भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 505

४८४ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'वृष्णिनन्दन ! वहाँके पारिजात सब ओरसे सम्पूर्ण मनोवाञ्छित श्रेष्ठ रत्न टपकाते रहते हैं ॥ २२ ॥

गणास्तान्युपभुञ्जन्ति प्रवराणां महात्मनाम् ।
आज्ञया देवदेवस्य लोकनाथस्य केशव ॥ २३ ॥

'केशव ! वहाँ देवाधिदेव विश्वनाथकी आज्ञासे महात्मा प्रमथोंके समूह उन रत्नोंका उपभोग करते हैं ॥ २३ ॥

पारिजाताद् बहुगुणं फलं तेषां तथा वनम् ।
अभिमानं प्रभांश्चैव गुणा भूरिगुणास्तथा ॥ २४ ॥
मूर्तिमन्तश्च ते वृक्षाः सोमं देवं वृषध्वजम् ।
उपनिष्ठन्ति सततं प्रवरैः सह केशव ॥ २५ ॥

'स्वर्गीय पारिजातकी अपेक्षा उन मन्दराचलवर्ती पारिजातोंका फल और वन कई गुना अच्छा है। उनमें अभिमान, प्रभा और गुण सभी स्वर्गीय पारिजातसे बढ़कर हैं। केशव ! वहाँके प्रचुर गुणशाली वृक्ष मूर्तिमान् होकर उमासहित भगवान् शङ्करकी प्रमथगणोंके साथ सदा उपासना करते हैं ॥

रौद्रेण तेजसा जुष्टा दुःखरैर्हीनाः सुखान्विताः ।
तरवो मन्दरे ते हि दयिताः शैलकन्यया ॥ २६ ॥

'मन्दराचलपर जो ये पारिजातके वृक्ष हैं, वे भगवान् रुद्रके तेजसे युक्त, दुःखरहित और सुखसे सम्पन्न हैं; अतः गिरिराजकुमारी उमाको वे विशेष प्रिय हैं ॥ २६ ॥

प्रविवेशान्धको नाम घोरस्तत्र महाबलः ।
दैतेयो वरदानेन दर्पितः पापनिश्चयः ॥ २७ ॥

'एक समयकी बात है, अन्धक नामसे प्रसिद्ध घोर महाबली और पापपूर्ण निश्चय रखनेवाला दैत्य, जो वरदानसे मदमत्त रहता था, उस पारिजात-वनमें घुस गया ॥ २७ ॥

स हतो देवदेवेन हरेणामित्रघातिना ।
अवध्यः सर्वभूतानां वृत्राद् दशगुणं बली ॥ २८ ॥

'वह वृत्रासुरसे दस गुना बलवान् और समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य था तो भी वहाँ शत्रुघाती देवाधिदेव महादेवने उसे मार डाला ॥ २८ ॥

एवं दुःखं न ते देव पारिजातं प्रदास्यति ।
पुष्कंराक्ष सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २९ ॥

'देव ! कमलनयन ! इस प्रकार दुःखके साथ कहना पड़ता है कि सहस्र नेत्रधारी इन्द्र आपको पारिजात नहीं देंगे । यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ २९ ॥

सततं सहितो देव्या शच्या स हि वरद्रुमः ।
सर्वकामप्रदः कृष्ण तथेन्द्राय महौजसे ॥ ३० ॥

'श्रीकृष्ण ! यह श्रेष्ठ वृक्ष हित-साधनकी शक्तिसे युक्त है । वह शचीदेवी तथा महापराक्रमी इन्द्रको सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थ देता रहता है' ॥ ३० ॥

श्रीभगवानुवाच

मुने तद् युज्यते साधु महादेवेन धीमता ।
यच्छचीकारणं कृत्वा न नीतः स तरुः पुरा ॥ ३१ ॥

श्रीभगवान् बोले—मुने ! पूर्वकालमें बुद्धिमान् महादेवजी शचीके कारण उस वृक्षको जो मन्दराचलपर नहीं ले गये, वह उनका कार्य ठीक जँचता है ॥ ३१ ॥

स ज्येष्ठः सर्वभूतानां लोककृत् प्रभवोऽव्ययः ।
पारावर्यस्य सदृशं कृतवानिति मे मतिः ॥ ३२ ॥

वे समस्त भूतोंके लिये ज्येष्ठ, लोकस्रष्टा, जगत्‌की उत्पत्तिके कारण और अविनाशी परमात्मा हैं। उन्होंने बड़े-छोटेकी जो लोकमर्यादा है, उसके अनुरूप ही कार्य किया । ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ३२ ॥

अहं यवीयान् देवस्य सर्वथा बलघातिनः ।
लालनीयश्च भगवञ्जयन्त इव सत्तम् ॥ ३३ ॥

परंतु भगवन् ! मुनिश्रेष्ठ ! मैं तो बलासुर-विनाशन देवेन्द्रका छोटा भाई हूँ; अतः जयन्तकी भाँति उनके द्वारा सर्वथा लाड़-प्यार पाने योग्य हूँ ॥ ३३ ॥

सर्वथा भगवांस्तावदुपायैर्बहुविस्तरैः ।
करोतु यत्नं प्रीत्यर्थं शक्तो ह्यसि तपोधन ॥ ३४ ॥

तपोधन ! आप बहुतेरे उपाय करके ऐसा यत्न करें, जिससे हमलोगोंमें प्रेम बना रहे; क्योंकि आप ऐसा करनेमें समर्थ हैं ॥ ३४ ॥

मया मुने प्रतिज्ञातं पुण्यार्थे सत्यभामया ।
स्वर्गादिहानयिष्यामि पारिजातमिति प्रभो ॥ ३५ ॥

मुने ! प्रभो ! मैंने सत्यभामाके पुण्यकव्रतका सम्पादन करनेके लिये यह प्रतिज्ञा की है कि मैं पारिजात वृक्षको स्वर्गसे यहाँ ले आऊँगा ॥ ३५ ॥

मया तदनृतं कर्तुं कथं शक्यं तपोधन ।
नानृतं हि वचो विप्र प्रोक्तं पूर्वं मयानघ ॥ ३६ ॥

निष्पाप तपोधन ! मैं अपने उस वचनको मिथ्या कैसे कर सकता हूँ । विप्रवर ! मैंने पहले भी कोई मिथ्या बात नहीं कही है ॥ ३६ ॥

मयि भग्नप्रतिज्ञे वै लोकानां विप्लवो भवेत् ।
यन्मया हि मुनिश्रेष्ठ लोकधर्मा गुणान्विताः ।
परिधार्याः स्थितौ सर्वे स कथं ह्यनृतं वदेत् ॥ ३७॥

मुनिश्रेष्ठ ! मेरी प्रतिज्ञा भग्न हो जानेपर समस्त लोकोंमें विप्लव मच जायगा (सब लोग झूठ बोलने लगेंगे)। मुझे तो जगत्‌की स्थितिके लिये उत्तम गुणसे युक्त समस्त लोक-धर्मोंको धारण करना चाहिये; जिसपर ऐसा उत्तरदायित्व हो, वह झूठ कैसे बोल सकता है ? ॥ ३७ ॥