विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 504, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टषष्टितमोऽध्यायः ४८३
तत्पर रहनेवाली अदिति आदि देवियोंने धर्मके लिये ही आपके उस उत्तम वृक्षको व्रतपालनपूर्वक (पतिसहित) दान कर दिया था (और उसे नारदजीने पुनः आपको लौटाया था)। प्रभो! इस बातको सुनकर मेरी पत्नियाँ भी पुण्य, दानधर्म तथा मेरी प्रसन्नताकी प्राप्तिके लिये उसका दान करना चाहती हैं॥ ५-६ १/२ ॥
आनाययद् द्वारवर्तीं पारिजात महाद्रुमम् ॥ ७ ॥
दत्ते दाने पुनः स्वर्गं तरुं त्वं नेतुमर्हसि ।
'इसीलिये आपके इस भाईने उस पारिजातनामक महान् वृक्षको द्वारकापुरीमें मँगवाया है। यहाँ दानका कार्य सम्पन्न हो जानेपर आप पुनः उस वृक्षको स्वर्गलोकमें ले जा सकते हैं॥
स वाच्य एवं भगवान् वलभिद् भगवंस्त्वया ॥ ८ ॥
तथा तथा प्रयत्नश्च कार्योऽस्मिन् मुनिसत्तम ।
यथा तरुवरं दद्यात् पारिजातं सुरेश्वरः ॥ ९ ॥
(अब वे नारदजीको सम्बोधित करके बोले—) 'भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! वलासुरका भेदन करनेवाले ऐश्वर्यशाली इन्द्रको आप मेरा संदेश इसी रूपमे सुनाइयेगा। इस विषयमें आपको वैसा-ही वैसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे देवेश्वर इन्द्र वह तरुश्रेष्ठ पारिजात मुझे दे दें॥ ८-९॥
तत्र दूतगुणं तावत् पश्यामस्ते तपोधन ।
सम्भाव्या सर्वकृत्यानां सम्पद्धि त्वयि मे मता ॥ १० ॥
'तपोधन! दूतमे जितने गुण होने चाहिये, वे सब मुझे आपके भीतर दिखायी देते हैं। मेरे मनमें आपको सौंपे गये सभी कार्योंकी सम्यक्रूपसे सिद्धिके लिये निश्चित सम्भावना बनी हुई है' ॥ १० ॥
एवं नारायणेनोक्तो नारदो भगवानृषिः।
प्रहस्योवाच केशिघ्नमिदं वाक्यं तपोधनः ॥ ११ ॥
नारायणस्वरूप श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर तपोधन भगवान् नारद मुनिने हँसकर केशिनाशन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—॥ ११ ॥
बाढमेवं प्रवक्ष्यामि यदुमुख्य सुरेश्वरम् ।
न तु दास्यति देवेन्द्रः पारिजातं कथंचन ॥ १२ ॥
'यदुश्रेष्ठ! मैं स्वीकार करता हूँ। मैं देवराज इन्द्रसे ऐसी ही बात कहूँगा; परंतु मुझे मालूम है कि देवराज इन्द्र उस पारिजात वृक्षको किसी तरह भी नहीं देंगे ॥ १२ ॥
मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं दानवैस्त्रिदशैस्तथा ।
निक्षिप्य तोयधौ पूर्वं पारिजातः समाहृतः ॥ १३ ॥
मन्दरात् पर्वतश्रेष्ठादानयितुं प्रेषितः पुरा ।
पारिजातं हरेणापि लोककर्त्रा जनार्दन ॥ १४ ॥
'जनार्दन ! पहलेकी बात है, दानवों और देवताओंने पर्वतश्रेष्ठ मन्दरको क्षीरसागरमे डालकर उसका मन्थन करके पारिजात वृक्षको वहाँसे निकाला था। तत्पश्चात् पूर्वकालमें गिरिश्रेष्ठ मन्दराचलसे लोककर्ता भगवान् शङ्करने उसी पारिजातको लेनेके लिये मुझे इन्द्रके पास भेजा था ॥ १३-१४ ॥
स्वयं विज्ञापितो गत्वा ततः शक्रेण शङ्करः ।
आक्रीडद्रुम उद्याने शच्याः स्यादिति याचितः ॥ १५॥
'उस समय इन्द्रने स्वयं ही जाकर भगवान् शङ्करसे प्रार्थना की और नम्रतापूर्वक यह निवेदन किया कि वह वृक्ष शचीके उद्यानमें क्रीड़ावृक्षके रूपमें रहे ॥ १५ ॥
तथास्त्विति वरो दत्तो महादेवेन चानघ ।
न च नीतः पारिजातो मन्दरं चित्रकन्दरम् ॥ १६ ॥
'अनघ! तब महादेवजीने 'तथास्तु' कहकर इन्द्रको उसे रखनेके लिये वरदान दे दिया। फिर वे विचित्र कन्दराओंसे सुशोभित मन्दराचलपर उस पारिजात वृक्षको नहीं ले गये॥
क्रीडावृक्षः स शच्या्ति व्यपदेशेन मोक्षितः ।
महेन्द्रेण महाबाहो पारिजातस्ततः पुरा ॥ १७ ॥
'महाबाहो! इस तरह प्राचीनकालमें महेन्द्रने 'वह शचीका क्रीड़ा-वृक्ष है' ऐसा बहाना बनाकर पारिजातको शङ्करजीके अधिकारसे छुड़ा लिया ॥ १७ ॥
प्रियार्थमुमया साक्षात् पारिजातवनं हरः।
गव्यूतिशतविस्तीर्णं मन्दरस्यैव कन्दरम् ॥ १८ ॥
'तब उमादेवीका प्रिय करनेके लिये साक्षात् भगवान् शिवने मन्दराचलकी दो सौ कोस विस्तृत कन्दराको ही पारिजातके वनसे परिपूर्ण कर दिया ॥ १८ ॥
न तत्र सूर्यभाः कृष्ण प्रविशन्ति नगोत्तमे ।
न च चन्द्रप्रभा शीता नैव कृष्ण सदागतिः ॥ १९ ॥
'श्रीकृष्ण! उस श्रेष्ठ पर्वतपर वहाँ न तो सूर्यकी प्रभा पहुँच पाती है, न चन्द्रमाकी शीतल किरणोंका प्रवेश होता है और न वायुकी ही पहुँच हो पाती है ॥ १९ ॥
शीतोष्णे छन्दतस्तत्र शैलपुत्र्या भवन्ति हि ।
स्वयंप्रभं वनं तद्धि महादेवस्य तेजसा ॥ २० ॥
'वहाँ गिरिराजनन्दिनी उमाकी इच्छाके अनुसार सर्दी और गर्मी होती है। महादेवजीके तेजसे वह वन स्वयं ही प्रकाशित होता रहता है ॥ २० ॥
वर्जयित्वा महादेवी सगणौ यदुनन्दन ।
मां चान्यस्तद्वनं दिव्यं न प्रयाति कथंचन ॥ २१ ॥
'यदुनन्दन! महादेवी पार्वती, महादेव शिव, उन दोनोंके गण तथा मुझको छोड़कर दूसरा कोई उस दिव्य वनमें किसी तरह नहीं जाने पाता है ॥ २१ ॥
स्रवन्ति तत्र वार्ष्णेय पारिजाताः समन्ततः ।
सर्वरत्नानि मुख्यानि मनसा काङ्क्षितानि वै ॥ २२ ॥