विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 503, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४८२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
‘तदनन्तर शुभलक्षणा देवी अदितिने पुण्य और सौभाग्यकी वृद्धिके लिये उस वृक्षके पास कश्यपजीको बाँधकर मुझे दान कर दिया था ॥ ६६ ॥
अदित्या कश्यपो दत्तः पुण्यार्थं च तथा मम ।
पुष्पस्रग्भा वेष्टयित्वा कण्ठे पुण्यार्थमात्मवान् ॥ ६७ ॥
‘अदितिने पुण्यके लिये कश्यपजीके गलेमें फूलोंकी माला लपेटकर उन मनस्वी मुनिको मेरे हाथमें दानके रूपमें दे दिया था। उस दानका एकमात्र उद्देश्य था पुण्यकी प्राप्ति एवं वृद्धि ॥ ६७ ॥
निष्क्रयेण मया मुक्तः कश्यपस्तु तपोधनः ।
इन्द्रो दत्तस्त्वथेन्द्राण्या सौभाग्यार्थे ततो मम ॥ ६८ ॥
‘उस समय मैंने निष्क्रय (मूल्य) लेकर तपोधन कश्यपको मुक्त कर दिया था। इसी प्रकार इन्द्राणीने भी सौभाग्यकी वृद्धिके लिये मुझे इन्द्रका दान कर दिया था ॥ ६८ ॥
सोमश्चाप्यथ रोहिण्या ऋद्ध्या च धनदस्तथा ।
एवं सौभाग्यदो वृक्षः पारिजातो न संशयः ॥ ६९ ॥
‘रोहिणीने सोमका तथा ऋद्धिने धनाध्यक्ष कुबेरका दान भी इसी उद्देश्यसे किया था। इस प्रकार वह पारिजात वृक्ष सौभाग्य प्रदान करनेवाला है, इसमें संशय नहीं है ॥
परि जातो विष्णुपद्याः पारिजातेतिशब्दितः ।
मन्दारपुष्पैर्युक्तो मन्दारस्तेन कथ्यते ॥ ७० ॥
‘यह वृक्ष विष्णुपदी गङ्गाके ऊपर प्रकट हुआ था, इसलिये इसका नाम पारिजात हुआ। मन्दारके फूलोंसे भी संयुक्त होनेके कारण यह मन्दार कहलाता है ॥ ७० ॥
कोऽप्ययं दारुरित्याहुरजानन्तो यतो जनाः ।
कोविदार इति ख्यातस्ततः स सुमहातरुः ॥ ७१ ॥
‘जो लोग इसे नहीं जानते थे, वे इसे देखकर कहने लगे—‘कोऽप्ययं दारुः’ (यह कोई दारु है); इसलिये वह महान् वृक्ष कोविदार नामसे विख्यात हो गया ॥ ७१ ॥
मन्दारः कोविदारश्च पारिजातश्च नामभिः ।
स वृक्षो ज्ञायते दिव्यो यस्यैतत् कुसुमोत्तमम् ॥ ७२ ॥
‘इस प्रकार वह दिव्य वृक्ष मन्दार, कोविदार और पारिजात--इन तीन नामोंसे जाना जाता है, जिसका यह उत्तम पुष्प मै लाया था’ ॥ ७२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि पारिजातहरणे सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पारिजातहरणविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
अष्टषष्टितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका पारिजात वृक्ष माँगनेके लिये नारदजीके द्वारा इन्द्रके पास संदेश भेजना और न देनेपर उन्हें गदा मारनेकी धमकी देना
वैशम्पायन उवाच
ततो जिगमिषुं तत्र नारदं मुनिसत्तमम् ।
प्रोवाच भगवान् विष्णुरप्रमेयपराक्रमः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर अनन्त पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णने इन्द्रलोकको जानेकी इच्छावाले मुनिश्रेष्ठ नारदसे वहाँ इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
महर्षे धर्मतत्त्वज्ञ स्वर्गं गत्वा त्वयानघ ।
दृष्ट्वा सदस्यान् देवस्य त्रिपुरघ्नस्य धीमतः ॥ २ ॥
अनाज्ञया मद्वचनाद् विज्ञाप्यः पाकशासनः ।
सम्भावयित्वा भ्रातृत्वं पौराणं वेत्सि यन्मुने ॥ ३ ॥
‘धर्मके तत्त्वको जाननेवाले निष्पाप महर्षे ! आप स्वर्गमें जाकर (वहाँ उत्सव देखनेके लिये पधारे हुए) बुद्धिमान् त्रिपुरविनाशक देव रुद्रके सदस्यों (पार्षद गणों) का दर्शन करके मेरे शब्दोंमें पाकशासन इन्द्रसे मेरी एक प्रार्थना सुनाइयेगा। मुने ! मुझमें और इन्द्रमें जो पुराना (वामनावतारके समयका) भ्रातृभाव है, उसे तो आप जानते ही हैं। उसीको सादर सामने रखते हुए उनसे इस तरह बात कीजियेगा, जिससे मेरी ओरसे आज्ञा देनेका भाव प्रकट न हो ॥ २-३ ॥
यमस्राक्षीन्मुनिश्रेष्ठो भगवान् कश्यपस्तरुम् ।
पारिजातं पुरादित्याः सुखार्थं धर्मसत्तमः ॥ ४ ॥
स पुण्यमतिसौभाग्यं ददाति तरुसत्तमः ।
(नारदजीसे ऐसा कहकर श्रीकृष्णने अपना संदेश इस प्रकार उपस्थित किया—) ‘देवराज ! पूर्वकालमें धर्मात्माओंमें उत्तम मुनिश्रेष्ठ भगवान् कश्यपने देवमाता अदितिको सुख पहुँचानेके लिये जिस पारिजात वृक्षकी सृष्टि की थी, वह सब वृक्षोंमें श्रेष्ठ है और दानमे दिये जानेपर अत्यन्त सौभाग्य तथा पुण्य प्रदान करता है ॥ ४ ½ ॥
तव दत्तं पुरा दानं व्रतेन तरुमुत्तमम् ॥ ५ ॥
देवीभिर्धर्मनित्याभिर्धर्मार्थममरोत्तम ।
दत्तं श्रुत्वाभिकाङ्क्षन्ति दातुं पत्न्यो मम प्रभो ॥ ६ ॥
पुण्यार्थं दानधर्मार्थं मम प्रीत्यर्थमेव च ।
‘अमरश्रेष्ठ ! सुननेमें आया है कि पहले सदा धर्ममें