भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 502

विष्णुपर्व ] सप्तषष्टितमोऽध्यायः ४८१

से निकलीं और महात्मा नारदजीको नमस्कार करके श्रीकृष्णके पार्श्वभागमें बैठ गयीं ॥ ४९ ॥

ततो मुहूर्तमासित्वा नारदः कृष्णमब्रवीत् । आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शक्रलोकमधोक्षज ॥ ५० ॥

'दो घड़ीतक बैठनेके पश्चात् नारदजीने श्रीकृष्णसे कहा— 'अधोक्षज ! अब मैं इन्द्रलोकको जाऊँगा; अतः जानेकी अनुमति चाहता हूँ ॥ ५० ॥

तत्राद्यं देवमीशानं नमस्कृत्य महेश्वरम् । गास्यन्ति देवगन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५१ ॥

'वहाँ देवगन्धर्व और अप्सराएँ आदिदेव ईशान भगवान् महेश्वरको नमस्कार करके उनकी प्रसन्नताके लिये नृत्य एवं गान करेंगी ॥ ५१ ॥

मासि मास्युचितं ह्येतन्महेन्द्रसदने प्रभो । पूजार्थं देवदेवस्य गान्धर्वं नृत्यमेव च ॥ ५२ ॥

'प्रभो ! देवाधिदेव महादेवजीकी पूजाके लिये महेन्द्र-भवनमें प्रतिमास इस नृत्य और गानका समुचित आयोजन होता है ॥ ५२ ॥

अन्तर्हितो देवदेवः सोमः सप्रवरो विभुः । पश्यत्यमरमुख्येन कृतं भक्त्याद्रिघातिना ॥ ५३ ॥

'पर्वतोंका विघात करनेवाले देवश्रेष्ठ इन्द्रद्वारा भक्तिभावसे किये गये उस आयोजनको अपने श्रेष्ठ पार्षदों तथा भगवती उमासहित देवाधिदेव भगवान् महादेव अदृश्य रहकर देखते हैं ॥ ५३ ॥

निमन्त्रितोऽहं पूर्वेद्युः पुष्पं दत्त्वा महाद्युते । पारिजातस्य भद्रं ते तरुराज्ञो महात्मनः ॥ ५४ ॥

'महाद्युते ! आपका भला हो । इन्द्रने विशालकाय वृक्षराज पारिजातका फूल देकर पहले ही दिन मुझे वहाँ आनेके लिये निमन्त्रित किया था ॥ ५४ ॥

यदेतदाहृतं स्वर्गात् त्वदर्थं तु मया विभो । देवोपभोग्यमेतद्धि तरुराजसमुद्भवम् ॥ ५५ ॥

'प्रभो ! तरुराज पारिजातका यह फूल, जिसे मैं स्वर्गसे आपके लिये ही लाया था, देवताओंके उपभोगकी वस्तु है ॥

हृष्टः स वृक्षः सततं शच्याः पुष्करलोचन । सौभाग्यमावहत्येव पूज्यमानोऽपि नित्यशः ॥ ५६ ॥

'कमलनयन ! वह वृक्ष इन्द्रपत्नी शचीको सदा ही प्रिय है। प्रतिदिन पूजित होनेपर वह अवश्य ही सौभाग्यकी प्राप्ति कराता है ॥ ५६ ॥

पुण्यं कर्तुं तदा सृष्टः पारिजातो महाद्रुमः । अदित्या धर्मनित्येन कश्यपेन महात्मना ॥ ५७ ॥

'धर्मपरायण महात्मा कश्यपने अदिति देवीके पुण्यकर्म-के लिये उस समय पारिजातनामक महावृक्षकी सृष्टि की थी ॥

पुरादित्या महातेजास्तोषितः किल कश्यपः । वरेण च्छन्दयामास मारीचस्तपसो निधिः ॥ ५८ ॥

'कहते हैं, पूर्वकालमें अदितिदेवीने महातेजस्वी कश्यप मुनिको अपनी सेवासे संतुष्ट किया । तब तपोनिधि मरीचिनन्दन कश्यपने उन्हे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ॥

सोवाच सुभगा येन भवेयं मुनिसत्तम । स्वलंकृता कामतश्च सर्वैरेव विभूषणैः ॥ ५९ ॥ ईप्सितं गीतनृत्यं च भवेन्मम तपोधन । कुमारी नित्यदा चैव भवेयं तपसो निधे ॥ ६० ॥ विरजा शोकरहिता भवेयमिति नित्यदा । पतिभक्तिमती चैव धर्मशीला तथैव च ॥ ६१ ॥

'उस समय उन्होंने उनसे कहा—'मुनिश्रेष्ठ ! मुझे कोई ऐसी वस्तु दीजिये, जिससे मैं सदा सौभाग्यशालिनी बनी रहूँ। इच्छा होते ही समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो जाऊँ । तपोधन ! मुझे मनोवाञ्छित गीत और नृत्य प्राप्त होता रहे । तपनिधे ! मैं सदा कुमारी-सी ही बनी रहूँ और निर्मल, शोकरहित, पतिभक्तिमती एवं धर्मशीला होऊँ' ॥५९-६१॥

पारिजातं ततोऽस्राक्षीददित्याः प्रियकाम्यया । सर्वकामप्रदः पुष्पैरावृतं नित्यगन्धदैः ॥ ६२ ॥

'तब मुनिवर कश्यपने अदितिका प्रिय करनेकी इच्छासे पारिजातकी सृष्टि की; जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंको देनेमें समर्थ और नित्य सुगन्धप्रद फूलोंसे भरा रहता है ॥

त्रिशाखं सर्वदा दृश्यं सर्वभूतमनाहरम् । सर्वपुष्पाणि दृश्यन्ते तस्मिन्नेव महाद्रुमे ॥ ६३ ॥

'वह सदा तीन शाखाओसे ही युक्त दिखायी देता है और अपनी शोभासे सम्पूर्ण प्राणियोंका मन हर लेता है। उसी महान् वृक्षमे सभी तरहके फूल दिखायी देते हैं ॥६३॥

ईदृशान्यपि पुष्पाणि बिभर्त्येकापि रूपिणी । बहुरूपाणि चाप्यन्या पद्मानि च ततोऽपरा ॥ ६४ ॥

'देवताओंकी कोई रूपवती स्त्री तो ऐसे फूल भी धारण करती है (जैसे मै यहाँ लाया था), दूसरी उसके अनेक रूपवाले फूलोंको ग्रहण करती है तथा तीसरी उस वृक्षसे केवल कमल-जैसे फूलोंको ही चुनती है ॥ ६४ ॥

मन्दारादपि वृक्षाच्च सारमुद्धृत्य कश्यपः । तस्मादेष तरुश्रेष्ठः सर्वेषां श्रेष्ठतां गतः ॥ ६५ ॥

'कश्यपजीने मन्दार-वृक्षसे भी सार निकालकर इस वृक्षका निर्माण किया था; इसलिये यह तरुश्रेष्ठ पारिजात समस्त देववृक्षोमे उत्कृष्ट माना गया है ॥ ६५ ॥

ततस्तत्र निबध्याथ कश्यपं प्रददौ शुभा । अदितिर्मम पुण्यार्थं सौभाग्यार्थं तथैव च ॥ ६६ ॥

म० ह०