भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 501
४८०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

मन्युरेव प्रमृष्टो हि भवेद् बहुगुणं मम।
सीमन्तिनीनां सर्वासामधिका स्यामधोक्षज ॥ ३४ ॥

भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर हरिवल्लभा सत्यभामा बोलीं—'अच्युत ! यदि इस प्रकार उस वृक्षको यहाँ लाया जा सके तो मैंने यह रोष त्याग दिया और मेरा सुख कई गुना बढ़ सकता है। अधोक्षज ! उस दशामें मैं समस्त भाग्यवती स्त्रियोंमें सबसे अधिक गौरवशालिनी हो जाऊँगी' ॥ ३३-३४ ॥

तथास्तु प्रथमः कल्प इति तां मधुसूदनः।
प्रोवाचाप्रतिमो देवो जगतः प्रभवोऽव्ययः ॥ ३५ ॥

तब जगत्‌की उत्पत्ति और प्रलयके कारणभूत अनुपम देवता भगवान् मधुसूदनने उनसे कहा 'अच्छा तो तुम्हारा रोष शान्त करनेके लिये यही सर्वोत्तम उपाय हो' ॥ ३५ ॥

तथेत्युक्तेति कृष्णेन तुतोष समितिंजय।
सत्यभामा सतामिष्टा कंसनाशनवल्लभा ॥ ३६ ॥

युद्धमें विजय पानेवाले जनमेजय ! जब श्रीकृष्णने 'तथास्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, तब सत्पुरुषोंकी इष्टदेवी और कंसनाशन श्रीकृष्णकी वल्लभा सत्यभामा बहुत संतुष्ट हुईं ॥ ३६ ॥

ततः स्नातो जगन्नाथः सर्वेशः सर्वभावनः।
चकारावश्यकं सर्वं सर्वकामप्रदः सताम् ॥ ३७ ॥

तदनन्तर सबकी उत्पत्ति करनेवाले सर्वेश्वर जगन्नाथ श्रीकृष्णने, जो सत्पुरुषोंकी सम्पूर्ण कामनाओंके दाता हैं, स्नान और अन्य सब आवश्यक कार्य किया ॥ ३७ ॥

दध्यौ च नारदं देवः स्नातो देवमुनिर्नृप ।
अभ्याजगाम स्नानान्ते मुनिश्रेष्ठो महोदधौ ॥ ३८ ॥

नरेश्वर ! तत्पश्चात् भगवान्‌ने देवर्षि नारदका चिन्तन किया। नारदजी उस समय महासागरमें स्नान कर रहे थे। स्नानके पश्चात् वे मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णके पास आये ॥ ३८ ॥

तमागतं नरपते सतां गतिरधोक्षजः।
सत्यया सह धर्मात्मा यथाविधि अपूजयत् ॥ ३९ ॥

राजन् ! उन्हें आया देख सत्पुरुषोंके आश्रयदाता धर्मात्मा अधोक्षज श्रीकृष्णने सत्याके साथ उनका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ ३९ ॥

पादौ प्रक्षालयाञ्चक्रे मुनेः सत्राजिती स्वयम्।
जलं देवः स्वयं कृष्णो भृङ्गारेण ददौ तदा ॥ ४० ॥

उस समय सत्राजित्‌की पुत्रीने स्वयं ही नारदजीके दोनों पैर धोये और भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं ही झारीसे जल गिराया ॥ ४० ॥

अथोपकल्पयामास सुखासीनाय केशवः।
परमान्नं स मुनये प्रयतात्मा जगद्गुरुः ॥ ४१ ॥

जब वे सुखपूर्वक बैठ गये, तब अपने मनको वशमें रखनेवाले जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णने मुनिके लिये उत्तम अन्न परोसा ॥ ४१ ॥

तल्लोककर्ता सत्कृत्य दत्तं मुनिरुदारधीः।
बुभुजे वदतां श्रेष्ठः श्रद्धया परया युतः ॥ ४२ ॥

लोकस्रष्टा भगवान् श्रीहरिके सत्कारपूर्वक दिये हुए उस अन्नको वक्ताओंमें श्रेष्ठ उदारबुद्धि नारद मुनिने बड़ी श्रद्धाके साथ भोजन किया ॥ ४२ ॥

उपस्पृश्य ततस्तुष्टः प्रददौ चाशिषः प्रभो ।
ताश्च प्रीतेन मनसा प्रतिजग्राह केशवः ॥ ४३ ॥

प्रभो ! तदनन्तर हाथ-मुँह धो आचमन करके तृप्त हुए मुनिने भगवान्‌को बहुत-से आशीर्वाद दिये और भगवान् केशवने प्रसन्न चित्तसे उन आशीर्वादोंको ग्रहण किया ॥ ४३ ॥

ततः सत्राजितीं देवीं प्रणतां नारदोऽब्रवीत् ।
प्रसार्य दक्षिणं हस्तं सजलं जलजेक्षणाम् ॥ ४४ ॥

तत्पश्चात् नारदजी अपने चरणोंमें प्रणाम करनेवाली कमलनयनी सत्राजित्-पुत्री सत्यभामा देवीसे भीगे हुए दाहिने हाथको फैलाकर बोले—॥ ४४ ॥

यथेदानीं तथैव त्वं भव देवि पतिव्रता।
सविशेषं च सुभगा भव मत्तपसो बलात् ॥ ४५ ॥

'देवि ! तुम इस समय जैसी हो, वैसी ही पतिव्रता सदा बनी रहो तथा मेरे तपके बलसे तुम विशेष सौभाग्यशालिनी होओ' ॥ ४५ ॥

इत्युक्ता मुनिमुख्येन सत्यभामा हरिप्रिया।
उत्तस्थौ महता युक्ता हर्षेण तु नराधिप ॥ ४६ ॥

नरेश्वर ! मुनिप्रवर नारदजीके ऐसा कहनेपर हरिप्रिया सत्यभामा महान् हर्षसे उत्फुल्ल होकर उठीं ॥ ४६ ॥

स कृष्णोऽप्यभ्यनुज्ञां तु लब्ध्वा मुनिवरात् तदा।
बुभुजे विघसं धीमानप्रमेयपराक्रमः ॥ ४७ ॥

उस समय मुनिवर नारदजीसे आज्ञा लेकर अप्रमेय पराक्रमी बुद्धिमान् श्रीकृष्णने भी यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन किया ॥

ततस्त्वावश्यकं कृत्वा सत्यभामापि भारत।
अनुज्ञया तदा भर्तुर्विवेशान्तर्गृहं मुदा ॥ ४८ ॥

भरतनन्दन ! तदनन्तर आवश्यक कृत्य करके सत्यभामा-ने भी पतिकी आज्ञासे अपने घरके भीतर प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया ॥ ४८ ॥

ततो विनिर्गता देवी कृष्णस्यैवाभ्यनुज्ञया।
स्थिता पार्श्वे च कृष्णस्य नमस्कृत्या महात्मने ॥ ४९ ॥

इसके बाद पुनः श्रीकृष्णकी ही आज्ञासे सत्यभामादेवी भीतर-