विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 480, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] त्रिषष्टितमोऽध्यायः ४५७
जब परम पराक्रमी महाबाहु श्रीकृष्ण द्वारकाको लौट आये, तब उन्होंने क्या किया, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच स तैः परिवृतः श्रीमान् पुरीं यादवनन्दनः । द्वारकां भगवान् विष्णुः प्रत्यवैक्षत वीर्यवान् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! श्रीमान् यादव-नन्दन पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण उन यादवोंसे घिरे हुए जब द्वारकाको आये, तब उन्होंने उस पुरीका भलीभाँति निरीक्षण किया ॥ २ ॥
प्रत्यपद्यत रत्नानि विविधानि वसूनि च । यथार्हं पुण्डरीकाक्षो नैर्ऋतान् प्रत्यवारयत् ॥ ३ ॥
कमलनयन श्रीकृष्णने जो नाना प्रकारके धन और रत्न प्राप्त किये थे, उनका वे द्वारकामें यथोचितरूपसे संरक्षण करते थे और उन्हें हड़पनेकी इच्छावाले राक्षसोंको उन्होंने मार भगाया था ॥ ३ ॥
तत्र विघ्नं चरन्ति स्म दैतेयाः सह दानवैः । ताञ्जघान महाबाहुर्वरदृप्तान् महासुरान् ॥ ४ ॥
वहाँ उनके मार्गमें दैत्य और दानव विघ्न डाला करते थे । महाबाहु श्रीकृष्णने वर पाकर उन्मत्त हुए उन बड़े-बड़े असुरोंको मार डाला ॥ ४ ॥
विघ्नं चास्याकरोत् तत्र नरको नाम दानवः । त्रासनः सर्वदेवानां देवराजरिपुर्महान् ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् नरक नामक दानवने भगवान्के कार्यमें विघ्न डालना आरम्भ किया । वह समस्त देवताओंको भयभीत करनेवाला तथा देवराज इन्द्रका महान् शत्रु था ॥ ५ ॥
स भूमौ मूर्तिलिङ्गस्थः सर्वदेवाधिबाधितः । देवतानामृषीणां च प्रतीपमकरोत् तदा ॥ ६ ॥
समस्त देवताओंको बाधा देनेवाला नरकासुर भूमिके भीतर मूर्तिलिङ्गमें स्थित होकर देवताओं और ऋषियोंके प्रति-कूल आचरण किया करता था ॥ ६ ॥
त्वष्टुर्दुहितरं भौमः कशेरुमगमत् तदा । गजरूपेण जग्राह रुचिराङ्गीं चतुर्दशीम् ॥ ७ ॥
भूमिका पुत्र होनेसे नरकको भौमासुर भी कहते हैं । उसने हाथीका रूप धारण करके प्रजापति त्वष्टाकी पुत्री कशेरुके, जो चौदह वर्षकी अवस्थावाली तथा सुन्दर अङ्गोंसे सुशोभित थी, समीप जाकर उसे पकड़ लिया ॥ ७ ॥
१ १. मूर्ति या शिवलिङ्गके आकारका कोई दुर्भेद्य गृह, जो पृथ्वीके भीतर गुफामें बनाया गया हो । शत्रुओंसे आत्मरक्षाकी दृष्टिसे नरकासुरने ऐसे निवासस्थानका निर्माण करा रखा था ।
प्रमथ्य तां वरारोहां नरको वाक्यमब्रवीत् । नष्टशोकभयो मोहात् प्राग्ज्योतिषपतिस्तदा ॥ ८ ॥
नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका राजा था । उसके शोक और भय नष्ट हो गये थे । वह मोहवश सुन्दरी कशेरुको अपनी दोनों भुजाओंमें दबाकर हर ले गया और उससे इस प्रकार बोला—॥ ८ ॥
यानि देवमनुष्येषु रत्नानि विविधानि च । बिभर्ति च मही कृत्स्ना सागरेषु च यद् वसु ॥ ९ ॥ अद्यप्रभृति तानीह सहिताः सर्वनेर्ऋताः । तवैवोपाहरिष्यन्ति दैत्याश्च सह दानवैः ॥ १० ॥
'देवि ! देवता और मनुष्योंके पास जो नाना प्रकारके रत्न हैं, सारी पृथ्वी जिन रत्नोंको धारण करती है तथा समुद्रोंमें जो रत्न संचित हैं, उन सबको आजसे सभी राक्षस, दैत्य और दानव भी तुम्हें ही लाकर दिया करेंगे' ॥ ९-१०॥
एवमुत्तमरत्नानि वस्त्राणि विविधानि च । स जहार तदा भौमस्तच्च नाधिचकार सः ॥ ११ ॥
इस प्रकार भौमासुरने नाना प्रकारके उत्तम रत्नों और भाँति-भाँतिके वस्त्रोंका उस समय अपहरण किया था । अप-हरण करके भी उसने उनपर अधिकार नहीं किया (उन्हें अपने उपभोगमें नहीं लाया ) ॥ ११ ॥
गन्धर्वाणां च याः कन्या जहार नरको बली । याश्च देवमनुष्याणां सप्त चाप्सरसां गणाः ॥ १२ ॥
गन्धर्वोंकी जो कन्याएँ थीं, उन्हें भी बलवान् नरकासुर हर लाया था । देवताओं और मनुष्योंकी कन्याओं तथा अप्सराओंके सात समुदायोंका भी उसने अपहरण कर लिया ॥ १२ ॥
चतुर्दश सहस्राणि एकविंशच्छतानि च । एकवेणीधराः सर्वाः सतीमार्गमनुव्रताः ॥ १३ ॥
इस प्रकार सोलह हजार एक सौ सुन्दरी स्त्रियाँ उसके घरमें एकत्र हो गयीं । वे सब-की-सब सतियोंके मार्गका अनु-सरण करके व्रत और नियमोंके पालनमें तत्पर हो एक वेणी धारण करती थीं ॥ १३ ॥
वैशम्पायन उवाच तासां पुरवरं भौमोऽकारयन्मणिपर्वतम् । अलकायामदीनात्मा मुरोः स्वविषयं प्रति ॥ १४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उदार हृदय-वाले भौमासुरने उनके रहनेके लिये मणिपर्वतपर एक श्रेष्ठ पुरका निर्माण कराया था । जिस स्थानपर वह पुर बना था, वह अलका नामसे प्रसिद्ध था । वह स्थान मुर नामक दैत्यके अधिकृत प्रदेशमें था ॥ १४ ॥