भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 474
४५२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तब उस विदर्भराजकुमारीने आकर शत्रुसूदन प्रद्युम्नका वरण कर लिया ॥ ५ ॥

स हि सर्वास्त्रकुशलः सिंहसंहननो युवा ।
रूपेणाप्रतिमो लोके केशवस्यात्मजोऽभवत् ॥ ६ ॥

प्रद्युम्न सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञान एवं प्रयोगमें कुशल थे । उनका शरीर सिंहके समान सुदृढ़ था । वे नवयुवक थे । रूपमें श्रीकृष्णके उस पुत्रकी समानता करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं था ॥ ६ ॥

वयोरूपगुणोपेता राजपुत्री च साभवत् ।
नारायणीवेन्द्रसेना जातकामा च तं प्रति ॥ ७ ॥

वह राजकुमारी भी नयी अवस्था, सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थी । जैसे नारायणी इन्द्रसेना अपने पति महर्षि मुद्गलके प्रति प्रेम करती थी, उसी प्रकार शुभाङ्गी भी प्रद्युम्नके प्रति अनुरक्त थी ॥ ७ ॥

वृत्ते स्वयंवरे जग्मू राजानः स्वपुराणि ते ।
उपादाय च वैदर्भीं प्रद्युम्नो द्वारकां ययौ ॥ ८ ॥

स्वयंवर समाप्त हो जानेपर सब राजा अपने-अपने नगरको चले गये और प्रद्युम्न उस विदर्भराजकुमारीको साथ लेकर द्वारका चले आये ॥ ८ ॥

रेमे सह तया वीरो दमयन्त्या नलो यथा ।
स तस्यां जनयामास देवगर्भोपमं सुतम् ॥ ९ ॥

वीर प्रद्युम्न उसके साथ उसी प्रकार रमण करने लगे, जैसे राजा नल दमयन्तीके साथ करते थे । उन्होंने वैदर्भीके गर्भसे देवकुमारके समान तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया ॥ ९ ॥

अनिरुद्धमिति ख्यातं कर्मणाप्रतिमं भुवि ।
धनुर्वेदे च वेदे च नीतिशास्त्रे च पारगम् ॥ १० ॥

उसका नाम था अनिरुद्ध । वह अपने पराक्रमपूर्ण कार्यद्वारा भूमण्डलमें अनुपम वीर माना जाता था । वह धनुर्वेद, वेद तथा नीतिशास्त्रका पारंगत विद्वान् था ॥ १० ॥

अभवत् स यदा राजन्ननिरुद्धो वयोऽन्वितः ।
तदास्य रुक्मिणः पौत्रीं रुक्मिणी रुक्मसंनिभाम् ।
पत्न्यर्थे वरयामास नाम्ना रुक्मवतीति सा ॥ ११ ॥

राजन् ! जब अनिरुद्ध युवावस्थासे सम्पन्न हुए, तब रुक्मिणीने उनकी पत्नी बनानेके लिये रुक्मीकी पौत्रीको, जो सुवर्णके समान गौर वर्णवाली थी, उससे माँगा । उसका नाम था रुक्मवती ॥ ११ ॥

अनिरुद्धगुणैर्दातुं कृतबुद्धिर्नृपस्ततः ।
प्रीत्या हि रौक्मिणेयस्य रुक्मिण्याश्चाप्युपग्रहात् ॥ १२ ॥
विस्पर्द्धन्नपि कृष्णेन वैरं त्यज्य महायशाः ।
ददामीत्यब्रवीद् राजा प्रीतिमाञ्जनमेजय ॥ १३ ॥

जनमेजय ! राजा रुक्मी अनिरुद्धके गुणोंसे ही आकृष्ट होकर अपनी पौत्रीका विवाह उनके साथ करना चाहता था, अतः रुक्मिणीके आग्रहसे उसे राजी रखनेके लिये तथा प्रद्युम्नकी प्रसन्नताके निमित्त उस महायशस्वी राजाने श्रीकृष्णके साथ स्पर्धा रखते हुए भी वैर त्यागकर प्रसन्नतापूर्वक कहा कि 'मैं अपनी पौत्री अनिरुद्धके लिये दे रहा हूँ' ॥ १२-१३ ॥

केशवः सह रुक्मिण्या पुत्रैः संकर्षणेन च ।
अन्यैश्च वृष्णिभिः सार्द्धं विदर्भान् सयलो ययौ ॥ १४ ॥

तब भगवान् श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी, प्रद्युम्न आदि पुत्रगण, भैया बलराम तथा अन्य वृष्णिवंशी योद्धाओंके साथ सेनासहित विदर्भदेशमें गये ॥ १४ ॥

संयुक्ता भ्रातयश्चैव रुक्मिणः सुहृदश्च ये ।
आहूता रुक्मिणा तेऽपि तत्राजग्मुर्नर्राधिपाः ॥ १५ ॥

उस विवाहोत्सवमें रुक्मीके भाई-बन्धु और सुहृद् नरेश भी उसका निमन्त्रण पाकर वहाँ आये थे ॥ १५ ॥

शुभे तिथौ महाराज नक्षत्रे चाभिपूजिते ।
विवाहः सोऽनिरुद्धस्य बभूव परमोत्सवः ॥ १६ ॥

महाराज ! शुभ तिथि तथा उत्तम नक्षत्रमें अनिरुद्धका वह परम उत्सवमय विवाह-कार्य सम्पन्न हुआ ॥ १६ ॥

पाणौ गृहीते वैदर्भ्यास्त्वनिरुद्धेन तत्र वै ।
वैदर्भायादवानां च बभूव परमोत्सवः ॥ १७ ॥

जब अनिरुद्धने विदर्भराजकुमारी रुक्मवतीका पाणिग्रहण किया, उस समय विदर्भनिवासियों तथा यादवोंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ ॥ १७ ॥

रेमिरे वृष्णयस्तत्र पूज्यमाना यथामराः ।
अथाश्मकानामधिपो वेणुदारिरुदारधीः ॥ १८ ॥
अक्षः श्रुतर्वा चाणूरः क्राथदन्तैर्वांशुमानपि ।
जयत्सेनः कलिङ्गानामधिपश्च महाबलः ॥ १९ ॥
पाण्ड्यश्च नृपतिः श्रीमान्नृपीकाधिपतिस्तथा ।
एते सम्बन्धय राजानो दाक्षिणात्या महर्द्धयः ॥ २० ॥
अभिगम्याब्रुवन् सर्वे रुक्मिणं रहसि प्रभुम् ।

वैदर्भोद्वारा पूजित हुए यदुवंशी वहाँ देवताओंके समान आनन्दपूर्वक रम रहे थे । इसी समय अश्मक देशका अधिपति उदारबुद्धि वेणुदारि, अक्ष, श्रुतर्वा, चाणूर, क्रथपुत्र अंशुमान्, कलिङ्गदेशका अधिपति जयत्सेन, राजा पाण्ड्य तथा श्रीमान् ऋषीकनरेश—ये सब अत्यन्त समृद्धिशाली दाक्षिणात्य नरेश एकान्तमे सामर्थ्यशाली रुक्मीके पास जाकर बोले—॥ १८-२०३ ॥

भवानक्षेषु कुशलो वयं चापि रिरंसवः ॥ २१ ॥
प्रियद्यूतश्च रामोऽसावक्षेप्वनिपुणोऽपि च ।

'आप अक्षविद्या (द्यूत) में कुशल हैं और हमलोग भी द्यूतक्रीड़ाकी इच्छा रखते हैं । उधर बलराम द्यूतक्रीड़ामें निपुण न होनेपर भी उससे प्रेम रखते हैं ॥ २१३ ॥