विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकषष्टितमोऽध्यायः [ ४५३
ते भवन्तं पुरस्कृत्य जेतुमिच्छाम तं वयम् ।
इत्युक्तो रोचयामास रुक्मी द्यूतं महारथः ॥ २२ ॥
'अतः हम चाहते हैं कि आपको आगे करके बलरामको द्यूतक्रीड़ाद्वारा जीत लें।' उनके ऐसा कहनेपर महारथी रुक्मीको जुआ खेलनेकी बात पसंद आ गयी ॥ २२ ॥
ते शुभां काञ्चनस्तम्भां कुसुमैर्धूपिताजिराम् ।
सभामाविविशुर्हृष्टाः सिक्तां चन्दनवारिणा ॥ २३ ॥
तदनन्तर वे समस्त भूपाल बड़े हर्षके साथ सुन्दर द्यूत-सभामें प्रविष्ट हुए, जिसमें सोनेके खम्भे लगे थे और जिसके आँगनको फूलोंसे सजाया गया था। उस सभामें चन्दनके जलसे छिड़काव किया गया था ॥ २३ ॥
तां प्रविश्य ततः सर्वे शुभ्रस्रगनुलेपनाः ।
सौवर्णेष्वासनेष्वासांचक्रिरे विजिगीषवः ॥ २४ ॥
सुन्दर माला और चन्दनसे अलंकृत हो उस सभामें प्रवेश करके वे सभी राजा सोनेके सिंहासनोंपर बैठ गये। उन सबकी यही इच्छा थी कि हम बलभद्रको जीत लें ॥ २४ ॥
आहूतो बलदेवस्तु कितवैरक्षकौविदैः ।
बाढमित्यब्रवीद्धृष्टः सह दीव्याम पण्यताम् ॥ २५ ॥
तदनन्तर द्यूतक्रीड़ामें निपुण जुआरियोंद्वारा बलदेवजीको आमन्त्रित किया गया। वे 'बहुत अच्छा' कहकर प्रसन्नतापूर्वक बोले—'अच्छा, हमलोग साथ-साथ खेलें। आपलोग दाँव लगाइये' ॥ २५ ॥
निकृत्या विजिगीषन्तो दाक्षिणात्या नराधिपाः ।
मणिमुक्ताः सुवर्णं च तत्रानिन्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥
छलसे जीतनेकी इच्छा रखनेवाले दाक्षिणात्य नरेश वहाँ सहस्रों मणि, मोती एवं सुवर्ण ले आये ॥ २६ ॥
ततः प्रावर्तत द्यूतं तेषां रतिविनाशनम् ।
कलहस्यास्पदं घोरं दुर्मतीनां क्षयावहम् ॥ २७ ॥
फिर तो उनमें द्यूत आरम्भ हुआ, जो पारस्परिक प्रेमका नाश करनेवाला एवं कलहका घोर स्थान है तथा दुर्बुद्धि पुरुषोंका संहार करनेवाला है ॥ २७ ॥
निष्काणां च सहस्राणि सुवर्णस्य दशादितः ।
रुक्मिणा सह सम्पाते बलदेवो ग्लहं ददौ ॥ २८ ॥
बलदेवजीने रुक्मीके साथ जुआ खेलते समय पहले दस हजार सोनेकी मोहरें दाँवपर रखीं ॥ २८ ॥
तं जिगाय ततो रुक्मी यतमानं महाबलम् ।
तावदेवापरं भूयो बलदेवं जिगाय सः ॥ २९ ॥
महाबली बलदेव जीतनेका प्रयत्न करते ही रह गये, परंतु रुक्मीने उस दाँवको जीत लिया। तत्पश्चात् उसने पुनः बलदेवका उतना ही सुवर्ण जीता ॥ २९ ॥
असकृज्जीयमानस्तु रुक्मिणा केशवाग्रजः ।
सुवर्णकोटीर्जग्राह ग्लहं तस्य महात्मनः ॥ ३० ॥
रुक्मीके द्वारा वारंवार जीते जानेपर श्रीकृष्णके बड़े भाई बलरामने उस महामनस्वी रुक्मीके दाँवपर एक करोड़ सुवर्णमुद्राएँ लेकर रक्खीं ॥ ३० ॥
जितमित्येव हृष्टोऽथ तमाहूतिरभाषत ।
श्लाघ्यमानश्च चिक्षेप प्रहसन् मुसलायुधम् ॥ ३१ ॥
रुक्मी अत्यन्त कुटिल था। वह हर्षमें भरकर बोल उठा—'मैंने ही जीता।' सब राजा उसकी प्रशंसा करने लगे। उसने हँसते हुए वहाँ मुसलधारी बलरामजीपर आक्षेप किया—॥ ३१ ॥
अविद्यो दुर्बलः श्रीमान् हिरण्यममितं मया ।
अजेयो बलदेवोऽयमक्षद्यूते पराजितः ॥ ३२ ॥
'ये श्रीमान् बलदेव विद्याहीन एवं दुर्बल हैं। ये अजेय बनते थे; परंतु आज इस अक्षद्यूतमें मुझसे पराजित हो गये। मैंने इनसे असंख्य सुवर्ण जीता है' ॥ ३२ ॥
कलिङ्गराजस्तच्छ्रुत्वा प्रजहास भृशं तदा ।
दन्तान् संदर्शयन् हृष्टस्तत्राक्रुद्ध्यद्धलायुधः ॥ ३३ ॥
रुक्मीकी वह बात सुनकर कलिङ्गराज हर्षसे उल्लसित हो उठा। वह अपने दाँत दिखा-दिखाकर जोर-जोरसे हँसने लगा। तब वहाँ बलरामजी कुपित हो उठे ॥ ३३ ॥
रुक्मिणस्तद् वचः श्रुत्वा पराजयनिमित्तजम् ।
निगृह्यमाणस्तीक्ष्णाभिर्वाग्भिर्भीष्मकसूनुना ॥ ३४ ॥
रोषमाहारयामास जितरोषोऽपि धर्मवित् ।
संक्रुद्धो घर्षणं प्राप्य रौहिणेयो महाबलः ॥ ३५ ॥
रुक्मीके उस वचनको, जो बलदेवजीकी पराजयको निमित्त बनाकर कहा गया था, जब उन्होंने सुना और जब भीष्मकपुत्र रुक्मी अपने तीखे वचनोंसे उन्हें निगृहीत करने लगा, तब महाबली रोहिणीकुमार बलरामजी उस तिरस्कारको पाकर अत्यन्त कुपित हो उठे। यद्यपि वे धर्मज्ञ थे, उन्होंने रोषपर विजय भी पायी थी, तो भी उस समय उनके मनमें बड़ा भारी रोष हुआ ॥ ३४-३५ ॥
धैर्यान्मनः संनिधाय ततो वचनमब्रवीत् ।
दशकोटिसहस्राणि ग्लह एको ममापरः ॥ ३६ ॥
एनं सम्परिगृह्णीष्व पातयाक्षान् नराधिप ।
कृष्णाक्षांल्लोहिताक्षांश्च देशेऽस्मिंस्त्वधिपांसुले ॥ ३७ ॥
इत्येवमाह्वयामास रुक्मिणं रोहिणीसुतः ।
इतनेपर भी उन्होंने धैर्यपूर्वक मनको काबूमें किया और इस प्रकार कहा—'विदर्भनरेश्वर ! दस सहस्र कोटि स्वर्ण मुद्राओंका यह मेरा एक दूसरा दाँव है। इसे ग्रहण करो और इस अधिक रजोगुणी देश-कालमें तुम काले और लाल पासे