विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 476, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४५४ | श्रीमद्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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फेंको।' ऐसा कहकर रोहिणीकुमार बलरामने पुनः जुआ खेलनेके लिये ललकारा ॥ ३६-३७½ ॥
अनुक्त्वा वचनं किंचिद् वाढमित्यब्रवीत् पुनः ॥ ३८ ॥
अक्षान् रुक्मी ततो हृष्टः पातयामास पार्थिवः ।
इसके उत्तरमें राजा रुक्मीने कोई दूसरी बात न कहकर फिर इतना ही कहा कि 'बहुत अच्छा।' इसके बाद उसने हर्षपूर्वक पासे फेंके ॥ ३८½ ॥
चातुरक्षे तु निर्वृत्ते निर्जितस्य नराधिपः ॥ ३९ ॥
बलदेवेन धर्मेण नेत्युवाच ततो बलम् ।
उस समय चार अंकवाला पासा गिरा। उसके अनुसार बलदेवजीने धर्मतः उसे हरा दिया था, तो भी उस नरेशने बलदेवजीसे यही कहा कि 'आपकी विजय नहीं हुई है' ३९½
धैर्येणमनः समाधाय स न किंचिदुवाच ह ॥ ४० ॥
बलदेवं ततो रुक्मी मया जितमिति स्मयन् ।
बलरामजीने पुनः अपने मनको धैर्यपूर्वक काबूमें करके कोई बात नहीं कही। तब रुक्मीने मुसकराते हुए बलरामजीसे कहा—'यह दाँव भी मैंने ही जीता है' ॥ ४०½ ॥
बलदेवस्तु तच्छ्रुत्वा जिह्मं वाक्यं नराधिप ॥ ४१ ॥
भूयः क्रोधसमाविष्टो नोत्तरं व्याजहार ह ।
नरेश्वर ! उसकी यह कुटिलतापूर्ण बात सुनकर बलदेवजीको पुनः बड़ा क्रोध हुआ, तथापि उन्होंने उसे कोई उत्तर नहीं दिया ॥ ४१½ ॥
ततो गम्भीरनिर्घोषा वागुवाचाशरीरिणी ॥ ४२ ॥
बलदेवस्य तं क्रोधं वर्धयन्ती महात्मनः ।
तब गम्भीर घोषके साथ वहाँ आकाशवाणी हुई, जो महात्मा बलदेवके क्रोधको बढ़ानेवाली थी ॥ ४२½ ॥
सत्यमाह बलः श्रीमान् धर्मेणैष पराजितः ॥ ४३ ॥
अनुक्त्वा वचनं किंचित् प्राप्तो भवति कर्मणा ।
मनसा समनुज्ञातं तत् स्यादित्यवगम्यताम् ॥ ४४ ॥
'श्रीमान् बलदेवजी सत्य कहते हैं। यह रुक्मी धर्मतः पराजित हो चुका है ! यद्यपि इसने दाँव लगाते समय कोई बात नहीं कही थी तो भी इसने जो पासा फेंकने आदिका कर्म किया, उससे उस दाँवमें इसका सहयोग स्वतः सिद्ध हो जाता है। इसने मनसे उस दाँवको स्वीकार कर लिया था, ऐसा समझना चाहिये' ॥ ४३-४४ ॥
इति श्रुत्वा वचस्तथ्यमन्तरिक्षात् सुभाषितम् ।
संकर्षणस्तथोत्थाय सौवर्णेनोरुणा बली ॥ ४५ ॥
रुक्मिण्या भ्रातरं ज्येष्ठं निजघान महीतले ।
आकाशसे सुन्दर ढंगसे कहा गया यह यथार्थ वचन सुनकर बलवान् संकर्षण उठकर खड़े हो गये और उन्होंने सोनेके बने हुए विशाल अष्टापदके द्वारा रुक्मिणीके बड़े भाई रुक्मीको पृथ्वीपर मार गिराया ॥ ४५½ ॥
विवादे कुपितो रामः क्षेप्तारं किल रुक्मिणम् ।
अघानाष्टापदेनैव प्रमथ्य यदुनन्दनः ॥ ४६ ॥
विवादमें कुपित हुए यदुनन्दन बलरामने अपने ऊपर आक्षेप करनेवाले रुक्मीको पटककर अष्टापदसे ही मार डाला।
ततोऽपसृत्य संक्रुद्धः कलिङ्गाधिपतेरपि ।
दन्तान् बभञ्ज संरम्भादुन्ननाद च सिंहवत् ॥ ४७ ॥
वहाँसे हटकर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए संकर्षणने कलिङ्गराज जयत्सेनके सारे दाँत तोड़ डाले तथा रोषसे वे सिंहके समान दहाड़ने लगे ॥ ४७ ॥
खड्गमुद्यम्य तान्सर्वालासयामास पार्थिवान् ।
स्तम्भं सभायाः सौवर्णमुत्पाट्य बलिनां वरः ॥ ४८ ॥
इसके बाद उन्होंने तलवार उठाकर समस्त राजाओंको भयभीत कर दिया। फिर द्यूतसभाके सुवर्णमय खम्भको उखाड़कर बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामजी आगे बढ़े ॥ ४८ ॥
गजेन्द्र इव तं स्तम्भं कर्षन् संकर्षणस्ततः ।
निर्जगाम सभाद्वारात् त्रासयामास कैशिकान् ॥ ४९ ॥
गजराजके समान उस खंभेको खींचकर लिये जाते हुए संकर्षण जब सभाद्वारसे बाहर निकले, तब उन्होंने समस्त कैशिकोंको भयभीत कर दिया ॥ ४९ ॥
रुक्मिणं निकृतिप्रज्ञं स हत्वा यादवर्षभः ।
वित्रास्य विक्षिपः सर्वान् सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ५० ॥
इस प्रकार छल-कपटमे चतुर रुक्मीको मारकर यादवप्रवर बलरामने समस्त शत्रुओंको उसी तरह भयमें डाल दिया, जैसे सिंह छोटे पशुओंको भयभीत कर देता है ॥ ५० ॥
जगाम शिविरं रामः स्वयमेव जनावृतः ।
न्यवेदयत् स कृष्णाय तत्र सर्वं यथाभवत् ॥ ५१ ॥
तदनन्तर स्वजनोंसे घिरे हुए बलराम अपने शिविरमें गये और द्यूतसभा में जो कुछ हुआ था, वह सब स्वयं ही उन्होंने श्रीकृष्णको बता दिया ॥ ५१ ॥
नोवाच स तदा कृष्णः किंचिद् रामं महाद्युतिः ।
निगृह्य च तदाऽऽत्मानं कृच्छ्रादश्रूण्यवर्तयत् ॥ ५२ ॥
उस समय महातेजस्वी श्रीकृष्णने बलरामजीसे कुछ नहीं कहा; वे अपने आपको किसी तरह सँभालकर बड़े कष्टसे आँसू बहाने लगे ॥ ५२ ॥
न हतो वासुदेवेन यः पूर्वं परवीरहा ।
ज्येष्ठो भ्राताथ रुक्मिण्या रुक्मिणीस्नेहकारणात् ५३
१. अमरकोषके अनुसार शारिफल (शतरंज या चौसरकी बिछौत अथवा बिसात) को अष्टापद कहते हैं।