भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 477

विष्णुपर्व ] द्विषष्टितमोऽध्यायः ४५५

स रामकरमुक्तेन निहतो द्यूतमण्डले।
अष्टापदेन बलवान् राजा वज्रधरोपमः ॥ ५४ ॥

भगवान् वासुदेवने पहले रुक्मिणीके प्रति स्नेहके कारण उसके जिस बड़े भाईको नहीं मारा था, वही वज्रधारी इन्द्रके समान बलवान् एवं शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला राजा रुक्मी बलरामजीके हाथसे छूटे हुए अष्टापदके द्वारा मार डाला गया ॥

तस्मिन् हते महावीर्ये नृपतौ भीष्मकात्मजे।
द्रुमभार्गवतुल्ये वै द्रुमभार्गवशिक्षिते ॥ ५५ ॥
कृतौ च युद्धकुशले नित्ययाजिनि पातिते।
वृष्ण्यन्धकाश्चैव सर्वे विमनसोऽभवन् ॥ ५६ ॥

भीष्मकपुत्र राजा रुक्मी महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न था। वह द्रुम और परशुरामजीसे अस्त्र-शिक्षा पाकर उन्हीं दोनोंके समान पराक्रमी हो गया था। रुक्मी विद्वान्, युद्ध-कुशल और नित्य यज्ञ करनेवाला था। उसके मारे जानेपर वृष्णि और अन्धकवंशके सभी वीर उदास हो गये ॥ ५५-५६ ॥

वैशम्पायन उवाच
रुक्मिणी च महाभागा विलपन्त्यार्तया गिरा।
विलपन्तीं तथा दृष्ट्वा सान्त्वयामास केशवः ॥ ५७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! (भाईके मारे जानेसे) महाभागा रुक्मिणी आर्तवाणीमें विलाप करने लगीं। उन्हें रोती-बिलखती देख भगवान् कृष्णने सान्त्वना दी॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं रुक्मिणो निधनं यथा।
वैरस्य च समुत्थानं वृष्णिभिर्भरतर्षभ ॥ ५८ ॥

भरतश्रेष्ठ ! यह मैंने तुम्हे रुक्मीके वधका यथावत् वृत्तान्त बताया है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उसका वृष्णिवंशियोंके साथ किस प्रकार वैर हुआ था ? ॥

वृष्णयोऽपि महाराज धनान्यादाय सर्वशः।
रामकृष्णौ समाश्रित्य ययुर्द्वारवतीं प्रति ॥ ५९ ॥

महाराज ! वृष्णिवंशी भी वहाँसे सब प्रकारके धन लेकर बलराम और श्रीकृष्णका आश्रय ले द्वारकापुरीको चले गये ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिवधो नामैकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मीका वधविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥


द्विषष्टितमोऽध्यायः

बलदेवजीका माहात्म्य, उनके द्वारा हस्तिनापुरको गङ्गामें गिरानेका अद्भुत प्रयत्न

राजोवाच
भूय एव तु विप्रर्षे बलदेवस्य धीमतः।
माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि शेषस्य धरणीभृतः ॥ १ ॥

राजाने कहा—ब्रह्मर्षे ! धरतीको धारण करनेवाले शेषके अवतार बुद्धिमान् बलरामके माहात्म्यको मैं पुनः सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

अतीव बलदेवं तं तेजोराशिनिर्जितम्।
कथयन्ति महात्मानं ये पुराणविदो जनाः ॥ २ ॥

जो पुराणवेत्ता पुरुष हैं, वे महात्मा बलदेवको अत्यन्त तेजकी राशि और अपराजित बताते हैं ॥ २ ॥

तस्य कर्माण्यहं विप्र श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।
अनन्तं यं विदुर्नागमादिदेवं महौजसम् ॥ ३ ॥

विप्रवर ! मैं उनके कर्मोंको पुनः यथार्थरूपसे श्रवण करना चाहता हूँ, जिन्हें विद्वान् पुरुष महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न आदिदेव अनन्त नागके रूपमे जानते हैं ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच
पुराणे नागराजोऽसौ पठ्यते धरणीधरः।
शेषस्तेजोनिधिः श्रीमानकम्प्यः पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥
योगाचार्यो महावीर्यो देवमन्त्रमुखो बली।
जरासंधं गदायुद्धे जितवान् यो न चावधीत् ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुराणमें बलभद्रजीको साक्षात् नागराज धरणीधर शेष बताया जाता है। वे तेजकी निधि, दिव्य शोभासे सम्पन्न, कभी कम्पित न होनेवाले और पुरुषोत्तम हैं। वे योगके आचार्य, महापराक्रमी, बलवान् तथा देवताओंकी गुप्त मन्त्रणाको सुनने और उसपर विचार करनेवालोंमें प्रधान हैं। उन्होंने गदा-युद्धमे जरासंधको जीत लिया, परंतु उसका वध नहीं किया ॥

बहवश्चैव राजानः प्रथिताः पृथिवीतले।
अन्वयुर्मागधं सर्वे ते चापि विजिता रणे ॥ ६ ॥

भूतलके बहुत-से विख्यात राजा, जो सबके सब मगध-राज जरासंधका अनुसरण करते थे, युद्धमे बलदेवजीके द्वारा परास्त कर दिये गये ॥ ६ ॥

नागायुतबलप्राणो भीमो भीमपराक्रमः।
असकृद् बलदेवेन बाहुयुद्धे पराजितः ॥ ७ ॥

जिनमें दस हजार हाथियोंका बल था, वे भयानक पराक्रमी भीमसेन बाहुयुद्धमें बलदेवजीके द्वारा अनेक बार पराजित हो चुके थे ॥ ७ ॥

दुर्योधनस्य कन्यां तु हरमाणो न्यगृह्यत।
साम्बो जाम्बवतीपुत्रो नगरे नागसाह्वये ॥ ८ ॥
राजभिः सर्वतो रुद्धे हरमाणे बलात् किल।