विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४५६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
एक समय दुर्योधनकी पुत्री लक्ष्मणाका अपहरण करते हुए जाम्बवतीकुमार साम्बको कौरवोंने हस्तिनापुरमे कैद कर लिया। यह नगर सब ओरसे राजाओंद्वारा घिरा हुआ था। कहते हैं, साम्ब बलपूर्वक उस कन्याको ले जा रहे थे, इसलिये उन्हें बंदी बनाया गया ॥ ८½ ॥
तदुपश्रुत्य संरुद्धमाजगाम महाबलः ॥ ९ ॥
रामस्तस्य तु मोक्षार्थमागतो नालभच्च तम्।
साम्बको कैद कर लिया गया है, यह सुनकर महाबली बलराम उन्हें छुड़ानेके लिये आये; परंतु वे शान्तिपूर्वक माँगनेपर साम्बको न पा सके ॥ ९½ ॥
ततश्चुक्रोध बलवानद्भुतं चाकरोन्महत् ॥ १० ॥
अनिवार्यमभेद्यं च दिव्यमप्रतिमं बले।
लाङ्गलास्त्रं समुद्यम्य ब्रह्ममन्त्राभिमन्त्रितम् ॥ ११ ॥
प्राकारवप्रे विन्यस्य पुरस्य च महाद्युतिः।
प्रक्षेप्तुमैच्छद् गङ्गायां नगरं कौरवस्य तत् ॥ १२ ॥
तब बलवान् बलराम कुपित हो उठे और उन्होंने वहाँ एक महान् अद्भुत कार्य कर दिखाया। महातेजस्वी बलरामजीने, जो किसीके द्वारा भी निवारण या भेदन करनेयोग्य नहीं है, उस अप्रतिम शक्तिशाली दिव्य हल नामक अस्त्रको उठाकर उसे ब्रह्ममन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और कौरवनगर हस्तिनापुरके परकोटेकी नींवमे धँसाकर समूचे नगरको गङ्गाजीमें उलट देनेकी इच्छा की ॥ १०–१२ ॥
तद् विघूर्णितमालक्ष्य पुरं दुर्योधनो नृपः।
साम्बं निर्यांतयामास सभार्यं तस्य धीमतः ॥ १३ ॥
अपने नगरको चक्कर काटता देख राजा दुर्योधनने तुरंत आकर बुद्धिमान् बलदेवजीकी सेवामे पत्नीसहित साम्बको लौटा दिया ॥ १३ ॥
ददौ शिष्यं तदाऽऽत्मानं रामस्य सुमहात्मनः।
गदायुद्धे कुरुपतिं शिष्यं जग्राह तं च सः ॥ १४ ॥
उस समय उसने अपने-आपको महात्मा बलरामजीके हाथमे शिष्य-भावसे सौंप दिया। तब उन्होंने कुरुराज दुर्योधनको गदायुद्धकी शिक्षा देनेके लिये अपना शिष्य बना लिया ॥
ततः प्रभृति राजेन्द्र पुरमेतद् विघूर्णितम्।
आवर्जितमिवाभाति गङ्गामभिमुखं नृप ॥ १५ ॥
राजेन्द्र ! तभीसे यह नगर कुछ घुमा और गङ्गाकी ओर झुकाया हुआ-सा प्रतीत होता है ॥ १५ ॥
इदमप्यद्भुतं कर्म रामस्य कथितं भुवि।
भाण्डीरे कथितं राजन् यत् कृतं शौरिणा पुरा ॥ १६ ॥
राजन् ! यह भूतलपर बलरामजीका अत्यन्त अद्भुत कर्म कहा गया है। पहले भाण्डीरवटके निकट उन्होंने जो कुछ किया था, उसका वर्णन तो कर ही दिया गया है ॥ १६ ॥
प्रलम्बं मुष्टिनैकेन यज्जघान हलायुधः।
धेनुकं तु महावीर्यं विक्षेप नगमूर्द्धनि।
स गतायुः पपातोर्व्यां दैत्यो गर्दभरूपधृक् ॥ १७ ॥
उस समय हलधरने प्रलम्बको एक ही मुक्केसे मारकर कालके गालमें डाल दिया था और महापराक्रमी धेनुकासुरको ताड़की चोटीपर फेंक दिया था। वह गर्दभरूपधारी दैत्य वहींसे गतायु होकर पृथ्वीपर गिरा था ॥ १७ ॥
लवणजलगामा महानदी द्रुतजलवेगतराङ्गमालिनी।
नगरमभिमुखं यदा हृता हलविधृता यमुना यमस्वसा ॥ १८ ॥
खारे पानीके समुद्रमें मिलनेवाली यमकी बहिन महानदी यमुनाको, जो बहते हुए जलके वेग और तरंगोंसे अलंकृत थी, उन्होंने हलके द्वारा नगरकी ओर खींच लिया था ॥
बलदेवस्य माहात्म्यमेतत् ते कथितं मया।
अनन्तस्याप्रमेयस्य शेषस्य धरणीभृतः ॥ १९ ॥
जो अनन्त, अप्रमेय, धरणीधर शेषके अवतार हैं, उन बलदेवजीका माहात्म्य मैंने तुम्हे बता दिया ॥ १९ ॥
इति पुरुषवरस्य लाङ्गले-
र्बहुविधमुत्तममन्यदेव च।
यदकथितमिहाद्य कर्म ते
तदुपलभस्व पुराणविस्तरात् ॥ २० ॥
इस प्रकार पुरुषोत्तम हलधरके दूसरे-दूसरे भी उत्तम चरित्र हैं, उनके जिस कर्मकी यहाँ चर्चा नहीं की गयी है, उसे तुम विस्तृत पुराणोंसे जान लो ॥ २० ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बलदेवमाहात्म्ये द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलदेवका माहात्म्यविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
नरकासुरका परिचय, द्वारकामें इन्द्रका आगमन और श्रीकृष्णसे नरकवधके लिये अनुरोध, सत्यभामासहित श्रीकृष्णका प्राग्ज्योतिषपुरमें गमन तथा उनके द्वारा मुरु, निसुन्द, हयग्रीव, विरूपाक्ष, पञ्चनाद, अन्यान्य असुर तथा नरकासुरका वध
जनमेजय उवाच
प्रस्थेत्य द्वारकां विष्णुर्हते रुक्मिणि वीर्यवान् । अकरोद् यन्महाबाहुस्तन्मे वद महामुने ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—महामुने ! रुक्मीके मारे जानेपर