विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 471, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] षष्टितमोऽध्यायः ४४९
उन सबने दूरतक रास्ता तय करके नर्मदा नदीके किनारे अपनी प्रियतमा रुक्मिणीके साथ रथपर बैठे हुए श्रीकृष्णको क्रोधपूर्वक देखा ॥ ६ ॥
अवस्थाप्य च तत्सैन्यं रुक्मी मदबलान्वितः ।
चिकीर्षुर्द्वैरथं युद्धमभ्ययान्मधुसूदनम् ॥ ७ ॥
रुक्मीको अपने बलका बड़ा घमंड था। उसने अपने साथ आयी हुई सारी सेनाको एक जगह खड़ी करके द्वैरथ युद्ध करनेकी इच्छासे स्वयं ही भगवान् मधुसूदनपर आक्रमण किया ॥ ७ ॥
स विव्याध चतुःषष्ट्या गोविन्दं निशितैः शरैः ।
तं प्रत्यविध्यत् सप्तत्या बाणैर्युधि जनार्दनः ॥ ८ ॥
उसने चौंसठ पैने बाणोंसे श्रीकृष्णको बींध डाला। तब जनार्दनने भी समरमें सत्तर बाण मारकर रुक्मीसे बदला चुका लिया ॥ ८ ॥
यतमानस्य चिच्छेद ध्वजं चास्य महाबलः ।
जहार च शिरः कायात् सारथेस्तस्य वीर्यवान् ॥ ९ ॥
महाबली और पराक्रमी श्रीकृष्णने विजयके लिये प्रयत्न-शील रुक्मीके ध्वजको काट डाला तथा उसके सारथिके सिरको धड़से काट लिया ॥ ९ ॥
तं कृच्छ्रगतमाज्ञाय परिवव्रुर्जनार्दनम् ।
दाक्षिणात्या जिघांसन्तो राजानः सर्व एव हि ॥ १० ॥
उसे संकटमें पड़ा जान दक्षिण दिशाके समस्त राजाओंने श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छा रखते हुए उन्हे चारों ओर-से घेर लिया ॥ १० ॥
तमंशुमान् महाबाहुर्विंव्याध दशभिः शरैः ।
श्रुतर्वा पञ्चभिः क्रुद्धो वेणुदारिश्च सप्तभिः ॥ ११ ॥
महाबाहु अंशुमान्ने दस, श्रुतर्वाने पाँच और क्रोधमें भरे हुए वेणुदारिने सात बाणोंसे उन्हे घायल कर दिया ॥
ततोऽंशुमन्तं गोविन्दो विभेदोरसि वीर्यवान् ।
निपसाद रथोपस्थे व्यथितः स नराधिपः ॥ १२ ॥
तब पराक्रमी गोविन्दने एक बाणसे अंशुमान्की छाती छेद डाली। इससे व्यथित होकर राजा अंशुमान् रथके पिछले भागमे जा बैठा ॥ १२ ॥
श्रुतर्वणो जघानाश्वांश्चतुर्भिंश्चतुरः शरैः ।
वेणुदारेर्ध्वजं छित्त्वा भुजं विव्याध दक्षिणम् ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्णने चार बाणोंसे श्रुतर्वाके चारों घोड़ोंको मार डाला और वेणुदारिकी ध्वजा काटकर उसकी दाहिनी बाँहमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १३ ॥
तथैव च श्रुतर्वाणं शरैर्विंव्याध पञ्चभिः ।
शिश्रिये स ध्वजं शान्तो न्यषीदच्च व्यथान्वितः ॥ १४ ॥
इसी प्रकार श्रुतर्वाको भी पाँच बाणोंसे घायल कर दिया। श्रुतर्वा व्यथासे पीड़ित हो ध्वजका सहारा ले शान्त हो-कर बैठ गया ॥ १४ ॥
मुञ्चन्तः शरवर्षाणि वासुदेवं ततोऽभ्ययुः ।
क्रथकैशिकमुख्याश्च सर्व एव महारथाः ॥ १५ ॥
तत्पश्चात् क्रथकैशिक देशके सभी मुख्य महारथी बाणों-की वर्षा करते हुए भगवान् श्रीकृष्णपर चढ़ आये ॥ १५ ॥
बाणैर्बाणांश्च चिच्छेद तेषां युधि जनार्दनः ।
जघान चैषां संरब्धः पतमानांश्च ताञ्छरान् ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा उन सबके बाण काट डाले तथा रोषावेशमें भरकर उन्होंने शत्रुओंके उन गिरते हुए बाणोंको नष्ट कर दिया ॥ १६ ॥
पुनरन्यांश्चतुःषष्ट्या जघान निशितैः शरैः ।
क्रुद्धानापततो वीरानद्विवत् स महाबलः ॥ १७ ॥
पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हुए उन महाबली श्रीकृष्णने पुनः चौंसठ पैने बाणोंद्वारा क्रोधमें भरकर अपने-पर आक्रमण करनेवाले शत्रुपक्षके अन्य वीरोंको मार गिराया ॥ १७ ॥
विद्रुतं स्वबलं दृष्ट्वा रुक्मी क्रोधवशंगतः ।
पञ्चभिर्निशितैर्बाणैर्विंव्याधोरसि केशवम् ॥ १८ ॥
अपनी सेनाको भागती देख रुक्मी क्रोधके वशीभूत हो गया। उसने पाँच तीखे बाणोंसे श्रीकृष्णकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १८ ॥
सारथिं चास्य विव्याध सायकैर्निशितैस्त्रिभिः ।
आजघान शरेणास्य ध्वजं च नतपर्वणा ॥ १९ ॥
साथ ही तीन पैने सायकोंसे उनके सारथिको भी घायल कर दिया और झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे उनके ध्वज-पर भी आघात किया ॥ १९ ॥
केशवस्त्वरितं दृष्ट्वा क्रुद्धो विव्याध मार्गणैः ।
धनुश्चिच्छेद चाप्यस्य यतमानस्य रुक्मिणः ॥ २० ॥
रुक्मीको शीघ्रतापूर्वक बाण मारते देख श्रीकृष्ण कुपित हो उठे। उन्होंने अपने बाणोंसे रुक्मीको घायल कर दिया और विजयके लिये प्रयत्नशील हुए रुक्मीके धनुषको भी काट डाला ॥ २० ॥
अथान्यद् धनुरादाय रुक्मी कृष्णजिघांसया ।
प्रादुश्चकार चान्यानि दिव्यान्धस्त्राणि वीर्यवान् ॥ २१ ॥
फिर तो पराक्रमी रुक्मी दूसरा धनुष हाथमें लेकर श्री-कृष्णको मार डालनेकी इच्छासे दूसरे-दूसरे दिव्यास्त्र प्रकट करने लगा ॥ २१ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तस्य कृष्णो महाबलः ।
पुनश्चिच्छेद तच्चापं रथेषां च त्रिभिः शरैः ॥ २२ ॥
म० ह० १५ —