भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 472

४५० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

महाबली श्रीकृष्णने अपने अस्त्रोंद्वारा उसके अस्त्रोंका निवारण करके पुनः तीन बाणोंद्वारा उसके धनुष और रथके हरसेको काट डाला॥ २२॥

स च्छिन्नधन्वा विरथः खड्गमादाय चर्म च।
उत्पपात रथाद् वीरो गरुत्मानिव वीर्यवान्॥ २३॥

धनुष कट जानेपर रथहीन हुआ पराक्रमी वीर रुक्मी हाथमें ढाल और तलवार लेकर उस टूटे रथसे गरुड़की भाँति कूद पड़ा॥ २३॥

तस्याभिपतनः खड्गं चिच्छेद युधि केशवः।
नाराचैश्च त्रिभिः क्रुद्धो विभेदेनमयोरसि॥ २४॥

युद्धमें अपने सामने आते हुए रुक्मीकी तलवारको श्रीकृष्णने काट डाला और कुपित होकर तीन नाराचोंसे उसकी छाती छेद डाली॥ २४॥

स पपात महाबाहुर्वसुधामनुनादयन्।
विसंज्ञो मूर्च्छितो राजा वज्रेणेव महासुरः॥ २५॥

तब संज्ञाशून्य हुआ महाबाहु राजा रुक्मी पृथ्वीको प्रतिध्वनित करता हुआ मूर्च्छित होकर गिर पड़ा, मानो कोई महान् असुर वज्रसे मारा गया हो॥ २५॥

तांश्च राज्ञः शरैः सर्वान् पुनर्विव्याध माधवः।
रुक्मिणं पतितं दृष्ट्वा व्यद्रवन्त नराधिपाः॥ २६॥

तदनन्तर माधवने पुनः अपने बाणोंद्वारा उन सब नरेशोंको घायल करना आरम्भ किया। रुक्मीको धराशायी हुआ देख सब नरेश भाग खड़े हुए॥ २६॥

विचेष्टमानं तं भूमौ भ्रातरं वीक्ष्य रुक्मिणी।
पादयोर्न्यपतद् विष्णोर्भ्रातुर्जीवितकाङ्क्षिणी॥ २७॥

अपने भाईको भूमिपर छटपटाते देख उसके जीवनकी इच्छा रखनेवाली रुक्मिणी भगवान् श्रीकृष्णके पैरोंपर गिर पड़ी॥ २७॥

तामुत्थाप्य परिष्वज्य सान्त्वयामास केशवः।
अभयं रुक्मिणे दत्त्वा प्रययौ स्वपुरीं ततः॥ २८॥

तब भगवान् श्रीकृष्णने उसे उठाकर हृदयसे लगा लिया और भलीभाँति सान्त्वना दी। फिर रुक्मीको अभय देकर वे अपनी पुरीको चले गये॥ २८॥

वृष्णयोऽपि जरासंधं भङ्क्त्वा तांश्चैव पार्थिवान्।
प्रययुर्द्वारकां हृष्टाः पुरस्कृत्य हलायुधम्॥ २९॥

वृष्णिवंशी भी जरासंध तथा उन राजाओंको पीछे हटाकर हर्षसे उल्लसित हो बलरामजीको आगे करके द्वारकापुरीकी ओर चल दिये॥ २९॥

प्रयाते पुण्डरीकाक्षे श्रुतवीर्येत्य संगरे।
रुक्मिणं रथमारोप्य प्रययौ स्वां पुरीं प्रति॥ ३०॥

कमलनयन श्रीकृष्णके चले जानेपर श्रुतर्वा रणभूमिमें आया और रुक्मीको रथपर बिठाकर अपनी पुरीकी ओर ले चला॥ ३०॥

अनानीय स्वसारं तु रुक्मी मानमदान्वितः।
हीनप्रतिज्ञो नैच्छत् स प्रवेष्टुं कुण्डिनं पुरम्॥ ३१॥

अभिमान और मदसे उन्मत्त रहनेवाला रुक्मी अपनी बहिनको लौटाकर न ला सका, इसलिये उसकी प्रतिज्ञा भङ्ग हो गयी। इसीसे उसने कुण्डिनपुरमें प्रवेश करनेकी इच्छा नहीं की॥ ३१॥

विदर्भेषु निवासार्थं निर्ममेऽन्यत् पुरं महत्।
तद् भोजकटमित्येव बभूव भुवि विश्रुतम्॥ ३२॥

उसने विदर्भ देशमें अपने रहनेके लिये दूसरे विशाल नगरका निर्माण किया, जो इस भूतलपर भोजकटके नामसे विख्यात हुआ॥ ३२॥

तत्रौजसा महातेजा दक्षिणां दिशमन्वगात्।
भीष्मकः कुण्डिने चैव राजोवास महाभुजः॥ ३३॥

उस महातेजस्वी वीरने वहाँ बलपूर्वक रहकर दक्षिण दिशाका शासन किया और महाबाहु राजा भीष्मक कुण्डिनपुरमें रहने लगे॥ ३३॥

द्वारकां चापि सम्प्राप्ते रामे वृष्णिबलान्विते।
रुक्मिण्याः केशवः पाणिं जग्राह विधिवत् प्रभुः॥ ३४॥

वृष्णिवंशियोंकी सेनाके साथ जब बलरामजी द्वारकामे पहुँचे, तब भगवान् श्रीकृष्णने विधिपूर्वक रुक्मिणीका पाणिग्रहण किया॥ ३४॥

ततः सह तया रेमे प्रियया प्रीयमाणया।
सीतयेव पुरा रामः पौलोम्येव पुरंदरः॥ ३५॥

पूर्वकालमें जैसे श्रीरामचन्द्रजी सीता और देवराज इन्द्र पुलोमकुमारी शचीके साथ सानन्द रमण करते थे, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न हुई प्रिय पत्नी रुक्मिणीके साथ रमण करने लगे॥ ३५॥

सा हि तस्याभवज्ज्येष्ठा पत्नी कृष्णस्य भामिनी।
पतिव्रता गुणोपेता रूपशीलगुणान्विता॥ ३६॥

वह श्रीकृष्णकी ज्येष्ठ पत्नी थी। भामिनी रुक्मिणी पतिव्रता, सद्गुणवती, रूपवती, सुशीला तथा अन्यान्य उत्तम गुणोंसे सम्पन्न थी॥ ३६॥

तस्यामुत्पादयामास पुत्रान् दश महारथान्।
चारुदेष्णं सुदेष्णं च प्रद्युम्नं च महाबलम्॥ ३७॥
सुषेणं चारुगुप्तं च चारुबाहुं च वीर्यवान्।
चारुविन्दं सुचारुं च भद्रचारुं तथैव च॥ ३८॥
चारुं च वलिनां श्रेष्ठं सुतां चारुमतीं तथा।
धर्मार्थकुशलास्ते तु कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः॥ ३९॥