भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 470
४४८श्रीमद्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

षड्भिर्निहत्य कारूषान् महेष्वासान् स वीर्यवान् ।
शतं जघान संक्रुद्धो मागधानां महाबले ॥ ७४ ॥

अत्यन्त कुपित हुए पराक्रमी बलरामने छः बाणोंसे करुष देशके अनेक महाधनुर्धरोंका वध करके मागधोंकी विशाल सेनामेंसे सौ चुने हुए वीरोंको यमलोक पहुँचा दिया॥ ७४ ॥

निहत्य तान् महाबाहुर्जरासंधं ततोऽभ्ययात् ।
तमापतन्तं विव्याध नाराचैर्मागधस्त्रिभिः ॥ ७५ ॥

उन सबका संहार करके महाबाहु बलरामने जरासंधपर धावा किया। अपनी ओर आते हुए बलरामको मगधराजने तीन नाराचोंसे घायल कर दिया ॥ ७५ ॥

तं बिभेदाष्टभिः क्रुद्धो नाराचैर्मुसलायुधः ।
चिच्छेद चास्य भल्लेन ध्वजं हेमपरिष्कृतम् ॥ ७६ ॥

तब मूसलधारी बलदेवने कुपित हो आठ नाराचोंसे जरासंधको क्षत-विक्षत कर दिया और उसके सुवर्ण-भूषित ध्वजको एक भल्लसे काट गिराया ॥ ७६ ॥

तद् युद्धमभवद् घोरं तेषां देवासुरोपमम् ।
सृजतां शरवर्षाणि निघ्नतामितरेतरम् ॥ ७७ ॥

बाणोंकी वृष्टि करते और एक-दूसरेको मारते हुए उन वीरोंमें देवासुरसंग्रामके समान घोर युद्ध होने लगा ॥ ७७ ॥

गजैर्गजा हि संक्रुद्धाः संनिपेतुः सहस्रशः ।
रथै रथाश्च संरब्धाः सादिनश्चापि सादिभिः ॥ ७८ ॥

क्रोधमें भरे हुए सहस्रों हाथी हाथियोंसे, रथ रथोंसे और रोषावेशसे युक्त घुड़सवार घुड़सवारोंसे भिड़ गये ॥ ७८ ॥

पदातयः पदातींश्च शक्तिचर्मासिपाणयः ।
छिन्दन्तश्चोत्तमाङ्गानि विचेरुर्युधि ते पृथक् ॥ ७९ ॥

हाथोंमें शक्ति, ढाल और तलवार लिये हुए पैदल वीर पैदलोंसे जूझते और उनके मस्तक काटते हुए युद्धमें पृथक्-पृथक् विचरने लगे ॥ ७९ ॥

असीनां पात्यमानानां कवचेषु महास्वनः ।
शराणां पततां शब्दः पक्षिणामिव शुश्रुवे ॥ ८० ॥

कवचोंपर गिरायी जाती हुई तलवारों और गिरते हुए बाणोंका महान् शब्द पक्षियोंके चहचहानेके समान सुनायी पड़ता था ॥ ८० ॥

भेरीशङ्खमृदङ्गानां वेणूनां च मृधे ध्वनिम् ।
जुगूह घोषः शस्त्राणां ज्याघोषश्च महात्मनाम् ॥ ८१ ॥

युद्धस्थलमें महामनस्वी वीरोंकी प्रत्यञ्चाके खींचने और शस्त्रोंके टकरानेका शब्द भेरी, शङ्ख, मृदङ्ग और वेणुओंकी ध्वनिको आच्छादित कर देता था ॥ ८१ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीहरणे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीहरणविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥


षष्टितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा रुक्मीकी पराजय तथा रुक्मिणी आदिके साथ श्रीकृष्णका विवाह एवं उनसे उत्पन्न हुई संतानोंका संक्षिप्त परिचय

वैशम्पायन उवाच
कृष्णेन ह्रियमाणां तां रुक्मी श्रुत्वा तु रुक्मिणीम् ।
प्रतिज्ञामकरोत् क्रुद्धः समक्षं भीष्मकस्य ह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! रुक्मीने जब सुना कि श्रीकृष्ण रुक्मिणीको हरकर लिये जा रहे हैं, उसने कुपित होकर भीष्मकके सामने ही यह प्रतिज्ञा की ॥ १ ॥

रुक्म्युवाच
अहत्वा युधि गोविन्दमनानीय च रुक्मिणीम् ।
कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ २ ॥

रुक्मी बोला— मैं युद्धमें श्रीकृष्णका वध किये बिना तथा रुक्मिणीको वापस लाये बिना कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा; यह मैं सत्य कहता हूँ ॥ २ ॥

आस्थाय स रथं वीरः समुद्ग्रायुधध्वजम् ।
जवेन प्रययौ क्रुद्धो बलेन महता वृतः ॥ ३ ॥

ऐसी प्रतिज्ञा करके क्रोधमें भरा हुआ वीर रुक्मी प्रचण्ड आयुध और ऊँचे ध्वजसे सुशोभित रथपर आरूढ़ हो विशाल सेनाके साथ बड़े वेगसे आगे बढ़ा ॥ ३ ॥

तमन्वयुर्नृपाश्चैव दक्षिणापथवर्तिनः ।
क्राथोऽंशुमान् श्रुतर्वा च वेणुदारिश्च वीर्यवान् ॥ ४ ॥
भीष्मकस्य सुताश्चान्ये रथेन रथिनां वराः ।
क्रथकैशिकमुख्याश्च सर्व एव महारथाः ॥ ५ ॥

उसके पीछे दक्षिण भारतके बहुत-से नरेश, क्रथपुत्र अंशुमान्, श्रुतर्वा तथा पराक्रमी वेणुदारि भी चले। भीष्मकके अन्य पुत्र भी, जो रथियोंमें श्रेष्ठ थे, रथके द्वारा रुक्मीके साथ गये। क्रथकैशिकदेशके सभी मुख्य महारथियोंने भी रुक्मीका साथ दिया ॥ ४-५ ॥

ते गत्वा दूरमध्वानं सरितं नर्मदांमनु ।
गोविन्दं ददृशुः क्रुद्धाः सहैव प्रियया स्थितम् ॥ ६ ॥