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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

४१४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

सन्धि-विग्रह आदि छः गुणोंसे अलंकृत, शुभ एवं नीतिसम्पन्न बात कही ॥ ९-१० १/२ ॥

भीष्मक उवाच
भवतामवनीशानां समालोक्य नयान्वितम् ॥ ११ ॥
वचनं व्याहृतं श्रुत्वा कृतवान् कार्यमीदृशम्।
सद्भिर्भवद्भिः क्षन्तव्यं वयं नित्यापराधिनः ॥ १२ ॥

भीष्मक बोले—राजाओ ! आप सब पृथ्वीपतियोंकी ओर देखकर और आपके द्वारा कहे गये नीतियुक्त वचनको सुनकर मैंने ऐसा कार्य किया है। आप सब लोग सत्पुरुष हैं; अतः मेरे इस बर्तावको क्षमापूर्वक सह लेंगे। हम अपनेको सदा अपराधी मानते हैं ॥ ११-१२ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु राजा स भीष्मको नयकोविदः।
उवाच सुतमुद्दिश्य वचनं राजसंसदि ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसा कहकर नीति-निपुण विद्वान् राजा भीष्मक उस राजसभामें अपने पुत्रको लक्ष्य करके बोले ॥ १३ ॥

भीष्मक उवाच
पुत्रस्य चेष्टामालोक्य त्रासाकुलितलोचनः।
मन्ये बालानिमाँल्लोकान् स एष पुरुषः परः ॥ १४ ॥

भीष्मकने कहा—राजाओ ! अपने पुत्रकी चेष्टाको देखकर मेरे नेत्र भयसे व्याकुल हो उठे हैं। मैं इन लोगोंको (रुक्मी आदिको) बालक (विवेकशून्य) मानता हूँ। मेरी दृष्टिमें ये भगवान् श्रीकृष्ण परम पुरुष हैं ॥ १४ ॥

कीर्तिः कीर्तिमंतां श्रेष्ठो यशश्च विपुलं तथा।
स्थापितं भुवि मर्त्येऽस्मिन् स्वबाहुबलमूर्जितम् ॥ १५ ॥

ये कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। इन्होंने इस मर्त्यलोकमें भूतलपर अपनी उत्तम कीर्ति और सुयशकी स्थापना की है तथा अपने ओजस्वी बाहुबलका भी परिचय दिया है ॥ १५ ॥

धन्या खलु महाभागा देवकी योषितां वरा।
पुत्रं त्रिभुवनश्रेष्ठं कृत्वा गर्भेण केशवम् ॥ १६ ॥
कृष्णं कमलपत्राक्षं श्रीपुञ्जममराचितम् ।
नेत्राभ्यां स्नेहपूर्णाभ्यां वीक्षते मुखपङ्कजम् ॥ १७ ॥

धन्य हैं नारियोंमें श्रेष्ठ महाभागा देवकी, जो तीनों लोकोंमें सबसे श्रेष्ठ, शोभाके पुञ्ज, देवपूजित, कमलदललोचन केशव कृष्णको पुत्ररूपसे गर्भमें रखकर जन्म देनेके पश्चात् सदा स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे उनके मुखारविन्दको निहारा करती हैं ॥ १६-१७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं लालप्यमानं तु राजानं राजसंसदि ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा शाल्वराजो महाद्युतिः ॥ १८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! राजसभामें राजा भीष्मकको इस प्रकार बारंबार बोलते देख महातेजस्वी शाल्वराजने सान्त्वनापूर्ण मधुर वाणीमें कहा ॥ १८ ॥

शाल्व उवाच
अलं खेदेन राजेन्द्र सुताय रिपुमर्दिने ।
क्षत्रियस्य रणे राजन् ध्रुवं जयपराजयौ ॥ १९ ॥

शाल्व बोला—राजेन्द्र ! (आप खेद क्यों प्रकट करते हैं) आपका पुत्र शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाला है। इसके लिये खेद करना व्यर्थ है (इसपर तो आपको गर्व होना चाहिये)। राजन् ! रणभूमिमें क्षत्रियको जय अथवा पराजय अवश्य प्राप्त होती है ॥ १९ ॥

नियता गति मर्त्यानामेष धर्मः सनातनः।<sup></sup>
बलकेशवयोरन्यस्तृतीयः कः पुमानिह ॥ २० ॥
रणे योधयितुं शक्तस्तव पुत्रं महाबलम् ।

यह मनुष्योंकी नियत गति है। यह सनातन धर्म है। बलराम और श्रीकृष्णके सिवा इस भूतलपर तीसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो समराङ्गणमें आपके महाबली पुत्रका सामना कर सके ॥ २० १/२ ॥

रथातिरथवृन्दानामेक एव रणाजिरे ॥ २१ ॥
रिपून बाधयितुं शक्तो धनुर्गृह्य महाभुजः।

यह महाबाहु वीर हाथमें धनुष लेकर अकेला ही युद्ध-क्षेत्रमें रथियों और अतिरथियोंके समूहका सामना करने और शत्रुओंको बाधा पहुँचानेमें समर्थ है ॥ २१ १/२ ॥

भार्गवास्त्रं महारौद्रं देवैरपि दुरासदम् ॥ २२ ॥
सृजतो बाहुवीर्येण कः पुमान् प्रसहिष्यति ।

जिस समय यह अपने बाहुबलसे देवताओंके लिये भी दुर्जय महाभयंकर भार्गवास्त्रका प्रयोग करेगा, उस समय इस वीरका आक्रमण कौन पुरुष सह सकेगा ॥ २२ १/२ ॥

अयं तु पुरुषः कृष्णो ह्यनादिनिधनोऽव्ययः ॥ २३ ॥
तं विजेतानृलोकेऽस्मिन् नापिशूलधरः स्वयम्।

ये श्रीकृष्ण तो अनादि, अनन्त और अविनाशी पुरुष हैं। इस नरलोकमें साक्षात् त्रिशूलधारी भगवान् शङ्कर भी उन्हें जीत नहीं सकते ॥ २३ १/२ ॥

तव पुत्रो महाराज सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥ २४ ॥
विदित्वा देवमीशानं न योधयति केशवम् ।

महाराज ! आपका पुत्र सम्पूर्ण शास्त्रोंका तत्त्ववेत्ता है। यह श्रीकृष्णको देवता और ईश्वर समझकर ही उनसे युद्ध नहीं करता है ॥ २४ १/२ ॥

अद्य तस्य रणे जेता यवनाधिपतिर्नृप ॥ २५ ॥
स कालयावनो नाम अवध्यः केशवस्य ह।

नरेश्वर ! आजकल युद्धमें श्रीकृष्णपर विजय पानेवाला


१. 'गति' के स्थानमें 'गतिः' समझना चाहिये। नीलकण्ठने यहाँ विभक्तिका लोप आर्ष माना है।

विष्णुपर्व ] द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ४१५


केवल कालयवन है, जो यवनोंका अधिपति है। वह श्रीकृष्णके लिये अवध्य है॥ २५¾ ॥

तप्त्वा सुदारुणं घोरं तपः परमदुश्चरम् ॥ २६ ॥
रुद्रमाराधयामास द्वादशाब्दानयोऽशनः।
पुत्रकामेन मुनिना तोष्य रुद्रात्सुतो वृतः ॥ २७ ॥
माथुराणामवध्योऽयं भवेदिति च शङ्करात् ।
एवमस्त्विति रुद्रोऽपि प्रददौ मुनये सुतम् ॥ २८ ॥

गार्ग्यमुनिने अत्यन्त दुष्कर, भयंकर एवं दारुण तपस्या करके बारह वर्षांतक पुत्रकी कामनासे रुद्रदेवकी आराधना की थी। वे उन दिनों केवल लोहका चूर्ण खाकर रहते थे। इस प्रकार रुद्रदेवको संतुष्ट करके उन्होंने उनसे एक पुत्र माँगा तथा भगवान् शङ्करसे यह भी प्रार्थना की कि मेरा वह पुत्र माथुरों (मथुरामें उत्पन्न हुए लोगों) के लिये अवध्य हो। तब रुद्रदेवने 'एवमस्तु' कहकर मुनिको वैसा पुत्र प्रदान कर दिया॥ २६—२८ ॥

एवं गार्ग्यस्य तनयः श्रीमान् रुद्रवरोद्भवः ।
माथुराणामवध्योऽयं मथुरायां विशेषतः ॥ २९ ॥

इस तरह गार्ग्यका वह तेजस्वी पुत्र रुद्रदेवके वरसे उत्पन्न हुआ है और विशेषतः माथुरों (मथुरामे पैदा हुए वीरों) के लिये अवध्य है ॥ २९॥

कृष्णोऽपि बलवानेष माथुरो जातवानयम् ।
स जेष्यति रणे कृष्णं मथुरायां समागतः ॥ ३० ॥

ये श्रीकृष्ण बलवान् होनेपर भी मथुरामें जन्म लेनेके कारण माथुर ही हैं। अतः मथुरामें आया हुआ कालयवन रणभूमिमें श्रीकृष्णको अवश्य जीत लेगा ॥ ३० ॥

मन्यध्वं यदि वा युक्तां नृपा वाचं मयेरिताम् ।
तत्र दूतं विसृजध्वं यवनेन्द्रपुरं प्रति ॥ ३१ ॥

नरपतियो ! यदि आपलोग मेरी कही हुई इस बातको उचित समझें तो यवनराजके नगरको दूत भेज दें॥ ३१ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा सौभपतेर्वाक्यं सर्वे ते नृपसत्तमाः।
कुर्म इत्यब्रुवन् हृष्टा जरासंधं महाबलम् ॥ ३२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सौभ विमानके अधिपति राजा शाल्वकी बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ नरेश हर्षमें भरकर महाबली जरासंधसे बोले—'हमलोग अवश्य ऐसा ही करें' ॥ ३२॥

स तेषां वचनं श्रुत्वा जरासंधो महीपतिः।
बभूव विमना राजन् ब्रह्मणो वचनं स्मरन् ॥ ३३ ॥

राजन् ! उन राजाओकी बात सुनकर आकाशवाणीकी बात याद करके पृथ्वीपति जरासंधका मन उदास हो गया॥ ३३ ॥

जरासंध उवाच

मां समाश्रित्य पूर्वस्मिन् नृपानृपभयार्दिताः ।
प्राप्नुवन्ति हतं राज्यं सभृत्यबलवाहनम् ॥ ३४ ॥

जरासंध बोला—आजसे पहले सब राजा दूसरे राजाओंके भयसे पीड़ित होनेपर मेरी शरणमें आते थे और भृत्य, सेना तथा वाहनोंसहित अपने खोये हुए राज्यको मेरे सहयोगसे पुनः प्राप्त कर लेते थे ॥ ३४ ॥

इह संचोद्यते भूपैः परसंश्रयहेतुना ।
कन्येव स्वपतिद्वेषादन्यं रतिपरायणा ॥ ३५ ॥

इस समय यहाँ सब राजा मुझे दूसरेका आश्रय लेनेके लिये प्रेरित कर रहे हैं। जैसे रतिलोलुप नारी अपने पतिके प्रति द्वेष होनेसे उसे छोड़कर दूसरे पुरुषका आश्रय लेती है, (उसी प्रकार मैं अपने बलका आश्रय न लेकर दूसरेका सहारा लेनेको उद्यत हुआ हूँ) ॥३५॥

अहो सुबलवद् दैवमशक्यं विनिवर्तितुम् ।
यदहं कृष्णभीतोऽन्यं संश्रयामि बलाधिकम् ॥ ३६ ॥

अहो ! दैव बड़ा प्रबल है। उसे लौटाया नहीं जा सकता; क्योंकि आज मैं श्रीकृष्णसे डरकर दूसरे अधिक बलशाली राजाका आश्रय ग्रहण कर रहा हूँ ॥ ३६ ॥

नूनं योगविहीनोऽहं कारयिष्ये पराश्रयम् ।
श्रेयो हि मरणं मह्यं न चान्यं संश्रये नृपाः ॥ ३७॥

निश्चय ही मैं निरुपाय हो गया हूँ, अतः मुझे दूसरेका आश्रय लेना पड़ेगा; परंतु ऐसे जीवनसे तो मेरा मर जाना ही अच्छा है। नरपतियो ! मैं दूसरेकी शरण नहीं लूँगा ॥ ३७॥

कृष्णो वा बलदेवो वा यो वाऽसौ वा नराधिपः ।
हन्तारं प्रतियोत्स्यामि यथा ब्राह्माप्रचोदितः ॥ ३८ ॥

श्रीकृष्ण हों, बलदेव हों अथवा जो कोई भी राजा क्यों न हो, जो मुझे मारेगा, उसका मैं डटकर सामना करूँगा। जैसा कि आकाशवाणीने कहा है कि मुझे कोई दूसरा मारनेवाला है ॥ ३८ ॥

एषा मे निश्चिता बुद्धिरेतत् सत् पुरुषव्रतम् ।
अतोऽन्यथा न शक्तोऽहं कर्तुं परसमाश्रयम् ॥ ३९ ॥

यही मेरी बुद्धिका निश्चय है, यही सत्पुरुषका व्रत है। इसके विपरीत मैं दूसरेका आश्रय लेनेमे असमर्थ हूँ ॥ ३९ ॥

भवतां साधुवृत्तानामाबाधं न करोति सः ।
तेन दूतं प्रदास्यामि नृपाणां रक्षणाय वै ॥ ४० ॥

आप सदाचारी नरेशोको श्रीकृष्ण बाधा न पहुँचायें, इस उद्देश्यसे राजाओंकी रक्षाके लिये मैं दूत दूँगा अर्थात् दूत भेजना स्वीकार करूँगा ॥ ४० ॥

व्योममार्गेण यातव्यं यथा कृष्णो न बाधते ।
गच्छन्तमनुचिन्त्यैवं प्रेषयध्वं नृपोत्तमाः ॥ ४१ ॥

श्रेष्ठ राजाओ ! इस दूतको आकाशमार्गसे जाना चाहिये, जिससे यहाँसे जाते समय उसे श्रीकृष्ण बाधा न दे सकें। इसकी भलीभाँति विचार करके ही तुमलोग दूत भेजो ॥ ४१॥

४१६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

अयं सौभपतिः श्रीमाननलाकेन्दुविक्रमः।
रथेनादित्यवर्णेन प्रयाति स्वपुरं बली ॥ ४२ ॥

ये श्रीमान् सौभपति बलवान् राजा शाल्व अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान पराक्रमी हैं। ये सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ (विमान) द्वारा अपने नगरको जाते हैं॥ ४२ ॥

यवनेन्द्रो यथाभ्येति नरेन्द्राणां समागमम्।
वचनं च तथास्माभिर्दूत्ये नः कृष्णविग्रहे ॥ ४३ ॥

ये दूतकर्म करते समय हमलोगोंकी ओरसे जैसी बात कहनी चाहिये, वैसी ही कहें, जिससे श्रीकृष्णके साथ हम लोगोंका युद्ध उपस्थित होनेपर वह यवनराज कालयवन हम नरेशोंकी मण्डलीसे आकर मिल जाय ॥ ४३ ॥

वैशम्पायन उवाच
पुनरेवाब्रवीद् राजा सौभस्य पतिमुर्जितम् ।
गच्छ सर्वनरेन्द्राणां साहाय्यं कुरु मानद ॥ ४४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! फिर राजा जरासंधने सौभविमानके स्वामी बलवान् राजा शाल्वसे कहा—'मानद ! जाओ, सम्पूर्ण नरेशोंकी सहायता करो ॥ ४४ ॥

यवनेन्द्रो यथा याति यथा कृष्णं विजेष्यति ।
यथा वयं च तुष्यामस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ४५ ॥

तुम ऐसी नीतिका प्रयोग करो, जिससे यवनराज चढ़ाई करे, श्रीकृष्णको जीते और हमलोगोंको संतोप हो' ॥ ४५ ॥

एवं संदिश्य सर्वांस्तान् भीष्मकं पूज्य धर्मतः ।
प्रययौ स्वपुरं राजा स्वेन सैन्येन संवृतः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार सबको संदेश देकर और धर्मानुसार भीष्मकका भी सम्मान करके राजा जरासंध अपनी सेनाके साथ अपने नगरको चला गया ॥ ४६ ॥

शाल्वोऽपि नृपतिश्रेष्ठस्तांश्च सम्पूज्य धर्मतः।
जगामाकाशमार्गेण रथेनानिलरंहसा ॥ ४७ ॥

राजाओंमें श्रेष्ठ शाल्व भी उन सबका धर्मपूर्वक आदर करके वायुके समान वेगशाली विमानद्वारा आकाशमार्गसे चला गया ॥ ४७ ॥

तेऽपि सर्वे महीपाला दक्षिणापथवासिनः ।
अनुव्रज्य जरासंधं गताः स्वनगरं प्रति ॥ ४८ ॥

दक्षिण भारतके रहनेवाले जो समस्त भूमिपाल वहाँ उपस्थित थे, वे भी कुछ दूरतक जरासंधके पीछे जाकर फिर अपने नगरको चले गये ॥ ४८ ॥

भीष्मकः सह पुत्रेण तावुभौ चिन्त्य दुर्नयम् ।
स्वे गृहे न्यवसद् दीनः कृष्णमेवानुचिन्तयन् ॥ ४९ ॥

राजा भीष्मक अपने पुत्र रुक्मीके साथ ही उन दोनों शाल्व और जरासंधका तथा उन सबकी दुर्नीतिका विचार करके श्रीकृष्णका ही चिन्तन करते हुए दीनभावसे अपने घरमें रहने लगे ॥ ४९ ॥

विदित्वा रुक्मिणी साध्वी स्वयंवरनिवर्तनम् ।
कृष्णस्यागमनाद्धेतोर्नृपाणां दोषदर्शनम् ॥ ५० ॥
गत्वा तु सा सखीमध्ये उवाच व्रीडितानना ।
न चान्येषां नरेन्द्राणां पत्नी भवितुमुत्सहे ।
कृष्णात् कमलपत्राक्षात् सत्यमेतद् वचो मम ॥ ५१ ॥

सती साध्वी रुक्मिणीको जब यह पता लग गया कि श्रीकृष्णका आगमन होनेसे स्वयंवर स्थगित हो गया तथा राजाओंकी जो दोषद्रष्टि थी उसका भी ज्ञान हो गया, तब वे अपनी सखियोंके बीचमें जाकर लज्जासे सिर झुकाये हुए बोलीं—'सखियो ! मैं कमलनयन श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरे नरेशोंकी पत्नी नहीं हो सकती—यह मेरी सच्ची बात है ।५०-५१।

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीका स्वयंवरविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥


त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालयवनकी विशेषता, राजा शाल्वका उसके यहाँ दूत बनकर आना और उसे जरासंधका संदेश सुनाना

वैशम्पायन उवाच
यवनानां बलोदग्रः स कालयवनो नृपः ।
बभूव राजा धर्मेण रक्षिता पुरवासिनाम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सबसे अधिक बलशाली कालयवन यवनोंका राजा था, जो धर्मके अनुसार पुरवासियोंकी रक्षा करता था ॥ १ ॥

त्रिवर्गविदितः प्राज्ञः षड्गुणानुपजीवकः ।
सप्तव्यसनसम्मूढो गुणेष्वभिरतः सदा ॥ २ ॥

वह त्रिवर्ग (पद, स्थान एवं वृद्धि अथवा धर्म, अर्थ और काम ) का ज्ञाता, बुद्धिमान्, राजनीतिके छः गुणों(संधि-विग्रह आदि ) का आश्रय लेनेवाला, सात प्रकारके व्यसनों- से अनभिज्ञ और सदा गुणोंमें तत्पर रहनेवाला था ॥ २॥

श्रुतिमान् धर्मशीलश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
सांग्रामिकविधिज्ञश्च दुर्गलाभानुसारणः ॥ ३ ॥


१ सात व्यसन इस प्रकार हैं—मृगया, जुआ, दिनमें सोना, परायी निन्दा, स्त्रीविषयक आसक्ति, मद्यपान और व्यर्थ भाषण ।

विष्णुपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१७


विद्यावान्, धर्मशील, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, युद्धविधि-का ज्ञाता तथा दुर्लभ लाभका अनुसरण करनेवाला था ॥ ३ ॥

शूरोऽप्रतिबलश्चैव मन्त्रिप्रवरसेवकः ।
सुखासीनः सभां रम्यां सचिवैः परिवारितः ॥ ४ ॥
उपास्यमानो यवनैरात्मविद्भिर्विपश्चितैः ।
विविधाश्च कथा दिव्याः कथ्यमानाः परस्परम् ॥ ५ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु दिव्यगन्धवहोऽनिलः ।
प्रववौ मदनावोधं चकार सुखशीतलः ॥ ६ ॥

उसके समान बलवान् दूसरा कोई नहीं था। वह शूरवीर और श्रेष्ठ मन्त्रियोंका सेवन करनेवाला था। एक दिन जब वह मन्त्रियोंसे घिरा हुआ अपनी रमणीय सभामें सुखपूर्वक बैठा था, आत्मज्ञ एवं विद्वान् यवन उसकी सेवामें उपस्थित थे और उनमें परस्पर नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ हो रही थीं। इसी समय दिव्य सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द वायु बहने लगी। वह सुखद एवं शीतल वायु उन सबके कामभावको जाग्रत् करने लगी ॥ ४–६ ॥

किंस्विदित्युत्कमनसः सभायां ये समागताः ।
उत्फुल्लनयनाः सर्वे राजा चैवावलोक्य सः ॥ ७ ॥

उस समय सभामें जो लोग आये थे, वे सभी एकचित्त होकर यह जिज्ञासा करने लगे कि 'यह क्या है ?' सबके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे थे। राजा कालयवन भी यह अद्भुत बात देखकर प्रभावित हुए बिना न रह सका ॥ ७ ॥

अपश्यन्त रथं दिव्यमायान्तं भास्करोपमम् ।
शातकुम्भमयैः शुभ्रं रथाङ्गैरुपशोभितम् ॥ ८ ॥
दिव्यरत्नप्रभाकीर्णं दिव्यध्वजपताकिनम् ।
वाहितं दिव्यतुरगैर्र्मनोमारुतरंहसैः ॥ ९ ॥

उन सबने आकाशसे एक सूर्यके समान तेजस्वी दिव्य विमानको उतरते देखा, जो सुवर्णमय चमकीले पहियोंसे शोभा पाता था, वह रथ या विमान दिव्य रत्नोंकी प्रभासे व्याप्त था। उसमें दिव्य ध्वजा-पताकाएं फहरा रहीं थीं तथा मन एवं वायुके समान वेगशाली दिव्य अश्व उस रथको खींच रहे थे ॥ ८-९ ॥

चन्द्रभास्करविम्बानि कृत्वा जाम्बूनदेन तम् ।
रचितं वै विश्वकृता वैयाघ्रवरभूषितम् ॥ १० ॥

विश्वकर्माने चन्द्रमा और सूर्यके बिम्ब बनाकर जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उस रथका निर्माण किया था। वह चारों ओरसे उत्तम व्याघ्रचर्मद्वारा मढ़ा हुआ था ॥ १० ॥

रिपूणां त्रासजननं मित्राणां हर्षवर्द्धनम् ।
दक्षिणादिगुपायान्तं रथं पररथारुजम् ॥ ११ ॥

वह रथ शत्रुओंके मनमें त्रास उत्पन्न करनेवाला और मित्रोंका हर्ष बढ़ानेवाला था। वह दक्षिण दिशाकी ओरसे आ रहा था और शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेमे समर्थ था ११

तत्रोपविष्टं श्रीमन्तं सौभस्य पतिमूर्जितम् ।
दृष्ट्वा परमसंहृष्टाश्चार्घ्यं पाद्येति चासकृत् ॥ १२ ॥
उवाच यवनेन्द्रस्य मन्त्री मन्त्रविशां वरः ।

उसमे बैठे हुए सौभपति तेजस्वी राजा श्रीमान् शाल्वको देखकर मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ यवनराजका मन्त्री बहुत प्रसन्न हुआ और बारंबार कहने लगा—'अरे ! अर्घ्य लाओ, पाद्य लाओ' ॥ १२३ ॥

तत्रोत्थाय महाबाहुः स्वयमेव नृपासनात् ॥ १३ ॥
प्रत्युद्गम्यार्घ्यमादाय रथावतरणे स्थितः ।

उस समय महाबाहु राजा कालयवन स्वयं ही राजसिंहासनसे उठा और अर्घ्य लिये आगे बढ़कर विमानसे उतरनेकी सीढ़ीके पास खड़ा हो गया ॥ १३३ ॥

शाल्वोऽपि च महातेजा दृष्ट्वा राजानमागतम् ॥ १४ ॥
मुदा परमया युक्तं शक्रप्रतिमतेजसम् ।
अवतीर्य सुविश्रब्ध एक एव रथोत्तमात् ॥ १५ ॥
विवेश परमं प्रीतो मित्रदर्शनलालसः ।

महातेजस्वी राजा शाल्व भी इन्द्रके समान तेजस्वी राजा कालयवनको बड़ी प्रसन्नताके साथ आया देख निर्भय हो अकेला ही उस उत्तम रथसे उतर पड़ा और मित्रके दर्शनकी लालसा मनमें रखकर अत्यन्त संतुष्ट हो उसके भवनमें प्रविष्ट हुआ ॥ १४-१५३ ॥

दृष्ट्वार्घ्यमुद्यतं राजा शाल्वो राजर्षिसत्तमः ॥ १६ ॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा नार्घोऽहंऽस्मि महाद्युते ।

अपने लिये अर्घ्य उपस्थित देख राजर्षियोंमें श्रेष्ठ राजा शाल्व मधुर वाणीमे बोला—'महाद्युते ! मैं अर्घ्य ग्रहण करनेके योग्य नहीं हूँ ॥ १६३ ॥'

दूतोऽहं मनुजेन्द्राणां सकाशाद् भवतोऽन्तिकम् ॥ १७ ॥
प्रेषितो बहुभिः सार्द्धं जरासंधेन धीमता ।
तेन मन्ये महाराज नार्घाहोऽस्मीति राजसु ॥ १८ ॥

'मैं नरेशोंका दूत बनकर उनकी ओरसे आपके पास आया हूँ। बुद्धिमान् जरासंध तथा बहुत-से नरेशोंने एक साथ मिलकर मुझे आपके पास भेजा है। महाराज ! इसीलिये मैं समझता हूँ कि इस समय मैं राजाओंका अर्घ्य लेने योग्य नहीं हूँ' ॥ १७-१८ ॥

कालयवन उवाच

जानाम्यहं महाबाहो दौत्येन त्वामिहागतम् ।
साहित्ये नरदेवानां प्रेषितो मागधेन वै ॥ १९ ॥

कालयवन बोला—महाबाहो ! मैं जानता हूँ कि तुम दूत बनकर यहाँ आये हो और नरपतियोंके साथ मगधराज जरासंधने तुम्हे यहाँ भेजा है ॥ १९ ॥


म० ह० १४ -

४१८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तेन त्वामर्चये राजन् विशेषेण महामते।
अर्घ्यपाद्यादिसत्कारैरासनेन यथाविधि ॥ २० ॥
भवत्यभ्यर्चिते राज्ञां सर्वेषामर्चितं भवेत्।
आस्यतामासने शुभ्रे मया सार्द्धं जनेश्वर ॥ २१ ॥

राजन् ! महामते ! इसलिये मैं तुम्हारी विशेषरूपसे पूजा करना चाहता हूँ। अर्घ्य, पाद्य आदि सत्कारोंसे तथा विधिपूर्वक आसन देनेसे यदि आपकी पूजा हो जायगी तो इसके द्वारा समस्त राजाओंका पूजन सम्पन्न हो जायगा। अतः जनेश्वर ! अब मेरे साथ उज्ज्वल सिंहासनपर विराजमान होइये ॥ २०-२१ ॥

वैशम्पायन उवाच
स हस्तालिङ्गनं कृत्वा पृष्ट्वा च कुशलमामयम् ।
सुखोपविष्टौ सहितौ शुभे सिंहासने स्थितौ ॥ २२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! कालयवनने शाल्वसे हाथ मिलाकर उसका कुशलमंगल पूछा। फिर दोनों एक सुन्दर सिंहासनपर साथ-साथ सुखपूर्वक बैठे ॥ २२ ॥

कालयवन उवाच
यद्बाहुबलमाश्रित्य वयं सर्वे नराधिपाः।
वसामो विगतोद्विग्ना देवा इव शचीपतिम् ॥ २३ ॥
किमसाध्यं भवेदस्य येनासि प्रेषितो मयि।

उस समय कालयवनने कहा—राजन् ! जिनके बाहुबलका सहारा लेकर हम सब नरेश उसी प्रकार निर्भय रहते हैं, जैसे देवता शचीपति इन्द्रका सहारा लेकर भयसे मुक्त हो जाते हैं; उन्हीं महाराज जरासंधके लिये कौन-सा कार्य असाध्य हो गया है, जिससे उन्होंने मेरे पास आपको भेजा है ? ॥ २३ ॥

वद सत्यं वचस्तस्य किमाज्ञापयति प्रभुः।
करिष्ये वचनं तस्य अपि कर्म सुदुष्करम् ॥ २४ ॥

उन्होंने क्या कहा है, यह सच-सच बताइये। वे प्रभु मेरे लिये क्या आज्ञा देते हैं ? मैं उनकी आज्ञाका पालन करूँगा। उनके कहनेसे अत्यन्त दुष्कर कर्म भी कर सकता हूँ ॥ २४ ॥

शाल्व उवाच
यथा वदति राजेन्द्र मगधाधिपतिस्तव।
तथाहं सम्प्रवक्ष्यामि श्रूयतां यवनाधिप ॥ २५ ॥

शाल्व बोला—राजेन्द्र ! यवनेश्वर ! मगधराज जरासंधने आपसे जैसी बात कहनेको कहा है, वैसी ही बता रहा हूँ, सुनिये ॥ २५ ॥

जरासंध उवाच
जातोऽयं जगतां बाधी कृष्णः परमदुर्जयः।
विदित्वा तस्य दुर्वृत्तमहं हन्तुं समुद्यतः ॥ २६ ॥

जरासंधका कथन है कि—ये जो परम दुर्जय श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं, सम्पूर्ण जगत्‌को बड़ा कष्ट दे रहे हैं। उनके दुराचारको जानकर मैं उन्हें मार डालनेके लिये उद्यत हुआ था ॥ २६ ॥

पार्थिवैर्बहुभिः सार्द्धं समग्रबलवाहनैः ।
उपरुध्य महासैन्यैर्गोमन्तमचलोत्तमम् ॥ २७ ॥
चेदिराजस्य वचनं महार्थं श्रुतवानहम् ।
तदा तयोर्विनाशाय हुताशनमयोजयम् ॥ २८ ॥

बहुत-से राजा अपनी समूची सेना और सवारियाँ लेकर मेरे साथ हो गये थे। उन सबकी विशाल सेनाओंद्वारा मैंने गोमन्त नामक उत्तम पर्वतपर घेरा डाला (क्योंकि उस समय श्रीकृष्ण और बलराम गोमन्तपर ही विद्यमान थे)। घेरा डालनेके बाद मैंने चेदिराज दमघोषका वचन सुना, जो महान् अर्थसे भरा था। तब मैंने उन दोनोंके विनाशके लिये उस पर्वतपर आग लगा दी ॥ २७-२८ ॥

ज्वालाशतसहस्राढ्यं युगान्ताग्निसमप्रभम् ।
दृष्ट्वा रामो गिरेः कूटादाप्लुतो हेमतालधृक् ॥ २९ ॥
विनिष्पत्य महासेनां मध्ये सागरसंनिभाम् ।
आजघान दुराधर्षो नराश्वरथदन्तिनाम् ॥ ३० ॥

वह आग सैकड़ों और हजारों लपटोंसे प्रज्वलित हो उठी, जो प्रलयकालकी संवर्तक अग्निके समान प्रकाशित हो रही थी। उस आगको देखकर सुवर्णमय तालध्वज धारण करनेवाले बलराम पर्वतके शिखरसे कूद पड़े और समुद्र-जैसी प्रतीत होनेवाली उस विशाल सेनाके मध्यभागमें पहुँचकर हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंका संहार करने लगे। उस समय उन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन हो गया था॥२९-३०

सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं विकृष्याकृष्य लाङ्गलम् ।
नरनागाश्ववृन्दानि मुसलेन व्यपोथयत् ॥ ३१ ॥

उन्होंने सर्पराजके समान सरकते हुए हलका आकर्षण और विकर्षण करके अर्थात् उस हलद्वारा शत्रुसैनिकोंको ढकेलते और खींचते हुए बहुत-से मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको मुसलसे मार डाला ॥ ३१ ॥

गजेन गजमास्फाल्य रथेन रथयोधिनम् ।
हयेन च हयारोहं पदातेन पदातिनम् ॥ ३२ ॥

वे हाथीसे हाथीको, रथसे रथी योद्धाको, घोड़ेसे घुड़सवारको तथा पैदलसे पैदल सिपाहीको मौतके घाट उतार देते थे ॥ ३२ ॥

समरे स महातेजा नृपार्कशतसंकुले ।
विचरन् विविधान् मार्गान् निदाघे भास्करो यथा ॥३३॥

जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यदेव प्रचण्ड तेजसे सम्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार सैकड़ों राजारूपी सूर्यसे व्याप्त समराङ्गणमें वे

विष्णुपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४१९


महातेजस्वी बलराम भाँति-भाँतिके पैंतरे दिखाते हुए विचरने लगे ॥ ३३ ॥

रामादनन्तरं कृष्णः प्रगृह्यार्कसमप्रभम् ।
चक्रं चक्रभृतां श्रेष्ठः सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥ ३४ ॥

बलरामसे छोटे हैं श्रीकृष्ण, जो चक्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं। वे सूर्यके समान तेजस्वी चक्र हाथमें लेकर उसी तरह शत्रु-सैनिकोंपर टूट पड़े, जैसे सिंह क्षुद्र मृगोंपर आक्रमण करता है ॥ ३४ ॥

प्रविचाल्य महावीर्यः पादवेगेन तं गिरिम् ।
शत्रुसैन्ये पपातोच्चैैर्यदुवीरः प्रतापवान् ॥ ३५ ॥
प्रनृत्यन्निव शैलेन्द्रस्तोयधाराभिषेचितः ।
घूर्णमानो विवेशोर्वीं विनिर्वाप्य हुताशनम् ॥ ३६ ॥

महापराक्रमी प्रतापी यदुवीर श्रीकृष्ण अपने पैरोंके वेगसे उस पर्वतको हिलाकर जब ऊँचे शिखरसे शत्रुओंकी सेनामें कूदे थे, उस समय वह शैलराज नाचता-सा प्रतीत होता था। वह अपने ही अवयवोंसे निकली हुई जलधारासे नहा उठा और सारी आगको बुझाकर चक्कर काटता-सा कुछ दूरतक पृथ्वीमें घुस गया ॥ ३५-३६ ॥

आदीप्यमानशिखरादवप्लुत्य जनार्दनः ।
जघान वाहिनीं राजंश्चक्रव्यग्रेण पाणिना ॥ ३७ ॥

राजन् ! पर्वतके जलते हुए शिखरसे नीचे कूदकर श्रीकृष्णने चक्रयुक्त हाथसे राजाओंकी सेनाका संहार आरम्भ किया ॥ ३७ ॥

विक्षिप्य विपुलं चक्रं गदापातादनन्तरम् ।
नरनागाश्ववृन्दानि मुसलेन व्यचूर्णयत् ॥ ३८ ॥

विशाल चक्र फेंककर फिर गदाद्वारा आघात करते थे। तदनन्तर बलराम मुसलसे हाथी, घोड़े और मनुष्योंके समूहोंका कचूमर निकाल देते थे ॥ ३८ ॥

क्रोधानिलसमुद्धतचक्रलाङ्गलवह्निना ।
निर्दग्धा महती सेना नरेन्द्रार्काभिपालिता ॥ ३९ ॥

क्रोधरूपी वायुसे प्रज्वलित चक्र और हलरूपी आगसे नरेशरूपी सूर्यद्वारा पालित वह विशाल सेना जलकर भस्म हो गयी ॥ ३९ ॥

नरनागाश्वकलिलं पत्तिध्वजसमाकुलम् ।
रथानीकं पदाताभ्यां क्षणेन विदलीकृतम् ॥ ४० ॥

इन दो ही पैदल वीरोंने हाथी, घोड़ों और मनुष्योंसे परिपूर्ण एवं पैदलों और ध्वजोंसे व्याप्त रथसमूहका क्षणभरमें ही संहार कर डाला ॥ ४० ॥

सेनां प्रभग्नामालोक्य चक्रानलभयार्दिताम् ।
महता रथवृन्देन परिवार्य समन्ततः ॥ ४१ ॥
तत्राहं युद्धयमानस्तु भ्रातास्य बलवान् बली ।
स्थितो ममाग्रतः शूरो गदापाणिर्हलायुधः ॥ ४२ ॥

चक्राग्निके भयसे पीड़ित हुई अपनी सेनाको पलायन करती देख मैं विशाल रथसमूहके द्वारा उन दोनोंको सब ओरसे घेरकर युद्ध करने लगा। उस समय श्रीकृष्णके बलवान् भ्राता शूरवीर बलराम हाथमें गदा और हल लिये मेरे सामने खड़े हो गये ॥ ४१-४२ ॥

द्वादशाक्षौहिणीर्हत्वा प्रभिन्न इव केसरी ।
हलं सौनन्दमुत्सृज्य गदया मामताडयत् ॥ ४३ ॥

उन्होंने चोट खाये हुए सिंहके समान कुपित हो मेरी बारह अक्षौहिणी सेनाओंका संहार करके हल और मुसलको तो छोड़ दिया और गदासे ही मुझपर आघात किया ॥ ४३॥

वज्रपातनिभं वेगं पातयित्वा ममोपरि ।
भूयः प्रहर्तुकामो मां वैशाखेनास्थितो महीम् ॥ ४४ ॥

उसका वेग वज्रपातके समान था। मेरे ऊपर उस गदाका प्रहार करके वे पुनः मुझपर चोट करनेकी इच्छासे वैशाखी (शक्ति) लेकर पृथ्वीपर खड़े हो गये ॥ ४४ ॥

वैशाखं स्थानमास्थाय गुहः क्रौञ्चं यथा पुरा ।
तथा मां दीर्घनेत्राभ्यामीक्षते निर्दहन्निव ॥ ४५ ॥

जैसे पूर्वकालमें कार्तिकेयने क्रौञ्च पर्वतको विदीर्ण किया था, उसी प्रकार वे मेरे मर्मस्थानको लक्ष्य करके शक्ति छोड़नेकी इच्छासे अपने बड़े-बड़े नेत्रोंद्वारा मेरी ओर इस तरह देखने लगे, मानो मुझे जलाकर भस्म कर डालेंगे ॥ ४५ ॥

तादृग्रूपं समालोक्य बलदेवं रणाजिरे ।
जीवितार्थी नृलोकेऽस्मिन् कः पुमान् स्थातुमर्हति ॥ ४६॥

रणभूमिमें बलदेवके वैसे स्वरूपको देखकर अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाला इस मनुष्यलोकका कौन पुरुष उनके सामने ठहर सकता है ॥ ४६ ॥

गृहीत्वा सगदां भीमां कालदण्डमिवोद्यताम् ।
कालाङ्कुशेन निर्धूतां स्थित एवाग्रतो मम ॥ ४७ ॥

फिर कालदण्डके समान उठी हुई भयानक गदाको हाथमें लेकर वे मेरे सामने खड़े हो गये। वह गदा कालकी प्रेरणासे घुमायी जा रही थी ॥ ४७ ॥

ततो जलदगम्भीरस्वरेणापूरयन् नभः ।
वागुवाचाशरीरेण स्वयं लोकपितामहः ॥ ४८ ॥
प्रहर्तव्यो न राजायमवध्योऽयं तवानघ ।
कल्पितोऽस्य वधोऽन्यस्माद् विरमस्व हलायुध॥ ४९ ॥

इसी बीचमें साक्षात् लोकपितामह ब्रह्माजी मेघके समान गम्भीर स्वरसे आकाशको पूर्ण करते हुए अदृश्यरूपसे बोले— 'अनघ ! इस राजापर प्रहार न करना। यह तुम्हारे लिये

४२०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

अवध्य है। इसका वध दूसरेके हाथसे निश्चित किया गया है, अतः हलधारी बलराम ! तुम प्रहारसे विरत हो जाओ' ४८-४९

श्रुत्वाहं तेन वाक्येन चिन्ताविष्टो निवर्तितः ।
सर्वप्राणहरं घोरं ब्रह्मणा स्वयमीरितम् ॥ ५० ॥
यह सुनकर उस आकाशवाणीके कारण मैं चिन्तामें निमग्न हो गया और युद्धसे लौट पड़ा; क्योंकि साक्षात् ब्रह्माजीने वह ऐसा घोर वचन सुनाया था, जो मेरी सम्पूर्ण प्राणशक्तिको हर लेनेवाला था ॥ ५० ॥

तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि नृपाणां हितकाम्यया ।
श्रुत्वा त्वमेव राजेन्द्र कर्तुमर्हसि तद् वचः ॥ ५१ ॥
राजेन्द्र ! इसलिये मैं तुमसे समस्त नरेशोंके हितकी कामनासे कुछ कहना चाहता हूँ, उसे सुनकर तुम्हीं उसे पूर्ण कर सकते हो ॥ ५१ ॥

तपसोग्रेण महता पुत्रार्थी तोष्य शङ्करम् ।
प्राप्तवान् देवदेवं त्वामवध्यं माथुरैर्जनैः ॥ ५२ ॥
महामुनिश्चायसचूर्णमशन-
न्युपस्थितो द्वादशवार्षिकं व्रतम् ।
सुरासुरैः संस्तुतपादपङ्कजः
स लब्धवानीप्सितकामसम्पदम् ॥ ५३ ॥
महामुनि गार्ग्य, जिनके चरणारविन्दोंकी स्तुति देवता और असुर भी करते हैं; बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेके पश्चात् लोहचूर्ण खाकर तपस्या करने लगे । मनमें पुत्रकी कामना रखकर उस उग्र एवं महान् तपके द्वारा भगवान् शङ्करको संतुष्ट करके उनसे उन्होंने अपनी अभीष्ट कामसम्पत्तिके रूपमें देवराज-तुल्य तुमको प्राप्त किया । तुम मथुरा मण्डलमें उत्पन्न होनेवाले लोगोंके लिये अवध्य हो ॥ ५२-५३ ॥

तपोबलाद् गार्ग्यमुनेर्महात्मनो
वरप्रभावाच्चकलेन्दुमौलिनः ।
भवन्तमासाद्य जनार्दनो हिमं
विलीयते भास्कररश्मिना यथा ॥ ५४ ॥
महामुनि गार्ग्यके तपोबल और चन्द्रार्धशेखर भगवान् शिवके वरदानसे तुम्हारा प्राकट्य हुआ है । तुमसे टक्कर लेने-पर श्रीकृष्ण उसी प्रकार नष्ट हो जायँगे, जैसे बर्फ सूर्यकी किरणोंसे गल जाता है ॥ ५४ ॥

यतस्व राज्ञां वचनप्रचोदितो
व्रजस्व यात्रां विजयाय केशवम् ।
प्रविश्य राष्ट्रं मथुरां च सेनया
निहत्य कृष्णं प्रथयन् स्वकं यशः ॥ ५५ ॥
राजन् ! तुम राजाओंके वचनोंसे प्रेरित हो श्रीकृष्णको जीतनेका प्रयत्न करो । उनपर विजय पानेके लिये मथुरापर चढ़ाई कर दो । अपनी सेनाद्वारा मथुराके राज्य और नगर-में प्रवेश करके श्रीकृष्णको मारकर अपने यशका विस्तार करो ॥ ५५ ॥

माथुरो वासुदेवोऽयं बलदेवः सबान्धवः ।
तौ विजेष्यसि संग्रामे गत्वा तां मथुरां पुरीम् ॥ ५६ ॥
वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण और बलदेव अपने बन्धु-बान्धवों-सहित माथुर ही हैं; तुम मथुरापुरीपर चढ़ाई करके उन दोनों भाइयोंको युद्धमें जीत लोगे ॥ ५६ ॥

शाल्व उवाच

इत्येवं नरपतिभास्करप्रगीतं
वाक्यं ते कथितमिदं हितं नृपाणाम् ।
तत्सर्वं सह सचिवैर्विमृश्य बुद्ध्या
यद्युक्तं कुरु मनुजेन्द्र चात्मनिष्ठम् ॥ ५७ ॥
शाल्व कहता है— नरेन्द्र ! राजाओंमें सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले जरासंधने इस प्रकार जो सम्पूर्ण नरेशोंके लिये हितकारक बात कही है, वह मैंने तुम्हें कह सुनायी । तुम अपने मन्त्रियोंके साथ बैठकर उन सारी बातोंपर बुद्धि-पूर्वक विचार करके जो अपने लिये लाभदायक और उचित जान पड़े, वह करो ॥ ५७ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शाल्ववाक्ये त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शाल्वका वाक्यविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥


चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालयवनका राजाओंका अनुरोध स्वीकार करके श्रीकृष्णपर विजय पानेके लिये मथुराको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाचवैशम्पायनजी कहते हैं—
एवं कथयमानं तं शाल्वराजं नृपाज्ञया ।<br>उवाच परमप्रीतो यवनाधिपतिर्नृपः ॥ १ ॥जनमेजय ! नरेशोंकी आज्ञाके अनुसार शाल्वराजने जब उपर्युक्त बात कही, तब यवनोंके अधिपति राजा कालयवनने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा ॥ १ ॥

विष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२१

कालयवन उवाच

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि सफलं जीवितं मम ।
कृष्णनिग्रहहेतोर्यन्नियुक्तो बहुभिर्नृपैः ॥ २ ॥

कालयवन बोला—बहुत-से राजाओंने मिलकर जो मुझे श्रीकृष्णके निग्रहके लिये नियुक्त किया है, इससे मैं धन्य हो गया। यह उन सबका मुझपर महान् अनुग्रह है। आज मेरा जीवन सफल हो गया ॥ २ ॥

दुर्जयस्त्रिषु लोकेषु सुरासुरगणैरपि ।
तस्य निग्रहहेतोर्मामवधार्य जयाशिषम् ॥ ३ ॥
प्रहृष्टै राजसिंहैस्तैरवधार्यो जयो मम ।
तेषां वाचामृतवर्षेण विजयो मे भविष्यति ॥ ४ ॥

जो तीनों लोकोंमें देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय हैं, उन्हींके निग्रहके लिये मुझे भेजनेका निश्चय किया गया और मुझे विजयसूचक आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। हर्षमे भरे हुए उन राजसिंहोंने यदि मेरी विजयका निश्चय किया है तो उनके वचनामृतकी वर्षासे मेरी जीत अवश्य होगी ॥ ३-४॥

करिष्ये वचनं तेषां नृपसत्तमचोदितम् ।
पराजयोऽपि राजेन्द्र जयेन सदृशो मम ॥ ५ ॥

राजेन्द्र ! मैं नृपश्रेष्ठ जरासंधके कथनानुसार उन राजाओंके वचनका पालन अवश्य करूँगा। इस युद्धमें यदि मेरी पराजय भी हुई तो वह मेरे लिये विजयके ही समान होगी ॥ ५ ॥

अद्यैव तिथिनक्षत्रं मुहूर्तं करणं शुभम् ।
यास्यामि मथुरां राजन् विजेतुं केशवं रणे ॥ ६ ॥

राजन् ! मैं आजकी तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त और करणको शुभ मानकर श्रीकृष्णको युद्धमें जीतनेके लिये आज ही मथुराको प्रस्थान करूँगा ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमाभाष्य राजानं सौभस्य पतिमूर्जितम् ।
सत्कृत्य च यथान्यायं महार्हमणिभूषणैः ॥ ७ ॥
ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं सिद्धादेशाय वै नृपः ।
पुरोहिताय राजेन्द्र प्रददौ बहुशो धनम् ॥ ८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सौभविमानके अधिपति बलवान् राजा शाल्वसे ऐसा कहकर कालयवनने बहुमूल्य मणिमय आभूषणोंद्वारा उसका यथोचित सत्कार किया। राजेन्द्र ! तत्पश्चात् उस राजाने सिद्धिसूचक आशीर्वाद प्राप्त करनेके लिये ब्राह्मणोंको धन दान दिया और पुरोहितको बहुत-सा धन अर्पित किया ॥ ७-८ ॥

हुत्वाग्निं विधिवद् राजा कृतकौतुकमङ्गलः ।
प्रस्थानं कृतवान् सम्यग् जेतुकामो जनार्दनम् ॥ ९ ॥

तदनन्तर, विधिपूर्वक अग्निमें आहुति करके यात्राकालिक मङ्गलाचार सम्पन्न करनेके पश्चात् राजा कालयवनने जनार्दन श्रीकृष्णपर भलीभाँति विजय पानेके लिये वहाँसे प्रस्थान किया ॥ ९ ॥

शाल्वोऽपि भरतश्रेष्ठ कृतार्थो हृष्टमानसः ।
यवनेन्द्रं परिष्वज्य जगाम स्वपुरं नृपः ॥ १० ॥

भरतश्रेष्ठ ! इधर राजा शाल्व भी कृतार्थ एवं प्रसन्नचित्त हो यवनराजको हृदयसे लगाकर अपने नगरको चला गया ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि कालयवनवाक्ये चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें कालयवनका वाक्यविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥


पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

गरुड़का श्रीकृष्णके निवासयोग्य भूमि देखनेके लिये जाना, मथुरामें राजेन्द्र श्रीकृष्णका स्वागत, श्रीकृष्णद्वारा राजा उग्रसेन तथा मथुरावासियोंका सत्कार एवं गरुड़का लौटकर कुशस्थलीके विषयमें बताना।

जनमेजय उवाच

विदर्भनगराद् याते शक्रतुल्यपराक्रमे ।
किमर्थं गरुडो नीतः किं च कर्म चकार सः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा—इन्द्रके तुल्य पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण जब विदर्भ नगरसे मथुराको गये, उस समय अपने साथ गरुड़को क्यों ले गये और गरुड़ने वहाँ जाकर कौन-सा कार्य सम्पन्न किया ? ॥ १ ॥

न चारुरोह भगवान् वैनतेयं महाबलम् ।
एतन्मे संशयं ब्रह्मन् ब्रूहि तत्त्वं महामुने ॥ २ ॥

महामुने ! ब्रह्मन् ! भगवान् श्रीकृष्ण महाबली गरुड़पर आरूढ़ क्यों नहीं हुए ? यह मेरा संशय है। आप इसका ठीक-ठीक समाधान करें ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु राजन् सुपर्णेन कृतं कर्मातिमानुषम् ।
विदर्भनगरों गत्वा वैनतेयो महाद्युतिः ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! महातेजस्वी विनता-नन्दन गरुड़ने विदर्भनगरमें जाकर ऐसा कार्य किया था, जो मानवीय शक्तिसे परेकी वस्तु है ॥ ३ ॥

४२२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

असम्प्राप्ते च नगरीं मधुरां मधुसूदने।
मनसा चिन्तयामास वैनतेयो महाद्युतिः॥ ४ ॥
यदुक्तं देवदेवेन नृपाणामग्रतः प्रभो।
यास्यामि मधुरां रम्यां भोजराजेन पालिताम्॥ ५॥
इति तद्वचनस्यान्ते गमिष्येति विचिन्तयन्।
कृताञ्जलिपुटः धीमान् प्रणिपत्याब्रवीदिदम्॥ ६ ॥

प्रभो ! मधुसूदन श्रीकृष्ण विदर्भनगरसे चलकर अभी मार्गमें ही थे, मथुरापुरी नहीं पहुँचे थे। तभी महातेजस्वी गरुड़ने मन-ही-मन विचार किया कि देवाधिदेव श्रीहरिने सब राजाओंके सामने जो कहा था कि 'मैं भोजराज उग्रसेनके द्वारा पालित रमणीय नगरी मथुराको जाऊँगा' उनके उस कथनके अन्तमें 'चलूँगा' यह कहकर मैंने भी चलना स्वीकार कर लिया था। यही सोचते हुए गरुड़को एक कार्य सूझ गया और उन तेजस्वी पक्षिराजने दोनों हाथ जोड़ भगवान्‌को प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ ४-६॥

गरुड उवाच

देव यास्यामि नगरीं रैवतस्य कुशस्थलीम्।
रैवतं च गिरिं रम्यं नन्दनप्रतिमं वनम्॥ ७ ॥

गरुड़ बोले—देव ! मैं राजा रैवतकी कुशस्थली नगरीको जाऊँगा। वहाँ रमणीय रैवत गिरि है, जहाँ नन्दनके समान मनोहर वन है॥ ७॥

रुक्मिणोद्वासितां रम्यां शैलोदधितटाश्रयाम्।
वृक्षगुल्मलताकीर्णां पुष्परेणुविभूषिताम्॥ ८ ॥

रुक्मीने पर्वत और समुद्रतटका आश्रय लेकर बसी हुई उस रमणीय नगरीको उजाड़ दिया है। वहाँ हरे-भरे वृक्ष, गुल्म और लताएँ फैली हुई हैं। फूलोंके पराग उसकी शोभा बढ़ाते हैं॥ ८॥

गजेन्द्रभुजगाकीर्णामृक्षवानरसेविताम् ।
वराहमहिषाक्रान्तां मृगयूथैरनेककः॥ ९ ॥

वहाँ हाथी और सर्प भरे हुए हैं। रीछ तथा वानर उसका सेवन करते हैं। वाराह, भैंसे तथा मृगोंके अनेकानेक झुंड वहाँ वास करते हैं॥ ९ ॥

तां समन्तात् समालोक्य वासार्थं ते क्षमां क्षमा।
यदि स्याद् भवतो रम्या प्रशस्ता नगरीति च॥ १०॥
कण्टकोद्धरणं कृत्वा आगमिष्ये तवान्तिकम्।

उस भूमिको सब ओरसे निरीक्षण करके मैं यह देखूँगा कि वह आपके निवासके लिये उपयुक्त है या नहीं। यदि वह आपके योग्य रमणीय या उत्तम नगरी हो सकेगी तो वहाँके कण्टकोंको (आपके मार्गका अवरोध करनेवाले शत्रुओंको) उखाड़ फेंकूँगा और आपके पास लौट आऊँगा॥ १०१/२॥


वैशम्पायन उवाच

एवं विज्ञाप्य देवेशं प्रणिपत्य जनार्दनम्॥ ११ ॥
जगाम पतगेन्द्रोऽपि पश्चिमाभिमुखो बली।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार अपना अभिप्राय निवेदन करके देवेश्वर जनार्दनको प्रणाम करनेके अनन्तर बलवान् पक्षिराज गरुड़ पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये ॥ १११/२ ॥

कृष्णोऽपियदुभिः सार्द्धं विवेश मधुरां पुरीम्॥ १२ ॥
स्वैरिण्य उग्रसेनश्च नागराश्चैव सर्वशः।
प्रत्युद्गम्यार्चयन् कृष्णं प्रहृष्टजनसंकुलम्॥ १३ ॥

इधर श्रीकृष्ण भी यदुवंशियोंके साथ मथुरापुरीमें जा पहुँचे। उस समय राजा उग्रसेन, नर्तकियों तथा मथुराके नागरिक सबने आगे बढ़कर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंके साथ आये हुए श्रीकृष्णका स्वागत सत्कार किया ॥ १२-१३ ॥

जनमेजय उवाच

श्रुत्वाभिषिक्तं राजेन्द्रं बहुभिर्वसुधाधिपैः।
किं चकार महाबाहुरुग्रसेनो महीपतिः॥ १४ ॥

जनमेजयने पूछा—बहुत-से राजाओंने मिलकर श्रीकृष्णका राजेन्द्रपदपर अभिषेक किया है—यह समाचार सुनकर महाबाहु राजा उग्रसेनने क्या किया ? ॥ १४ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वाभिषिक्तं राजेन्द्रं बहुभिः पार्थिवोत्तमैः।
इन्द्रेण कृतसंधानं दूतं चित्राङ्गदं कृतम्॥ १५ ॥
एकैकं नृपतेर्भागं शतसाहस्रसम्मितम्।
राजेन्द्रे त्वर्बुदं दत्तं मानवेषु च वै दश॥ १६ ॥
ये तत्र समनुप्राप्ता न रिक्तास्ते गृहं गताः।
शङ्खो यादवरूपेण प्रददौ हरिचिन्तितम्॥ १७ ॥
एवं निधिपतिः श्रीमान् दैवतैरनुमोदितः।

वैशम्पायनजीने कहा—बहुत-से श्रेष्ठ नरेशोंने मिलकर श्रीकृष्णका राजेन्द्रके पदपर अभिषेक किया है। इन्द्रका अभिप्राय निवेदन करनेके लिये चित्राङ्गद दूत बनकर आये थे। एक-एक राजाको एक-एक लाख मुद्राएँ पुरस्कारमें दी गयीं। जो राजेन्द्र था, उसे एक अर्बुद (दस करोड) दिया गया तथा साधारण मनुष्योंको भी दस दस हजार रुपये दिये गये। जो वहाँ पहुँच गये थे, वे खाली हाथ घर नहीं लौटे। श्रीमान् निधिपति शङ्ख ही यादवरूपसे उपस्थित हो भगवान् श्रीकृष्णकी इच्छाके अनुसार धन देता था और सम्पूर्ण देवता इसका अनुमोदन करते थे ॥ १५-१७१/२ ॥

इति श्रुत्वात्मिकजनाल्लोकप्रवृत्तिकात्नरात्॥ १८ ॥

विष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२३

चकार महतीं पूजां देवतायतनेष्वपि।

यह समाचार आत्मीय जनोंसे सुनकर तथा लोकवृत्तान्तकी जानकारी करानेवाले गुप्तचरके मुखसे जानकर उग्रसेनने देवमन्दिरोंमें विशेष रूपसे पूजाकी व्यवस्था करायी ॥ १८ १/२ ॥

वसुदेवस्य भवने तोरणोभयपार्श्वतः ॥ १९ ॥
नटानां नृत्यगेयानि वाद्यानि च समन्ततः।

वसुदेवके भवनके दोनों बगलमें तोरण लगे और सब ओर नटोंके नाच-गान होने और बाजे बजने लगे ॥ १९ १/२ ॥

पताकाध्वजमालाढ्यां कारयामास वै नृपः ॥ २० ॥
कंसराजस्य च सभां विचित्राम्बरसुप्रभाम्।

राजा उग्रसेनने कंसराजकी सभाको विचित्र वस्त्रोंसे सुसज्जित तथा / ध्वजा-पताका एवं मालाओंसे अलंकृत कराया ॥ २० १/२ ॥

पताका विविधाकारा दापयामास भोजराट् ॥ २१ ॥
तोरणं गोपुरं चैव सुधापङ्कानुलेपनम् ।
कारयामास राजेन्द्रो राजेन्द्रस्यासनालयम् ॥ २२ ॥

भोजराजने सब ओर भाँति-भाँतिकी पताकाएँ लगवायीं और प्रत्येक फाटक एवं गोपुरको चूनेसे लिपवाया। इस प्रकार राजेन्द्र उग्रसेनने राजेन्द्र श्रीकृष्णके लिये सिंहासन और भवन तैयार करवाया ॥ २१-२२ ॥

नटानां नृत्यगेयानि वाद्यानि च समन्ततः ।
पताका वनमालाढ्याः पूर्णकुम्भाः समन्ततः ॥ २३ ॥
राजमार्गेषु राजेन्द्र चन्दनोदकसेचितम् ।

राजेन्द्र ! नगरमें चारों ओर नाच-गान होने और बाजे बजने लगे । राजमार्गोंपर चन्दनयुक्त जलका छिड़काव किया गया था और वहाँ चारों ओर जलसे भरे हुए कलश रखे गये थे । उन कलशोंको पताका और वनमालाओंसे अलंकृत किया गया था ॥ २३ १/२ ॥

वस्त्राभरणकं राजा दापयामास भूतले ॥ २४ ॥
धूपं पार्श्वोभये चैव चन्दनागुरुगुग्गुलैः ।
गुडं सर्जरसं चैव दह्यमानं ततस्ततः ॥ २५ ॥

राजा उग्रसेनने भूतलपर पाँवड़ेके रूपमें वस्त्र बिछवा दिये थे और वहाँ फूलोंकी मालाएँ रखवा दी थीं तथा सड़कोंके दोनों बगल चन्दन, अगुरु और गुग्गुलकी धूप जलवायी । जहाँ-तहाँ राल और गुड जलाये जा रहे थे ॥ २४-२५ ॥

वृद्धस्त्रीजनसंघैश्च गायद्भिः स्तुतिमङ्गलम्।
अर्घ्यं कृत्वा प्रतीक्षन्ते स्वेषु स्थानेषु योषितः ॥ २६ ॥

बूढी स्त्रियोंके समुदाय स्थान-स्थानपर स्तुति और मङ्गल गाते थे । उनके साथ ही युवतियाँ अपने-अपने घरोंपर अर्घ्य सजाकर श्रीकृष्णके शुभागमनकी बाट जोह रही थीं ॥ २६ ॥

एवं कृत्वा पुरानन्दमुग्रसेनो नराधिपः ।
वसुदेवगृहं गत्वा प्रियाख्यानं निवेद्य च ॥ २७ ॥
रामेण सह सम्मन्त्र्य निर्गतो रथमन्तिकम् ।

इस प्रकार राजा उग्रसेन नगरमें आनन्दोत्सवकी व्यवस्था करके वसुदेवके घरपर गये और श्रीकृष्णके अभिषेक तथा आगमनका प्रिय समाचार निवेदन करके बलरामके साथ सलाहकर श्रीकृष्णके रथके निकट चले ॥ २७ १/२ ॥

तस्मिन्नेवान्तरे राजञ्छङ्खध्वनिरभून्महान् ॥ २८ ॥
पाञ्चजन्यस्य निनदं श्रुत्वा मथुरावासिनः ।
स्त्रियो वृद्धाश्च बालाश्च सूता मागधवन्दिनः ॥ २९ ॥
विनिर्ययुर्महासेना रामं कृत्वाग्रतो नृप ।
अर्घ्यं पाद्यं पुरस्कृत्य उग्रसेनेन धीमता ॥ ३० ॥

राजन् ! नरेश्वर ! इसी बीचमें बड़े जोरसे शङ्ख-ध्वनि सुनायी दी । पाञ्चजन्यका गम्भीर नाद सुनकर मथुरावासी स्त्री, बालक, वृद्ध, सूत, मागध और वन्दी बलरामजीको आगे करके विशाल सेनाके साथ अर्घ्य-पाद्य आदि लिये नगरसे बाहर निकले । इन सबके साथ बुद्धिमान् राजा उग्रसेन भी थे ॥ २८-३० ॥

दृष्टिपन्थानमासाद्य उग्रसेनो महीपतिः ।
अवतीर्य रथाच्छुभ्रात् पादमार्गेण चाग्रतः ॥ ३१ ॥

श्रीकृष्णके दृष्टिपथमें आकर राजा उग्रसेन अपने उज्ज्वल रथसे उतर पड़े और पैदल ही आगे बढ़े ॥ ३१ ॥

दृष्ट्वाऽऽसीनं रथे रम्ये दिव्यरत्नविभूषितम् ।
अङ्गेष्वाभरणं चैव दिव्यरत्नप्रभायुतम् ॥ ३२ ॥
वनमालोरसं दिव्यं तपन्तमिव भास्करम् ।
चामरं व्यजनं छत्रं खगेन्द्रध्वजमुच्छ्रितम् ॥ ३३ ॥
राजलक्षणसम्पूर्णमाप्तार्कमिवोज्ज्वलम् ।
श्रियाभिभूतं देवेशं दुर्निरीक्ष्यतरं हरिम् ॥ ३४ ॥

उन्होंने देखा, भगवान् श्रीकृष्ण एक रमणीय रथपर विराजमान हैं । दिव्य रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं । उनके अङ्गोंके आभूषण दिव्य रत्नोंकी प्रभासे प्रकाशित हो रहे हैं । उनके वक्षःस्थलपर वनमाला विराज रही है। वे दिव्य रूपधारी श्रीहरि तपते हुए सूर्यके समान जान पड़ते हैं । उनके दोनों पार्श्वमें चँवर और व्यजन डुलाये जाते हैं । सिरपर छत्र तना हुआ है । रथपर ऊँचा गरुड़ध्वज फहरा रहा है । वे समस्त राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न हैं और निकट आये हुए सूर्यके समान दिव्य ज्योतिसे जाज्वल्यमान

४२८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हो रहे हैं। अद्भुत शोभासे व्याप्त दिखायी देते हैं। उन देवेश्वर श्रीहरिकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन हो रहा है ॥ ३२-३४ ॥

दृष्ट्वा स राजा राजेन्द्र हर्षगद्गदया गिरा।
बभाषे पुण्डरीकाक्षं रामं बलनिषूदनम् ॥ ३५॥

राजेन्द्र ! भगवान् श्रीकृष्णको इस रूपमें देखकर राजा उग्रसेन शत्रुसैन्यहन्ता कमलनयन बलरामजीसे हर्षगद्गद वाणीमें बोले— ॥ ३५ ॥

रथेन न मया गन्तुं युक्तपूर्वमिति चिन्त्य वै।
अवतीर्णो महाभाग गच्छ त्वं स्यन्दनेन च ॥ ३६॥

'महाभाग ! मैंने पहलेसे ही यह सोच लिया है कि मुझे रथपर बैठकर भगवान्‌के सामने नहीं जाना चाहिये। अतः तुम्हीं रथसे यात्रा करो।' ऐसा कहकर वे रथसे उतर गये ॥ ३६ ॥

विष्णुना छद्मरूपेण गत्वेमां मथुरां पुरीम्।
अनुप्रकाशितमात्मानं देवेन्द्रत्वं नृपार्णवे ॥ ३७॥
तमहं स्तोतुमिच्छामि सर्वभावेन केशवम्।

उतरकर वे फिर बोले—भगवान् विष्णु छद्मरूप धारण करके इस मथुरापुरीमें आये थे। इन्होंने राजाओंके समुद्रमें जाकर अपने देवेन्द्र-रूपको प्रकाशित किया है; अतः मैं केशवकी सर्वतोभावसे स्तुति करना चाहता हूँ ॥ ३७॥

प्रत्युवाच महातेजा राजानं कृष्णपूर्वजः ॥ ३८ ॥
न युक्तं नृपते स्तोतुं व्रजन्तं देवसत्तमम्।
विना स्तोत्रेण संतुष्टस्तव राजञ्जनार्दनः ॥ ३९॥
तुष्टस्य स्तुतिना किं ते दर्शनेन तव स्तुतिः।

तब श्रीकृष्णके बड़े भाई महातेजस्वी बलरामने राजा उग्रसेनको इस प्रकार उत्तर दिया—'नरेश्वर ! यहाँ आते हुए देवप्रवर श्रीकृष्णकी स्तुति करना आपके लिये उचित नहीं है। राजन् ! आपपर तो श्रीकृष्ण बिना स्तुतिके ही संतुष्ट हैं। जब वे संतुष्ट ही हैं तो उनकी स्तुतिसे आपको क्या लेना है । आपके दर्शनमात्रसे ही उनकी स्तुति हो गयी ॥ ३८-३९॥

राजेन्द्रत्वमनुप्राप्य आगतस्तव वेश्मनि ॥ ४० ॥
न त्वया स्तुतवान् राजन् दिव्यैः स्तोत्रैरमानुषैः।

राजन् ! श्रीकृष्ण राजेन्द्रका पद पाकर आपके घर आ रहे हैं; इसलिये आप अमानुषिक दिव्य स्तुतियोंद्वारा उनकी स्तुति करें—यह आपके लिये उचित नहीं है ॥ ४० ॥

एवमाद्युद्यमाणौ तौ सम्प्राप्तौ केशवान्तिकम् ॥ ४१ ॥
अर्घोद्यतभुजं दृष्ट्वा स्थापयित्वा रथोत्तमम्।
उवाच वदतां श्रेष्ठ उग्रसेनं नराधिपम् ॥ ४२ ॥

इस तरह बातचीत करते हुए वे दोनों श्रीकृष्णके निकट जा पहुँचे। राजा उग्रसेनको हाथमें अर्घ्य लिये खड़ा देख वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण अपने उत्तम रथको ठहराकर उनसे इस प्रकार बोले—॥ ४१-४२ ॥

यन्मया चाभिषिक्तस्त्वं मथुरेशो भवत्विति।
न युक्तमन्यथा कर्तुं मधुराधिपते त्वयम् ॥ ४३॥

'मधुरापते ! मैंने जो आपका इसलिये अभिषेक किया था कि आप मथुराराज्यके स्वामी हों, उसे आप स्वयं ही मटियामेट कर दें—यह आपके लिये उचित नहीं है ॥४३॥

अर्घ्यमाचमनीयं च पाद्यं चास्मै निवेदितम्।
न दातुमर्हसे राजन्नेष मे मनसः प्रियः ॥ ४४॥

'राजन् ! मैंने आपको अर्घ्य, पाद्य और आचमनीय निवेदन किया है। अतः आप मुझे ये सब वस्तुएँ न दें — यही मेरे मनको प्रिय है ॥ ४४ ॥

तवाभिप्रायं विज्ञाय ब्रवीमि नृपते वचः।
त्वमेव माधुरो राजा नान्यथा कर्तुमर्हसि ॥ ४५॥

'नरेश्वर ! मैं आपके मनोभावको जानकर कहता हूँ। आप ही मथुराके राजा हैं और रहेंगे। इसे अन्यथा करना आपके लिये उचित नहीं है ॥ ४५ ॥

स्थानभागं च नृपते दास्यामि तव दक्षिणम्।
यथा नृपाणां सर्वेषां तथा ते स्थापितोऽग्रतः ॥ ४६ ॥

'महाराज ! मैं आपको पुरस्कारके रूपमें नियत धनका भाग अर्पित करूँगा। जैसे अन्य सब राजाओंको दिया गया है, वैसे आपके लिये भी सामने रखा हुआ है ॥ ४६ ॥

शतसाहस्रिको भागो वस्त्राभरणवर्जितः।
आरुहस्व रथं शुभ्रं चामीकरविभूषितम् ॥ ४७ ॥

'वस्त्र और आभूषण छोड़कर केवल एक लाख स्वर्ण (दीनार) आपके हिस्सेमें अर्पित हैं। अब आप इस स्वर्ण-भूषित शुभ्र रथपर आरूढ़ होइये ॥ ४७ ॥

चामरं व्यजनं छत्रं ध्वजं च मनुजेश्वर।
दिव्याभरणसंयुक्तं मुकुटं भास्करप्रभम् ॥ ४८ ॥
धारयस्व महाभाग पालयस्व पुरीमिमाम्।

'महाभाग ! मनुजेश्वर ! चँवर, व्यजन, छत्र, ध्वज और दिव्य आभूषणोंसहित सूर्यके समान प्रकाशमान मुकुट धारण कीजिये। साथ ही इस पुरीका पालन करते रहिये ॥४८॥

विष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२५


पुत्रपौत्रैः प्रमुदितो मथुरां परिपालय ॥ ४९ ॥
जित्‍वारिगणसंघांश्च भोजवंशं विवर्द्धय ।

आप पुत्रों और पौत्रोंके साथ आनन्दित रहकर मथुरा-पुरीका पालन कीजिये। शत्रुगणोंको पराजित करके भोजवंशको बढ़ाइये ॥ ४९॥

देवदेवाद्यनन्ताय शौरिणे वज्रपाणिना ॥ ५० ॥
प्रेषितं देवराजेन दिव्याभरणमम्बरम् ।

‘वज्रधारी इन्द्रने शूरसेनके कुलमें उत्पन्न हुए देवताओंके भी देवता, सबके आदि कारण शेषस्वरूप बलरामजीके लिये दिव्य वस्त्र और आभूषण भेजा है ॥ ५०॥’

माथुराणां च सर्वेषां भागा दीनारका दश ॥ ५१ ॥
सूतमागधबन्दीनामेकैकस्य सहस्रकम् ।
वृद्धस्त्रीजनसंघानां गणिकानां शतं शतम् ॥ ५२ ॥
नृपेण सह तिष्ठन्ति विकद्रुप्रमुखाश्च ये ।
दशसाहस्रिको भागस्तेषां धात्रा प्रकल्पितः ॥ ५३ ॥

‘मथुराके सभी नागरिकोंके लिये पृथक्-पृथक् दस-दस दीनार सुवर्णके भाग नियत किये गये हैं। सूत, मागध और वन्दीजनोंमेंसे एक-एकको एक-एक हजार दीनार प्राप्त होंगे। मङ्गल गानेवाली बूढ़ी स्त्रियों तथा नर्तकियोंको सौ-सौ दीनार दिये जायेंगे। विकद्रु आदि जो प्रमुख यादव राजा उग्रसेनके साथ रहते हैं, उनमेंसे प्रत्येकका भाग इन्द्रने दस दस हजार दीनार नियत किया है’ ॥ ५१-५३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्पूज्य राजानं माथुराणां चमूमुखे ।
कृत्वा सुमहदानन्दां मथुरां मधुसूदनः ॥ ५४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार मथुरावासियोंकी सेनाके मुहानेपर राजा उग्रसेनका सम्मान करके भगवान् मधुसूदनने सारी मथुराको महान् आनन्दसे परिपूर्ण करते हुए उसमे प्रवेश किया ॥ ५४ ॥

दिव्याभरणमाल्यैश्च दिव्याम्बरविलेपनैः ।
दीप्यमानाः समन्ताच्च देवा इव त्रिविष्टपे ॥ ५५ ॥

जैसे स्वर्गमें देवता शोभा पाते हैं, उसी प्रकार मथुरामें भगवान् श्रीकृष्ण और वहाँके नागरिक दिव्य आभूषणों, दिव्य पुष्पोंकी मालाओं तथा दिव्य वस्त्र और चन्दनॉसे अलंकृत हो सब ओर प्रकाशित हो रहे थे ॥ ५५ ॥


भेरीपटहनादेन शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ।
बृंहितेन च नागानां हयानां हेषितेन च ॥ ५६ ॥
सिंहनादेन शूराणां रथनेमिस्वनेन च ।
तुमुलः सुमहानासीन्मेघनाद इवाम्बरे ॥ ५७ ॥

‘भेरी, पटह, शङ्ख और दुन्दुभि आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ हाथियोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हींसने, शूरवीरोंके सिंहनाद करने तथा रथके पहियोंकी घरघराहट होनेसे जो सम्मिलित महान् शब्द होता था, वह आकाशमें मेघोंकी गर्जनाके समान प्रतीत होता था ॥ ५६-५७ ॥

बन्दिभिः स्तूयमानं च नमश्चक्रुरपि प्रजाः ।
दत्त्वा दानमनन्तं च न ययौ विस्मयं हरिः ॥ ५८ ॥

बन्दीजन भगवान्‌की स्तुति करते थे और प्रजावर्गके लोग उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। उस समय धनका अनन्त दान करके भी श्रीहरिको कोई विस्मय या गर्व नहीं हुआ ॥ ५८ ॥

स्वभावोन्नतभावत्वाददृष्टपूर्वात्ततोऽधिकम् ।
अनहंकारभावाच्च विस्मयं न जगाम ह ॥ ५९ ॥

एक तो स्वभावसे ही उनका ऊँचा भाव था। वे उससे पहले उसकी अपेक्षा भी अधिक धनका दान देख चुके थे और स्वाभाविक ही उन्हें अहंकार छू नहीं गया था; इसलिये उनको विस्मय या गर्व नहीं हुआ ॥ ५९ ॥

दीप्यमानं स्ववपुषा आयान्तं भास्करप्रभम् ।
दृष्ट्वा मथुरवासिन्यो नमश्चक्रुः पदे पदे ॥ ६० ॥

अपने इस शरीरसे प्रकाशित होते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णको आते देख मथुरावासी स्त्रियाँ पग-पगपर उन्हें नमस्कार करती थीं ॥ ६० ॥

एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः ।
नागपर्यङ्कमुत्सृज्य प्राप्तोऽयं मथुरां पुरीम् ॥ ६१ ॥

(उस समय मथुरावासी आपसमें इस प्रकार कहते थे) ‘ये ही क्षीरसमुद्रमें निवास करनेवाले श्रीमान् भगवान् नारायण हैं, जो इस समय शेषशय्याका परित्याग करके मथुरा पुरीमें आ गये हैं ॥ ६१ ॥

बद्ध्वा बलिं महावीर्यं दुर्जयं त्रिदशैरपि ।
शक्राय प्रददौ राज्यं त्रैलोक्यं वज्रपाणये ॥ ६२ ॥

‘इन्होंने देवताओंके लिये भी दुर्जय महापराक्रमी राजा बलिको बाँधकर वज्रधारी इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य दे दिया था ॥ ६२ ॥

हत्वा दैत्यगणान् सर्वान् कंसं च बलिनां वरम् ।


^१. एक हजार स्वर्णमुद्राओंका एक दीनार होता है। इसके अनुसार मथुराके प्रत्येक नागरिकको दस-दस हजार स्वर्णमुद्रायें अर्पित की गयीं।

४२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

भोजराजाय मथुरां दत्त्वा केशिनिसूदनः ॥ ६३ ॥
नाभिषिक्तः स्वयं राज्ये न चासीनो नृपासने ।
राजेन्द्रत्वं च सम्प्राप्य मथुरामाविशत् ततः ॥ ६४ ॥

'इन केशिनिसूदन केशवने समस्त दैत्यसमूहोंका वध करके बलवानोंमें श्रेष्ठ कंसको मारकर मथुराका राज्य भोजराज उग्रसेनको दे दिया; किंतु न तो स्वयं ये राज्यपर अभिषिक्त हुए और न राजाके सिंहासनपर ही बैठे। इस समय राजेन्द्र-पद प्राप्त करके ये मथुरामें प्रविष्ट हुए हैं' ॥ ६३-६४ ॥

एवमन्योन्यसंजल्पं श्रुत्वा पुरनिवासिनाम् ।
वन्दिमागधसूतानामिदमूचुर्गणाधिपाः ॥ ६५ ॥

इस प्रकार आपसमें कही गयी पुरवासियोंकी बातें सुन-कर सूत, मागध और वन्दीजनोंके प्रधान लोग इस प्रकार कहने लगे— ॥ ६५ ॥

किं वा शक्यामहे वक्तुं गुणानां ते गुणोदधे ।
मानुषेणैकजिह्वेन प्रभावोत्साहसम्भवान् ॥ ६६ ॥

'गुणसागर ! हम मनुष्यको मिली हुई एक जिह्वाके द्वारा आपके गुणोंका प्रभाव, उत्साह और प्राकट्य कैसे बता सकते हैं ? ॥ ६६ ॥

स तत्र भोगी नागेन्द्रः कदाचिद् देव बुद्धिमान् ।
द्विसाहस्रेण जिह्वेन वासुकिः कथयिष्यति ॥ ६७ ॥

'देव ! कदाचित् पाताललोकमें रहनेवाले सर्पशरीरधारी नागराज बुद्धिमान् वासुकि (शेष) अपनी दो हजार जिह्वाओं-द्वारा आपके गुण प्रभावका वर्णन कर सकेंगे ॥ ६७ ॥

किं त्वद्भुतमिदं लोके मानवेन्द्रेषु भूतले ।
न भूतं न भविष्यं च शक्रादासनमागतम् ॥ ६८ ॥

'इस भूतलपर या जगत्‌मे नरेशोंके लिये कभी इन्द्रलोक-से सिंहासन आया हो, यह अद्भुत बात न कभी हुई थी और न भविष्यमें कभी होनेवाली है । (किंतु आपने इस असम्भव-को भी सम्भव कर दिखाया ) ॥ ६८ ॥

सभावतरणं चैव कलशैरागतं स्वयम् ।
न श्रुतं न च दृष्टं वा तेन मन्यामहेऽद्भुतम् ॥ ६९ ॥

'स्वर्गसे सभाभवनका उतरना और आकाशमें दिव्य कलशोंका प्रकट होकर स्वयं ही अभिषेक करना न तो किसीने देखा था और न कभी सुननेमें ही आया था। इसलिये हम इस घटना-को अद्भुत मानते हैं ॥ ६९ ॥

धन्या देवी महाभागा देवकी योषितां वरा ।
भवन्तं त्रिदशश्रेष्ठं धृत्वा गर्भेण केशवम् ॥ ७० ॥
कृष्णं पद्मपलाशाक्षं श्रीपुञ्जममरार्चितम् ।
नेत्राभ्यां स्नेहपूर्णाभ्यां वीक्षते मुखपङ्कजम् ॥ ७१ ॥

'युवतियोंमें श्रेष्ठ महाभागा देवकीदेवी धन्य हैं, जिन्होंने आप देवप्रवर केशवको गर्भमें धारण करनेका महान् सौभाग्य प्राप्त किया और अब वे अपने स्नेहपूर्ण नेत्रोंसे आपके श्याम-सुन्दर कमलनयन शोभाधाम देवपूजित मुखारविन्दको निहारा करती हैं' ॥ ७०-७१ ॥

इति संजल्पमानानां शृण्वन्तौ पृथगीरितम् ।
उग्रसेनं पुरस्कृत्य भ्रातरौ रामकेशवौ ॥ ७२ ॥
प्राकारद्वारि सम्प्राप्तावर्चयामास वै तदा ।
अर्घ्यमाचमनं दत्त्वा पाद्यं पाद्येति चाब्रवीत् ॥ ७३ ॥
उग्रसेनस्ततो धीमान् केशवस्य रथाग्रतः ।

ऐसी बातें कहनेवाले सूत, मागध और वन्दियोंके पृथक्-पृथक् वचनोंको सुनते हुए दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्ण उग्रसेनको आगे करके नगरकी चहारदीवारीके दरवाजेपर आ पहुँचे । उस समय बुद्धिमान् राजा उग्रसेनने भगवान् श्री-कृष्णके रथके आगे खड़ा होकर कहा—'पाद्य लाओ, पाद्य लाओ।' फिर स्वयं ही पाद्य, अर्घ्य और आचमन देकर उनका पूजन किया ॥ ७२-७३ ½ ॥

प्रणम्य शिरसा कृष्णं गजमारुह्य वीर्यवान् ॥ ७४ ॥
घनवत् तोयधारेण ववर्ष कनकाम्बुभिः ।

तत्पश्चात् श्रीकृष्णको सिरसे प्रणाम करके वे पराक्रमी राजा उग्रसेन हाथीपर चढ़ गये और जैसे मेघ पानीकी धारा गिराता है, उसी प्रकार वे सुवर्णमय जलकी वर्षा करने लगे ॥ ७४ ½ ॥

घनौघैर्वर्षमाणस्तु सम्प्राप्तः पितृवेश्मनि ॥ ७५ ॥
मथुराधिपतिः श्रीमानुवाच मधुसूदनम् ।

उस वर्षाके साथ ही श्रीकृष्ण अपने पिताके घर जा पहुँचे । वहाँ श्रीमान् मथुरानरेश उग्रसेनने मधुसूदन श्रीकृष्ण-से कहा— ॥ ७५ ½ ॥

राजेन्द्रत्वमनुप्राप्य युक्तं मे नृपवेश्मनि ॥ ७६ ॥
स्थापितुं देवराजेन दत्तं सिंहासनं प्रभो ।

'प्रभो ! आपने राजेन्द्रका पद प्राप्त किया है; अतः आपके लिये यही उचित है कि आप देवराज इन्द्रके दिये हुए सिंहासनको इस राजमहलमे स्थापित करें ॥ ७६ ½ ॥

नेष्यामि मथुरेशस्य सभां भुजबलार्जिताम् ॥ ७७ ॥
प्रसादयिष्ये भगवन् न कोपं कर्तुमर्हसि ।

भगवन् ! 'आप ही मथुराके स्वामी हैं। आपने यहाँकी राजसभाको अपनी भुजाओके बलसे प्राप्त किया है। मैं आपको उस सभामें ले चलूँगा। एवं अपने व्यवहारोंसे आपको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करूँगा । आप मुझपर क्रोध न करें ॥ ७७ ½ ॥

विष्णुपर्व ] पश्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२७


देवकी वसुदेवश्च रोहिणी च विशाम्पते ॥ ७८ ॥
न किंचित्करणे शक्ता हर्षक्लमविमोहिता ।
'प्रजानाथ ! देवकी, वसुदेव और रोहिणी—ये हर्षके उद्रेकसे मोहित हो गये थे; अतः उस समय कुछ भी न कर सके ॥ ७८ १/२ ॥

कंसमाता ततो राजन्नर्चयामास केशवम् ॥ ७९ ॥
नानादिग्देशजानीतं कंसेनोपार्जितं धनम् ।
देशकालं समालोक्य पादयुग्मे न्यवेदयत् ॥ ८० ॥
उग्रसेनं समाहूय उवाच श्लक्ष्णया गिरा ।
राजन् ! तब कंसकी माता पद्मावतीने भगवान् केशवका पूजन किया और कंस अनेक देशोंसे जिस धनको जीतकर लाया था, उसे देशकालका विचार करके श्रीकृष्णके युगल चरणोंमें निछावर कर दिया। इस समय श्रीकृष्णने राजा उग्रसेनको बुलाकर मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा ॥७९-८० १/२॥

श्रीकृष्ण उवाच
न चाहं मथुराकाङ्क्षी न मया वित्तकाङ्क्षया ॥ ८१ ॥
घातितस्तव पुत्रोऽयं कालेन निधनं गतः ।
श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! मैं मथुराका राज्य नहीं चाहता । मैंने धनकी अभिलाषासे आपके पुत्रका वध नहीं किया है। यह कालसे ही मृत्युको प्राप्त हुआ है ॥ ८१ १/२ ॥

यजस्व विविधान् यज्ञान् ददस्व विपुलं धनम् ॥ ८२ ॥
जयस्व रिपुसैन्यानि मम बाहुबलाश्रयात् ।
राजन् ! आप नाना प्रकारके यज्ञ कीजिये, प्रचुर धनका दान दीजिये और मेरे बाहुबलका आश्रय लेकर शत्रुओंकी सेनाओंपर विजय पाइये ॥ ८२ १/२ ॥

त्यजस्व मनसस्तापं कंसनाशोद्भवं भयम् ॥ ८३ ॥
नयस्व वित्तनिचयं मया दत्तं पुनस्तव ।
आप मानसिक संतापको त्याग दीजिये । कंस-वधजनित भयको मनसे निकाल दीजिये तथा मेरी दी हुई इस धन-राशिको पुनः अपने ही भवनमें ले जाइये ॥ ८३ १/२ ॥

इति प्राश्वास्य राजानं कृष्णस्तु हलिना सह ॥ ८४ ॥
प्रविवेश ततः श्रीमान् मातापित्रोरथान्तिकम् ।
इस तरह राजा उग्रसेनको आश्वासन दे श्रीमान् श्रीकृष्ण हलधरके साथ माता-पिताके पास गये ॥ ८४ १/२ ॥

आनन्दपरिपूर्णाभ्यां हृदयाभ्यां महाबलौ ॥ ८५ ॥
पितृमात्रोस्तु पादान् वै नमश्चक्रतुरानतौ ।
वहाँ उन दोनों महाबली वीरोंने आनन्दपूर्ण हृदयसे विनीत होकर माता-पिताके चरणोंमें नमस्कार किया ॥८५ १/२॥


तस्मिन् मुहूर्ते नगरी मथुरा तु बभूव सा ॥ ८६ ॥
स्वर्गलोकं परित्यज्यावतीर्णेवामरावती ।
उस मुहूर्तमें मथुरा नगरी ऐसी जान पड़ती थी, मानो अमरावतीपुरी स्वर्गलोकका परित्याग करके भूतलपर उतर आयी हो ॥ ८६ १/२ ॥

वसुदेवस्य भवनं समीक्ष्य पुरवासिनः ॥ ८७ ॥
मनसा चिन्तयामासुर्देवलोकं न भूतुलम् ।
वसुदेवके घरकी ओर देखकर पुरवासी अपने मनमें सोचने लगे कि यह भूलोक नहीं देवलोक है ॥ ८७ १/२ ॥

विसृज्य मथुरेशं तु महिषीसहितं तदा ॥ ८८ ॥
भवनं वसुदेवस्य प्रविश्य बलकेशवौ ।
न्यस्तशस्त्रावुभौ वीरौ स्वगृहे स्वैरचारिणौ ॥ ८९ ॥
उस समय रानीसहित मथुरानरेशको विदा करके दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण वसुदेवके घरमें प्रविष्ट हुए और अस्त्र-शस्त्र रखकर अपने घरमें इच्छानुसार विचरने लगे ॥ ८८-८९ ॥

ततः कृताह्निकौ भूत्वा सुखासीनौ कथान्तरे ।
एतस्मिन्नेव काले तु महोत्पातो बभूव ह ॥ ९० ॥
तदनन्तर, नित्य कर्म करके सुखपूर्वक बैठकर जब वे दोनों बातचीत करने लगे, इसी समय वहाँ महान् उत्पात प्रकट हुआ ॥ ९० ॥

बभ्रमुश्च घनाकाशे चेलुश्च भुवि पर्वताः ।
समुद्राः क्षुभिताः सर्वे विभ्रान्तो भोगिनां वरः ॥९१॥
कम्पिता यादवाः सर्वे न्युब्जाश्च पतिता भुवि ।
आकाशमें बादल चक्कर काटने लगे । पृथ्वीपर पर्वत हिलने लगे । सारे समुद्र क्षुब्ध हो उठे और सर्पोंमें श्रेष्ठ शेषनाग भी चकरा गये । समस्त यादव कम्पित हो औंधे मुँह पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ९१ १/२ ॥

तौ तान् निपतितान् दृष्ट्वा रामकृष्णौ तु निश्चलौ ॥ ९२ ॥
महता पक्षवातेन विज्ञातौ पतगोत्तमम् ।
उन सबको गिरा हुआ देखकर भी बलराम और श्रीकृष्ण विचलित नहीं हुए । पाँखोंसे उठी हुई प्रचण्ड वायुके द्वारा उन्हें यह पता लग गया कि पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ आ रहे हैं ॥ ९२ १/२ ॥

ददर्श समुदप्राप्तं दिव्यस्रगनुलेपनम् ॥ ९३ ॥
प्रणम्य शिरसा ताभ्यां सौम्यरूपी कृतासनः ।
इतनेमें ही श्रीकृष्णने देखा, गरुड़जी आ गये । वे दिव्य पुष्पोंके हार और दिव्य चन्दनसे अलंकृत थे । उन्होंने सिर

४२८] श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


झुकाकर उन दोनों भाइयोंको प्रणाम किया । फिर वे सौम्यरूप धारण करके एक आसनपर बैठ गये ॥ ९३॥

तं दृष्ट्वा समनुप्राप्तं सचिवं साम्परायिकम् ॥ ९४ ॥
धृतिमन्तं गरुत्मन्तमुवाच बलिसूदनः।
अपने समरसचिव धैर्यवान् गरुड़को आया देख बलिको बाँधनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार बोले—॥ ९४ १/२ ॥

स्वागतं खेचरश्रेष्ठ सुरसेनारिमर्दन ॥ ९५ ॥
विनताहृदयानन्द स्वागतं केशवप्रिय।
'पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड ! तुम्हारा स्वागत है। देवसेनाके शत्रुओंको कुचल देनेवाले पक्षिराज ! तुम्हारा स्वागत है। विनताके हृदयको आनन्द देनेवाले केशवप्रिय गरुड़ ! तुम्हारा स्वागत है' ॥ ९५ १/२ ॥

तमुवाच ततः कृष्णः स्थितं देहमिवापरम् ॥ ९६ ॥
तुल्यसामर्थ्यया वाचा आसीनं विनतात्मजम् ।
तदनन्तर, श्रीकृष्ण अपने दूसरे शरीरके समान बैठे हुए विनतानन्दन गरुड़से अपनी शक्तिके अनुरूप वाणी-द्वारा इस प्रकार बोले—॥ ९६ १/२ ॥

श्रीकृष्ण उवाच
यास्यामः पतगश्रेष्ठ भोजस्यान्तःपुरं महत् ॥ ९७ ॥
तत्र गत्वा सुखासीना मन्त्रयामो मनोगतम् ।
श्रीकृष्णने कहा—पक्षिप्रवर ! हमलोग भोजराजके विशाल अन्तःपुरमें चलेंगे और वहीं सुखपूर्वक बैठकर मनोगत विषयपर गुप्तरूपसे विचार करेंगे ॥ ९७ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच
प्रविष्टौ तौ महावीर्यौ बलदेवजनार्दनौ ॥ ९८ ॥
वैनतेयतृतीयौ च गुहां मन्त्रमथाब्रुवन् ।
अवध्योऽसौ कृतोऽस्माकं सुमहच्च रिपोर्बलम् ॥ ९९ ॥
वृतः सैन्येन महता महद्भिश्च नराधिपैः ।
बहुलानि च सैन्यानि हन्तुं वर्षशतैरपि ॥१००॥
न शक्ष्यामः क्षयं कर्तुं जरासंधस्य वाहिनीम् ।
अतोऽर्थे वैनतेय त्वां ब्रवीमि मथुरां पुरीम् ॥१०१॥
वसतोरावयोः श्रेयो न भवेदिति मे मतिः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इसके बाद महापराक्रमी बलराम और श्रीकृष्ण तीसरे गरुड़को साथ लेकर उक्त भवनमें प्रविष्ट हुए और गुप्त विषयपर मन्त्रणा करने लगे । उस समय श्रीकृष्ण बोले—'विनतानन्दन ! जरासंधको हमलोगोंके लिये अवध्य बना दिया गया है (यहाँ दशा कालयवनकी भी है) । परंतु हमारे उस शत्रु‌का सैनिक एवं शारीरिक बल बहुत बढ़ा है। यह बहुत बड़ी सेना तथा महान् नरेशोंसे घिरा रहता है। उसकी सेनाएँ इतनी अधिक हैं कि हमलोग जरासंधकी उस विशालवाहिनीका सौ वर्षोंमें भी संहार नहीं कर सकेंगे। अतः मैं तुमसे कहता हूँ कि अब मथुरापुरीमें रहनेसे हम दोनोंका भला नहीं होगा। मेरा तो ऐसा ही विश्वास है' ॥ ९८—१०१ १/२ ॥

गरुड उवाच
देवदेवं नमस्कृत्य गतोऽहं भवतोऽन्तिकात् ॥१०२॥
वासार्थमीक्षितुं भूमिं तव देव कुशस्थलीम् ।
गरुड़ बोले—देव ! आप देवताओंके भी देवता हैं । आपको नमस्कार करके मैं आपके निकटसे आपकेही रहनेयोग्य निवासभूमिका निरीक्षण करनेके लिये कुशस्थलीकी ओर चला गया था ॥ १०२ १/२ ॥

गत्वाहं खे समास्थाय समन्तादवलोक्य ताम् ॥१०३॥
दृष्ट्वाहं विबुधश्रेष्ठ पुरीं लक्षणपूजिताम् ।
सुरश्रेष्ठ ! वहाँ जाकर आकाशका आश्रय ले सब ओरसे निरीक्षण करके मैं इस निश्चयपर पहुँचा हूँ कि वहाँ सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एवं सम्मानित पुरीका निर्माण हो सकता है ॥ १०३ १/२ ॥

सागरानूपविपुलां प्रागुदक्प्लवशीतलाम् ॥१०४॥
सर्वतोदधिमध्यस्थामभेद्यां त्रिदशैरपि ।
कुशस्थलीके बहुत-से प्रदेश सागरके समीप होनेसे जलप्राय हैं । वहाँकी भूमि पूर्व और उत्तरकी ओरसे कुछ ढालू और शीतल है। वह सब ओरसे समुद्रके बीचमें है, इस कारण वहाँ बसी हुई पुरीका भेदन करना देवताओंके लिये भी असम्भव होगा ॥ १०४ १/२ ॥

सर्वरत्नाकरवतीं सर्वकामफलद्रुमाम् ॥१०५॥
सर्वर्तुकुसुमाकीर्णां सर्वतः सुमनोहराम् ।
वहाँ जो पुरी बनेगी, वह सब प्रकारके रत्नोंकी खान होगी । वहाँके वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंको फलके रूपमें प्रदान करनेवाले होंगे । सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूल उस पुरीकी शोभा बढ़ायेंगे। वह सब ओरसे अत्यन्त मनोहर होगी ॥ १०५ १/२ ॥

सर्वाश्रमाधिवासां च सर्वकामगुणैर्युताम् ॥१०६॥
नरनारीसमाकीर्णां नित्यामोदविवर्द्धिनीम् ।
वहाँ सभी आश्रमोंके लोग निवास करेंगे । वह पुरी समस्त कमनीय गुणोंसे अलंकृत होगी । असंख्य नर-नारियोंसे भरी रहकर सदा ही आमोद-प्रमोदको बढ़ानेवाली होगी ॥ १०६ १/२ ॥

[ विष्णुपर्व ] पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२९


प्राकारपरिखोपेतां गोपुराट्टालमालिनीम् ॥ १०७॥
विचित्रचत्वरपथां विपुलद्वारतोरणाम् ।
यन्त्रार्गलविचित्राढ्यां हेमप्राकारशोभिताम् ॥ १०८॥

वह नगरी परकोटों, खाइयों, गोपुरों और अट्टालिकाओंकी पंक्तियोंसे सुशोभित होगी। इसकी सड़कें और चौराहे अद्भुत शोभासे सम्पन्न होंगे। उस पुरीके द्वार एवं फाटक बहुत बड़े-बड़े होंगे। विचित्र-विचित्र यन्त्रों और अर्गलाओंसे वह सम्पन्न होगी। सोनेकी चहारदीवारी उसकी शोभा बढ़ायेगी॥

नरनागाश्वकलिलां रथसैन्यसमाकुलाम् ।
नानादिग्देशजाकीर्णां दिव्यपुष्पफलद्रुमाम् ॥ १०९॥

हाथी, घोड़े, मनुष्य और रथोंकी सेनासे वह पुरी व्याप्त रहेगी। विभिन्न दिशाओं और देशोंके लोगों तथा वहाँ उत्पन्न हुए पदार्थोंसे वह भरी होगी। दिव्य पुष्प और फल देनेवाले देववृक्ष उसकी शोभा बढ़ायेंगे ॥ १०९ ॥

पताकाध्वजमालाढ्यां महाभवनशालिनीम् ।
भीषणीं रिपुसंघानां मित्राणां हर्षवर्द्धनीम् ॥ ११०॥

वह नगरी ध्वजा-पताकाओंकी पङ्क्तियोंसे अलंकृत तथा बड़े-बड़े भवनोंसे सुशोभित होगी। शत्रु-समूहोंका भय और मित्रोंका हर्ष बढ़ाती रहेगी ॥ ११० ॥

मनुजेन्द्राधिवासेभ्यो विशिष्टां नगरोत्तमाम् ।
रैवतं च गिरिश्रेष्ठं कुरु देव सुरालयम् ॥ १११॥
नन्दनप्रतिमं दिव्यं पुरद्वारस्य भूषणम् ।
कारयस्वाधिवासं च तत्र गत्वा सुरोत्तम ॥ ११२॥

देव ! अबतक नरेन्द्रके जितने अधिवास हैं, उन सबसे वह पुरी विशिष्ट होगी। देवताओंका निवासस्थान जो गिरिश्रेष्ठ रैवतक है, उसको और वहाँके नन्दनवन-सदृश दिव्य वनको अपने नगरद्वारका भूषण बनाइये। सुरश्रेष्ठ ! वहीं चलकर आप निवास कीजिये ॥ १११-११२ ॥

कुमारीणां प्रचारश्च सुरमण्यो भविष्यति ।
नाम्ना द्वारवती ज्ञेया त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ११३॥
भविष्यति पुरी रम्या शक्रस्येवामरावती ।

वहाँ कुमारियोंका अत्यन्त मनोहर ढंगसे घूमना-फिरना हो सकेगा। उस पुरीका नाम होगा द्वारवती या द्वारका, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होगी। वह पुरी इन्द्रकी अमरावतीके समान परम रमणीय होगी ॥ ११३½ ॥

यदि स्यात् संवृतां भूमिं प्रदास्यति महोदधिः ॥ ११४॥
यथेष्टं विविधं कर्म विश्वकर्मा करिष्यति ।

दे देगा, तो वहाँ उपर्युक्त गुणोंसे सम्पन्न पुरीका निर्माण हो सकेगा। साक्षात् विश्वकर्मा पधारकर वहाँ आपकी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके शिल्प-कर्म करेंगे ॥ ११४½ ॥

मणिमुक्ताप्रवालाभिर्वज्रवैडूर्यसप्रभैः ॥ ११५॥
दिव्यैरभिप्राययुतैर्दिव्यैरत्नौघैस्त्रिलोकजैः ।
दिव्यस्तम्भशताकीर्णान् स्वर्गे देवसभोपमान् ॥ ११६॥
जाम्बूनदमयाञ्छुभ्रान् सर्वरत्नविभूषितान् ।
दिव्यध्वजपताकाढ्यान् देवगन्धर्वपालितान् ॥ ११७॥
चन्द्रसूर्यप्रतीकाशान् प्रासादान् कारय प्रभो ।

प्रभो ! आप मणि, मोती, मूँगा, हीरा, वैदूर्य तथा दिव्य भावोंसे युक्त त्रिलोकीके अन्यान्य दिव्य रत्नोंद्वारा ऐसे महल बनवाइये, जो स्वर्गलोककी देव-सभाओंके समान शोभा पा रहे हों। उनमें सैकड़ों दिव्य खम्भे लगे हों। वे महल सोनेकी ईंटोंसे बने हों और उन्हें सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित किया गया हो। वे शुभ्र प्रासाद दिव्य ध्वजा और पताकाओंसे अलंकृत हों। चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रतीत होते हों और देव-गन्धर्व उनकी रक्षामें तत्पर रहें ॥ ११५-११७½ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं कृत्वा तु संकल्पं वैनतेयोऽथ केशवम् ॥ ११८॥
प्रणम्य शिरसा ताभ्यां निषसाद कृतासनः ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार श्रीकृष्णके प्रति अपना मनोभाव प्रकट करके विनतानन्दन गरुड़ने सिर झुकाकर उन दोनों भाइयोंको प्रणाम किया। फिर वे अपने आसनपर बैठ गये ॥ ११८½ ॥

कृष्णोऽपि रामसहितो विचिन्त्य हितमीरितम् ॥ ११९॥
प्रकाशकर्तुकामो तौ विसृज्य विनतात्मजम् ।
सत्कृत्य विधिवद् राजन् महार्हवरभूषणैः ॥ १२०॥
मोदेते सुखिनौ तत्र सुरलोके यथामरौ ।

राजन् ! फिर बलरामसहित श्रीकृष्णने भी गरुड़की कही हुई हितकर बातपर विचार करके उसे प्रकाशित करनेकी इच्छा की और बहुमूल्य सुन्दर आभूषणोंद्वारा विनतानन्दन गरुड़़का विधिवत् सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया। तत्पश्चात् देवलोकमें विहार करनेवाले दो अमरोंकी भाँति वे दोनों भाई मथुरामें सुख और आनन्दके साथ रहने लगे ॥ ११९-१२०½ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भोजराजो महायशाः ॥ १२१ ॥
कृष्णं स्नेहेन विस्रब्धं वभाषे वचनामृतम् ।

गरुड़का वह वचन सुनकर महायशस्वी भोजराज उग्रसेन श्रीकृष्णसे स्नेह और विश्वासपूर्वक यह अमृतके समान मधुर वचन बोले—॥ १२१½ ॥

४३०श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां नन्दिवर्द्धन ॥१२२॥
श्रूयतां वचनं त्वाद्य वक्ष्यामि रिपुसूदन ।

‘श्रीकृष्ण ! यदुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीकृष्ण ! शत्रुसूदन ! आज मैं तुमसे जो बात कहता हूँ, उसे सुनो ॥ १२२॥

त्वया विहीनाः सर्वे स्म न शक्ताः सुखमासितुम् ॥१२३॥
पुरेऽस्मिन् विषयान्ते वा पतिहीना इव स्त्रियः ।

‘जैसे पतिहीन स्त्रियाँ कहीं सुखसे नहीं रह सकतीं, उसी प्रकार तुमसे बिछुड़कर हम समस्त यादव इस नगर या राज्य-में सुखसे नहीं रह सकते हैं ॥ १२३½ ॥

त्वत्सनाथा वयं तात त्वद्बाहुबलमाश्रिताः ॥१२४॥
विभीमो न नरेन्द्राणां सेन्द्राणामपि मानद ।

‘दूसरोंको मान देनेवाले तात ! हम तुमसे सनाथ होकर तुम्हारे बाहुबलका आश्रय ले नरेन्द्रोंकी तो बात ही क्या है, इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंसे भी नहीं डरते हैं ॥ १२४½ ॥

विजयाय यदुश्रेष्ठ यत्र यत्र गमिष्यसि ॥१२५॥
तत्र त्वं सहितोऽस्माभिर्गच्छेथा यादवर्षभ ।

‘यदुश्रेष्ठ ! यादवप्रवर ! तुम विजयके लिये जहाँ-जहाँ जाओ, वहाँ हम सबको साथ लिये चलो’ ॥ १२५½ ॥

तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा सस्मितं देवकीसुतः ॥१२६॥
यथैवं भवतामद्य तथा कर्तास्म्यसंशयम् ॥१२७॥

राजा उग्रसेनकी यह बात सुनकर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर बोले—‘राजन् ! आज आपकी जैसी इच्छा होगी, वैसा ही करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥१२६-१२७॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि श्रीकृष्णस्य मधुरागमनमहोत्सवो
द्वारवतीप्रयाणसंकेतो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका मथुरा-गमनमहोत्सव तथा उनके द्वारका जानेका संकेतनामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥


षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीकृष्णकी आज्ञासे यादवोंका द्वारकापुरीको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

कस्यचित् त्वथ कालस्य सभ्यांस्तान् यदुसंसदि ।
बभाषे पुण्डरीकाक्षो हेतुमद्वाक्यमुत्तमम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर, किसी समय कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने यादवोंकी सभामें बैठे हुए समस्त सभासदोंसे यह हेतुयुक्त उत्तम वचन कहा—॥ १ ॥

यादवानामिदं भूमेर्मथुरा राष्ट्रमालिनी ।
वयं चैवेह सम्भूता व्रजे च परिवर्द्धिताः ॥ २ ॥

‘यह राष्ट्रकी मालासे अलंकृत (समूचे राष्ट्रको मालाकी भाँति धारण करनेवाली राजधानी) मथुरापुरी यादवोंकी भूमि है। हम भी यहीं पैदा हुए हैं और इसीके व्रजमें पलकर बड़े हुए हैं ॥ २ ॥

तदिदानीं गतं दुःखं शत्रवश्च पराजिताः ।
नृपेषु जनितं वैरं जरासंधेन विग्रहः ॥ ३ ॥

‘इस समय हमारा सारा दुःख दूर हो गया है। हमारे शत्रु भी हमसे हार मान चुके हैं। हमने राजाओंसे वैर मोल ले लिया और जरासंधसे लड़ाई छेड़ दी है ॥ ३ ॥

वाहनानि च नः सन्ति पादातं चाप्यनन्तरम् ।
रत्नानि च विचित्राणि मित्राणि च बहूनि च ॥ ४ ॥

‘हमारे पास पर्याप्त वाहन हैं। पैदलोंकी संख्या भी अनन्त है। हमारे खजानेमें विचित्र रत्न हैं तथा हमारे मित्रोंकी संख्या भी बहुत है ॥ ४ ॥

इयं च माथुरी भूमिरल्पा गम्या परस्य तु ।
वृद्धिश्चैव परास्माकं बलतो मित्रतस्तथा ॥ ५ ॥

‘परंतु यह मथुराकी भूमि बहुत छोटी है और शत्रुको सुगमतापूर्वक इसमें प्रवेश हो जाता है। इधर हमारे सैनिकों और मित्रोंकी बहुत अधिक वृद्धि हुई है ॥ ५ ॥

कुमारकोट्यो याश्चेमाः पदातीनां गणाश्च ये ।
एषामपीह वसतां सम्मर्दमुपलक्षये ॥ ६ ॥

‘हमारे पास जो ये एक करोड़ कुमार (अविवाहित)

[विष्णुपर्व ] षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२१


सैनिक हैं तथा ये जो पैदलोंके बहुत-से दल हैं, इनके भी यहीं रहनेसे यहाँ बड़ी भीड़-भाड़ दिखायी देती है ॥ ६ ॥

अत्र नो रोचते मह्यं निवासो यदुपुङ्गवाः ।
पुरीं निवेशयिष्यामि मम तत् क्षन्तुमर्हथ ॥ ७ ॥

'अतः यदुपुङ्गवो ! अब यहाँ निवास करना मुझे अच्छा नहीं लगता है; इसलिये मैं दूसरी पुरी बसाऊँगा । मेरी इस धृष्टताको आपलोग क्षमा करेंगे ॥ ७ ॥

एतद् यदनुरूपं वो ममाभिप्रायजं वचः ।
भवाय भवतां काले यदुक्तं यदुसंसदि ॥ ८ ॥

'इस यादवसभामें मेरे हार्दिक अभिप्रायके अनुसार जो बात कही गयी है, वह समयानुसार आपलोगोंके उद्भवके लिये ही है। यदि आपलोगोंको अनुकूल जँचती हो तो कहिये' ॥ ८ ॥

तमूचुर्यादवाः सर्वे हृष्टेन मनसा तदा ।
साध्यतां यदभिप्रेतं जनस्यास्य भवाय वै ॥ ९ ॥

तब समस्त यादव प्रसन्न मनसे बोल उठे—'प्रभो ! इस यादव समाजके उद्भवके लिये आपको जो अभीष्ट हो, वह कार्य कीजिये' ॥ ९ ॥

ततः सम्मन्त्रयामासुर्वृष्णयो मन्त्रमुत्तमम् ।
अवध्योऽसौ कृतोऽस्माकं सुमहच्च रिपोर्बलम् ॥ १० ॥

तब समस्त वृष्णिवंशी मिलकर उत्तम मन्त्रणा करने लगे—'यह जरासंध ( या कालयवन ) हमलोगोंके लिये अवध्य कर दिया गया है। हमारे उस शत्रु का सैनिक बल बहुत बड़ा है ॥ १० ॥

कृतः सैन्यक्षयश्चापि महानिह नराधिपैः ।
बहुलानि च सैन्यानि हन्तुं वर्षशतैरपि ।
न शक्ष्यामो ह्यतस्तेषामपयानेऽभवन्मतिः ॥ ११ ॥

'हमारे पक्षके नरेशोंने शत्रु की उस सेनाका बड़ा भारी विनाश किया है तो भी उसके पास अभी बहुत-सी सेनाएँ हैं, जिन्हें हमलोग सौ वर्षोंमें भी नहीं मार सकते । अतः हमारा विचार उनसे हट जानेके लिये हो गया है' ॥ ११ ॥

तस्मिंश्चैवान्तरे राजा सकालयवनस्तदा ।
सैन्येन तद्विधेनैव मथुरामभ्युपागमत् ॥ १२ ॥

इसी बीचमें कालयवनसहित राजा जरासंध फिर वैसी ही सेना साथ लेकर मथुरापर चढ़ आया ॥ १२ ॥

ततो जरासंधबलं दुर्निवार्यमभूत् तदा ।
ते कालयवनं चैव श्रुत्वेदं प्रतिपेदिरे ॥ १३ ॥

उस समय मथुराके सैनिकोंके लिये जरासंधकी सेनाको ही रोकना अत्यन्त कठिन कार्य था । फिर जब यादवोंने कालयवनका भी आगमन सुना, तब तो उन्होंने मथुरासे हट जाना ही अपने लिये श्रेयस्कर समझा ॥ १३ ॥

केशवः पुनरेवाह यादवान् सत्यसंगरः ।
अद्यैव दिवसः पुण्यो निर्यामः स्वबलानुगाः ॥ १४ ॥

सत्यप्रतिज्ञ श्रीकृष्णने वहाँ यादवोंसे फिर कहा—'आज ही वह पुण्य दिवस है, जब कि अपनी सेनाके साथ हमें यहाँ-से निकल चलना है' ॥ १४ ॥

ततो निष्क्रममुः सर्वे यादवाः कृष्णशासनात् ।
ओघा इव समुद्रस्य बलौघप्रतिनादिताः ॥ १५ ॥

यह सुनकर समस्त यादव श्रीकृष्णकी आज्ञासे उस पुरीको छोड़कर निकल गये । उस समय सैन्यसमूहोंके कोलाहलसे भरे हुए यादवोंके दल समुद्रके जलप्रवाहकी भाँति जान पड़ते थे ॥ १५ ॥

संगृह्य ते कलत्राणि वसुदेवपुरोगमाः ।
सुसन्नद्धैर्गजैर्मत्तै रथैरश्वैश्च दंशितैः ॥ १६ ॥
आहत्य दुन्दुभीन् सर्वे स्वजनज्ञातिबान्धवाः ।
निर्ययुर्यादवाः सर्वे मथुरामपहाय वै ॥ १७ ॥

वसुदेव आदि सभी यादव अपनी स्त्रियोंको साथ ले कसे-कसाये मतवाले हाथियों, रथों और सुसज्जित अश्वोंके द्वारा मथुरा छोड़कर चल दिये । उन सबने डंके पीटकर स्वजनों तथा जाति-भाइयोंके साथ वहाँसे प्रस्थान किया था ॥ १६-१७ ॥

स्यन्दनैः काञ्चनापीडैर्मत्तैश्च वरवारणैः ।
सूतैः प्लुतैश्च तुरगैः कशापाणिप्रणोदितैः ॥ १८ ॥
स्वानि स्वानि बलाग्राणि शोभयन्तः प्रकर्षिणः ।
प्रत्यङ्मुखा ययुर्हृष्टा वृष्णयो भरतर्षभ ॥ १९ ॥

भरतश्रेष्ठ ! सुवर्णभूषित रथों, मतवाले गजराजों और सारथीकी आज्ञामात्रसे उछलकर चलनेवालेतथा हाथमें चाबुक लिये सवारोंद्वारा हाँके जानेवाले घोड़ोंसे अपनी-अपनी श्रेष्ठ सेनाओंकी शोभा बढ़ाते तथा उन्हे खींचकर अपने साथ लिये जाते हुए वृष्णिवंशी बड़े हर्षके साथ पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १८-१९ ॥

ततो मुख्यतमाः सर्वे यादवा रणकोविदाः ।
अनीकाग्राणि कर्षन्तो वासुदेवपुरोगमाः ॥ २० ॥

तदनन्तर, युद्धकुशल श्रीकृष्ण आदि सभी मुख्य-मुख्य यादव अपनी सेनाओंको साथ लेकर चले ॥ २० ॥

ते स्म नानालताचित्रं नारिकेलवनायुतम् ।
कीर्णं नागवलैः कान्तं केतकीखण्डमण्डितम् ॥ २१ ॥
तालपुन्नागवकुलद्राक्षाबनघनं क्वचित् ।
अनूपं सिन्धुराजस्य प्रपेदुर्यदुपुङ्गवाः ॥ २२ ॥

४३२श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

वे यदुपुङ्गव वीर सिंधुराजके जलप्राय देशमें जा पहुँचे, जो नाना प्रकारकी लताओंसे विचित्र शोभा पा रहा था। नारियलके बहुत-से वन वहाँ सुशोभित होते थे। नागकेसरोंके झुंड इधर-उधर सब ओर फैले थे, जिनसे वहाँकी कमनीयता और भी बढ़ गयी थी। केवड़ोंकी झाड़ियोंसे वह प्रदेश अलंकृत हो रहा था। कहीं-कहीं ताड़, पुन्नाग, बकुल और अंगूरके वन उस भूभागको और घना बना रहे थे ॥ २१-२२ ॥

ते तत्र रमणीयेषु विषयेषु सुखप्रियाः।
मुमुदुर्यादवाः सर्वे देवाः स्वर्गगता इव ॥ २३ ॥

जिन्हें सुख ही प्रिय है, वे सब यादव वहाँके रमणीय स्थानोंमें स्वर्गमें रहनेवाले देवताओंके समान आनन्दका अनुभव करने लगे ॥ २३ ॥

पुरवास्तु विचिन्वन् स कृष्णस्तु परवीरहा।
ददर्श विपुलं देशं सागरेणोपशोभितम् ॥ २४ ॥

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले श्रीकृष्णने नगरके वास्तुस्थानकी खोज करते हुए समुद्रसे सुशोभित होनेवाले एक विशाल प्रदेशको देखा ॥ २४ ॥

वाहनानां हितं चैव सिकताताम्रमृत्तिकम्।

विष्णुपर्व ] सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३३

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

कालयवनका वध

जनमेजय उवाच
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि विस्तरेण महात्मनः।
चरितं वासुदेवस्य यदुश्रेष्ठस्य धीमतः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— भगवन्! मैं बुद्धिमान् यदुश्रेष्ठ महात्मा वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका चरित्र विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

किमर्थं च परित्यज्य मथुरां मधुसूदनः।
मध्यदेशस्य ककुदं धाम लक्ष्म्याश्च केवलम् ॥ २ ॥
शृङ्गं पृथिव्याः स्वालक्ष्यं प्रभूतधनधान्यवत्।
आर्याह्वयजलभूयिष्ठमधिष्ठानवरोत्तमम् ॥ ३ ॥
अयुद्धेनैव दाशार्हस्त्यक्तवान् द्विजसत्तम।
स कालयवनश्चापि कृष्णे किं प्रत्यपद्यत ॥ ४ ॥

भगवान् मधुसूदन किसलिये मथुरा छोड़कर चले गये? वह तो मध्यदेशका ककुद (सर्वोत्तम स्थान), लक्ष्मीका अद्वितीय धाम, पृथ्वीका शृङ्ग, सुन्दर, दर्शनीय, प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न, आर्योंका निवासस्थान, जलकी अधिकतासे सुशोभित तथा सभी अधिष्ठानोंमें सबसे उत्तम है। द्विजश्रेष्ठ! दशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णने बिना युद्धके ही उसे क्यों छोड़ दिया? तथा कालयवनने भी श्रीकृष्णके साथ क्या बर्ताव किया? ॥ २-४ ॥

द्वारकां च समासाद्य वारिदुर्गां जनार्दनः।
किं चकार महाबाहुर्महायोगी महातपाः ॥ ५ ॥

महाबाहु, महायोगी और महातपस्वी भगवान् जनार्दनने जलरूपी दुर्गसे घिरी हुई द्वारकामें जाकर क्या किया? ॥ ५ ॥

किंवीर्यः कालयवनः केन जातश्च वीर्यवान्।
यमसहां समालक्ष्य व्यपयातो जनार्दनः ॥ ६ ॥

कालयवनका पराक्रम कैसा था? किसने उस बलशाली वीरको जन्म दिया था, जिसे असह्य समझकर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकासे हट गये थे? ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच
वृष्णीनामन्धकानां च गुरुर्गार्ग्यो महामनाः।
ब्रह्मचारी पुरा भूत्वान स्म दारान् स विन्दति ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! वृष्णि और अन्धक वंशी यादवोंके गुरु (पुरोहित) महामना गार्ग्यमुनि पहले नियमपूर्वक ब्रह्मचारी रहकर किसी साधनामें लगे हुए थे। वे उन दिनों स्त्री-संसर्गसे दूर रहते थे ॥ ७ ॥

तथा हि वर्तमानं तमूर्ध्वरेतसमव्ययम्।
श्यालोऽभिशस्तवान् गार्ग्यमपुमानिति राजनि ॥ ८ ॥

विकाररहित ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारीके रूपमें रहते हुए उन गार्ग्य-मुनिपर उन्हींके सालेने राजसभामें नपुंसक होनेका कलङ्क लगाया॥

सोऽभिशस्तस्तदा राजन् नगरे त्वजितं जये।
अलिप्संस्तु स्त्रियं चैव तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ ९ ॥

राजन्! जिन्होंने अजित परमात्माको भी जीत लिया था, उस नगरमें इस प्रकार कलङ्कित होनेपर उन्होंने स्त्रीकी इच्छा तो नहीं की, परंतु क्रोधपूर्वक अत्यन्त कठोर तपस्या आरम्भ कर दी ॥ ९ ॥

ततो द्वादशवर्षाणि सोऽयश्चूर्णमभक्षयत्।
आराधयन् महादेवमचिन्त्यं शूलपाणिनम् ॥ १० ॥

वे गार्ग्यमुनि अचिन्त्यस्वरूप शूलपाणि महादेवजीकी आराधना करते हुए बारह वर्षोंतक केवल लोहेका चूर्ण खाकर रहे ॥ १० ॥

रुद्रस्तस्मै वरं प्रादात् समर्थं युधि निग्रहे।
वृष्णीनामन्धकानां च सर्वतेजोमयं सुतम् ॥ ११ ॥

तब भगवान् रुद्रने उन्हें वरके रूपमे पूर्ण तेजस्वी पुत्र प्रदान किया, जो युद्धमें वृष्णि और अन्धक-वंशके वीरोंका भी निग्रह करनेमें समर्थ था ॥ ११ ॥

ततः शुश्राव तं राजा यवनाधिपतिर्वरम्।
पुत्रप्रसवजं दैवात्पुत्रः पुत्रकामिता ॥ १२ ॥

इसी समय यवनोंके अधिपति एक राजाने उस पुत्र-प्रदान करनेवाले वरका वृत्तान्त सुना। वह दैवयोगसे पुत्रहीन था और पुत्र पानेकी इच्छा रखता था ॥ १२ ॥

स नृपस्तमुपानाय्य सान्त्वयित्वा द्विजोत्तमम्।
तं घोषमध्ये यवनो गोपस्त्रीषु समासृजत् ॥ १३ ॥

उस यवन-नरेशने द्विजश्रेष्ठ गार्ग्यको सान्त्वनापूर्वक घर लाकर ठहराया और किसी गोष्ठके भीतर उन्हें गोपनारियोंके संसर्गमें रखा ॥ १३ ॥

गोपाली त्वप्सरास्तत्र गोपस्त्रीवेषधारिणी।
धारयामास गार्ग्यस्य गर्भं दुर्धरमच्युतम् ॥ १४ ॥

उसी गोष्ठमे गोपाली नामवाली अप्सरा थी, जो गोप-नारीका वेष धारण करके वहाँ रहती थी। उसीने गार्ग्यमुनिके उस दुर्धर एवं अच्युत गर्भको धारण किया ॥ १४ ॥

मानुष्यां गार्ग्यभार्यायां नियोगाच्छूलपाणिनः।
स कालयवनो नाम जज्ञे शूरो महाबलः ॥ १५ ॥

भगवान् शङ्करके वरके प्रभावसे गार्ग्यमुनिकी उस मानवी-रूपधारिणी अप्सरारूपा भार्याके गर्भसे महाबली शूरवीर कालयवनका जन्म हुआ ॥ १५ ॥