भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 426
४०५श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

देवदूतस्य वचनं यथोक्तं वज्रपाणिना ।
निशम्य सुमहान्तेजाः कैशिकः प्राह शासनम् ॥ २४ ॥

मनस्वी कैशिकने देवदूतके वचनको, जैसा कि वज्रधारी इन्द्रने उसके द्वारा कहलाया था, स्वयं विचारकर राजाओंको सुनाया तथा इन्द्रके आदेशपत्रको भी पढ़ा ॥ २४ ॥

कैशिक उवाच
विदितं वो नृपाः सर्वे वैनतेयसहायच्युतः ।
आगतोऽतिथिरूपेण विदर्भनगरीं हरिः ॥ २५ ॥

कैशिक बोले—राजाओ ! आप सब लोगोंको यह विदित है कि अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् श्रीहरि गरुड़के साथ अतिथिरूपसे विदर्भपुरीमें पधारे हैं ॥ २५ ॥

प्राप्तमालोक्य पात्रोऽयमिति संचिन्त्य भूपतिः ।
प्रददौ वासुदेवाय स्वं राज्यं धर्महेतुना ॥ २६ ॥
इदमासनमास्वेति भ्रात्रा मे चोदिते ततः ।
वागुक्ता चाशरीरेण केनापि व्योमचारिणा ॥ २७ ॥

उन्हें आया देख 'यह उत्तम पात्र हैं' ऐसा सोचकर राजा क्रथने भगवान् वासुदेवको धर्मके लिये अपना सारा राज्य समर्पित कर दिया । फिर मेरे भाई क्रथने भगवान्‌से कहा, 'प्रभो ! यह सिंहासन आपकी सेवामें समर्पित है; इस-पर बैठिये।' उनके इतना कहते ही किसी आकाशचारी दिव्य प्राणीने, जिसका शरीर दिखायी नहीं देता था, यह बात कही ॥ २६-२७ ॥

देवदूत उवाच
न युक्तमासनं दातुं त्वयासीनं नराधिप ।
इदमभ्यासनं दिव्यं सर्वरत्नविभूषितम् ॥ २८ ॥
जाम्बूनदमयं शुभ्रं रचितं विश्वकर्मणा ।
प्रेषितं देवराजेन सिंहलक्षणलक्षितम् ॥ २९ ॥
अत्रोपविष्टं देवेशं चराचरनमस्कृतम् ।
अभिषिञ्चन्तु राजेन्द्रं यदुभिः पार्थिवैः सह ॥ ३० ॥

देवदूत बोला—नरेश्वर ! जिसपर दूसरे लोग बैठ चुके हैं, ऐसा सिंहासन तुम्हें श्रीकृष्णके लिये देना उचित नहीं है। इनके लिये तो यह सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित दिव्य सिंहासन प्रस्तुत है, जो जाम्बूनद नामक सुवर्णका बना हुआ और परम उज्ज्वल है। साक्षात् विश्वकर्माने इसका निर्माण किया है। यह सिंहके चिह्नोंसे चिह्नित है, देवराज इन्द्रने यह आसन भगवान्‌के लिये भेजा है। समस्त चराचर प्राणी जिनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं, वे देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण जब इसपर बैठ जायँ, तब तुम लोग बहुत-से राजाओंके साथ मिलकर इनका राजेन्द्रके पदपर अभिषेक करो ॥ २८-३० ॥

समागताः कुण्डिननगरे कन्याहेतोर्नराधिपाः ।
नागमिष्यति यः कश्चित् सोऽस्य वध्यो भविष्यति ॥ ३१ ॥

इस कुण्डिनपुरमें राजकन्याकी प्राप्तिके लिये जो-जो नरेश पधारे हैं, उनमेंसे जो कोई भी इनके अभिषेकमें न आयेगा, वह इनका वध्य होगा ॥ ३१ ॥

इमे चैवाष्टकलशा निधीनामंशसम्भवाः ।
अक्षया राजराजस्य धनेशस्य महात्मनः ॥ ३२ ॥
दिव्या काञ्चनरत्नाढ्या दिव्याभरणयोनयः ।
राजेन्द्रस्याभिषेकार्थमागच्छन्ति नृपैर्वृताः ॥ ३३ ॥

ये आठ अक्षय कलश हैं, जो निधियोंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये राजाधिराज महात्मा धनेश (कुबेर) के कलश दिव्य कलश हैं, जो सुवर्ण और रत्नोंसे सम्पन्न हैं। इनके आभूषण और आसन भी दिव्य हैं। ये कलश श्रीकृष्णका राजेन्द्रपदपर अभिषेक करनेके लिये राजाओंके साथ आ रहे हैं ॥ ३२-३३ ॥

एष शक्रस्य संदेशः कथितो वो नराधिपाः ।
लेखेनाहूय तान् सर्वानभिषिञ्चन्तु केशवम् ॥ ३४ ॥

नरेश्वरो ! यह मैंने आपलोगोंसे इन्द्रका संदेश सुनाया है। अतः आपलोग इस लिखित आज्ञापत्रके द्वारा सब राजाओंको बुलाकर भगवान् श्रीकृष्णका अभिषेक करें ॥ ३४ ॥

कैशिक उवाच
इति संचोद्य खस्थोऽसौ देवदूतो गतो दिवम् ।
दत्त्वाऽऽसनं च कृष्णाय बालार्कसदृशप्रभम् ॥ ३५ ॥

कैशिकने कहा—ऐसी प्रेरणा देकर तथा श्रीकृष्णके लिये प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिमान् सिंहासन समर्पित करके वह आकाशमें स्थित हुआ देवदूत स्वर्गलोकको चला गया ॥ ३५ ॥

नैताहं नोदयिष्यामि भवद्भियै समागताः ।
दुर्নিবার्यतरं घोरं शक्रस्य स्वयमीरितम् ॥ ३६ ॥

इसलिये मैं आपलोगोंको श्रीकृष्णका अभिषेक करनेके लिये प्रेरित कर रहा हूँ। आपमेंसे जो लोग यहाँ पधारे हैं, उन सबके लिये साक्षात् इन्द्रके द्वारा दी गयी इस आज्ञा-का उल्लङ्घन करना अत्यन्त कठिन एवं भयंकर है ॥ ३६ ॥

युष्माभिर्दर्शनं युक्तमद्भुतं भुवि दुर्लभम् ।
कलशैर्भिषिच्यन्तं स्वयमेव नभस्तलात् ॥ ३७ ॥
दृष्ट्वाऽऽश्चर्ये हि नः सर्वान्, ध्रुवं पापक्षयो भवेत् ।

आकाशसे आठ कलशोंद्वारा श्रीकृष्णका स्वयं ही अभिषेक होगा—यह अद्भुत दृश्य पृथ्वीपर सर्वथा दुर्लभ है। आपलोगोंको भी यह दर्शनीय उत्सव अवश्य देखना चाहिये। इस आश्चर्यजनक दृश्यको देखकर हम सब लोगों-का पाप निश्चय ही दूर हो जायगा ॥ ३७३ ॥

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