भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 427

विष्णुपर्व ] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ४०५


स्नापनार्थं च कृष्णाय देवदेवाय विष्णवे ॥ ३८ ॥
आगच्छध्वं नृपश्रेष्ठा न भयं कर्तुमर्हथ ।
श्रेष्ठ नरपतियो ! आपलोग देवाधिदेव विष्णुरूप श्रीकृष्णको नहलानेके लिये आइये। उनसे भय न कीजिये॥ ३८॥

आवयोः कृतसन्धानो युष्मदर्थे जनार्दनः ॥ ३९ ॥
सर्वेषां मनुजेन्द्राणामभयं कुरुते हरिः ।
विशुद्धभावः कृष्णस्तु आवयोर्दृष्टतस्त्वतः ॥ ४० ॥
हमने आपलोगोंके लिये जनार्दनसे संधि कर ली है। भगवान् श्रीहरि समस्त नरेशोंको अभयदान कर रहे हैं। हमने श्रीकृष्णके स्वरूपको अच्छी तरह देख और समझ लिया है । आपलोगोंके प्रति इनका भाव सर्वथा शुद्ध है ॥ ३९-४० ॥

मागधस्य विशेषेण न वैरं हृदि दृश्यते ।
यदत्र कारणं कार्यं तद् भवद्भिर्विचिन्त्यताम् ॥ ४१ ॥
विशेषतः मगधराज जरासंधके लिये उनके हृदयमें तनिक भी वैर नहीं दिखायी देता है। इसलिये यहाँ जो कार्य-कारण उपस्थित है, उसपर आपलोग अच्छी तरह विचार कर लें ॥ ४१ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं संचिन्तयामासुर्नृपाः शापभयार्दिताः ।
भूयः शुश्रुवु राजेन्द्रः केशवाय महात्मने ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! ऐसी बात सुनकर वे राजा शापके भयसे पीड़ित हो नाना प्रकारकी चिन्ताएँ करने लगे। इतनेमें ही उन राजेन्द्रोने महात्मा केशवके निमित्त पुनः आकाशवाणी सुनी ॥ ४२ ॥

मेघगम्भीरनादेन स्वरेणापूरयन् नभः ।
वागुवाचाशरीरेण देवराजस्य शासनात् ॥ ४३ ॥
देवराजके शासनसे किसी अदृश्य व्यक्तिने मेघके समान गम्भीर ध्वनिसे आकाशको पूर्ण करते हुए इस प्रकार कहा—॥ ४३ ॥

चित्राङ्गद उवाच
त्रैलोक्याधिपतिः शक्रः प्रजापालनहेतुना ।
आज्ञापयति युष्माकं नृपाणां हितकाम्यया ॥ ४४ ॥
चित्राङ्गद बोला—त्रिलोकीनाथ इन्द्र प्रजा-पालनके लिये तुम सब राजाओंका हित चाहते हुए तुम्हें इस प्रकार आज्ञा दे रहे हैं ॥ ४४ ॥

न युक्तं वसतान्योन्यं कृष्णेन सह वैरिणा ।
वसध्वं प्रीतिमुत्पाद्य स्वराष्ट्रेषु नृपोत्तमाः ॥ ४५ ॥
श्रेष्ठ नरेशगण! तुमलोग श्रीकृष्णके साथ वैरभाव रखकर अथवा श्रीकृष्णको वैरी बनाकर जो उनके साथ रहते हो, ऐसा तुम्हारे लिये उचित नहीं है । तुम्हें एक दूसरेके साथ वैरभाव नहीं रखना चाहिये । तुमलोग परस्पर प्रेम-भाव उत्पन्न करके अपने-अपने राष्ट्रोंमें निवास करो ॥ ४५ ॥

प्रणतार्तिहरः कृष्णः प्रतिसेनान्तकोऽनलः ।
अनेन सह सम्प्रीत्या मोदध्वं विगतज्वराः ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्ण शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले हैं; परंतु शत्रुओंकी सेनाके लिये काल और अग्निके समान भयंकर हैं । तुमलोग इनके साथ प्रेमभाव रखकर निश्चिन्त एवं प्रसन्न रहो ॥ ४६ ॥

मानुषाणां नृपा देवा नृपाणां देवताः सुराः ।
सुराणां देवता शक्रः शक्रस्यापि जनार्दनः ॥ ४७ ॥
साधारण मनुष्योंके लिये राजा ही देवता हैं । राजाओंके लिये देवता ही आराध्यदेव हैं । देवताओंके देवता इन्द्र हैं और इन्द्रके भी देवता भगवान् श्रीकृष्ण हैं ॥ ४७ ॥

एष विष्णुः प्रभुर्देवो देवानामति दैवतम् ।
जातोऽयं मानुषे लोके नररूपेण केशवः ॥ ४८ ॥
ये भगवान् विष्णुदेव देवताओंके भी देवता हैं । ये केशव ही मनुष्यलोकमें मानवरूपमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४८ ॥

अजेयः सर्वलोकेषु देवदानवमानवैः ।
कार्त्तिकेयसहायस्य अपि शूलभृतः स्वयम् ॥ ४९ ॥
समस्त लोकोंमें देवता, दानव और मनुष्य इन्हें कभी जीत नहीं सकते । कार्त्तिकेयके साथ साक्षात् भगवान् त्रिशूलधारी शंकरके लिये भी ये अजेय हैं ॥ ४९ ॥

तस्मै देवाधिदेवाय केशवाय महात्मने ।
अभिषेक्तुं सुरैः सार्द्धं किमिच्छेयमतः परम् ॥ ५० ॥
उन्हीं देवाधिदेव महात्मा केशवके लिये देवताओंसहित मेरी यह इच्छा है कि इनका राजेन्द्रपदपर अभिषेक हो । इससे बढ़कर मुझे और कौन-सी इच्छा हो सकती है ॥ ५०॥

न चाधिकारो देवानां राजेन्द्रस्याभिषेचने ।
तेनाहं नाभिषिञ्चामि सर्वलोकनमस्र्कतम् ॥ ५१ ॥
परंतु राजेन्द्रपदपर किसीका अभिषेक करनेके लिये देवताओंका अधिकार नहीं है; इसीलिये मैं सर्वलोकवन्दित श्रीकृष्णका स्वयं भी अभिषेक नहीं कर रहा हूँ ॥ ५१ ॥

नृपाणामधिकारोऽयं राजेन्द्रस्य निवेशने ।
गत्वा यूयं विदर्भायां क्रथकैशिकयोः सह ॥ ५२ ॥
संचिन्त्य विधिदृष्टेन कुरुध्वं नृपसत्तमाः ।
श्रेष्ठ नरेशगण ! राजेन्द्रपदपर किसीको प्रतिष्ठित करनेका अधिकार केवल राजाओंको ही प्राप्त है। अतः तुम लोग क्रथ और कैशिकके साथ विदर्भपुरीमें जाकर भलीभाँति सोच-विचार करके शास्त्रीय विधिके अनुसार श्रीकृष्णका अभिषेक करो ॥ ५२॥