भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 420
३९८श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंश

वाक्यार्णवं महागाधं नीतिशास्त्रार्थवृंहितम्।
क एष निखिलं वक्तुं शक्तो वै राजसंसदि ॥ ४ ॥

इस राजसभामें कौन ऐसा पुरुष है जो इस प्रकार समुद्र-के समान अत्यन्त अगाध एवं नीतिशास्त्रके अनुकूल सर्वगुण-सम्पन्न बात कह सके ॥ ४ ॥

किं त्वनुस्मरणार्थेऽहं यद् ब्रवीमि शृणुध्व मे।
आगतो वासुदेवोति किमाश्चर्यं नराधिपाः ॥ ५ ॥

परंतु आपलोगोंको एक कर्तव्यकी याद दिलानेके लिये मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरी वह बात सुन लीजिये। नरेशरो ! यदि वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ पधारे हैं, तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है ॥ ५ ॥

यथाऽऽगता वयं सर्वे कृष्णोऽपीह तथाऽऽगतः।
किमत्र दोषो गौण्यो वा कन्याहेतोः समागताः ॥ ६ ॥

जैसे हम सब लोग यहाँ आये हैं, उसी तरह श्रीकृष्ण भी चले आये हैं। इसमें क्या दोष है और क्या गुण। हम सब लोगोंके आगमनका एक ही उद्देश्य है—राजकन्याकी प्राप्ति॥

यदस्माभिः समेत्यैक्यात् कृतं गोमन्तरोधनम्।
तत्र युद्धकृतं दोषं कथं वै वक्तुमर्हथ ॥ ७ ॥

हमलोगोंने एक साथ मिलकर आपसमें एकता स्थापित करके जो गोमन्त पर्वतपर घेरा डाल रखा था, उस दशामें यदि वहाँ युद्ध हुआ तो उसे आपलोग दोष कैसे बता रहे हैं॥

वनवासे स्थितौ वीरौ कंसव्यामोहहेतुना।
देवर्षिवचनाद् राजन् वृन्दावनतटे स्थितौ ॥ ८ ॥
तावाहूय वधार्थेन उभौ रामजनार्दनौ।
नागेनोद्दीपिता वीरौ हत्वा नागं विवेशतुः ॥ ९ ॥
ततः स्ववीर्यमाश्रित्य निहतो रङ्गसागरे।
गतासुरिव चासीनो मधुरेशः सहानुगः ॥ १० ॥
किमत्र विहितो दोषो येनास्माभिर्विरोधिकैः।
उपरोधपरा राजन् वयं सर्वे समागताः ॥ ११ ॥

राजन् ! वीर बलराम और श्रीकृष्ण कंसको मोहमें डालनेके लिये ही वनवास कर रहे थे। वृन्दावनके किनारे रहते थे; परंतु देवर्षि नारदके कहनेसे उन दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णको कंसने उनका वध करनेके लिये बुलवाया और कुवलयापीड हाथीके द्वारा आक्रमण कराकर उन दोनों वीरोंके क्रोधको उद्दीपित किया। उस दशामें वे दोनों उस हाथीको मारकर समुद्रके समान विशाल रंगशालामें प्रविष्ट हुए; फिर उन्होंने अपने बाहुबलका आश्रय लेकर मुर्देके समान बैठे हुए मथुरानरेशको यदि उसके साथियोंसहित मार डाला तो इसमें उनके द्वारा क्या दोष बन गया। राजन् ! इसी तरह कंसका वध करके यदि श्रीकृष्ण और बलरामने हम वयोवृद्ध नरेशोंके साथ विरोध किया और उस दशामें यदि हम सब लोगोंने वहाँ पहुँचकर मथुरापुरीपर घेरा डाल दिया तो उसमें भी क्या दोष था ॥ ८-११ ॥

सेनातिबलमालोक्य विग्रस्तवौ रामकेशवौ।
पुरं बलं समुत्सृज्य गोमन्ते च गतावुभौ ॥ १२ ॥

हमारी सेनाका महान् बल देखकर बलराम और कृष्ण डर गये और अपने नगर तथा सेनाको छोड़कर दोनों भाई गोमन्तपर्वतपर चले गये ॥ १२ ॥

तत्रापि गतमस्माभिर्हन्तुं समग्रयोधिभिः।
अप्राप्तयौवनाभ्यां च पदातिभ्यां रणाजिरे ॥ १३ ॥
रथाश्वनरनागेन नास्माभिर्विग्रहः कृतः।
कृत्वोपरोधं शैलस्य क्षत्रधर्मेण दीपितः ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् हम समग्रशस्त्रोंसे युद्ध करनेवाले योद्धाओंने उन्हें मार डालनेके लिये वहाँ भी धावा किया। वे दोनों अभी जवान नहीं हुए थे और रणभूमिमें पैदल ही लड़ते थे; इसलिये हमने हाथी-घोड़े, रथ और पैदल सेना होती हुई चतुरङ्गिणी सेनाद्वारा उनके साथ युद्ध नहीं किया; अपितु क्षत्रिय-धर्मके अनुसार गोमन्तपर्वतपर घेरा डालकर उसमें आग लगा दी थी॥

दावाग्निमुखमाविश्य दुर्विनीततपस्विनो।
विनीत इति मन्यामः सर्वे क्षत्रियपुङ्गवाः।
प्रत्युद्गते कृते त्वेवं दूषयाम जनार्दनम् ॥ १५ ॥

हम सभी क्षत्रिय-पुङ्गव यह समझते थे कि ये दोनों उद्दण्ड तपस्वी बालक दावानलके मुखमें पड़कर सीख जायेंगे ( अपने कियेका फल पा जायेंगे )। ऐसी दशामें उन दोनों भाइयोंने यदि प्रतिशोधात्मक युद्ध किया तो हम जनार्दनको इस तरह दोष क्यों दें ( उन्होंने जो कुछ किया, ठीक ही किया ) ॥ १५ ॥

यत्र यत्र प्रयास्यामो वयं तत्र भवेत् कलिः।
प्रीत्यर्थं प्रयतियामः कृष्णेन सह भूमिपाः ॥ १६ ॥

(श्रीकृष्णसे बैर रखनेपर) हमलोग जहाँ-जहाँ जायेंगे, वहीं-वहीं कलह हो सकता है। अतः राजाओ ! आइये हम श्रीकृष्णके साथ प्रेम बढ़ानेका प्रयत्न करेंगे ॥ १६ ॥

इदं कुण्डिनपुरं कृष्णो नागतः कलिहेतुना।
कन्यानिमित्तागमने कस्य युद्धं प्रयच्छति ॥ १७ ॥

इस कुण्डिनपुरमें श्रीकृष्ण युद्धके लिये नहीं आये हैं। यदि राजकन्याके निमित्त ही उनका आगमन हुआ है, तब वे किसके साथ युद्ध करेंगे ॥ १७ ॥

मर्त्येऽस्मिन् पुरुषेन्द्वोऽसौ न कश्चित् प्राकृतो नरः।
देवलोकेषु देवेषु प्रवरः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥

वे कोई प्राकृत मनुष्य नहीं हैं। इस मर्त्यलोकमें श्रेष्ठ पुरुष हैं। देवलोकवासी देवताओंमें भी सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम हैं॥