भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 421
[ विष्णुपर्व ]एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः३९९

देवानापि कर्तासौ लोकानां च विशेषतः।
न चैव बालिशा बुद्धिर्न चेर्ष्या नापि मत्सरः॥ १९॥
वे देवताओंके भी कर्ता हैं और विशेषतः सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा भी वे ही हैं। उनकी बुद्धि गँवारों-जैसी नहीं है। उनके मनमें न ईर्ष्या है, न मात्सर्य॥ १९॥

न स्तब्धो न कृशो नार्तः प्रणतार्तिहरः सदा।
एष विष्णुः प्रभुर्देवो देवानापि दैवतम्॥ २०॥
ये न तो कठोर हैं, न दुर्बल हैं और न रोग-शोकसे पीड़ित ही हैं। ये तो सदा शरणागतोंका दुःख दूर करते रहते हैं। ये श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् विष्णु तथा देवताओंके भी देवता हैं॥ २०॥

आगतो गरुडेनेहच्छद्मप्रकाशयहेतुना।
नानाशस्त्रसहितो याति कृष्णः शत्रुविनाशने॥ २१॥
इमां यात्रां विजानीध्वं प्रीत्यर्थं ह्यागतो हरिः।
सहितो यादवेन्द्रैश्च भोजवृष्ण्यन्धकैरपि॥ २२॥
इस समय ये अपने छद्मरूपको प्रकाशित करनेके लिये गरुड़के द्वारा यहाँ पधारे हैं। श्रीकृष्ण शत्रुओंका विनाश करनेके लिये नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके साथ यात्रा करते हैं। परंतु उनकी इस यात्राको वैसा न समझो। इस समय तो ये श्रीहरि भोज, वृष्णि, अन्धक आदि यादवेन्द्रोंके साथ यहाँ प्रीति बढ़ानेके लिये ही आये हैं॥ २१-२२॥

अर्घ्यमाचमनं दत्त्वा आतिथ्यं च नराधिपाः।
करिष्यामो वयं सर्वे केशवाय महात्मने॥ २३॥
अतः नरेश्वरो! हम सब लोग यहाँ महात्मा केशवको अर्घ्य और आचमन आदि देकर उनका आतिथ्य-सत्कार करेंगे॥ २३॥

एवं संधानतः कृत्वा कृष्णेन सहिता वयम्।
वसामो विगतोद्वेगा निर्भया विगतज्वराः॥ २४॥
इस प्रकार सन्धि करके हमलोग श्रीकृष्णके साथ उद्वेग, भय और चिन्तासे रहित होकर निवास करेंगे॥ २४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दन्तवक्त्रस्य धीमतः।
शाल्वः प्रवदतां श्रेष्ठस्तानुवाच नराधिपान्॥ २५॥
बुद्धिमान् दन्तवक्त्रका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ शाल्वने उन नरेशोंसे कहा—॥ २५॥

शाल्व उवाच

किं भयेनास्य नः सर्वे न्यस्तशस्त्रा भवामहे।
संधानकरणाद्धेतोः कृष्णस्य भयकम्पिताः॥ २६॥
शाल्व बोला—राजाओ! यदि ऐसी बात है तो क्या हम सब लोग श्रीकृष्णके भयसे अब अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे डालकर निहत्थे हो जायें। सन्धि करनेके हेतुसे तो यही पता लगता है कि सब नरेश श्रीकृष्णके भयसे काँप रहे हैं॥ २६॥

परस्तवेन किं कार्यं विनिन्द्य बलमात्मनः।
नैष धर्मो नरेन्द्राणां क्षात्रे धर्मे च तिष्ठताम्॥ २७॥
अपने बलकी निन्दा करके दूसरेकी स्तुति करनेसे क्या प्रयोजन। क्षत्रिय-धर्ममें स्थित रहनेवाले नरेशोंका यह धर्म नहीं है॥ २७॥

महत्सु राजवंशेषु सम्भूताः कुलवर्द्धनाः।
तेषां कापुरुषा बुद्धिः कथं भवितुमर्हति॥ २८॥
जो महान् राजवंशोंमें उत्पन्न होकर अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं, उन राजाओंकी बुद्धिमे ऐसे कायरतापूर्ण विचार-का उदय कैसे हो सकता है॥ २८॥

अहं जानामि वै कृष्णमादिदेवं सनातनम्।
प्रभुं सर्वामरेन्द्राणां नारायणपरायणम्॥ २९॥
मै जानता हूँ, श्रीकृष्ण समस्त अमरेन्द्रवरोंके स्वामी आदि-देव सनातन पुरुष हैं। नारायण ही इनके महान् आश्रय (स्वरूप) हैं॥ २९॥

वैकुण्ठमजयं लोके चराचरगुरुं हरिम्।
सम्भूतं देवकीगर्भे विष्णुं लोकनमस्कृतम्॥ ३०॥
कंसराजवधार्थाय भारावतरणाय च।
अस्माकं च विनाशाय लोकसंरक्षणाय च॥ ३१॥
अंशावतरणे कृत्स्नं जाने विष्णोर्विचेष्टितम्।
लोकमें अजेय, वैकुण्ठ-धामके अधिपति, चराचरगुरु, पापहारी विश्ववन्दित भगवान् विष्णु ही पृथ्वीका भार उतारने, कंसराजको मारने तथा हमारा विनाश और सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करनेके लिये देवकीके गर्भसे प्रकट हुए हैं। अपने अंश-सहित भगवान् विष्णुके इस पूर्ण अवतारमे जो-जो कार्य होने-वाला है, वह सब मैं अच्छी तरह जानता हूँ॥ ३०-३१½॥

संग्राममतुलं कृत्वा विष्णुना सह भूमिपाः॥ ३२॥
चक्रानलविनिर्दग्धा यास्यामो यमसादनम्।
अतः भूमिपालो! हमलोग इन भगवान् विष्णुके साथ अनुपम संग्राम करके इनकी चक्राग्निसे दग्ध हो यमलोकमें जा पहुँचेंगे॥ ३२½॥

तत्त्वं जानामि राजेन्द्र्राः कालेनायुःक्षयो भवेत्॥ ३३॥
नाकाले म्रियते कश्चित् प्राप्ते काले न जीवति।
राजेन्द्रगण! मै इस तत्त्वको जानता हूँ कि कालसे ही आयु क्षीण होती है। जबतक काल न आया हो कोई नहीं मरता है और काल आ जानेपर कोई जीवित नहीं रहता॥

एवं विनिश्चयं कृत्वा न कुर्यात् कस्यचिद् भयम्॥३४॥
स एव भगवान् विष्णुरालोक्य तपसः क्षयम्।
निहन्ता दितिजेन्द्राणां यथाकालेन योगवित्॥ ३५॥
अपने मनमें ऐसा दृढ़ निश्चय रखकर कभी किसीसे भय नहीं रखना चाहिये। वे ही योगवेत्ता भगवान् विष्णु दैत्य-

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