विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें४०० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
राजाओंकी तपस्या क्षीण हुई देख यथासमय उनका संहार करते हैं ॥ ३४-३५ ॥
बलिं वैरोचनिं चैवं बद्ध्वावध्यं महाबलम् । कृतवान् देवदेवेशः पातालतलवासिनम् ॥ ३६ ॥
उन्हीं देवदेवेश्वरने महाबली विरोचनकुमार बलिको, जो किसीके हाथसे मारे जानेवाले नहीं हैं, बाँधकर उन्हें पाताल-लोकका निवासी बना दिया है ॥ ३६ ॥
एवमादीनि वै विष्णोश्चेष्टानि च नराधिपाः । तस्मादयुक्तं भवतां विग्रहार्थं विचारणम् ॥ ३७॥
नरेश्वरो ! भगवान् विष्णुकी ऐसी ही चेष्टाएँ हुआ करती हैं। अतः आप लोगोंका युद्धके लिये विचार करना अनुचित है ॥ ३७ ॥
न च संग्रामहेतोर्हि कृष्णस्यागमनं त्विह । यस्य वा कस्य वा कन्या वरयिष्यति तस्य सा । किमत्र विग्रहो राज्ञां प्रीतिर्भवतु वै ध्रुवम् ॥ ३८ ॥
श्रीकृष्णका यहाँ आना युद्धके लिये नहीं हुआ है। राजकन्या जिस किसीका भी वरण करेगी, उसीकी पत्नी होगी। इसमें झगड़ेकी कौन-सी बात है। राजाओंमें सदा अटल प्रीति बनी रहनी चाहिये ॥ ३८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं कथयमानानां नृपाणां बुद्धिशालिनाम् । न किंचिदब्रवीद् राजा भीष्मकः पुत्रकारणात् ॥ ३९॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन बुद्धिशाली नरेशोंके इस प्रकार कहनेपर भी राजा भीष्मक अपने पुत्रके कारण कुछ बोल न सके ॥ ३९ ॥
महावीर्यमदोत्सिक्तं भार्गवास्त्राभिरक्षितम् । रणप्रचण्डातिरथं विचिन्त्य मनसा सुतम् ॥ ४० ॥
वह अपने महान् बलके घमंडमें भरा रहता था। भार्गवास्त्रसे सुरक्षित था और रणभूमिमें प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करनेवाला अतिरथी वीर था। भीष्मकने मन-ही-मन अपने उस पुत्रका चिन्तन करके इस प्रकार कहा— ॥ ४० ॥
भीष्मक उवाच
कृष्णं न सहते नित्यं पुत्रो मे बलदर्पितः । नित्याभिमानी च रणे न बिभेति च कस्यचित् ॥ ४१ ॥
भीष्मक बोले—मेरा पुत्र सदा बलके घमंडमें भरा रहनेवाला और अभिमानी है। वह श्रीकृष्ण और उनके प्रभावको सहन नहीं कर पाता है तथा युद्धमें किससे डरता नहीं है ॥ ४१ ॥
कृष्णस्य भुजवीर्येण ह्रियते नात्र संशयः । भविष्यति ततो युद्धं महापुरुषविग्रहम् ॥ ४२ ॥
इसमें सन्देह नहीं कि श्रीकृष्णकी भुजाओंके बलसे कन्या-का अपहरण होगा। उस अवसरपर महापुरुषके साथ महान् विग्रह एवं युद्ध होकर ही रहेगा ॥ ४२ ॥
द्वेषी चैवाभिमानी च कुतो जीवति मे सुतः । जीवितं नात्र पश्यामि मम पुत्रस्य केशवात् ॥ ४३ ॥
उस अवस्थामें श्रीकृष्णसे द्वेष रखनेवाला मेरा अभिमानी पुत्र कैसे जीवित रह सकता है। अतः मुझे श्रीकृष्णके हाथसे यहाँ अपने पुत्रके जीवनकी रक्षा होती नहीं दिखायी देती ॥
कन्याहेतोः सुतं ज्येष्ठं पितृणां नन्दिवर्द्धनम् । कारयिष्ये कथं युद्धं पुत्रेण सह केशवम् ॥ ४४ ॥
कन्याके लिये पितरोंका आनन्द बढ़ानेवाले अपने ज्येष्ठ पुत्रको केशवके साथ और केशवको अपने पुत्रके साथ युद्ध करनेका अवसर कैसे दूँगा ॥ ४४ ॥
न च नारायणं देवं वरमिच्छति रुक्मवान् । मूढभावो मदोन्मत्तः संग्रामेष्वनिवर्तकः । नियतं भस्मसाद् याति तुलराशिरिवानलात् ॥ ४५ ॥
रुक्मीका मनोभाव मूढ़तासे भरा हुआ है। अतः वह भगवान् नारायणको रुक्मिणीका वर बनाना नहीं चाहता। वह बलके मदसे उन्मत्त रहता और युद्धसे कभी मुँह नहीं मोड़ता है। अतः जैसे आग लगनेसे रूईका ढेर जल जाता है, उसी प्रकार वह श्रीकृष्णसे भिड़कर निश्चय ही भस्म हो जायगा ॥ ४५ ॥
करवीरेश्वरः शूरः शृगालश्चित्रयोधिनः । क्षणेन भस्मसान्नीतः केशवेन बलीयसा ॥ ४६ ॥
विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले अत्यन्त बलवान् केशवने करवीरपुरके शूरवीर राजा शृगालको क्षणभरमें धूलमें मिला दिया ॥ ४६ ॥
वृन्दावनेऽवसच्छ्रीमान् केशवो बलिनां वरः । उद्धृत्यैकेन हस्तेन सप्ताहं धृतवान् गिरिम् ॥ ४७ ॥ दुष्करं कर्म संस्मृत्य मनः सीदति मे भृशम् ॥ ४८ ॥
जब बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् केशव वृन्दावनमें रहते थे, उस समय उन्होंने गोवर्धन पर्वतको उठाकर सात दिनोंतक उसे एक ही हाथसे धारण कर रखा था। उनके उस दुष्कर कर्मको याद करके मेरा हृदय अत्यन्त शिथिल हो जाता है ॥ ४७-४८ ॥
नगेन्द्रे सहसाऽऽगम्य दैवतैः सह वृत्रहा । अभिषिच्याब्रवीत् कृष्णमुपेन्द्रोति शचीपतिः ॥ ४९ ॥
उस समय देवताओंके साथ वृत्रासुरविनाशक शचीपति इन्द्रने सहसा गिरिराज गोवर्धनपर आकर श्रीकृष्णका गौओंके इन्द्रके पदपर अभिषेक किया और उन्हें उपेन्द्र कहकर पुकारा ॥