विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] \hfill एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः \hfill ३९७
उपर्युक्त बात कह गये हैं। वहाँ युद्धमें बलराम और श्रीकृष्ण पैदल ही लड़ रहे थे, तो भी हमारी विशाल वाहिनीका ऐसा घोर संहार हुआ, जिसे रोकना अत्यन्त कठिन हो गया था ॥ ४२-४३ ॥
विदितं वः सुपर्णस्य स्वागतस्य नृपोत्तमाः।
पक्षवेगानिलोद्भूता वभ्रमुर्गगनेचराः ॥ ४४ ॥
श्रेष्ठ नरपतियो! गरुड़के आते समय यहाँ जो प्रभाव पड़ा था, उसे आपलोग अच्छी तरह जानते हैं। उनके पंखोंके वेगसे जो वायु उठी थी, उसका झोंका खाकर आकाशचारी प्राणी चक्कर काटने लगे थे ॥ ४४ ॥
समुद्राः क्षुभिताः सर्वे चचालाद्रिर्मही मुहुः।
वयं सर्वे सुसंत्रस्ताः किमुत्पातेति विह्वलाः ॥ ४५ ॥
सारे समुद्र क्षुब्ध हो उठे थे। पर्वत काँपने लगे और धरती भी बार-बार डोलने लगी थी। हम सब लोग यह सोचकर भयभीत एवं व्याकुल हो गये थे कि यह कैसा उत्पात खड़ा हो गया ॥ ४५ ॥
यदा संनह्य युध्येत आरूढः केशवः खगम्।
कथमस्मद्विधः शक्तः प्रतिस्थातुं रणाजिरे ॥ ४६ ॥
जब केशव कवच बाँधकर गरुड़की पीठपर आरूढ़ हो युद्ध करेंगे, उस समय हमारे-जैसा पुरुष समराङ्गणमें कैसे ठहर सकता है ॥ ४६ ॥
राज्ञां स्वयंवरो नाम सुमहान् हर्षवर्धनः।
कृतो नरवरैराद्यैर्यशोधर्मस्य वै विधिः ॥ ४७ ॥
स्वयंवर राजाओंके लिये महान् आनन्दवर्धक उत्सव है। पूर्वकालके श्रेष्ठ नरेशोंने इसे सुयश और धर्मकी सिद्धिके लिये प्रचलित किया था ॥ ४७ ॥
इदं तु कुण्डिनगरमासाद्य मनुजेश्वराः।
पुनरेवैष्यते क्षिप्रं महापुरुषविग्रहम् ॥ ४८ ॥
परंतु मनुजेश्वरो ! इस कुण्डिनपुरमें आकर हमारे सामने पुनः शीघ्र ही महापुरुषके साथ महान् युद्धका अवसर आन चाहता है ॥ ४८ ॥
यदि सा वरयेदन्यं राज्ञां मध्ये नृपात्मजा।
कृष्णस्य भुजयोर्वीर्यं कः पुमान् प्रसहिष्यति ॥ ४९ ॥
यदि राजकुमारी रुक्मिणी राजाओंके बीचमें किसी दूसरे नरेशका वरण कर ले, तब कौन ऐसा पुरुष है—जो श्रीकृष्णकी भुजाओंका पराक्रम सह सकेगा ॥ ४९ ॥
विज्ञापितमिदं दोषं स्वयंवरमहोत्सवे।
तदर्थमागतः कृष्णो वयं चैव नराधिपाः ॥ ५० ॥
इस स्वयंवर-महोत्सवमें यह युद्धकी सम्भावना ही महान् दोष है, जिसे सूचित कर दिया गया। श्रीकृष्ण तथा हम सब नरेश भी स्वयंवरके लिये ही यहाँ पधारे हैं ॥ ५० ॥
कृष्णस्यागमनं चैव नृपाणामतिगर्हितम्।
कन्याहेतोर्नरेन्द्राणां यथा वदति मागधः ॥ ५१ ॥
राजकन्याके उद्देश्यसे श्रीकृष्णका आगमन हम सब नरेशोंके लिये अत्यन्त गर्हित सिद्ध हो रहा है—जैसा कि मगधराजका कथन है ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलेषु हरिवंशे विष्णुपर्वणि रुक्मिणीस्वयंवरे मागधसुनीथवाक्ये अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें रुक्मिणीस्वयंवरके प्रसंगमें जरासंध और सुनीथका भाषणविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
दन्तवक्त्र और शाल्वका भाषण सुनकर भीष्मकका श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन करते हुए उन्हें प्रसन्न करनेका ही निश्चय करना
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्ते वचने सुनीथेन महात्मना।
करूपाधिपतिर्वीरो दन्तवक्त्रोऽभ्यभाषत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! महामना सुनीथके ऐसा कहनेपर करूपदेशके वीर राजा दन्तवक्त्रने भाषण देना आरम्भ किया ॥ १ ॥
दन्तवक्त्र उवाच
यदुक्तं मागधेनात्र सुनीथेन नराधिपाः।
युक्तपूर्वमहं मन्ये यदस्माकं वचो हितम् ॥ २ ॥
दन्तवक्त्र बोला—राजाओ ! यहाँ मगधराजने और राजा सुनीथने जो कुछ कहा है, उसे मैं युक्तिसंगत मानता हूँ; क्योंकि इनका प्रवचन हमलोगोंके लिये हितकर है ॥ २ ॥
न च विद्वेषणेनाहं न चाहंकारवादिना।
न चात्मविजिगीषुत्वाद् दूषयामि वचोऽमृतम् ॥ ३ ॥
मैं न तो विद्वेषके कारण, न अहंकारवादी होनेके कारण और न अपनी विजयकी अभिलाषा रखनेके ही कारण आप दोनोंके अमृतमय वचनोंको सदोष बता रहा हूँ ॥ ३ ॥