विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
सब ओर छायी रहती थी । गुफाओंमें झरनेका जल गिरनेसे जो शब्द होता था तथा बड़े-बड़े व्याघ्रोंके दहाड़नेसे जो ध्वनि होती थी, उससे भी वह पर्वत व्याप्त हो रहा था ॥ ८ ॥
नीलाश्मचयसंघातैर्बहुवर्णं यथा घनम् ।
धातुविस्त्रावदिग्धाङ्गं सानुप्रस्रवभूषितम् ॥ ९ ॥
यहाँ नीले पत्थरोंके ढेर-के-ढेर पड़े थे, जिनमें वह अनेक वर्णके मेघकी भाँति सुशोभित होता था। पानीके साथ गेरू आदि धातुओंके बहानेसे उसका अङ्ग चन्दनसे चर्चित-सा जान पड़ता था । शिखरोंसे जो झरने गिर रहे थे, वे आभूषण-के समान उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ९ ॥
कीर्णं सुरगणैः कान्तैर्मैनाकमिव कामगम् ।
उच्छ्रितं सुविशालाग्रं समूलाम्वुपरिस्रवम् ॥ १० ॥
कान्तिमान् देवता वहाँ सब ओर फैले हुए थे। वह इच्छानुसार विचरनेवाले मैनाक-सा प्रतीत होता था। अत्यन्त विशाल शिखरसे सुशोभित वह उच्चतम पर्वत अपने मूलभागसे निर्झरोंके जलकी धारा बहा रहा था ॥ १० ॥
सकाननदरीप्रस्थं श्वेताभ्रगणभूषितम् ।
पनसाम्रातकाम्रौघैर्वैत्रस्यन्दनचन्दनैः ॥ ११ ॥
तमालैलावनयुतं मरीचक्षुपसंकुलम् ।
वन, गुफा और शिखरोंसे सम्पन्न वह शैलराज श्वेत बादलोंसे विभूषित था । वहाँ कटहल, आम्रातक ( अमड़ा ), आम्रोंके समूह, बेंत, स्यन्दन ( तिनिश ), चन्दन, तमाल, इलायचीके वन तथा मिर्चकी झाड़ियों शोभा पाती थीं ॥११॥
पिप्पलीवल्लिकलिलं चित्रमिङ्गुदिपादपैः ॥ १२ ॥
द्रुमैः सर्जरसानां च सर्वतः परिशोभितम् ।
प्रांशुशालवनैर्युक्तं बहुचित्रवनैर्युतम् ॥ १३ ॥
वहाँ सब ओर पिप्पलीकी बेलें फैली थीं । इङ्गुदीके वृक्ष विचित्र शोभा दे रहे थे तथा सर्जरस ( राल ) के वृक्ष सब ओरसे उस पर्वतको सुशोभित किये हुए थे। ऊँचे-ऊँचे शाल वृक्षोंके वन तथा अन्य बहुत-से विचित्र वन उस पर्वतकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १२-१३ ॥
सर्जनिम्बार्जुनवनं पाटलीकुलसंकुलम् ।
हिन्तालैश्च तमालैश्च पुन्नागैश्चोपशोभितम् ॥ १४ ॥
राल, नीम और अर्जुन वृक्षोंका वन शोभा दे रहा था। पाड़र वृक्षोंके समूह वहाँ सब ओर छा रहे थे । हिंताल, तमाल और पुन्नाग ( जायफल ) उस शैलाग्रशिखरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १४ ॥
जलेषु जलजैश्छन्नं स्थलेषु स्थलजैरपि ।
पङ्कजैर्द्रुमखण्डैश्च सर्वतः प्रतिभूषितम् ॥ १५ ॥
वहाँ जलोंमें जलज कमल, स्थलोंमें स्थलज कमल तथा अन्यान्य वृक्षसमूह सब ओरसे उस पर्वतके आभूषण बने हुए थे ॥ १५ ॥
जम्बूजम्बूलवृक्षाढ्यं कद्रुकन्दलभूषितम् ।
चम्पकाशोकवकुलं बिल्वतिन्दुकशोभितम् ॥ १६ ॥
जामुन, केवड़े, कद्रु, केले, चम्पा, अशोक, बकुल, बिल्व और तिन्दुक आदि वृक्षोंसे वह शैल सुशोभित था ॥
कुब्जैश्च नागपुष्पैश्च समन्तादुपशोभितम् ।
नागयूथसमाकीर्णं मृगसंघातशोभितम् ॥ १७ ॥
बहुत-से कुब्ज और नागकेसरके फूल सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ाते थे । झुंड-के-झुंड हाथी वहाँ सब ओर फैले हुए थे । मृगोंके समुदायसे वह शोभायमान था ॥ १७ ॥
सिद्धचारणरक्षोभिः सेवितप्रस्तरान्तरम् ।
गन्धर्वैश्च समायुक्तं गुह्यकैः पक्षिभिस्तथा ॥ १८ ॥
उसके प्रस्तरखण्डोंके मध्यभागोंमें सिद्ध, चारण तथा राक्षस बैठे हुए थे। गन्धर्व, गुह्यक तथा पक्षी भी उस पर्वत-का सेवन करते थे ॥ १८ ॥
विद्याधरगणैर्नित्यमनुकीर्णशिलातलम् ।
सिंहशार्दूलसंनादैः सततं प्रतिनादितम् ।
सेवितं वारिधाराभिश्चन्द्रपादैश्च शोभितम् ॥ १९ ॥
उसकी शिलाएँ सदा ही विद्याधरगणोंसे सेवित होती थीं। सिंहों और व्याघ्रोंके दहाड़नेकी ध्वनिसे यह पर्वत निरन्तर गूँजता रहता था । जलकी धाराएँ और चन्द्रमाकी किरणें उसका सेवन एवं शोभा-संवर्धन करती थीं ॥ १९ ॥
स्तुतं त्रिदशगन्धर्वरप्सरोभिरलंकृतम् ।
वनस्पतीनां दिव्यानां पुष्पैरुच्चावचैः श्रितम् ॥ २० ॥
देवता और गन्धर्व उसकी प्रशंसा करते थे । वह पर्वत अप्सराओंसे अलंकृत था। दिव्य वनस्पतियोंके नाना प्रकारके फूल वहाँ सब ओर बिखरे पड़े थे ॥ २० ॥
शक्रवज्रप्रहाराणामनभिज्ञं कदाचन ।
दावाग्निभयनिर्मुक्तं महावातभयोज्झितम् ॥ २१ ॥
उस पर्वतको कभी भी इन्द्रके वज्रप्रहारकी व्यथाका अनुभव नहीं हुआ था । वहाँ न तो दावानलका भय था और न प्रचण्ड आँधीका ॥ २१ ॥
प्रपातप्रभवाभिश्च सरिद्भिरुपशोभितम् ।
काननैरानाकारैर्विशेषपद्भिरिव श्रियम् ॥ २२ ॥
निर्झरोंसे प्रकट हुई सरिताएँ उस पर्वतको सुशोभित करती थीं । वह अपनी शोभा बढ़ाते हुए-से मुखाकार काननोंसे उपलक्षित होता था ॥ २२ ॥
जलशैवलशृङ्गाग्रैरन्मिपन्तमिव श्रिया ।
स्थलीभिर्मृगजुष्टाभिः कान्ताभिरुपशोभितम् ॥ २३ ॥
जल और सिवारसे युक्त शिखरोंके अग्रभागद्वारा मानों वह लक्ष्मीसे आँख मिला रहा था । पशुओंसे सेवित कमनीय वनस्थलियाँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ २३ ॥