विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः [ ३६१
'श्रीकृष्ण! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूमण्डलके राजाओंके साथ तुम्हारा यह पहला संग्राम देवताओंद्वारा बताया गया है ॥ ७९ ॥
आयुधावाप्तिरत्रैव वपुषो वैष्णवस्य च ।
लक्ष्म्याश्च तेजसश्चैव व्यूहानां च विदारणम् ॥ ८० ॥
'यहीं तुम्हें अपने दिव्य आयुधोंकी, वैष्णव स्वरूपकी, लक्ष्मीकी तथा शत्रुव्यूहोंका विदारण करनेवाले तेजकी प्राप्ति होगी ॥ ८० ॥'
अतःप्रभृति संग्रामो धरण्यां शस्त्रमूर्च्छितः ।
भविष्यति महान् कृष्ण भारतं नाम वैशसम् ॥ ८१ ॥
'श्रीकृष्ण! इसके बाद पृथ्वीपर अस्त्र-शस्त्रोंसे व्याप्त एक महान् संग्राम होगा, जो लोगोंमें महाभारतके नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ८१ ॥
तद् गच्छ कृष्ण शैलेन्द्रं गोमन्तं च नगोत्तमम् ।
जरासंधमृधे चापि विजयस्त्वामुपस्थितः ॥ ८२ ॥
'अतः श्रीकृष्ण! तुम पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिरिराज गोमन्तपर चलो। जरासंधके युद्धमें भी विजयश्री तुम्हारा ही वरण करनेके लिये प्रस्तुत है ॥ ८२ ॥
इदं चैवामृतप्रख्यं होमधेनोः पयोऽमृतम् ।
पीत्वा गच्छत भद्रं वो मयाऽऽदिष्टेन वर्त्मना ॥ ८३ ॥
'तुम्हारा कल्याण हो। मेरी इस होमधेनुका यह अमृतोपम सुमधुर दुग्ध पीकर मेरे बताये हुए मार्गसे चलो' ॥ ८३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामवाक्ये एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत परशुरामवाक्यविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥
चत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण, बलराम और परशुरामजीका गोमन्तपर्वतपर आरोहण, गोमन्तकी शोभाका वर्णन तथा परशुरामजीका श्रीकृष्णको युद्धके लिये प्रोत्साहन देकर वहाँसे प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
तत्त धेन्वाः पयः पीत्वा बलदर्पसमन्वितौ ।
ततस्तौ रामसहितौ प्रस्थितौ यदुपुङ्गवौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस होमधेनुका दूध पीकर बल और दर्पसे भरे हुए वे दोनों यदुपुङ्गव वीर परशुरामजीके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ १ ॥
गोमन्तं पर्वतं द्रष्टुं मत्तनागेन्द्रगामिनौ ।
जामदग्न्यप्रदिष्टेन मार्गेण वदतां वरौ ॥ २ ॥
मतवाले गजराजकी भाँति मस्तीके साथ चलनेवाले वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और बलराम परशुरामजीके बताये हुए मार्गसे गोमन्तपर्वतका दर्शन करनेके लिये चले ॥ २ ॥
जामदग्न्यतृतीयास्ते त्रयस्त्रय इवाग्नयः ।
शोभयन्ति स्म पन्थानं त्रिदिवं त्रिदशा इव ॥ ३ ॥
उन दोनोंके साथ तीसरे परशुरामजी थे। वे तीनों तीन अग्नियोंके समान उसी तरह उस मार्गकी शोभा बढ़ाते थे, जैसे देवता स्वर्गकी ॥ ३ ॥
ते चाध्वविधिना सर्वे ततो वै दिवसक्रमात् ।
गोमन्तमचलं प्राप्ता मन्दरं त्रिदशा इव ॥ ४ ॥
मनुष्य जिस तरह किसी मार्गपर चलते हैं, उसी विधिसे वे सब लोग यात्रा करते हुए क्रमशः कई दिनोंके बाद गोमन्त गिरिपर् जा पहुँचे, मानो देवता मन्दराचलके शिखरपर गये हों ॥ ४ ॥
लताचारुविचित्रं च नानाद्रुमविभूषितम् ।
नानागुरुपिनद्धाङ्गं चित्रं चित्रैर्मनोज्ञरैः ॥ ५ ॥
नाना प्रकारकी लताओंके विस्तारसे उस पर्वतकी सुन्दर एवं विचित्र शोभा हो रही थी। भाँति-भाँतिके वृक्ष उसके लिये भूषणका काम दे रहे थे। उस पर्वतका सारा अङ्ग अनेक प्रकारके अगुरु आदि सुगन्धित धूपोंसे व्याप्त था। मनोहर मयूर उसे और भी विचित्र शोभासे सम्पन्न किये देते थे ॥ ५ ॥
द्विरेफगणसंकीर्णं शिलासंकटपादपम् ।
मत्तबर्हिणनिर्घोषैर्नादितं मेघनादिभिः ॥ ६ ॥
भ्रमरोंसे व्याप्त और शिला तथा वृक्षोंसे भरा हुआ वह पर्वत मेघोंके समान गम्भीर स्वरोंमें बोलनेवाले मतवाले मयूरोंकी मधुर ध्वनिसे निनादित हो रहा था ॥ ६ ॥
गगनालग्नशिखरं जलदासक्तपादपम् ।
मत्तद्विपविषाणाग्रैः परिवृष्टोपलाङ्कितम् ॥ ७ ॥
उसके शिखर आकाशके ऊर्ध्वभागसे लगे हुए थे। बादल उसके वृक्षोंका आलिङ्गन करते थे तथा उसके प्रस्तरखण्ड मतवाले हाथियोंके दाँतोंके अग्रभागकी रगड़से घिसे हुए दिखायी देते थे। उन प्रस्तरोंसे अङ्कित हुआ वह पर्वत बड़ी शोभा पाता था ॥ ७ ॥
कूजद्भिश्वाण्डजगणैः समन्तात् प्रतिनादितम् ।
दरीप्रपाताम्बुरवैश्छन्नं शार्दूलतल्लजैः ॥ ८ ॥
वहाँ चारों ओर पक्षी कलरव करते थे, जिनकी प्रतिध्वनि