भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 385

विष्णुपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः ३६३


पार्श्वैरुपलकल्माषैर्मेघैरिव विभूषितम् ।
पादपच्छन्नभूमिभिः सपुष्पाभिः समन्ततः ॥ २४ ॥
मण्डितं वनराजीभिः प्रमदाभिः पतिर्यथा ।

पार्श्वभागमें स्थित चितकबरे प्रस्तरखण्डोंसे वह ऐसी शोभा पा रहा था, मानो बहुरंगे बादलोंसे विभूषित हो रहा हो। अपने वृक्षसमूहोंसे भूमिको ढक देनेवाली पुष्पशोभित वनश्रेणियाँ उस पर्वतको सब ओरसे घेरकर उसी प्रकार शोभा-सम्पन्न किए हुए थीं, जैसे पुष्पवती (रजस्वला होनेके पश्चात् स्नान एवं पुष्पहारसे अलंकृत) युवती स्त्रियाँ पतिको घेरकर खड़ी हों ॥ २४३॥

सुन्दरीभिर्धरीभिश्च कन्दराभिस्तथैव च ॥ २५ ॥
तेषु तेष्ववकाशेषु सदारमिव शोभितम् ।

जगह-जगह सुन्दर गुफाओं और मनोहर कन्दराओंसे अलंकृत हुआ गोमन्तगिरि विभिन्न स्थानोंमें सपत्नीक पुरुष-की भाँति शोभा पाता था ॥ २५३॥

ओषधीदीप्तशिखरं वानप्रस्थनिषेवितम् ।
जातरूपैर्वनोद्देशैः कृत्रिमैरिव भूषितम् ॥ २६ ॥

विभिन्न प्रकारकी ओषधियाँ उसके शिखरको उद्भासित किये हुए थीं। वानप्रस्थ मुनि उसका सेवन करते थे तथा उसके सहज सुन्दर वनोद्देश कृत्रिम उद्यानोंकी भाँति उसे विभूषित किये हुए थे ॥ २६ ॥

मूलेन सुविशालेन शिरसाप्युच्छ्रितेन च ।
पृथिवीमन्तरिक्षं च ग्राहयन्तमिव स्थितम् ॥ २७ ॥

वह पर्वत अपने अत्यन्त विशाल मूलभाग और उच्चतम शिखरसे पृथ्वी और आकाशमे प्रविष्ट होकर उनकी थाह लगाता हुआ-सा खड़ा था ॥ २७ ॥

ते समासाद्य गोमन्तं रम्यं भूमिधरोत्तमम् ।
रुचिरं रुरुचुः सर्वे वासायामरसंनिभाः ॥ २८ ॥

पर्वतोंमें श्रेष्ठ सुन्दर एवं मनोहर गोमन्तपर्वतपर पहुँच-कर उन सभी देवोपम पुरुषोंने वहाँ निवास करनेकी इच्छा की ॥ २८ ॥

रुरुहुस्ते गिरिवरं खमूर्ध्वमिव पक्षिणः ।
असज्जमाना वेगेन वैनतेयपराक्रमाः ॥ २९ ॥

गरुड़के समान पराक्रमी वे तीनों महापुरुष उस श्रेष्ठ पर्वतपर उसी तरह वेगसे चढ़ने लगे, जैसे पक्षी ऊपर आकाश-में उड़ते हैं। उस समय उनमेंसे किसीकी भी गति अवरुद्ध नहीं होती थी ॥ २९ ॥

ते तु तस्योत्तरं शृङ्गमारूढास्त्रिदशा इव ।
अगारं सहसा चक्रुर्मनसा निर्मितोपमम् ॥ ३० ॥

वे देवताओंकी भाँति उसके सर्वोच्च शिखरपर आरूढ़ हो गये । वहाँ उन्होंने सहसा अपने रहनेके लिये घर बना लिया, मानो मानसिक संकल्पसे ही उसका निर्माण कर लिया हो ॥ ३० ॥

निविष्टौ यादवौ दृष्ट्वा जामदग्न्यो महामतिः ।
रामोऽभिमतमक्लिष्टमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ ३१ ॥

उन दोनों यदुकुमारोंको वहाँ विराजमान हुआ देख परम बुद्धिमान् परशुरामजीने प्रसन्नतापूर्वक अपने अभीष्ट स्थानपर जानेके लिये उनसे पूछना आरम्भ किया—॥३१॥

कृष्ण यास्याम्यहं तात पुरं शूर्पारकं विभो ।
युवयोर्नास्ति चमूख्यं संग्रामे दैवतैरपि ॥ ३२ ॥

'तात ! प्रभावशाली श्रीकृष्ण ! अब मैं शूर्पारक नगरको जाऊँगा । आप दोनोंको तो युद्धमें देवता भी नहीं हरा सकते (फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या है ?) ॥ ३२ ॥

प्राप्तवानस्मि यां प्रीतिं मार्गानुगमनादपि ।
सा मे कृष्णानुगृह्णाति शरीरमिदमव्ययम् ॥ ३३ ॥

'श्रीकृष्ण ! तुम दोनोंके साथ मार्गका अनुसरण करनेसे मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई है, वह मेरे इस अविनाशी शरीर-को अनुगृहीत कर रही है ॥ ३३ ॥

इदं तत् स्थानमुद्दिष्टं यत्रायुधसमागमः ।
युवयोर्विहितो देवैः समयः साम्परायिकः ॥ ३४ ॥

'मैंने जिसे बताया था और जहाँ तुम्हें अपने दिव्य आयुध प्राप्त होनेवाले हैं, वह स्थान यही है । देवताओंने तुम्हारे लिये उनकी प्राप्तिका यही समय निर्धारित किया है, जो परलोकके लिये हितकर है ॥ ३४ ॥

देवानां मुख्य वैकुण्ठ विष्णो देवैरभीष्टुत ।
कृष्ण सर्वस्य लोकस्य शृणु मे नैष्ठिकं वचः ॥ ३५ ॥

'देवताओंमे श्रेष्ठ वैकुण्ठ ! तुम सर्वव्यापी विष्णु हो । देवताओंने सदा तुम्हारी स्तुति की है । श्रीकृष्ण ! तुम मेरी यह तात्त्विक बात सुनो, जो सम्पूर्ण जगत्‌के लिये हितकर है ॥ ३५ ॥

यदिदं प्रस्तुतं कर्म त्वया गोविन्द लौकिकम् ।
मानुषाणां हितार्थाय लोके मानुषदेहिना ॥ ३६ ॥
तस्यायं प्रथमः कल्पः कालेन तु नियोजितः ।

'गोविन्द ! तुमने मनुष्योंके हितके लिये संसारमें मानव-शरीर धारण करके जो यह लौकिक कर्म प्रारम्भ किया है, उसका यह पहला प्रयोग यहीं होने जा रहा है। कालने उसका आयोजन यहीं किया है ॥ ३६३॥

जरासंधेन चै सार्धं संग्रामे समुपस्थिते ॥ ३७॥
तत्रायुधबलं चैव रूपं च रणकर्कशम् ।
स्वयमेवात्मना कृष्ण त्वमात्मानं विधत्स्व ह ॥ ३८ ॥

'श्रीकृष्ण ! जरासंधके साथ संग्राम उपस्थित होनेपर तुम स्वयं ही अपने-आपके द्वारा अपनेको आयुध-बलसे सम्पन्न कर लेना और अपना रण-कर्कश रूप बना लेना ॥३७-३८॥