विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 386, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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चक्रोद्यतकरं दृष्ट्वा त्वां गदापाणिमाहवे।
चतुर्द्विगुणपीनांसं विभ्येद्रपि शतक्रतुः॥ ३९॥
‘जिस समय तुम आठ मांसल कंधोंसे युक्त हो हाथोंमें चक्र और गदा उठाये युद्धके लिये उपस्थित होओगे, उस समय तुम्हें देखकर देवराज इन्द्र भी भयभीत हो उठेंगे ॥ ३९ ॥
अद्यप्रभृति ते यात्रा स्वर्गीका समुपस्थिता।
पृथिव्यां पार्थिवेन्द्राणां कृतास्त्रे त्वयि मानद॥ ४०॥
‘मानद ! जब तुम हाथमें हथियार लेकर युद्धके लिये उद्यत हो गये हो, तब आजसे ही भूमण्डलके राजाओंकी स्वर्गार्थ यात्रा आरम्भ हो जायगी ॥ ४० ॥
वैनतेयस्य चाह्वानं वाहनं ध्वजकर्मणि।
कुरु शीघ्रं महाबाहो गोविन्द वदतां वर॥ ४१॥
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाबाहु गोविन्द ! तुम अपने ध्वजारोपणरूप कार्यकी सिद्धिके लिये शीघ्र ही वाहनरूप विनतानन्दन गरुड़का आवाहन करो ॥ ४१ ॥
युद्धकामा नृपतयस्त्रिदिवाभिमुखोद्यताः।
धार्तराष्ट्रस्य वशगास्तिष्ठन्ति रणवृत्तयः ॥ ४२ ॥
‘युद्धकी इच्छा करनेवाले नरेशगण स्वर्गके लिये अभिमुख एवं उद्यत होकर युद्धवृत्तिका आश्रय ले धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन-के अधीन होकर खड़े हैं ॥ ४२ ॥
राज्ञां निधनदृष्टार्था वैधव्येनाधिवासिता।
एकवेणीधरा चेयं वसुधा त्वां प्रतीक्षते ॥ ४३ ॥
‘राजाओंका निधन होनेवाला है, यह बात प्रत्यक्ष देखकर वैधव्यसूचक वेष-भूषा धारण किये एक वेणीधारिणी ( केश-संस्कारसे रहित ) यह वसुन्धरा तुम्हारी राह देखती है ॥४३॥
सग्रहं कृष्ण नक्षत्रं संक्षिप्यारिविमर्दन।
त्वयि मानुष्यमापन्ने युद्धे च समुपस्थिते ॥ ४४॥
‘शत्रुमर्दन श्रीकृष्ण ! आप मानवरूप धारण करके इस धरातलपर आ गये हैं और युद्धका अवसर भी उपस्थित है, इसलिये क्षत्रियसमाज मृत्युसे संकुचित न होकर रणभूमिमे आनेके लिये उतावला हो उठा है। किसी समयविशेषकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा है, क्योंकि उसका जन्मनक्षत्र क्रूरग्रहमे आक्रान्त हो गया है ॥ ४४ ॥
त्वरस्व कृष्ण युद्धाय दानवानां वधाय च।
स्वर्गाय च नरेन्द्राणां देवतानां सुखाय च ॥ ४५ ॥
‘श्रीकृष्ण ! तुम दानवोंका वध करने, नरेशोंको स्वर्ग-लोकमें भेजने और देवताओंको सुख पहुँचानेके उद्देश्यसे युद्धके लिये जल्दी करो ॥ ४५ ॥
सत्कृतोऽहं त्वया कृष्ण लोकैश्च सचराचरैः।
त्वया सत्कृतरूपेण येन सत्कृतवानहम् ॥ ४६ ॥
‘सच्चिदानन्दघन श्रीकृष्ण ! तुम स्वरूपतः सबके द्वारा सत्कृत हो। तुम सर्वात्माने जो मेरा सत्कार किया है, उससे मैं चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण लोकोंद्वारा सत्कृत हो गया और सदाके लिये सत्कारवान् बन गया ॥ ४६ ॥
साधयामि महाबाहो भवतः कार्यसिद्धये ।
स्मर्तव्यश्चास्मि युद्धेषु कान्तारेषु महीक्षिताम् ॥ ४७ ॥
‘महाबाहो ! मैं तुम्हारे कार्यकी सिद्धिके लिये स्वयं भी साधना करूँगा। सभी भूमिपालोंको चाहिये कि वे दुर्गम संकट और युद्धके अवसरोंपर मेरा स्मरण करें’ ॥ ४७ ॥
इत्युक्त्वा जामदग्न्यस्तु कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ।
जयाशिषा वर्द्धयित्वा जगामाभीप्सितां दिशम्॥ ४८ ॥
ऐसा कहकर परशुरामजी अनायास ही महान् कर्म करने-वाले श्रीकृष्णको विजयसूचक आशीर्वादसे बढ़ावा देकर स्वयं अभीष्ट दिशाको चले गये ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोमन्तारोहणं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका गोमन्तपर्वतपर आरोहणविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
एकचत्वारिंशोऽध्यायः
बलरामके पास वारुणी, कान्ति एवं श्री (शोभा )—इन देवाङ्गनाओंका आगमन, गरुड़के द्वारा श्रीकृष्णको वैष्णव मुकुटकी प्राप्ति, श्रीकृष्णका बलरामसे वार्तालाप तथा जरासंधकी सेनाका निरीक्षण करके अपने आपसे ही मानसिक उद्गार प्रकट करना
वैशम्पायन उवाच
जामदग्न्ये गते रामे तौ यादवकुलोद्वहौ।
गोमन्तशिखरे रम्ये चेरतुः कामरूपिणौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! परशुरामजी-के चले जानेपर यादवकुलका भार वहन करनेवाले वे श्री-कृष्ण और बलराम इच्छानुसार रूप धारण करके गोमन्त-