भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

विष्णुपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः ३६५


पर्वतके रमणीय शिखरपर विचरने लगे ॥ १ ॥
वनमालाकुलोरोस्कौ नीलपीताम्बरादुभौ ।
नीलश्वेतवपुष्मन्तौ गगनस्थाविवाम्बुदौ ॥ २ ॥
उन दोनोंके वक्षःस्थलमें वनमाला शोभा पा रही थी । दोनों क्रमशः नीले-पीले वस्त्र धारण करके अपने गौर-श्याम शरीरसे आकाशमे स्थित हुए दो मेघोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २ ॥
तौ शैलधातुदिग्धाङ्गौ युवानौ शिखरे स्थितौ ।
चेरतुस्तत्र कान्तेषु वनेषु रतिलालसौ ॥ ३ ॥
पर्वतीय धातुओंसे अपने अङ्गोंका शृङ्गार करके उस पर्वतके शिखरपर खड़े हुए दोनो नवयुवक वीर क्रीड़ाकी लालसा लिये कमनीय वनोंमें विचरण करने लगे ॥ ३ ॥
उदयन्तं निरीक्षन्तौ शशिनं ज्योतिषां वरम् ।
उदयास्तमने चैव ग्रहाणां धरणीधरे ॥ ४ ॥
वे उस पर्वतपर ज्योतिर्मय नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ चन्द्रमाके उदयकी शोभा देखते और ग्रहोंके उदय-अस्त देखा करते थे ॥ ४ ॥
अथ संकर्षणः श्रीमान् विना कृष्णेन वीर्यवान् ।
चचार तस्य शिखरे नगस्य नगसंनिभः ॥ ५ ॥
एक दिन परम पराक्रमी श्रीमान् संकर्षण श्रीकृष्णके बिना ही उस पर्वतके शिखरपर विचर रहे थे। वे स्वयं भी पर्वत-के समान ही प्रतीत होते थे ॥ ५ ॥
प्रफुल्लस्य कदम्बस्य सुच्छायाये निषसाद ह ।
वायुना मन्दगन्धेन वीज्यमानः सुखेन वै ॥ ६ ॥
घूमते-घूमते एक खिले हुए कदम्बकी मनोहर छायामें बैठ गये। उस समय कदम्बकी मधुर मन्द गन्धसे वासित वायु उन्हें सुखपूर्वक व्यजन डुलाने लगी ॥ ६ ॥
तस्य तेनानिलौघेन सेव्यमानस्य तत्र वै ।
मद्यसंस्पर्शजो गन्धः संस्पृशन् घ्राणमागतः ॥ ७ ॥
वह मन्द-मन्द वायु बहकर जब बलरामजीकी सेवा कर रही थी, उस समय उनकी घ्राणेन्द्रियमें मद्यका स्पर्श करके आये हुए सुगन्धित समीरने प्रवेश किया ॥ ७ ॥
तृष्णा चैनं विवेशाशु वारुणीप्रभवा तदा ।
शुशोष च मुखं तस्य मत्तस्येवापरेऽहनि ॥ ८ ॥
उस समय उनके भीतर वारुणी (मद्य या अमृत) की तृष्णाका आवेग हुआ। फिर तो दूसरे दिन मतवाले पुरुषकी भाँति उनका मुँह सूखने लगा ॥ ८ ॥
स्मारितः स पुरावृत्तममृतप्राशनं विभुः ।
तृषितो मदिरान्वेषी ततस्तं तरुमैक्षत ॥ ९ ॥
उन्हें पूर्वकालमे किये गये अमृतपानका स्मरण हो आया। वे तृषित होकर उस अमृतकी खोज करने लगे। तब उन्होंने उस वृक्षकी ओर देखा ॥ ९ ॥

तस्य प्रावृषि फुल्लस्य यदम्भो जलजोझितम् ।
तत्कोटरस्थं मदिरा संजायत मनोहरा ॥ १० ॥
वर्षाकालमें उस खिले हुए कदम्बपर जो मेघोंका बरसाया हुआ जल गिरा था, वह उसके कोटरमें मनोहर सुधाके रूपमें प्रकट हो गया ॥ १० ॥
तां तु तृष्णाभिभूतात्मा पिबन्नार्त इवासकृत् ।
मोहाच्च चलिताकारः समजायत स प्रभुः ॥ ११ ॥
बलरामजीका हृदय प्याससे घबरा उठा था। वे पिपासा-पीड़ित पुरुषकी भाँति उस अमृतको बार-बार पीने लगे। उसको अधिक पी लेनेके कारण उनपर मोह (नशा-) सा छा गया, जिससे उन प्रभावशालीका शरीर कुछ लड़खड़ाने-सा लगा ॥ ११ ॥
तस्य मत्तस्य वदनं किंचिच्चलितलोचनम् ।
घूर्णिताकारमभवच्छरत्कालेन्दुसप्रभम् ॥ १२ ॥
मधुसे मत्त हुए बलरामका मुख कुछ झूमता-सा प्रतीत हुआ, नेत्र किंचित् चञ्चल हो उठे। उस मुखकी प्रभा शरत्-कालके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होने लगी ॥ १२ ॥
कदम्बकोटरे जाता नाम्ना कादम्बरीति सा ।
रूपिणी वारुणी तत्र देवानाममृतारणी ॥ १३ ॥
वह मधुमयी सुधा कदम्बके कोटरमें उत्पन्न हुई थी, इसलिये कादम्बरी नामसे विख्यात हुई। वहाँ मूर्तिमती वारुणी प्रकट हुई थी, जो देवताओंके लिये अमृत पैदा करने-वाली है ॥ १३ ॥
कादम्बरीमदकलं विदित्वा कृष्णपूर्वजम् ।
तिस्रस्त्रिदशनार्यस्तमुपतस्थुः प्रियंवदाः ॥ १४ ॥
श्रीकृष्णके बड़े भाईको कादम्बरी (मधु या अमृत) के नशेसे स्पष्ट बात बोलनेमे असमर्थ जान तीन प्रियवादिनी देवाङ्गनाएँ उनकी सेवामें उपस्थित हुईं ॥ १४ ॥
मदिरा रूपिणी भूत्वा कान्तिश्च शशिनः प्रिया ।
श्रीश्च देवी वरिष्ठा स्त्री स्वयमेवाम्बुजध्वजा ॥ १५ ॥
साञ्जलिप्रग्रहा देवी रौहिणेयमुपस्थिता ।
वारुण्या सहितं वाक्यमुवाच मदविह्वलम् ॥ १६ ॥
एक तो मादक मद्य या अमृतकी अधिष्ठात्री देवी (जिन्हें वारुणी कहते हैं) मूर्तिमती होकर प्रकट हुई। दूसरी चन्द्रमा-की प्रिय कान्ति (की अधिष्ठात्री देवी) थी और तीसरी श्री देवी थीं, जो सर्वश्रेष्ठ स्त्री मानी जाती हैं, उनके ध्वजमे कमलका चिह्न है, वे देवी स्वयं ही हाथ जोड़े हुए रोहिणी-नन्दन बलरामकी सेवामे उपस्थित हुई थीं। वारुणीके साथ उन्होंने मदविह्वल बलरामजीसे इस प्रकार कहा—॥ १५-१६ ॥
बलं जयस्व दैत्यानां बलदेव दिवीश्वर ।
अहं ते दयिता कान्ता वारुणी समुपस्थिता ॥ १७ ॥