भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

३६६ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'पहले वारुणी बोली 'देवलोकेश्वर बलदेव ! आप दैत्योंकी सेनापर विजय प्राप्त करें। मैं आपकी प्राणवल्लभा वारुणी सेवामें उपस्थित हुई हूँ ॥ १७ ॥

त्वामेवान्तर्हितं श्रुत्वा शाश्वतं वडवामुखे।
क्षीणपुण्येव वसुधां पर्यंटिं विमलानन ॥ १८ ॥

'निर्मल मुखवाले देव ! मैं आपको वडवानलके समीप पातालमें शेषरूपसे नित्य विराजमान जानती थी, किंतु इस समय भूतलमें अवतार लेनेके कारण वहाँसे अदृश्य हो गये हैं, ऐसा सुनकर मैं पुण्यहीना नारी-सी आपकी खोजमें सारी पृथ्वीपर भटक रही थी ॥ १८ ॥

पुष्पचक्रानुलेपेषु केसरेषूपषितं मया।
अतिमुक्तेषु चाक्षोभ्य पुष्पस्तवकवत्सु च ॥ १९ ॥

'अजेय वीर ! मैंने पुष्पसमूहोंसे अनुलिप्त हुए केसरोंमें निवास किया है, फूलोंके गुच्छोंसे सुशोभित वासन्ती लताओंमें वास किया है ॥ १९ ॥

अहं कदम्बमालीना मेघकाले मुखप्रिया ।
तृषितं मार्गमाणा त्वां स्वेन रूपेण छादिता ॥ २० ॥

'मेरे लिये प्यासे हुए आपकी खोज करती हुई मैं अपने रूपको छिपाकर वर्षाकालमें कदम्ब वृक्षके भीतर लुक-छिपकर रहती आयी हूँ। मुझे आपके मुखका निवास ही विशेष प्रिय है ॥ २० ॥

सास्मि पूर्णेन योगेन यथैवामृतमन्थने ।
समीपं प्रेषिता पित्रा वरुणेन तवानघ ॥ २१ ॥
सा यथैवार्णवगता तथैव वडवामुखे ।
त्वयोपभोक्तुमिच्छामि सम्मतस्त्वं हि मे गुरुः ॥ २२ ॥

'निष्पाप बलराम ! जैसे पूर्वकालमें अमृतमन्थनके समय पूर्णयोगसे युक्त होनेपर मेरे पिता वरुणने मुझे आपके समीप भेजा था, जैसे समुद्रमें और पातालमें मैं आपके पास रही हूँ, उसी प्रकार इस समय भी आपकी सेवामें उपस्थित हुई हूँ और चाहती हूँ, कि आपके द्वारा मेरा उपभोग हो; क्योंकि मेरे हृदयने आपहीको अपना स्वामी माना है ॥ २१-२२ ॥

न त्वानन्तं परित्यक्ष्ये भर्त्सितापि त्वयानघ ।
नाहं त्वया विना लोकानुत्सहे देव सेवितुम् ॥ २३ ॥
आदिपद्मं च पद्माङ्कं दिव्यं श्रवणभूषणम् ।
कौशेयानि च नीलानि समुद्रार्हाणि विभ्रती ॥ २४ ॥

'अनघ ! आप मुझे डाँट बताये, तो भी मैं आप अनन्त- का परित्याग नहीं करूँगी। देव ! मैं समुद्रमें रहनेवालीके योग्य नीले रंगकी रेशमी साड़ी पहनकर आदिपद्म तथा पद्मचिह्नित दिव्य कर्णभूषण धारण कर आपकी सेवामें आयी हूँ। आपके बिना मैं दूसरे किन्हीं लोकोंका सेवन करना नहीं चाहती' २३-२४

मदिरानन्तरं कान्तिः संकर्षणमुपस्थिता ।
मदेनागलितश्रोणी किंचिदाघूर्णितेक्षणा ॥ २५ ॥
प्रोवाच प्रणयात् कान्तिर्बद्धाञ्जलिपुटा सती।
जयपूर्वेण योगेन सस्मितं वाक्यमर्थवत् ॥ २६॥

वारुणीके बाद कान्तिदेवी संकर्षणकी सेवामें उपस्थित हुई। उसका कटिप्रदेश मदमें कुछ कम्पित हो रहा था। आँखें भी कुछ घूम रही थीं। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा- 'जय हो बलरामजीकी !' फिर प्रेमसे मुसकराती हुई वह प्रयोजनयुक्त वचन बोली-॥ २५-२६ ॥

अहं चन्द्रादपि गुरुं सहस्रशिरसं प्रभुम् ।
स्वैर्गुणैरनुरक्ता त्वां यथैव मदिरा तथा ॥ २७ ॥

'प्रभो ! आपके सहस्रों मस्तक हैं। आप जगत्के स्वामी हैं। मेरी दृष्टिमें आपका गौरव चन्द्रमासे भी अधिक है। मैं भी वारुणीकी भाँति आपके निजी गुणोंसे आकृष्ट हो आपमें अनुरक्त हो गयी हूँ (इसीलिये आपकी सेवामें उपस्थित हूँ। आप मुझे अङ्गीकार करें ।)' ॥ २७ ॥

श्रीश्च पद्मालया देवी निधेया वैष्णवोरसि ।
रौहिणेयोरसि शुभा मालेवामलतां गता ॥ २८ ॥
सा मालाममलां गृह्य वलस्योरसि दंशिता।
पद्मास्या पद्महस्ता वै संकर्षणमथाब्रवीत् ॥ २९ ॥

जो भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें नित्य निवास करने योग्य हैं, वे कमलभवनमें वास करनेवाली देवी श्री* (शोभा) रोहिणीनन्दन बलरामके वक्षःस्थलमे सुन्दर मालाकी भाँति प्रतिष्ठित हो निर्मल भावको प्राप्त हुईं। उनका मुख कमलके समान सुशोभित था, उनके हाथमे भी कमल-पुष्प शोभा दे रहा था; वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हुई वे मूर्तिमती शोभा देवी बलरामके वक्षमें स्थित हो एक निर्मल माला हाथमें लेकर संकर्षणसे बोलीं-॥ २८-२९ ॥

राम रामाभिरामस्त्वं वारुण्या समलंकृतः ।
कान्त्या मया च देवेश संगतश्चन्द्रमा यथा ॥ ३० ॥

'देवेश्वर राम ! बलराम ! आप बड़े ही अभिराम (सुन्दर) हैं। वारुणी (सुधा) से, चन्द्रमाकी-सी कान्तिसे तथा मुझसे (कमलालयाकी-सी शोभासे) सम्पन्न होकर चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ३० ॥

इयं च सा मया मौलिः प्रोद्धता वरुणालयात् ।
मूर्ध्नि शीर्षसहस्रस्य या ते भानुरिवाप्रभौ ॥ ३१ ॥

'आप सहस्र सिरवाले अनन्तदेवके मस्तकपर जो सूर्यके समान उद्भासित होता था, वह मुकुट समुद्रसे निकालकर मैं यहाँ ले आयी हूँ। यही है वह मुकुट ॥ ३१ ॥


* यहाँ श्रीका अर्थ शोभाकी अधिष्ठात्री देवी है। साक्षात् भगवती लक्ष्मी तो भगवान् विष्णुकी अनन्यानुरागिणी पतिव्रता पत्नी हैं। यहाँ मधु, कान्ति और शोभा - इन तीन लोकसामान्य वस्तुओं- की अधिष्ठात्री देवियोंका ही उल्लेख किया गया है- ऐसा समझना चाहिये।