विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः ३६७
जातरूपमयं चैकं कुण्डलं वज्रभूषितम् । आदिपद्मं च पद्माक्षं दिव्यश्रवणभूषणम् ॥ ३२ ॥
'इसके सिवा वज्रमणि (हीरे) से विभूषित एक सुवर्णमय कुण्डल भी लेती आयी हूँ, जो आपके एक कानका दिव्य भूषण है। यह आदिपद्म और पद्माक्ष कहलाता है ॥ ३२ ॥
कौशेयानि च नीलानि समुद्रार्हाणि भावतः । हारं च पीनतरलं समुद्राभ्यन्तरोपितम् ॥ ३३ ॥
'जो समुद्रमें ही मिल सकते हैं, ऐसे कितने ही नीले रंगके रेशमी वस्त्र (अथवा आपकी इच्छाके अनुरूप नील कौशेय वस्त्र) तथा यह पीन तरल हार, जो समुद्रमे ही विद्यमान था, मैं आपके लिये लायी हूँ । आप इसे सादर ग्रहण करें ॥ ३३ ॥
देवेमां प्रतिगृह्णीष्व पौराणीं भूषणक्रियाम् । समयस्ते महाबाहो भूषणानामलंकिया ॥ ३४ ॥
'देव ! यह सब आपकी पुरातन भूषण-सामग्री है। इसे ग्रहण कीजिये। महाबाहो ! यह आपके भूषण ग्रहण करनेका समय है। आपसे ही इन भूषणोंकी शोभा है, इनसे आपकी नहीं'॥
संगृह्य तमलंकारं ताश्च तिस्रः सुरस्त्रियः । शुशुभे बलदेवो हि शारदेन्दुसमप्रभः ॥ ३५ ॥
वह अलङ्कार तथा उन तीनों देवाङ्गनाओंको ग्रहण करके बलदेवजी शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगे ॥
स समागम्य कृष्णेन जलजाम्भोदवर्चसा । मुदं परमिकां लेभे ग्रहयुक्तः शशी यथा ॥ ३६ ॥
तदनन्तर वे नीलकमल और मेघके समान श्याम कान्तिवाले श्रीकृष्णके साथ मिलकर ग्रहयुक्त चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगे । उस समय उनको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ ३६ ॥
ताभ्यामुभाभ्यां संलापे वर्तमाने गृहे यथा । वैनतेयस्ततोऽध्वानमतिचक्राम वेगतः ॥ ३७ ॥
वे दोनों भाई जैसे घरमे बैठे हो, उस प्रकार बातचीत करने लगे । इसी समय विनतानन्दन गरुड बड़े वेगसे विशाल मार्ग तै करके वहाँ आये ॥ ३७ ॥
संग्राममुक्तस्तेजस्वी दैत्यप्रहरणाङ्कितः । देवतानां जयश्लाघी दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ ३८ ॥
तेजस्वी गरुड़ उस समय एक संग्रामसे छूटकर आये थे। दैत्योंके प्रहारोंके चिह्न उस समय भी उनके अङ्गोंमें अङ्कित थे। वे देवताओंकी विजय चाहनेवाले तथा दिव्य पुष्पोंकी माला और दिव्य चन्दन धारण करनेवाले थे ॥ ३८ ॥
सुप्तस्य शयने दिव्ये क्षीरोदे वरुणालये । विष्णोः किरीटं दैत्येन हृतं वैरोचनेन वै ॥ ३९ ॥
वरुणके निवासभूत क्षीरसमुद्रमे जब भगवान् विष्णु दिव्य शय्यापर सो रहे थे, उस समय विरोचनके पुत्र एक दैत्यने उनका किरीट चुरा लिया ॥ ३९ ॥
तदर्थस्तेन संग्रामः कृतो गुर्वर्थमोजसा । किरीटार्थे समुद्रस्य मध्ये दैत्यगणैः सह ॥ ४० ॥
अपने गुरुरूप भगवान्के लिये उस किरीटको वापस लानेके उद्देश्यसे गरुड़ने बीच समुद्रमे दैत्योंके साथ बलपूर्वक संग्राम किया ॥ ४० ॥
मोक्षयित्वा किरीतं तु वैष्णवं पततां वरः । व्यत्यक्रमत वेगेन गगनं देवतालयम् ॥ ४१ ॥
भगवान् विष्णुके उस किरीटको दैत्योंके हाथसे छुड़ाकर पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ बड़े वेगसे देवताओंके निवासभूत आकाशमे उड़ चले ॥ ४१ ॥
स ददर्श गुरुं शैले विष्णुं कार्यान्तरमागतम् । तेन क्रीडावलम्बेन किरीटेन विराजता ॥ ४२ ॥
उन्होंने देखा, मेरे स्वामी विष्णु दूसरे कार्यसे इस पर्वतपर पधारे हैं। वे उस समय उस प्रकाशमान किरीटको क्रीडापूर्वक अपनी चोंचमे लटकाये चल रहे थे ॥ ४२ ॥
स दृष्ट्वा मानुषं विष्णुं शैलराजशिरोगतम् । प्रकाशचेष्टानिर्मुक्तं विमौलिमिव मानुषम् ॥ ४३ ॥ अभिज्ञस्तस्य भावानां गरुत्मान् पततां वरः । विक्षेप खं गतो मौलिं विष्णोः शिरसि हृष्टवत् ॥ ४४ ॥
गिरिराज गोमन्तके शिखरपर विराजमान मानवरूपधारी विष्णुको प्रकाश और चेष्टाओसे रहित तथा मुकुटहीन देख उनके मानसिक भावोंको समझनेवाले पक्षियोमे श्रेष्ठ गरुड़ने आकाशमे स्थित होकर बड़े हर्षके साथ उन श्रीविष्णुके सिरपर वह मुकुट डाल दिया ॥ ४३-४४ ॥
उपेन्द्रमूर्ध्नि सा मौलिरपिनद्धा इवापतत् । शिरसः स्थाननियुक्ता कृष्णं चैवान्वशोभयत् । यथैव मेरुशिखरे भानुर्मध्यंदिने यथा ॥ ४५ ॥
वह मुकुट श्रीकृष्णके मस्तकपर गिरा और इस प्रकार बैठ गया मानो किसीने पहना दिया हो। मस्तकके स्थानपर निश्चित रूपसे आबद्ध होकर उस मुकुटने भगवान् श्रीकृष्णकी शोभा बढ़ा दी। जैसे दोपहरके समय मेरुके शिखरपर सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार वह मुकुट भी देदीप्यमान हो रहा था ॥ ४५ ॥
वैनतेयप्रयोगेण विदित्वा मौलिमागताम् । कृष्णः प्रहृष्टवदनो रामं वचनमब्रवीत् ॥ ४६ ॥
गरुड़के प्रयोगसे मुकुटको मस्तकपर आया हुआ जान श्रीकृष्णका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और वे बलरामजीसे इस प्रकार बोले—॥ ४६ ॥
त्वरते खलु कार्यार्थी देवतानां न संशयः । यथेयमावयोः शैले संग्रामरचना कृता ॥ ४७ ॥