विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
विष्णुपर्व ] एकचत्वारिंशोऽध्यायः ३६७
जातरूपमयं चैकं कुण्डलं वज्रभूषितम् । आदिपद्मं च पद्माक्षं दिव्यश्रवणभूषणम् ॥ ३२ ॥
'इसके सिवा वज्रमणि (हीरे) से विभूषित एक सुवर्णमय कुण्डल भी लेती आयी हूँ, जो आपके एक कानका दिव्य भूषण है। यह आदिपद्म और पद्माक्ष कहलाता है ॥ ३२ ॥
कौशेयानि च नीलानि समुद्रार्हाणि भावतः । हारं च पीनतरलं समुद्राभ्यन्तरोपितम् ॥ ३३ ॥
'जो समुद्रमें ही मिल सकते हैं, ऐसे कितने ही नीले रंगके रेशमी वस्त्र (अथवा आपकी इच्छाके अनुरूप नील कौशेय वस्त्र) तथा यह पीन तरल हार, जो समुद्रमे ही विद्यमान था, मैं आपके लिये लायी हूँ । आप इसे सादर ग्रहण करें ॥ ३३ ॥
देवेमां प्रतिगृह्णीष्व पौराणीं भूषणक्रियाम् । समयस्ते महाबाहो भूषणानामलंकिया ॥ ३४ ॥
'देव ! यह सब आपकी पुरातन भूषण-सामग्री है। इसे ग्रहण कीजिये। महाबाहो ! यह आपके भूषण ग्रहण करनेका समय है। आपसे ही इन भूषणोंकी शोभा है, इनसे आपकी नहीं'॥
संगृह्य तमलंकारं ताश्च तिस्रः सुरस्त्रियः । शुशुभे बलदेवो हि शारदेन्दुसमप्रभः ॥ ३५ ॥
वह अलङ्कार तथा उन तीनों देवाङ्गनाओंको ग्रहण करके बलदेवजी शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगे ॥
स समागम्य कृष्णेन जलजाम्भोदवर्चसा । मुदं परमिकां लेभे ग्रहयुक्तः शशी यथा ॥ ३६ ॥
तदनन्तर वे नीलकमल और मेघके समान श्याम कान्तिवाले श्रीकृष्णके साथ मिलकर ग्रहयुक्त चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगे । उस समय उनको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ ३६ ॥
ताभ्यामुभाभ्यां संलापे वर्तमाने गृहे यथा । वैनतेयस्ततोऽध्वानमतिचक्राम वेगतः ॥ ३७ ॥
वे दोनों भाई जैसे घरमे बैठे हो, उस प्रकार बातचीत करने लगे । इसी समय विनतानन्दन गरुड बड़े वेगसे विशाल मार्ग तै करके वहाँ आये ॥ ३७ ॥
संग्राममुक्तस्तेजस्वी दैत्यप्रहरणाङ्कितः । देवतानां जयश्लाघी दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ ३८ ॥
तेजस्वी गरुड़ उस समय एक संग्रामसे छूटकर आये थे। दैत्योंके प्रहारोंके चिह्न उस समय भी उनके अङ्गोंमें अङ्कित थे। वे देवताओंकी विजय चाहनेवाले तथा दिव्य पुष्पोंकी माला और दिव्य चन्दन धारण करनेवाले थे ॥ ३८ ॥
सुप्तस्य शयने दिव्ये क्षीरोदे वरुणालये । विष्णोः किरीटं दैत्येन हृतं वैरोचनेन वै ॥ ३९ ॥
वरुणके निवासभूत क्षीरसमुद्रमे जब भगवान् विष्णु दिव्य शय्यापर सो रहे थे, उस समय विरोचनके पुत्र एक दैत्यने उनका किरीट चुरा लिया ॥ ३९ ॥
तदर्थस्तेन संग्रामः कृतो गुर्वर्थमोजसा । किरीटार्थे समुद्रस्य मध्ये दैत्यगणैः सह ॥ ४० ॥
अपने गुरुरूप भगवान्के लिये उस किरीटको वापस लानेके उद्देश्यसे गरुड़ने बीच समुद्रमे दैत्योंके साथ बलपूर्वक संग्राम किया ॥ ४० ॥
मोक्षयित्वा किरीतं तु वैष्णवं पततां वरः । व्यत्यक्रमत वेगेन गगनं देवतालयम् ॥ ४१ ॥
भगवान् विष्णुके उस किरीटको दैत्योंके हाथसे छुड़ाकर पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ बड़े वेगसे देवताओंके निवासभूत आकाशमे उड़ चले ॥ ४१ ॥
स ददर्श गुरुं शैले विष्णुं कार्यान्तरमागतम् । तेन क्रीडावलम्बेन किरीटेन विराजता ॥ ४२ ॥
उन्होंने देखा, मेरे स्वामी विष्णु दूसरे कार्यसे इस पर्वतपर पधारे हैं। वे उस समय उस प्रकाशमान किरीटको क्रीडापूर्वक अपनी चोंचमे लटकाये चल रहे थे ॥ ४२ ॥
स दृष्ट्वा मानुषं विष्णुं शैलराजशिरोगतम् । प्रकाशचेष्टानिर्मुक्तं विमौलिमिव मानुषम् ॥ ४३ ॥ अभिज्ञस्तस्य भावानां गरुत्मान् पततां वरः । विक्षेप खं गतो मौलिं विष्णोः शिरसि हृष्टवत् ॥ ४४ ॥
गिरिराज गोमन्तके शिखरपर विराजमान मानवरूपधारी विष्णुको प्रकाश और चेष्टाओसे रहित तथा मुकुटहीन देख उनके मानसिक भावोंको समझनेवाले पक्षियोमे श्रेष्ठ गरुड़ने आकाशमे स्थित होकर बड़े हर्षके साथ उन श्रीविष्णुके सिरपर वह मुकुट डाल दिया ॥ ४३-४४ ॥
उपेन्द्रमूर्ध्नि सा मौलिरपिनद्धा इवापतत् । शिरसः स्थाननियुक्ता कृष्णं चैवान्वशोभयत् । यथैव मेरुशिखरे भानुर्मध्यंदिने यथा ॥ ४५ ॥
वह मुकुट श्रीकृष्णके मस्तकपर गिरा और इस प्रकार बैठ गया मानो किसीने पहना दिया हो। मस्तकके स्थानपर निश्चित रूपसे आबद्ध होकर उस मुकुटने भगवान् श्रीकृष्णकी शोभा बढ़ा दी। जैसे दोपहरके समय मेरुके शिखरपर सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार वह मुकुट भी देदीप्यमान हो रहा था ॥ ४५ ॥
वैनतेयप्रयोगेण विदित्वा मौलिमागताम् । कृष्णः प्रहृष्टवदनो रामं वचनमब्रवीत् ॥ ४६ ॥
गरुड़के प्रयोगसे मुकुटको मस्तकपर आया हुआ जान श्रीकृष्णका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और वे बलरामजीसे इस प्रकार बोले—॥ ४६ ॥
त्वरते खलु कार्यार्थी देवतानां न संशयः । यथेयमावयोः शैले संग्रामरचना कृता ॥ ४७ ॥
३६८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
‘भैया ! इस पर्वतपर हम दोनोंके लिये जिस प्रकार युद्धोपयोगी वेष-भूषाकी रचना कर दी गयी है, इससे यही अनुमान होता है कि देवताओंका कार्य एवं प्रयोजन शीघ्र ही सिद्ध होना चाहता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४७ ॥
वैरोचनेन सुप्तस्य मम मौलिर्महोदधौ ।
शक्रस्य सदृशं रूपं दिव्यमास्थाय सागरात् ॥ ४८ ॥
ग्राहरूपेण यो नीत आनीतोऽसौ गरुत्मता ।
ममादिशयनान्मौलिर्हृत्वा क्षिप्तो गरुत्मता ॥ ४९ ॥
‘जब मैं महासागरमें सो रहा था, उस समय विरोचनका पुत्र इन्द्रका-सा रूप धारण करके वहाँ चला गया और जब मैं शेष-शय्यासे उठकर यहाँ आ गया, तब वह ग्राहरूप धारण करके वहाँसे मेरा मुकुट उठा लाया। वही मुकुट गरुड़ उससे छीन लाये हैं और उन्होंने इसे मेरे मस्तकपर रख दिया है॥
सुव्यक्तं संनिकृष्टः स जरासंधो नराधिपः ।
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां वातरंहसाम् ॥ ५० ॥
‘निश्चय ही राजा जरासंध अब बहुत निकट आ गया है; क्योंकि वायुके समान वेगवाले रथोंकी ध्वजाओंके अग्रभाग दिखायी दे रहे हैं ॥ ५० ॥
एतानि विजिगीषूणां शशिकल्पानि भूपृताम् ।
छत्राण्यार्य विराजन्ते दंशितानि मितानि च ॥ ५१ ॥
‘आर्य ! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजाओंके ये चन्द्रमा-जैसे श्वेत कान्तिवाले सुसज्जित छत्र प्रकाशित हो रहे हैं; इनकी संख्या परिमित ही है ॥ ५१ ॥
अहो नृपरथोद्गता विमलाश्छत्रपङ्क्तयः ।
अभिवर्तन्ति नः शुभ्रा यथा खे हंसपङ्क्तयः ॥ ५२ ॥
‘अहो ! राजाओंके रथोंपर विराजमान जो ये श्वेत वर्णवाली ऊँची छत्र-पङ्क्तियाँ हमलोगोंकी ओर बढ़ी आ रही हैं, ये आकाशमें उज्ज्वल हंसपङ्क्तियोंके समान सुशोभित होती हैं ॥ ५२ ॥
अहो द्यौर्विमलाभानां शस्त्राणां विमलानना ।
प्रभा भास्करभामिश्रा चरन्तीव दिशो दश ॥ ५३ ॥
‘अहो ! इन निर्मल प्रभाववाले शस्त्रोंकी चमकसे आकाशका मुख भी उज्ज्वल एवं प्रकाशित हो उठा है । शस्त्रोंकी ये दीप्तियाँ सूर्यदेवकी किरणोंसे मिलकर दसों दिशाओंमें विचरती-सी प्रतीत होती हैं ॥ ५३ ॥
एतानि नूनं समरे पार्थिवैरायुधानि च ।
क्षिप्तानि विनशिष्यन्ति मयि सर्वाणि संयुगे ॥ ५४ ॥
‘निश्चय ही, समराङ्गणमें भूमिपालोंद्वारा मुझपर चलाये गये ये समस्त अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो जायेंगे ॥ ५४ ॥
काले खलु नृपः प्राप्तो जरासंधो महीपतिः ।
आवयोर्युद्धनिकषः प्रथमः समरातिथिः ॥ ५५ ॥
‘राजा जरासंध ठीक समयपर आया है। यह हमलोगोंके युद्ध-कौशलकी कसौटी है तथा समराङ्गणका पहला अतिथि है॥
आर्य तिष्ठाव सहितौ न खल्वानागते नृपे ।
युद्धारम्भः प्रयोक्तव्यो बलं तावद् विमृश्यताम् ॥ ५६ ॥
‘आर्य ! हम दोनों साथ रहें। राजा जरासंधके आनेसे पहले अभी हमें युद्ध आरम्भ नहीं करना चाहिये। जबतक वह नहीं आता है, तबतक हम उसके बलका विचार कर लें'॥
एवमुक्त्वा ततः कृष्णः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
जरासंधवधं प्रेप्सुश्चकार बलदर्शनम् ॥ ५७ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्ण स्वस्थभावसे संग्रामकी इच्छा रख-कर जरासंधका वध चाहते हुए उसके सैनिक-बलका निरीक्षण करने लगे ॥ ५७ ॥
वीक्षमाणश्च तान् सर्वान् नृपान् यदुवरोऽव्ययः ।
आत्मानमात्मनोवाच यत्पूर्वं दिवि मन्त्रितम् ॥ ५८ ॥
इमे ते पृथिवीपालाः पार्थिवे वर्त्मनि स्थिताः ।
ये विनाशं गमिष्यन्ति शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ५९ ॥
उन सब राजाओंका निरीक्षण करते हुए अविनाशी यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही अपने-आपसे कहने लगे—‘अहो ! दिव्यलोकमें देवताओंके साथ बैठकर जो गुप्त मन्त्रणा की गयी थी, उसके अनुसार ये भूमिपाल राजोचित मार्गपर स्थित हैं। ये शास्त्रोक्त विधिसे संग्राममे विनाशको प्राप्त होंगे ॥ ५८-५९ ॥
प्रोक्षितान् सत्विमान् मन्ये मृत्युना नृपसत्तमान् ।
स्वर्गगामीनि चाप्येषां वपूंषि प्रचकाशिरे ॥ ६० ॥
‘मैं तो समझता हूँ कि मृत्युने रणयज्ञमें आहुति देनेके लिये इन श्रेष्ठ राजाओंका प्रोक्षण कर लिया है। इनके स्वर्गगामी शरीर अभीसे प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ६० ॥
स्थाने भारपरिश्रान्ता वसुधेयं दिवं गता ।
एषां नृपतिसिंहानां बलौघैरभिपीडिता ॥ ६१ ॥
‘यह पृथ्वी इन राजसिंहोंके सैन्यसमूहोंसे पीड़ित हो इनके भारसे थककर जो देवलोकमें गयी थी, वह इसका जाना उचित ही था ॥ ६१ ॥
अल्पेन खलु कालेन विविक्तं पृथिवीतलम् ।
भविष्यति नरेन्द्रौघैराकीर्णं च नभस्तलम् ॥ ६२ ॥
‘अब थोड़े ही समयमें यह भूमण्डल इन राजसमूहोंसे खाली हो जायगा और आकाश भर जायगा’ ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि जरासंधाभिगमनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधका अभियानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥४१॥
[ विष्णुपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ३६९
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसका सेनाको पर्वतपर आक्रमण करनेकी आज्ञा देना, शिशुपालकी सम्मतिसे गोमन्तपर्वतमें आग लगाया जाना, पर्वतका जलना तथा बलराम और श्रीकृष्णका पर्वतसे कूदकर राजाओंकी सेनामें आ पहुँचना—
वैशम्पायन उवाच
जरासंधस्ततः प्राप्तो नृपः सर्वमहीक्षिताम् ।
नराधिपैर्बलयुक्तैरनुयातो महाद्युतिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर समस्त राजाओंका राजा महातेजस्वी जरासंध वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे अपनी-अपनी सेनाओंके साथ दूसरे भी बहुत-से नरेश थे ॥ १ ॥
व्यायतोद्यततुरगैर्धिष्ण्यप्रार्थसमाहितैः ।
रथैः साङ्ग्रामिकैर्युक्तैरसङ्गतगतिभिः क्वचित् ॥ २ ॥
कहीं अस्त्र-शस्त्रके ज्ञाता पुरुषोंद्वारा भलीभाँति सिखाये गये विशाल एवं प्रचण्ड बलशाली अश्वोंसे युक्त रथ युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर आगे बढ़ रहे थे। उन रथोंकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी ॥ २ ॥
हेमकक्षैर्महाघण्टैर्वारणैर्वारिदोपमैः ।
महामात्रोत्तमैरारूढैः कल्पितै रणगर्वितैः ॥ ३ ॥
कहीं बहुसंख्यक हाथी चल रहे थे, जिन्हें सोनेकी जंजीरोंसे कसा गया था। उनके दोनों पार्श्वमे बड़े-बड़े घंटे लटक रहे थे। वे सभी हाथी मेघोंकी घटाके समान जान पड़ते थे। उनके ऊपर अच्छे महावत बैठे थे तथा रणगर्वित कुशल योद्धाओं-द्वारा उन्हें सुसज्जित किया गया था ॥ ३ ॥
खारूढैः सादिभिर्युक्तैः प्रेङ्खमाणैः प्रवल्गितैः ।
वाजिभिर्वायुसङ्काशैः प्लवद्भिरिव पत्रिभिः ॥ ४ ॥
कहीं घुड़सवार योद्धा घोड़ोंपर अच्छी तरहसे सवार थे। उनके वे घोड़े वायुके समान वेगशाली थे और उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते समय आकाशमे उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥
खड्गचर्मवलोद्नग्नैः पत्तिभिर्बलिनां वरैः ।
सहस्रसंख्यैर्निर्मुक्तैरुत्पतद्भिरिवोरगैः ॥ ५ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ पैदल सैनिक भी ढाल और तलवार लिये प्रचण्डरूप धारण करके आगे बढ़ते थे। वे हजार-हजार-की टोलियोंमे एक साथ चलते और केंचुलसे छुटे हुए सर्पोंके समान उछलते थे ॥ ५ ॥
एवं चतुर्विधैः सैन्यैः प्रचलद्भिरिवाम्बुदैः ।
नृपोऽभियातो बलवाञ्जरासंधो धृतव्रतः ॥ ६ ॥
इस प्रकार मँडराते हुए बादलोंके समान चतुरङ्गिणी सेनाएँ साथ लेकर वीर-व्रतको धारण करनेवाला बलवान् राजा जरासंध युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ ६ ॥
स रथैर्नेमिघोषैश्च गजैश्च मदसंयुतैः ।
हेषद्भिश्चापि तुरगैः क्ष्वेडितोग्रैश्च पत्तिभिः ॥ ७ ॥
संनादयन् दिशः सर्वाः सर्वांश्चापि गुहाशयान् ।
स राजा सागराकारः ससैन्यः प्रत्यदृश्यत ॥ ८ ॥
वह राजा पहियोंके घर्घर घोषसे युक्त रथों, (चिग्घाड़ते हुए) मतवाले हाथियों, हिनहिनाते हुए घोड़ो तथा गर्जते हुए पैदल सैनिकोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं एवं समस्त पर्वताय कन्दराओंको प्रतिध्वनित करता हुआ, सेनाके साथ समुद्रके समान दिखायी देता था ॥ ७-८ ॥
तद्द्बलं पृथिवीशानां हृष्टयोधजनाकुलम् ।
क्ष्वेडितास्फोटितरवं मेघसैन्यमिवाबभौ ॥ ९ ॥
भूमिपालोंकी वह सेना हृष्टपुष्ट योद्धाओंसे परिपूर्ण थी। गर्जने और ताल ठोंकनेकी गम्भीर ध्वनिसे वह गर्जती हुई मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होती थी ॥ ९ ॥
रथैः पवनसंपातैर्गजैश्च जलदोपमैः ।
तुरगैश्च सिताभ्राभैः पत्तिभिश्चापि दंशितैः ॥ १० ॥
व्यामिश्रं तद्बलं भाति मत्तद्विपसमाकुलम् ।
घर्मान्ते सागरगतं यथाभ्रपटलं तथा ॥ ११ ॥
वायुके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले रथों, काले मेघोंके समान प्रतीत होनेवाले हाथियों, श्वेत बादलोंके समान घोड़ों तथा कवच आदिसे सुसज्जित पैदल योद्धाओसे मिश्रित हुई वह सेना सब ओरसे सुशोभित हो रही थी। मतवाले हाथियोंसे व्याप्त हुई वह विशाल वाहिनी वर्षाऋतुमें समुद्रके भीतर लक्षित होनेवाले मेघोंके समूहकी शोभा धारण करती थी ॥ १०-११ ॥
सबलास्ते महीपाला जरासंधपुरोगमाः ।
परिवार्य गिरिं सर्वे निवेशायोपचक्रमुः ॥ १२ ॥
जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनाके साथ उस पर्वतको चारों ओरसे घेरकर छावनी डालनेकी तैयारी करने लगे ॥ १२ ॥
बभौ तस्य निविष्टस्य बलश्रीः शिविरस्य वै ।
शुक्ले पर्वणि पूर्णस्य यथा रूपं महोदधेः ॥ १३ ॥
वहाँ डेरा डाले हुए जरासंधके सैनिकशिविरकी शोभा वैसी ही प्रतीत होती थी, जैसा कि शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको
| ३७० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशो |
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अपनी उत्ताल तरंगोंसे परिपूर्ण हुए महासागरका रूप देखनेमें आता है॥ १३॥
वीतरात्रे ततः काले नृपास्ते कृतकौतुकाः।
आरोहणार्थं शैलस्य समेता युद्धलालसाः॥ १४॥
तदनन्तर रात बीतनेपर सब राजा उठे और मंगलाचारमें सम्पन्न हो युद्धकी लालसासे गोमन्तपर्वतपर चढ़नेके लिये एकत्र होने लगे॥ १४॥
समवायीकृताः सर्वे गिरिम्रस्थेषु ते नृपाः।
निविष्टा मन्त्रयामासुर्युद्धकालकुतूहलाः॥ १५॥
पर्वतके शिखरोपर एकत्र हो वे सभी राजा बैठे और युद्धके शुभ अवसरके लिये उत्सुक हो आपसमें मन्त्रणा करने लगे॥ १५॥
एषां तु तुमुलः शब्दः शुश्रुवे पृथिवीक्षिताम्।
युगान्ते भिद्यमानानां सागराणां यथा स्वनः॥ १६॥
सेनासहित इन नरेशोंकी तुमुल ध्वनि प्रलयकालमें मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रोंकी भयंकर गर्जनाके समान सुनायी देती थी॥ १६॥
तेषां सकञ्चुकोष्णीषाः स्थविरा वेत्रपाणयः।
चेरुर्मा शब्द इत्येवं ब्रुवन्तो राजशासनात्॥ १७॥
'उन राजाओंके छड़ीदार वृद्ध सिपाही चोगा और पगड़ी धारण किये तथा हाथमें बेंत लिये राजाज्ञासे यह कहते हुए विचरने लगे कि सब लोग मौन रहें। कोई एक शब्द भी न बोले॥ १७॥
तस्य रूपं बलस्यासीन्निःशब्दस्तिमितस्य वै।
लीनमीनभुजङ्गस्य निःशब्दस्य पयोदधेः॥ १८॥
उस समय नीरव और निश्चल हुए उस सैन्यसमूहका रूप उस शब्दहीन प्रशान्त महासागरके समान प्रतीत होता था, जिसके मत्स्य और भुजङ्ग जलके भीतर विलीन हो गये हों॥ १८॥
तस्मिन् स्तिमितनिशब्दे योगादिव महार्णवे।
जरासन्धो बृहद्वाक्यं बृहस्पतिरिवाददे॥ १९॥
वह सैन्यसागर मानो योगबलसे जन सहसा नीरव तथा निश्चल हो गया, तब बृहस्पतिके समान नीतिज्ञ जरासंधने यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ १९॥
शीघ्रं समभिवर्तन्तां बलानीह महीक्षिताम्।
सर्वतः पर्वतश्चायं बलौघैः परिवार्यताम्॥ २०॥
'राजाओंकी सेनाएँ शीघ्र ही आक्रमण करें और सब ओरसे सैनिकसमूह इस पर्वतको घेर लें॥ २०॥
अश्मयन्त्राणि युज्यन्तां क्षेपणीयाश्च मुद्गराः।
ऊर्ध्वं चापिप्रवाद्यान्तां प्रासा वै तोमराणि च॥ २१॥
'पत्थरोंके गोले बरसानेवाले यन्त्र लगा दिये जायें। क्षेपणीय (गोफना या ढेलवाँस) तथा मुद्गर सँभाल लिये जायें। प्रास और तोमर भी ऊपर कर लिये जायें॥ २१॥
ऊर्ध्वं प्रक्षेपणार्याय दृढानि च लघूनि च।
शस्त्रपातविघातानि क्रियन्तामाशु शिल्पिभिः॥ २२॥
'शत्रुओंके शस्त्रप्रहारको नष्ट करनेमें समर्थ सुदृढ़ और हल्के गोलोंको ऊपर फेंकनेके लिये हमारे शिल्पी शीघ्र तैयार करें॥ २२॥
शूराणां युद्ध्यमानानां प्रमत्तानां परस्परम्।
यथा नरपतिः प्राह तथा शीघ्रं विधीयताम्॥ २३॥
'परस्पर प्रमत्त होकर युद्ध करनेवाले शूरवीरोंके लिये जैसा राजा शिशुपाल कहे, शीघ्र वैसा ही प्रबन्ध किया जाय॥
दार्यतामेष टङ्कौघैः खनित्रैश्च नगोत्तमः।
नृपाश्च युद्धमार्गज्ञा विम्यस्यन्तामदूरतः॥ २४॥
'उस उत्तम पर्वतको टंकसमूहों और खनित्रोंसे खोदकर विदीर्ण कर डाला जाय। युद्धकी प्रणालीके जानकार नरेशोंको इसके समीप ही यथास्थान खड़ा किया जाय॥ २४॥
अद्यप्रभृति सैन्यैर्मे गिरिरोधः प्रवर्त्यताम्।
यावदेतौ पातयामो वसुदेवसुतावुभौ॥ २५॥
'आजसे मेरे सैनिक इस पर्वतपर घेरा डाल दें और इसे तबतक चालू रखें, जबतक कि हम इन दोनों वसुदेवपुत्रोंको मार न डालें॥ २५॥
अचलोऽयं शिलायोनिः क्रियतां निश्चलाण्डजः।
आकाशमपि वाणौघैर्निःसम्पातं विधीयताम्॥ २६॥
'शिलाओंसे ही उत्पन्न हुआ (अथवा शिलाओंका उत्पादक) यह पर्वत स्वयं तो अचल है ही, इसपर रहनेवाले पक्षियोंको भी सायकोंद्वारा अचल (हिलने-डुलने या उड़नेमें असमर्थ) कर दिया जाय। आकाशको भी वाणसमूहोंसे इस तरह रूँध दिया जाय कि उसमें पक्षी भी उड़ न सकें॥ २६॥
मयानुशिष्टास्तिष्ठन्तु गिरिभूमिषु भूमिपाः।
तेषु तेष्ववकाशेषु शीघ्रमारुह्यतां गिरिः॥ २७॥
'मेरी आज्ञा मानकर समस्त भूपाल पर्वतीय स्थानोंमें खड़े रहें और जहाँ-जहाँ अवकाश मिल जाय, वहाँ-वहाँसे शीघ्र ही पर्वतपर चढ़ जायें॥ २७॥
मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्लिकः।
काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा॥ २८॥
द्रुमः किंपुरुषश्चैव पर्वतीयाश्च मानवाः।
पर्वतस्यापरं पार्श्वं क्षिप्रमारोहयन्त्वमी॥ २९॥
'मद्रराज शल्य, कलिङ्गराज श्रुतायु, चेकितान, बाह्लिक, काश्मीरराज गोनर्द, करूषराज दन्तवक्त्र, किन्नरराज द्रुम तथा
विष्णुपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ३७१
पर्वतीय प्रदेशके योद्धा—ये सब लोग इस पर्वतके पश्चिम भागपर शीघ्र ही चढ़ाई कर दें ॥ २८-२९ ॥
पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमकतथा ।
रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः ॥ ३० ॥
पाञ्चालाधिपतिश्चैव द्रुपदश्च नराधिपः ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥ ३१ ॥
छागलिः पुरुमित्रश्च विराटश्च महीपतिः ।
कौशाम्ब्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः ॥ ३२॥
भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च वाणः पञ्चनदस्तथा ।
उत्तरं पर्वतोद्देशमेते दुर्गसहा नृपाः ।
आरोहन्तु विमर्द्दन्तो वज्रप्रतिमगौरवाः ॥ ३३ ॥
पूरुवंशीय वेणुदारि, विदर्भदेशीय सोमक, भोजोंके अधिपति रुक्मी, मालवाके राजा सूर्याक्ष, पाञ्चालदेशके अधिपति राजा द्रुपद, अवन्तिके दोनों राजकुमार विन्द और अनुविन्द, पराक्रमी दन्तवक्त्र, छागलि, पुरुमित्र, राजा विराट, कौशाम्बीनरेश मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, वाण और पञ्चनद-ये दुर्गयुद्धका वेग सह सकनेवाले नरेश शत्रुओंको कुचलते हुए इस पर्वतके उत्तरभागपर चढ़ाई करें, इनका गौरव वज्रके तुल्य है ॥ ३०-३३ ॥
उलूकः कैतवेयश्च वीरश्चांशुमतः सुतः ।
एकलव्यो दृढाश्वश्च क्षत्रधर्मा जयद्रथः ॥ ३४ ॥
उत्तमौजास्तथा शाल्वः कैरलेयश्च कैशिकः ।
वैदिशो वामदेवश्च सुकेतुश्चापि वीर्यवान् ॥ ३५ ॥
पूर्वपर्वतनिव्यूहमतेष्वायतमस्तु नः ।
विदारयन्तो धावन्तो वाता इव बलाहकान् ॥ ३६ ॥
'शकुनिपुत्र उलूक, अंशुमानके पुत्र वीर, एकलव्य, दृढ़ाश्व, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शाल्व, केरलराज कैशिक, विदिशाके राजा वामदेव और पराक्रमी सुकेतु—इन सबके अधीन इस पर्वतका पूर्वभाग सौंप दिया जाय । ये लोग जैसे वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार शत्रुओंको विदीर्ण करते हुए उनपर धावा बोल दें ॥३४-३६॥
अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान् ।
दक्षिणं शैलनिचयं दारयिष्याम दंशितः ॥ ३७ ॥
'मैं दरद तथा पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल कवच आदि-से सुसज्जित होकर इस पर्वतके दक्षिणभागको विदीर्ण कर डालेंगे ॥ ३७ ॥
एवमेष गिरिः क्षिप्रं समन्ताद् वेष्टितो बलैः ।
वज्रप्रपातप्रतिमं प्राप्नोतु तुमुलं भयम् ॥ ३८ ॥
'इस प्रकार हमारी सेनाओंद्वारा चारों ओरसे घिरा हुआ यह पर्वत शीघ्र ही, मानो इसपर वज्रका आघात हो रहा हो, इस तरह घोर भय प्राप्त करे ॥ ३८ ॥
गदिनो वै गदाभिश्च परिघैः परिघायुधाः ।
अपरे विविधैः शस्त्रैर्दारयन्तु नगोत्तमम् ॥ ३९ ॥
'गदाधारी वीर गदाओंसे, परिघ चलानेवाले परिघोंसे तथा अन्य वीर नाना प्रकारके दूसरे अस्त्र-शस्त्रोंसे इस श्रेष्ठ पर्वतके टुकड़े-टुकड़े कर डालें ॥ ३९ ॥
एष भूमिधरोऽद्यैव विषमोज्चशिलान्वितः ।
कार्यो भूमिसमः सर्वो भवद्भिर्वसुधाधिपैः ॥ ४० ॥
'विषम एवं ऊँची शिलाओंसे युक्त इस भूधरको आप सभी भूपाल मिलकर आज ही भूमिके समान समतल कर डालें' ॥ ४० ॥
जरासंधवचः श्रुत्वा पार्थिवा राजशासनात् ।
गोमन्तं वेष्टयामासुः सागराः पृथिवीमिव ॥ ४१ ॥
जरासंधकी बात सुनकर समस्त राजाओंने मगधराजकी आज्ञासे गोमन्तपर्वतको चारों ओरसे घेर लिया, ठीक उसी तरह जैसे समुद्र पृथ्वीको घेरे हुए है ॥ ४१॥
उवाच राजा चेदीनां देवानां मघवानिव ।
किं ते युद्धेन दुर्गेऽस्मिन् गोमन्ते च नगोत्तमे ॥ ४२ ॥
उस समय देवताओंके राजा इन्द्रके समान चेदिवासियोंके अधिपति राजा दमघोषने जरासंधसे कहा—राजन् ! यह पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्त दुर्गम पर्वत है । इसपर युद्ध करनेसे आपको क्या लाभ होगा ॥ ४२ ॥
दुरारोहश्च शिखरे प्रांशुपादपकण्टके ।
काष्ठैस्तृणैश्च बहुभिः परिचार्य समन्ततः ॥ ४३ ॥
अद्यैव दीप्यतां क्षिप्रमलमन्येन कर्मणा ।
'इसके शिखरपर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष और काँटेरे हैं; अतः इसपर चढ़ना बहुत कठिन काम है । मेरी तो राय है, बहुत-से काठ और घासफूस जुटाकर इस पर्वतको चारों ओरसे घेर दिया जाय और अभी इसमें आग लगा दी जाय । इसी कार्यमें शीघ्रता करनी चाहिये । दूसरे किसी प्रयत्नसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है ॥ ४३॥
क्षत्रियाः सुकुमारा हि रणे सायकयोधिनः ॥ ४४ ॥
नियुक्ताः पर्वते दुर्गे नियोक्तुं पादयोधिनः ।
ननाम प्रतिबन्धेन न चावस्कन्दकर्मणा ॥ ४५ ॥
शक्य एष गिरिस्तात देवैरप्यवमर्दितुम् ।
'क्योंकि क्षत्रिय लोग सुकुमार होते है। ये रणभूमिमें बाणोंद्वारा ही युद्ध कर सकते हैं । ( पर्वतपर चढ़ना इनके लिये अत्यन्त कठिन है । ) इस समय इन्हें दुर्गम पर्वतपर चढ़कर वहाँके पैदल योद्धाओंके साथ युद्ध करनेके कामपर नियुक्त किया गया है ( जो इनके लिये दुष्कर है ) । तात ! केवल घेरा डालनेसे या ऊपर चढ़ जानेसे देवता भी इस पर्वतका मर्दन नहीं कर सकते ॥ ४४-४५½ ॥
| ३७२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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दुर्गयुद्धे क्रमः श्रेयान् रोधयुद्धेन पार्थिवाः ॥ ४६ ॥
भक्तोदकेन्धनैः क्षीणाः पात्यन्ते गिरिसंश्रिताः ।
वयं बहव इत्येवं नाप्येष निपुणो नयः ॥ ४७ ॥
राजाओ ! दुर्गयुद्धमें रोधयुद्ध (घेरा डालने) के द्वारा जो लड़ाईका क्रम चालू किया जाता है, वह श्रेयस्कर होता है (क्योंकि दुर्गकी खाद्यसामग्री समाप्त होनेपर वहाँके निवासियोंका पतन अवश्यम्भावी है; परंतु यहाँ पर्वतनिवासियोंके लिये खाने-पीनेकी सामग्री सदा सुलभ है) । अन्न, जल और लकड़ीकी कमी हो जाय तभी पर्वतवासी योद्धाओंको धराशायी किया जा सकता है। हमारी संख्या बहुत है और विपक्षियोंकी कम—ऐसा सोचना भी निपुण नीतिका परिचायक नहीं है ॥ ४६-४७ ॥
यादवौ नावमन्तव्यौ द्वावप्येतौ रणे स्थितौ ।
अविज्ञातबलावेतौ श्रूयेते देवसम्मितौ ॥ ४८ ॥
'ये दोनों यदुवंशी भी युद्धके लिये तैयार खड़े हैं; अतः इनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। इनके पूरे-पूरे बलका ज्ञान किसीको नहीं है। ये दोनों देवताओंके समान तेजस्वी सुने जाते हैं ॥ ४८ ॥
कर्मभिस्त्वमरौ विभो बालावतिबलान्वितौ ।
दुष्कराणीह कर्माणि कृतवन्तौ यदूत्तमौ ॥ ४९ ॥
'अपने कर्मोंसे तो ये अमर जान पड़ते हैं; क्योंकि बाल्यावस्थामें ही ये अत्यन्त बलशाली हैं। यदुकुलके इन श्रेष्ठ पुरुषोंने इस जगत्में बड़े-बड़े दुष्कर कर्म किये हैं ॥ ४९ ॥
शुष्कैःकाष्ठैस्तृणैर्वेष्ट्य सर्वतः पर्वतोत्तमम् ।
अग्निना दीपयिष्यामो दहोतां गतचेतनौ ॥ ५० ॥
'अतः सूखे काठों और तिनकोंसे आवेष्टित करके इस उत्तम पर्वतमें हम सब ओरसे आग लगा देंगे। इससे अचेत होकर वे दोनों भस्म हो जायेंगे ॥ ५० ॥
यदि चेन्निष्क्रमिष्येते दह्यमानावितोऽन्तिके ।
समेत्य पातयिष्यामस्त्यक्ष्यतो जीवितं ततः ॥ ५१ ॥
'यदि आगसे जलते हुए वे दोनों हमारे पाससे निकलेंगे तो हम सब लोग मिलकर उन्हें मार गिरायेंगे। इस तरह उन दोनोंको अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा' ॥ ५१॥
वाक्यमेतत्तु रुरुचे सबलानां महीक्षिताम् ।
यदुक्तं चेदिराजेन नृपाणां हितशंसिना ॥ ५२ ॥
राजाओंके हितकी बात बतानेवाले चेदिराजने जो बात वहाँ कही, वह सेनासहित समस्त राजाओंको अच्छी लगी ॥ ५२ ॥
ततः काष्ठैस्तृणैर्वेष्ट्यैः शुष्कशाखैश्च पादपैः ।
उपादीप्यत शैलेन्द्रः सूर्यपादैरिवाम्बुदः ॥ ५३ ॥
तदनन्तर उन्होंने काठ-कबाड़, घास-फूस और सूखी डालवाले वृक्ष लाकर उनके द्वारा उस गिरिराज गोमन्तमें आग लगा दी। उस समय आगकी ज्वालाओंसे घिरा हुआ वह पर्वत सूर्यकी किरणोंमे आवृत मेघके समान प्रतीत होता था ॥ ५३ ॥
ददुस्ते सर्वतस्तूर्णं पावकं तत्र पार्थिवाः ।
यथोद्देशं यथावातं शैलस्य लघुविक्रमाः ॥ ५४ ॥
इसके बाद शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाते हुए राजाओंने जहाँ जैसा हवाका रुख था, उसके अनुसार तुरंत ही पर्वतके चारों ओर वह आग फैला दी ॥ ५४ ॥
स वायुदीपतो वह्निरुत्पपात समन्ततः ।
सधूमज्वालमालाभिर्भाभिः खमिव शोभयन् ॥ ५५ ॥
वायुसे प्रज्वलित हुई आग वहाँ सब ओरसे ऊपरको उठने लगी और धूमयुक्त ज्वालामालाओंकी प्रभासे आकाशकी शोभा-सी बढ़ाने लगी ॥ ५५ ॥
सोऽनलः पवनायस्तः काष्ठसंचयमूलवान् ।
ददाह शैलं श्रीमन्तं गोमन्तं कान्तपादपम् ॥ ५६ ॥
सूखे काठोंके ढेर ही जिसकी जड़ थे, वह आग वायुके सहारेसे बढ़कर कमनीय वृक्षोंवाले शोभा-सम्पन्न गोमन्तपर्वतको चारों ओरसे दग्ध करने लगी ॥ ५६ ॥
स दह्यमानः शैलेन्द्रो मुमोच विपुलाः शिलाः ।
शतशः शतधा भूत्वा महोल्काकारदर्शनाः ॥ ५७ ॥
उस आगसे दग्ध होता हुआ गिरिराज गोमन्त बड़ी-बड़ी शिलाएँ छोड़ने लगा (अग्निके तापसे चटककर प्रस्तर-खण्ड टूट-टूटकर गिरने लगे), वे सैकड़ों शिलाएँ सौ-सौ टूक होकर गिरते समय बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान दिखायी देती थीं ॥ ५७ ॥
स चित्रभानुः शैलेन्द्रं भाभिर्भानुरिवाम्बुदम् ।
आलिम्पतीव विधिवत् समन्तादर्चिरुद्गतः ॥ ५८ ॥
लपटोंसे ऊपरको उठती हुई वह आग उस पर्वतराजको सब ओरसे प्रभाओंद्वारा विधिपूर्वक लीपती-सी प्रतीत होती थी, ठीक उसी तरह जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंद्वारा मेघोंको अनुलिप्त कर देते हैं ॥ ५८ ॥
धातुभिः पच्यमानैश्च ज्वलद्भिश्चैव पादपैः ।
उद्भ्रान्तश्वापदो रौति तुद्यमान इवाद्रिराट् ॥ ५९ ॥
पकती हुई धातुओं, जलते हुए वृक्षो तथा घबराये हुए हिंसक जन्तुओंसे युक्त वह पर्वतराज ऐसा जान पड़ता था, मानो व्यथासे पीड़ित होकर रो रहा हो ॥ ५९ ॥
प्रतप्तो दह्यमानस्तु स शैलः कृष्णवर्त्मना ।
रीतीर्निर्वर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः ॥ ६० ॥
आगसे दग्ध होकर तपा हुआ वह पर्वत सोने, चाँदी
विष्णुपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ३७३
तथा काले रंगकी धातुओंके पिघले हुए रसोंकी धारा बहाने लगा॥ ६० ॥
वह्निना चापि दीप्ताङ्गो गिरिनातिविराजते।
धूमान्धकारोर्ध्वतनुर्मज्जमान इवाम्बुदः॥ ६१॥
यद्यपि अग्निसे उसका सारा अङ्ग उद्भासित हो उठा था, तो भी उसके ऊपरी भागमें धुएँका अन्धकार छा रहा था; इसलिये उस पर्वतकी अधिक शोभा नहीं हो रही थी। वह समुद्रमें डूबते हुए मेघके समान जान पड़ता था॥ ६१॥
विश्लिष्टोपलसंघातः कर्कशाङ्गारवर्षणः।
गिरिर्भात्यनलोद्गारैरूल्कावृष्टिरिवाम्बुदः ॥ ६२॥
उसके प्रस्तरसमूह अलग हो-होकर गिर रहे थे। उससे कड़े अङ्गारोंकी वर्षा हो रही थी। उस समय आग उगलनेके कारण वह पर्वत उल्काओंकी वर्षा करनेवाले मेघके समान प्रतीत होता था॥ ६२॥
प्रपातप्रस्रवेण्विक्षो धूमसंवर्द्धितोदरः।
स गिरिर्भस्मसां यातो युगान्ताग्निरितोपमः॥ ६३॥
उसके झरनोंके स्रोत सूख गये, मध्यभागमें धुआँ फैल गया। उस अवस्थामें वह पर्वत प्रलयाग्निसे दग्ध होकर भस्म हुआ-सा जान पड़ता था॥ ६३॥
विह्वलास्तस्य पार्श्वेभ्यः सर्पा दग्धार्धदेहिनः।
श्वसन्तः पृथुमूर्धानो निश्चेरूरुशिवेक्षणाः॥ ६४॥
उसके पार्श्वभागोंसे, घबराये हुए सर्प निकलने लगे। उनके आधे शरीर जल गये थे। उनकी आँखोंसे क्रूरता टपक रही थी तथा वे अपने फैले हुए मस्तकों (फनो) से फुङ्कार मार रहे थे॥ ६४॥
उत्पत्योत्पत्य गगनात् पुनः पुनरवाङ्मुखाः।
रेसुश्चोद्वेजिताः सिंहाः शार्दूलाश्चानलाखिलाः॥ ६५॥
आगसे झुलसे हुए सिंह और व्याघ्र भयसे उद्विग्न हो बार-बार उछलकर आकाशसे नीचे मुँह किये गिरते और आर्तनाद करते थे॥ ६५॥
मुमुचुः पादपाश्चैव दाहनिर्यासं जलम्॥ ६६॥
वहाँके वृक्ष दग्ध होनेके कारण अपने भीतरके रसको पानीके रूपमे वहाने लगे॥ ६६॥
वहत्यूर्ध्वगतिर्वातो भस्माङ्गारारतिपिङ्गलः।
धूमच्छाया च गगने दर्पिताम्भोददर्शना॥ ६७॥
ऊपरको उठनेवाली वायु भस्म और अङ्गारोंसे अत्यन्त पिंगलवर्णको होकर बहने लगी और आकाशमें धूमकी छाया घुमड़कर घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान दिखायी देने लगी
त्यज्यमानो महासानुर्विहगैः श्वापदैरपि।
गिरिर्वैकल्यमायाति प्रागल्भ्यात्कृष्णवर्त्मनः॥ ६८॥
पक्षी और हिंसक जन्तु भी उसे छोड़कर भाग रहे थे। वह महान् शिखरवाला पर्वत अधिक आग बढ़ जानेके कारण व्याकुल-सा हो उठा था॥ ६८॥
स मुमोच शिलाः शैलश्चलोदग्रशिलोच्चयः।
वज्रेण पुरुहूतस्य यथा स्याद् दारितस्तथा॥ ६९॥
बड़ी-बड़ी चञ्चल शिलाओंके ढेरसे युक्त वह पर्वत आगसे तपकर अपनी शिलाओंको इस प्रकार छोड़ रहा था, मानो इन्द्रके वज्रसे विदीर्ण होकर बिखरा जा रहा हो॥ ६९॥
आदीप्य तं तु शैलेन्द्रं क्षत्रिया व्यूहदर्शिताः।
अर्धक्रोशमपक्रान्ताः पावकेनाभितापिताः॥ ७०॥
उस पर्वतराज़में आग लगाकर व्यूहके आकारमें सुसज्जित होकर खड़े हुए क्षत्रिय उस प्रचण्ड पावकसे सन्तप्त हो आधा कोस पीछे हट गये॥ ७०॥
दह्यमाने नगश्रेष्ठे सीदमानैर्महाद्रुमैः।
धूमभारैरनालक्ष्ये मूले शिथिलतां गते॥ ७१॥
सरोषं हि तदा रामो वचनं केनिसूदनम्।
बभाषे पद्मपत्राक्षं स साक्षान्मधुसूदनम्॥ ७२॥
वह पर्वतोंमे श्रेष्ठ गोमन्त नष्ट होते हुए महान् वृक्षोंके साथ जब इस प्रकार दग्ध होने लगा, धूमभारसे उसकी ओर देखना असम्भव हो गया और उसका मूलभाग शिथिल होने लगा, तब वलरामजीने केशी और मधुनामक दैत्योंका संहार करनेवाले साक्षात् विष्णुरूप कमलनयन श्रीकृष्णसे रोषपूर्वक कहा-॥ ७१-७२॥
दह्यतेऽयं गिरिस्तात ससानुशिखरद्रुमः।
आवयोः कृष्ण वैरेण चलिभिर्वसुधाधिपैः॥ ७३॥
'तात! श्रीकृष्ण! हमलोगोंसे वैर हो जानेके कारण इन बलवान् भूपतियोंद्वारा छोटे-बड़े शिखरों और वृक्षोंसहित यह पर्वत जलाया जा रहा है॥ ७३॥
पश्य कृष्णानलौष्णानां सधूमानां समन्ततः।
वनानां विरसन्तीय नगाभ्याशे द्विपोत्तमाः॥ ७४॥
'श्रीकृष्ण! देखो, चारो ओर आगमे तपे और धुएँसे भरे इन जंगलोंके वृक्षोंके निकट ये उत्तम हाथी करुण-क्रन्दन-सा कर रहे हैं॥ ७४॥
अयं यद्यावयोरर्थे गोमन्तस्तात दह्यते।
अयशस्यमिदं लोके कौलीनं च भविष्यति॥ ७५॥
'तात! यदि हम दोनोंके लिये गोमन्त जला दिया जायगा, तो यह संसारमें हमारे लिये महान् अयश और कलङ्ककी बात होगी॥ ७५॥
तदम्यानृण्यहेतोर्हि नगस्य नगसंनिभ।
क्षत्रियाञ्छिनिष्यामो दोर्भ्यामेव युधां वर॥ ७६॥
'अतः योद्धाओंमें श्रेष्ठ तथा युद्धमें पर्वतके समान
३७४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे
अविचल रहनेवाले श्रीकृष्ण ! इस गोमन्त पर्वतसे उन्ऋण होनेके लिये हमलोग अपनी भुजाओंसे ही इन क्षत्रियोंको मार डालेंगे ॥ ७६ ॥
एते ते क्षत्रियाः सर्वे गिरिमादीप्य दंशिताः ।
रथिनस्तात दृश्यन्ते यथादेशं युयुत्सवः ॥ ७७ ॥
'तात ! ये सारे क्षत्रिय इस पर्वतको जलाकर कवच आदिसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर यथास्थान युद्ध करनेके लिये उत्सुक दिखायी देते हैं ॥ ७७ ॥
एवमुक्त्वा गिरेः शृङ्गान्ममेरुशृङ्गादिवोडुराट् ।
निपपात बलः श्रीमान् वनमालाधरो युवा ॥ ७८ ॥
ऐसा कहकर मेरु पर्वतके शिखरसे नीचे उतरनेवाले चन्द्रमाके समान कान्तिमान् वनमालाधारी नवयुवक बलराम गोमन्त पर्वतकी चोटीसे कूद पड़े ॥ ७८ ॥
कादम्बरीमदक्षीबो नीलवासाः सिताननः ।
स शारदेन्दुसंकाशो वनमालाञ्चितोदरः ॥ ७९ ॥
उस समय वे कादम्बरी (सुधा या मधु) के मदसे कुछ मत्त-से हो रहे थे । उनके शरीरपर नील वस्त्र शोभा पाता था । उनका मुख गौर वर्णका था । वे शरत्-कालके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल प्रभासे उद्भासित हो रहे थे । उनका उदरभाग वन-मालासे अलंकृत था ॥ ७९ ॥
कान्तैककुण्डलधरश्चारुमौलिरवाङ्मुखः ।
निपपात नरेन्द्राणां मध्ये केशवपूर्वजः ॥ ८० ॥
उन्होंने एक कानमें कमनीय कुण्डल धारण कर रखा था तथा उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट शोभा दे रहा था । श्रीकृष्णके बड़े भाई बलराम नीचे मुँह किये राजाओंके बीचमें ही कूद पड़े ॥ ८० ॥
अवप्लुते ततो रामे कृष्णः कृष्णाम्बुदोपमः ।
गोमन्तशिखराच्छ्रीमानाप्लुतोऽमितविक्रमः ॥ ८१ ॥
बलरामजीके कूदनेके पश्चात् काले मेघके समान श्याम कान्तिमान् और अमित पराक्रमी श्रीमान् कृष्ण भी गोमन्त-शिखरसे कूद पड़े ॥ ८१ ॥
ततस्तं पीडयामास पद्भ्यां गिरिवरं हरिः ।
स पीडितो गिरिस्तेन निर्ममज्ज समन्ततः ॥ ८२ ॥
जलाकुलोपलस्तत्र प्रस्रुतो द्विरदो यथा ।
स तेन वारिणा वह्निस्तत्क्षणात् प्रशमं ययौ ॥ ८३ ॥
कल्पान्ते वारिधाराभिर्मेघजालैरिवांशुमान् ।
कूदते समय श्रीहरिने उस श्रेष्ठ पर्वतको अपने दोनों पैरोंसे दबाया । उनके द्वारा दबाव पड़नेपर वह पर्वत चारों ओरसे जलमग्न-सा हो गया । उसका एक-एक पत्थर जलसे नहा उठा और मदकी बूँदें टपकानेवाले हाथीके समान जल-का स्रोत बहाने लगा । उस जलसे वहाँकी सारी आग तत्काल बुझ गयी । मानो प्रलयकालमें मेघसमूहोंद्वारा बरसायी हुई वारिधाराओंसे अंशुमाली सूर्य शान्त हो गये हों ॥ ८२-८३ ॥
सिंहारसितनिर्घोषः पीतवासा घनाकृतिः ॥ ८४ ॥
किरीटमूर्द्धा सौम्यास्यः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
श्रीवत्सवक्षाः सुमुखः सहस्राक्षसमद्युतिः ॥ ८५ ॥
रामादनन्तरं कृष्णः प्लुतो वै वीर्यवांस्ततः ।
उस समय पीताम्बरधारी घनश्याम-विग्रह कमलनयन श्रीकृष्ण सिंहके समान दहाड़ रहे थे । उनके मस्तकपर दिव्य किरीट शोभा पा रहा था और मुख बड़ा ही सौम्य दिखायी देता था । उनके वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था । मुख बहुत ही सुन्दर था और अंगोंकी कान्ति देवराज इन्द्रके समान प्रकाशित हो रही थी । बलरामजीके बाद पराक्रमी श्रीकृष्ण भी वहीं (राजाओंके बीचमें ही) कूद पड़े थे ॥
ताभ्यामेव प्लुताभ्यां च चरणैः पीडितो गिरिः ॥ ८६ ॥
मुमोच सलिलोत्पीडांस्तीव्रपावकशान्तये ।
सलिलोत्पीडनं दृष्ट्वा पार्थिवा भयमाविशन् ॥ ८७ ॥
उन दोनों भाइयोंके कूदनेसे उनके चरणोंका दबाव पाकर वह पर्वत जलके स्रोत बहाने लगा था, जो उस भयानक अग्निको बुझानेमे सहायक हुआ । पर्वतसे जलके स्रोत निकलते देखकर राजाओंके मनमें भय समा गया ॥ ८६-८७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोमन्तदाहे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें गोमन्त-पर्वतका दाहविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
त्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और बलरामका जरासंध और उसकी सेनाओंके साथ युद्ध, राजा दरदकी मृत्यु, जरासंधका पराजित होकर पलायन तथा चेदिराज दमघोषके साथ श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना
वैशम्पायन उवाच
तौ नगादाप्लुतौ दृष्ट्वा वसुदेवसुतावुभौ ।
क्षुब्धं नरवरानीकं सर्वं सम्मूढवाहनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवके
विष्णुपर्व ] त्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः ३७५
उन दोनों पुत्रोंको पर्वतसे कूदकर आया देख उन नरेशोंकी सारी सेनामें हलचल मच गयी। उसके वाहनोंपर मोह छा गया ॥ १ ॥
बाहुप्रहरणौ तौ तु चेरतुस्तत्र यादवौ ।
मकराविव संरुद्धौ समुद्रक्षोभणावुभौ ॥ २ ॥
रोषमें भरे हुए वे दोनों यदुवंशी वीर अपनी भुजाओंसे ही आयुधका काम लेते हुए उस विशाल सेनामें विचरने लगे, जैसे दो महान् मगर समुद्रको विक्षुब्ध करते हुए उसके भीतर घूम रहे हों ॥ २ ॥
ताभ्यां मृधे प्रविष्टाभ्यां यादवाभ्यां मतिस्त्वभूत् ।
आयुधानां पुराणानामादानकृतलक्षणा ॥ ३ ॥
समराङ्गणमें प्रविष्ट होनेपर उन दोनों यादवोंके मनमें अपने पुराने आयुधोंको ग्रहण करनेका विचार हुआ ॥ ३ ॥
ततोऽम्बरतलाद् भूयः पतन्ति स्म महात्मनोः ।
मध्ये राजसहस्रस्य समरं प्रतिकाङ्क्षिणोः ॥ ४ ॥
यानि वै माथुरे युद्धे प्राप्तान्याहवशोभिनोः ।
फिर तो सहस्रो राजाओके बीचमें युद्धकी आकांक्षा रखने तथा समरमें शोभा पानेवाले उन दोनों महात्माओंके हाथमें आकाशसे वे ही अस्त्र-शस्त्र आ गये, जो मथुराके युद्धमें उन दोनोंको प्राप्त हुए थे ॥ ४½ ॥
तान्यम्बरात् पतन्ति स्म दिव्याान्याहवसप्लवे ॥ ५ ॥
लेलिहानानि दीप्तानि दीप्ताग्निसदृशानि वै ।
निक्षिप्य यानि तत्रैव तानि प्राप्तौ स्म यादवौ ॥ ६ ॥
उस युद्धसम्बन्धी विप्लवके समय वे ही प्रज्वलित अग्निके तुल्य तेजस्वी, दीप्तिमान् तथा शत्रुओंको चाट जानेवाले दिव्यास्त्र आकाशसे आ पड़े। जिन्हें वे यादव-वीर मथुरामें ही (आकाशमें) फेंककर चले गये थे, उन यदुवंशी वीरोंको पुनः उन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्ति हो गयी ॥ ५-६ ॥
क्रव्यादैरनुयातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च ।
तृषितान्याहवे भोक्तुं नृपमांसानि सर्वशः ॥ ७ ॥
उन अस्त्रोंके पीछे मांसभक्षी भूत-प्रेत आदि भी आ रहे थे। वे विशाल अस्त्र मूर्तिमान् होकर उस युद्धमे समस्त राजाओंके रक्त-मांसका उपभोग करनेके लिये मानो भूखे-प्यासे थे ॥ ७ ॥
दिव्यस्रग्दामधारीणि त्रासयन्ति च खेचरान् ।
प्रभया भासमानानि दंशितानि दिशो दश ॥ ८ ॥
उन सबने दिव्य पुष्पोंकी मालाएँ धारण की थीं। वे अपनी प्रभासे प्रकाशित होकर दसों दिशाओंको सुशोभित करते थे और आकाशचारी प्राणियोंको भी भयभीत कर देते थे ॥ ८ ॥
हलं सांवर्तकं नाम सौनन्दं मुसलं तथा ।
चक्रं सुदर्शनं नाम गदां कौमोदकीं तथा ॥ ९ ॥
चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि वै ।
ताभ्यां समवतीर्णानि यादवाभ्यां महामृधे ॥ १० ॥
सांवर्तक हल, सौनन्द मूसल, सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा—भगवान् विष्णुके ये चार तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र उस महासमरमें उन दोनों यादव-वीरोंके लिये उतरे थे ॥ ९-१० ॥
जग्राह प्रथमं रामो ललामप्रतिमं रणे ।
सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं दिव्यमालाकुलं हलम् ॥ ११ ॥
पहले बलरामजीने रणभूमिमें सुन्दर आकृतिवाले सर्पराजके समान सर्पणशील तथा दिव्यमालाओंसे अलंकृत हलको अपने दायें हाथमे ग्रहण किया ॥ ११ ॥
सव्येन सात्वतां श्रेष्ठो जग्राह मुसलोत्तमम् ।
सौनन्दं नाम बलवान् निरानन्दकरं द्विषाम् ॥ १२ ॥
फिर उन यदुकुलतिलक बलवान् वीरने बायें हाथसे सौनन्द नामक उत्तम मूसलको ग्रहण किया, जो शत्रुओंको आनन्दशून्य कर देनेवाला था ॥ १२ ॥
दर्शनीयं च लोकेषु चक्रमादित्यवर्चसम् ।
नाम्ना सुदर्शनं नाम प्रीतो जग्राह केशवः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने सम्पूर्ण लोकोंमे दर्शनीय तथा सूर्यके समान तेजस्वी सुदर्शन नामक चक्रको बड़ी प्रसन्नताके साथ ग्रहण किया ॥ १३ ॥
दर्शनीयं च लोकेषु धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
नाम्ना शार्ङ्गमिति ख्यातं प्रीतो जग्राह वीर्यवान् ॥ १४ ॥
फिर समस्त लोकोंमें दर्शनीय तथा मेघोंकी गर्जनाके समान टंकारध्वनि करनेवाले शार्ङ्ग नामसे विख्यात धनुषको भी उन बलवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक अपने हाथमें ले लिया ॥
देवैर्निगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे ।
निपक्ता कुमुदाक्षस्य नाम्ना कौमोदकीति सा ॥ १५ ॥
तदनन्तर देवताओंने जिनसे अपना प्रयोजन निवेदन किया था तथा जिनके नेत्र विकसित कुमुद-कुसुमके समान शोभायमान हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णके दूसरे हाथमें कौमोदकी नामक गदा आ गयी ॥ १५ ॥
तौ सप्रहरणौ वीरौ साक्षाद्विष्णुतनुपमौ ।
समरे रामगोविन्दौ रिपूंस्तान् प्रत्ययुद्ध्यताम् ॥ १६ ॥
साक्षात् विष्णुके-से विग्रहवाले वे दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण जब अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो गये, तब समरभूमिमें उन शत्रुओंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १६ ॥
आयुधप्रग्रहौ वीरौ तावन्योन्यमयावुभौ ।
पूर्वजानुजसंह्रदौ तु रामगोविन्दलक्षणौ ॥ १७ ॥
३७६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अस्त्र ग्रहण करके समराङ्गणमे खडे हुए वे दोनों अग्रज और अनुज वीर बलराम तथा श्रीकृष्ण अन्योन्यमय (एक-दूसरेपर आश्रित अथवा एक दूसरेके स्वरूप ) थे ॥ १७ ॥
समरेऽप्रतिरूपौ तौ विष्णुरेको द्विधा कृतः।
द्विषत्सु प्रतिकुर्वाणौ पराक्रान्तौ यथेश्वरौ ॥ १८ ॥
रणभूमिमें उनकी तुलना करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। वे दोनों एक ही विष्णुके दो स्वरूप थे तथा शत्रुओंका प्रतीकार करते हुए सर्वसमर्थ ईश्वरकी भाँति पराक्रम प्रकट कर रहे थे ॥ १८ ॥
हलमुद्यम्य रामस्तु सर्पेन्द्रमिव कोपनम्।
चचार समरे वीरो द्विषतामन्तकोपमः ॥ १९ ॥
वीर बलराम क्रोधमे भरे हुए सर्पराजके तुल्य सांवर्तक हलको हाथमें उठाकर समरमें शत्रुओंके लिये कालरूप होकर विचरने लगे ॥ १९ ॥
विकर्षन् रथवृन्दानि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
चकार रोषं सफलं नागेषु च हयेषु च ॥ २० ॥
कुञ्जराँल्लाङ्गलोत्क्षिप्तन् मुसलाक्षेपताडितान् ।
रामोऽभिरामः समरे निर्ममन्थ यथाचलान् ॥ २१ ॥
वे महामनस्वी क्षत्रियोंके रथसमूहोंको पीछे ढकेलते हुए हाथियों और घोड़ोंपर अपना रोष सफल करने लगे। समरमें परम सुन्दर प्रतीत होनेवाले बलराम हलसे हाथियोंको ऊपर उछाल देते और मूसल फेंककर उन्हें मार डालते थे। इस प्रकार उन पर्वतोपम हाथियोंको उन्होंने मार डाला ॥ २०-२१॥
ते वध्यमाना रामेण समरे क्षत्रियर्षभाः ।
जरासंधान्तिकं भीता विरथाः प्रतिजग्मिरे ॥ २२ ॥
समराङ्गणमें बलरामजीके द्वारा मारे जाते हुए वे क्षत्रिय-शिरोमणि योद्धा रथहीन हो भयके मारे जरासंधके पास भाग गये ॥ २२ ॥
तानुवाच जरासंधः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ।
धिगेतां क्षत्रवृत्तिं वः समरे कातरात्मनाम् ॥ २३ ॥
तब क्षत्रियधर्ममें स्थित रहनेवाले जरासंधने उनसे कहा- 'समरभूमिमे आकर मनमे कायरता लानेवाले तुमलोगोंकी इस क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है ॥ २३ ॥
पराक्रान्तस्य समरे विरथस्य पलायतः।
भ्रूणहत्यामिवासह्यां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २४ ॥
'मनीषी पुरुष समरमें पराक्रम प्रकट करके रथहीन होकर भागनेवाले योद्धाकी इस कायरताको भ्रूणहत्याके समान असह्य बताते हैं ॥ २४ ॥
पत्तिनो भुवि चैकस्य गोपस्याल्पबलीयसः ।
भीताः किं विनिवर्तध्वं धिगेतां क्षत्रवृत्तिताम् ॥ २५ ॥
'यह ग्वाला अत्यन्त बलहीन है, पैदल है और पृथ्वीपर अकेला खड़ा है। भला, इससे भयभीत होकर तुमलोग क्यों भाग रहे हो ? तुम्हारी इस क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है ॥२५॥
क्षिप्रं समभिवर्तन्तां मम वाक्येन नोदिताः ।
यावदेतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम् ॥ २६ ॥
'मेरी आज्ञासे प्रेरित होकर तुम सब लोग शीघ्र ही शत्रुओंपर आक्रमण करो। तबतक मैं रणभूमिमें इन दोनो ग्वालोंको मारकर यमलोक भेज देता हूँ' ॥ २६ ॥
ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे जरासंधेन नोदिताः।
क्षिपन्तः शरजालानि हृष्टा योद्धुमुपस्थिताः ॥ २७ ॥
ते हयैः काञ्चनापीडै रथैश्चेन्दुसमप्रभैः ।
नागैश्चाम्भोदसंकाशैर्महामात्रप्रणोदितैः ॥ २८ ॥
तब जरासंधसे प्रेरित होकर वे समस्त क्षत्रिय वाणसमूहों-की वर्षा करते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धके लिये डट गये । वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित अश्वों, चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रथों और महावतोंद्वारा हाँके गये एवं मेघोंके समान काले रंगवाले हाथियोंद्वारा रणभूमिमें आगे बढ़ने लगे ॥
सतनुत्राणनिस्त्रिंशाः सायुधाभरणाम्बराः ।
स्वारोपितधनुष्मन्तः सतूणीराः ससायकाः ॥ २९ ॥
उनके शरीरोंमें कवच और हाथोंमें खड्ग थे। वे आयुध, आभूषण तथा वस्त्रोंसे सुसज्जित थे। उन्होंने धनुषोंको भली-भाँति चढ़ा रखा था। वे बाणों और तरकशोंसे सम्पन्न थे॥२९॥
सच्छत्रोत्सेधिनः सर्वे चारुचामरवीजिताः ।
रणावनिगता रेजुः स्यन्दनस्था महीक्षितः ॥ ३० ॥
जो राजा रणभूमिमें रथोंपर बैठे हुए थे, उनके सिरपर ऊँचे छत्र तने थे तथा मनोहर चामरोंद्वारा उनके लिये हवा की जा रही थी। इस तरह वे सभी बड़ी शोभा पाते थे ॥ ३० ॥
तौ युद्धरङ्गापतितौ विधावन्तौ महाभुजौ।
वसुदेवसुतौ वीरौ युयुत्सू प्रत्यदृश्यताम् ॥ ३१ ॥
युद्धकी रंगभूमिमे उतर कर सब ओर धावा करनेवाले वे महाबाहु वीर वसुदेवपुत्र युद्धके लिये उत्सुक दिखायी देते थे ॥ ३१ ॥
तद् युद्धमभवत् तत्र तयोस्तेषां तु संयुगे।
सायकोत्सर्गबहुल गदानिर्घातदारुणम् ॥ ३२ ॥
वहाँ रणभूमिमें उन दोनो भाइयो तथा उन राजाओंमे भारी युद्ध होने लगा। उसमें बहुत-से वाणोंकी वर्षा की जा रही थी। गदाओंके आघातसे उस युद्धकी भयंकरता और बढ़ गयी थी ॥ ३२ ॥
ततः शरसहस्राणि प्रतीच्छन्तौ रणेविणौ।
तस्थतुर्योधमुख्यौ तावभिवृष्टौ यथाचलौ ॥ ३३ ॥
[विष्णुपर्व ] त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ३७७
तदनन्तर सहस्रों बाणोंकी बौछार ग्रहण करते हुए वे दोनों युद्धाभिलाषी महायोद्धा वर्षाका आघात सहन करनेवाले दो पर्वतोंके समान वहाँ अविचलभावसे खड़े रहे ॥ ३३ ॥
गदाभिश्चैव शूर्मीभिः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ।
अदर्द्यमानौ महेष्वासौ यादवौ न चकम्पतुः ॥ ३४ ॥
शत्रुओंकी भारी गदाओं, गोफनों या ढेलवासों तथा मुद्गरोंकी मारसे पीड़ित होते हुए भी वे दोनों महाधनुर्धर यादव वीर कम्पित नहीं हुए ॥ ३४ ॥
ततः कृष्णोऽम्बुदाकारः शङ्खचक्रगदाधरः ।
व्यवधंत महातेजा वातयुक्त इवानलः ॥ ३५ ॥
तत्पश्चात् शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले घनश्यामविग्रह महातेजस्वी श्रीकृष्ण वायुसे प्रेरित होकर प्रज्वलित हुई अग्निके समान बढ़ने लगे ॥ ३५ ॥
स चक्रेणार्कनृत्येन दीप्यमानेन तेजसा ।
चिच्छेद समरे वीरो नृगजाश्वमहारथान् ॥ ३६ ॥
समराङ्गणमें उन वीर मधुसूदनने तेजसे उद्दीप्त होनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रके द्वारा मनुष्यों, हाथियों, घोड़ों तथा बड़े-बड़े रथोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ३६ ॥
गदानिपातविहता लाङ्गलेन च कर्षिताः ।
न शेकुस्ते रणे स्थातुं पार्थिवा नष्टचेतसः ॥ ३७ ॥
गदाके आघातसे मारे गये तथा हलसे खींचकर नष्ट किये गये राजा लोग अपनी चेतना खोकर रणभूमिमें खड़े न रह सके ॥ ३७ ॥
चक्रक्षुरनिकृत्तानि विचित्राणि महीक्षिताम् ।
रथयूथानि भग्नानि न शेकुश्चलितुं रणे ॥ ३८ ॥
चक्रके छुरोंसे टुकड़े-टुकड़े किये गये राजाओंके विचित्र रथसमूह भग्न होकर युद्धभूमिमें आगे न बढ़ सके ॥ ३८ ॥
मुसलाक्षेपभग्नाश्च कुञ्जराः षष्टिहायनाः ।
घना इव घनापाये भग्नदन्ता विचुक्रुशुः ॥ ३९ ॥
मूसलोंकी मारसे घायल हुए साठ वर्षोंकी अवस्थावाले हाथी दाँत टूट जानेके कारण शरद्-ऋतुके जलहीन बादलोंके समान असमर्थ हो आर्तभावसे चीत्कार कर रहे थे ॥ ३९ ॥
चक्रानलज्वालहताः सादिनः सपदातयः ।
पेतुः परासवस्तत्र यथा वज्रहतास्तथा ॥ ४० ॥
सुदर्शन चक्रसे प्रकट हुई आगकी ज्वालासे झुलसकर कितने ही घुड़सवार और पैदल योद्धा धरतीपर पड़े थे। उनके प्राण-पखेरू उड़ गये थे तथा वे वज्रके आघातसे मरे हुएके तुल्य प्रतीत होते थे ॥ ४० ॥
चक्रलाङ्गलनिर्दग्धं तत्सैन्यं विदिलीकृतम् ।
युगान्तोपहतप्रख्यं सर्वं पतितमब्भौ ॥ ४१ ॥
चक्र और हलसे दग्ध होकर विदीर्ण की गयी वह सारी सेना इस तरह धरतीपर पड़ी थी मानो प्रलयकालमें सबका एक साथ संहार हो गया हो ॥ ४१ ॥
आक्रीडभूमिं दिव्यानामायुधानां वपुष्मताम् ।
वैष्णवानां नृपास्ते तु द्रष्टुमप्यबलीयसः ॥ ४२ ॥
वहाँ मूर्तिमान् होकर प्रकट हुए उन वैष्णव दिव्यास्त्रोंकी क्रीडा-भूमिरूप युद्धस्थलकी ओर देखनेमें भी वे राजालोग असमर्थ हो गये थे ॥ ४२ ॥
केचिद्रथाः सम्मृदिताः केचिन्निहतपार्थिवाः ।
भग्नैकचक्रास्त्वपरे विकीर्णा धरणीतले ॥ ४३ ॥
कितने ही रथ रौंद डाले गये। कितनोंके राजा मार डाले गये और कितने ही एक-एक पहिया नष्ट हो जानेके कारण भूतलपर बिखरे पड़े थे ॥ ४३ ॥
तस्मिन् विशसने घोरे चक्रलाङ्गलसम्प्लवे ।
दारुणानि प्रवृत्तानि रक्षांस्यौत्पातिकानि च ॥ ४४ ॥
चक्र और हलद्वारा जहाँ विप्लव मच गया था, उस घोर संग्राममें राक्षसोंद्वारा उपस्थित की गयी भयंकर उत्पातसूचक घटनाएँ घटित होने लगीं ॥ ४४ ॥
आर्तानां कूजमानानां पाटितानां च वेणुवत् ।
अन्तो न शक्यतेऽन्वेष्टुं नृनागरथवाजिनाम् ॥ ४५ ॥
जो आर्तभावसे चीख रहे थे तथा जो बाँसकी तरह चीर डाले गये थे, ऐसे मनुष्यों, हाथियों, रथारोहियों और घोड़ोंकी अन्तिम संख्या कितनी है, इसका पता लगाना असम्भव हो गया था ॥ ४५ ॥
सा पतितनरेन्द्राणां रुधिराऽऽर्द्रा रणक्षितिः ।
योषेव चन्दनाद्रार्ङ्गी भैरवा प्रतिभाति वै ॥ ४६ ॥
धरतीपर पड़े हुए राजाओंके रुधिरसे भीगी हुई वह रणभूमि लाल चन्दनसे आर्द्र अङ्गवाली नारीके समान भयंकर प्रतीत होती थी ॥ ४६ ॥
नरकेशास्थिमज्जान्त्रैः शातितानां च दन्तिनाम् ।
रुधिरौघप्लवस्तत्र च्छादयामास मेदिनीम् ॥ ४७ ॥
मनुष्योंके केशों, हड्डियों, मज्जाओं तथा आँतोंसे मिला हुआ कटे हाथियोंके रक्तका प्रवाह वहाँकी भूमिको आच्छादित करता जा रहा था ॥ ४७ ॥
तस्मिन् महाभीषणके नरवाहनसंक्षये ।
शिवानामशिवैः शब्दैर्नादिते घोरदर्शने ॥ ४८ ॥
वह रणभूमि बड़ी भयानक प्रतीत होती थी। वहाँ मनुष्यों और उनके वाहनोंका संहार हो रहा था। गीदड़ियोंके अमङ्गलसूचक शब्द वहाँ सदा गूँजते रहते थे। वह देखनेमें भी बड़ी भयंकर थी ॥ ४८ ॥
| ३७८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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आर्तस्तनितसंनादे रुधिराम्बुह्रदाकुले।
अन्तकाक्रीडसदृशे नागदेहैः समावृते॥ ४९॥
आर्त प्राणियोंकी चीख—पुकारका शब्द सब ओर फैला हुआ था। रक्तके कितने ही कुण्ड बन गये थे। हाथियोंकी लाशोंसे ढकी हुई वह युद्धस्थली कालकी क्रीडाभूमिके समान प्रतीत होती थी॥ ४९॥
अपास्तैर्बाहुभिर्योधैस्तुरगैश्च विदारितैः।
कङ्कैश्च वलगृध्रैश्च नादितैः प्रतिनादिते॥ ५०॥
कहीं योद्धाओंकी बाँहें कटकर गिरी थीं। कहीं बहुत-से योद्धा ही मरे पड़े थे और कहीं विदीर्ण हुए घोड़ोंकी लाशें बिछी हुई थीं। बड़े-बड़े बगुलों, कौओं और गीधोंकी बोलियोंसे वह समराङ्गण गूँज रहा था॥ ५०॥
निपाते पृथिवीशानां मृत्युसाधारणे रणे।
कृष्णः शत्रुवधं कर्तुं चचारान्तकदर्शनः॥ ५१॥
जहाँ बड़े-बड़े भूमिपाल धराशायी हो रहे थे और मृत्यु एक साधारण-सी बात हो गयी थी, उस रणभूमिमें कालके समान दिखायी देनेवाले श्रीकृष्ण शत्रुओंका वध करनेके लिये विचर रहे थे॥ ५१॥
युगान्तार्कप्रभं चक्रं कालीं चैवायसीं गदाम्।
गृह्य सैन्यावनिगतो बभाषे केशवो नृपान्॥ ५२॥
प्रलयकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाले चक्र और लोहेकी बनी हुई काली गदाको हाथमें लेकर भगवान् श्रीकृष्ण सेनाके मध्यकी भूमिमें खड़े हो राजाओंसे इस प्रकार बोले—॥
किन्न युद्ध्यत वै शूरा हस्त्यश्वरथसंयुताः।
किमिदं गम्यते शूराः कृतास्त्रा दृढनिश्चयाः।
अहं सपूर्वजः संख्ये पदातिः प्रमुखे स्थितः॥ ५३॥
'हाथी, घोड़े और रथोंसे युक्त शूरवीरो! अब युद्ध क्यों नहीं करते हो? अस्त्रोंके विद्वान् तथा युद्धका दृढ़ निश्चय रखनेवाले वीरो! क्यों इस प्रकार पलायन करते हो? मैं तो युद्धमें अपने बड़े भाईके साथ तुम्हारे सामने पैदल ही खड़ा हूँ॥ ५३॥
अदृष्टदोषेण रणे भवन्तो येन पालिताः।
स इदानीं जरासंधः किमर्थं नाभिवर्तते॥ ५४॥
'युद्धमें जिसने दोष नहीं देखा है तथा जिसके द्वारा तुम लोग पालित हुए हो, वह जरासंध अब हमारे सामने क्यों नहीं आ रहा है?'॥ ५४॥
एवमुक्ते तु नृपतिर्दरदो नाम वीर्यवान्।
रामं हलाग्रोग्रभुजं प्रत्ययात् सैन्यमध्यगम्॥ ५५॥
श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पराक्रमी राजा दरद सेनाके मध्यमें खड़े हुए तथा हलके अग्रभागसे उग्र भुजावाले बलरामके सामने आया॥ ५५॥
बभाषे स तु ताम्राक्षमुक्षाणमिव सेचनी।
एहोहि राम युध्यस्व मया सार्द्धमरिंदम॥ ५६॥
जैसे किसान बैलसे बात करता है, उसी प्रकार उसने लाल नेत्रोंवाले बलरामजीसे इस प्रकार कहा—'शत्रुदमन राम! आओ, आओ। मेरे साथ युद्ध करो'॥ ५६॥
तद् युद्धमभवत् ताभ्यां रामस्य दरदस्य च।
मृधे लोकवरिष्ठाभ्यां कुञ्जराभ्यामिवौजसा॥ ५७॥
बलराम और दरद—दोनों जगत्के श्रेष्ठ वीर थे। युद्धस्थलमें उन दोनोंका बलपूर्वक संग्राम होने लगा, मानो दो हाथी आपसमें लड़ रहे हों॥ ५७॥
योजयित्वा ततः स्कन्धे रामो दरदमाहवे।
हलेन बलिनां श्रेष्ठो मुसलेनावपोथयत्॥ ५८॥
तब बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामने युद्धस्थलमें दरदके कंधेसे हल फँसाकर उसे मुसलसे मार डाला॥ ५८॥
स्वकायगतमूर्धा वै मुसलेनावपोथितः।
पपात दरदो भूमौ दारिताद्रि रिवाचलः॥ ५९॥
मुसलसे मारे गये दरदका मस्तक उसके शरीरमें ही घुस गया और वह विदीर्ण हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ५९॥
रामेण निहते तस्मिन् दरदे राजसत्तमे।
जरासंधस्य राज्ञस्तु रामेणासीत् समागमः॥ ६०॥
महेन्द्रस्येव वृत्रेण दारुणो लोमहर्षणः।
राजाओंमें श्रेष्ठ दरदके बलरामद्वारा मारे जानेपर राजा जरासंधका उनके साथ अत्यन्त भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध होने लगा। मानो देवराज इन्द्रका वृत्रासुरके साथ संग्राम हो रहा हो॥ ६०१/२॥
गदे गृहीत्वा विक्रान्तावन्योन्यमभिधावतः॥ ६१॥
कम्पयन्तौ भुवं वीरौ तावुद्यतमहागदौ।
ददृशाते महात्मानौ गिरी सशिखराविव॥ ६२॥
वे दोनों पराक्रमी वीर गदाएं हाथमें लेकर पृथ्वीको कम्पित करते हुए एक दूसरेकी ओर दौड़े। दो विशाल गदाएँ उठाये हुए वे दोनों महामनस्वी योद्धा शिखरोंसे युक्त दो पर्वतोंके समान दिखायी देते थे॥ ६१-६२॥
व्युपरमन्त युद्धानि प्रेक्ष्य तौ पुरुषर्षभौ।
संरम्भाविव धावन्तौ गदायुद्धेषु विश्रुतौ॥ ६३॥
उन दोनों पुरुषप्रवर वीरोंको युद्ध करते देख दूसरोंके युद्ध बंद हो गये। गदायुद्धोंमें विख्यात जरासंध और बलराम रोषावेशमें भरे हुए-से एक दूसरेपर धावा करते थे॥ ६३॥
तावुभौ परमाचार्यौ लोके ख्यातौ महाबलौ।
मत्ताविव महानागावन्योन्यं समधावताम्॥ ६४॥
विष्णुपर्व ] त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ३७९
वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आचार्य कहे जाते थे। वे दो मदमत्त विशालकाय हाथियोंके समान परस्पर आक्रमण करते थे ॥ ६४ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । यक्षाश्चाप्सरसश्चैव समाजग्मुः सहस्रशः ॥ ६५ ॥
उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध, महर्षि, यक्ष तथा सहस्रों अप्सराएँ वह युद्ध देखनेके लिये आ गयीं ॥ ६५ ॥
तद्देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम् । शुशुभेऽभ्यधिकं राजन् नभो ज्योतिर्गणैरिव ॥ ६६ ॥
राजन् ! देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों और महर्षियोंसे अलंकृत हुआ वहाँका आकाश नक्षत्रोंसे आवृत्त हुआ-सा अधिक शोभा पाने लगा ॥ ६६ ॥
अभिदुद्राव रामं तु जरासंधो नराधिपः । सव्यं मण्डलमाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् ॥ ६७ ॥
राजा जरासंध बायीं ओरसे पैंतरा देकर बलरामजीपर टूट पड़ा और बलदेवजीने दाहिनी ओरसे उसपर धावा किया ॥ ६७ ॥
तावन्योन्यं प्रजह्राते गदायुद्धविशारदौ । दन्ताभ्यामिव मातङ्गौ नादयन्तौ दिशो दश ॥ ६८ ॥
गदायुद्धमें निपुण वे दोनों वीर एक दूसरेपर प्रहार करने लगे। जैसे दो मतवाले हाथी अपने दाँतोंसे परस्पर चोट करते हों, उसी प्रकार गदाओंसे आघात करते हुए वे दसों दिशाओंको निनादित करने लगे ॥ ६८ ॥
गदानिपातो रामस्य शुश्रुवेऽशनिनिःस्वनः । जरासंधस्य च रणे पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ ६९ ॥
रणभूमिमें बलरामजीकी गदाके आघातका शब्द वज्रपातके समान सुनायी पड़ता था तथा जरासंधके गदाघातकी ध्वनि फटते हुए पहाड़के समान प्रतीत होती थी ॥ ६९ ॥
न स्म कम्पयते रामं जरासंधकरच्युता । गदा गदाभृतां श्रेष्ठं विन्ध्यं गिरिमिवानिलः ॥ ७० ॥
जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको उसी प्रकार कम्पित नहीं कर पाती थी, जैसे वायु विन्ध्यगिरिको नहीं हिला सकती है ॥ ७० ॥
रामस्य तु गदावेगं राजा स मगधेश्वरः । सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोथयत् ॥ ७१ ॥
बलरामजीकी गदाका वेग मगधराज जरासंध बड़े धैर्यसे सहन करता और शिक्षा-कौशलसे उसको विफल भी कर देता था ॥ ७१ ॥
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुखरा लोकसाक्षिणी । "न त्वया राम वध्योऽयमलं खेदेन मानद ॥७२॥ विहितोऽस्य मया मृत्युस्तस्मात् साधु व्युपरम । अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागधः ॥७३॥"
उस समय आकाशमें सब लोगोंके समक्ष सुस्पष्ट स्वरमें दैवी वाणी सुनायी दी—'दूसरोंको मान देनेवाले बलराम ! जरासंधका वध तुम्हारे हाथोंसे होनेवाला नहीं है, अतः खेद न करो। इसकी मृत्युका विधान मेरे द्वारा बना दिया गया है, अतः तुम इस युद्धसे विरत हो जाओ। थोड़े ही समयमें मगधराजको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा' ॥७२-७३॥
जरासंधस्तु तच्छ्रुत्वा विमनाः समपद्यत । न प्राहरत् ततस्तस्मै पुनरेव हलायुधः । तौ व्युपरमतां युद्धाद् वृष्णयस्ते च पार्थिवाः ॥ ७४ ॥ दीर्घकालं महाराज निजघ्नुरितरेतरम् । पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ । विविक्तमभवत् सैन्यं परावृत्तमहारथम् ॥ ७५ ॥
वह आकाशवाणी सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया। तदनन्तर बलरामने उसपर पुनः प्रहार नहीं किया। वे दोनों वीर युद्धसे विरत हो गये। महाराज ! इसके पहले ये वृष्णिवंशी योद्धा और वे राजा लोग दीर्घकालतक एक दूसरेपर प्रहार करते रहे। जब राजा जरासंध पराजित होकर पलायन करने लगा, तब उसकी सारी सेना खाली हो गयी। उसके विशाल रथ पीछेकी ओर लौट गये ॥७४-७५॥
ते नृपाश्वोदितैर्नागैः स्यन्दनैस्तुरगैस्तथा । दुद्रुवुर्भीतमनसो व्याघ्राघ्राता मृगा इव ॥ ७६ ॥
वे राजा व्याघ्रके सूंघे हुए मृगोंके समान मन-ही-मन बहुत डरे हुए थे, अतः अपने हाथी, घोड़े और रथोंको हाँकते हुए रणभूमिसे भाग चले ॥ ७६ ॥
तन्नरेन्द्रैः परित्यक्तं भग्नदर्पैर्महारथैः । घोरं क्रव्यादबहुलं रौद्रमायोधनं वभौ ॥ ७७ ॥
जिनका घमंड चूर-चूर हो गया था, उन महारथी नरेशोंद्वारा परित्यक्त हुए उस घोर युद्धस्थलमें अधिकतर मांसभक्षी जीव-जन्तु ही रह गये थे। इससे वह बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ७७ ॥
द्रवत्सु रथमुख्येषु चेदिराजो महाद्युतिः । स्मृत्वा यादवसम्बन्धं कृष्णमेवान्ववर्तत ॥ ७८ ॥
जब मुख्य-मुख्य रथी भाग चले, तब महातेजस्वी चेदिराज दमघोषने यादवोंके साथ अपने सम्बन्धको स्मरण करके श्रीकृष्णका ही अनुसरण किया ॥ ७८ ॥
वृतः कारूषसैन्येन चेदिसैन्येन चानघ । सम्बन्धकामो गोविन्दमिदमाह स चेदिराट् ॥ ७९ ॥
निष्पाप जनमेजय ! करूष और चेदिदेशकी सेनासे घिरे हुए चेदिराज श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध बढ़ानेकी इच्छासे उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ७९ ॥
३८० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अहं पितृष्वसुर्भर्ता तव यादवनन्दन । सबलस्त्वामुपावृत्तस्त्वं हि मे दयितः प्रभो ॥ ८० ॥
‘यादवनन्दन ! मैं तुम्हारी बूआका पति हूँ और सेना-सहित तुम्हारे पास आया हूँ। प्रभो ! तुम मेरे परम प्रिय हो ॥ ८० ॥
उक्तश्चैष मया राजा जरासंधोऽल्पचेतनः । कृष्णाद् विरम दुर्बुद्धे विग्रहाद् रणकर्मणि ॥ ८१ ॥
‘मैंने इस मन्दबुद्धि राजा जरासंधसे कहा था कि अरे दुर्बुद्धे ! तू इस विग्रहमें श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेसे विरत हो जा, किंतु इसने नहीं माना ॥ ८१ ॥
तदेषोऽद्य मया त्यक्तो मम वाक्यस्य दूषकः । भग्नो युद्धे जरासंधस्त्वया द्रवति सानुगः ॥ ८२ ॥
‘इसने मेरे इस कथनकी निन्दा की थी, अतः अब मैंने इसे त्याग दिया है। युद्धमें तुम्हारे द्वारा पराजित होकर यह जरासंध अपने साथियोंसहित भागा जा रहा है ॥ ८२ ॥
निर्वैरो नैष संयाति स्वपुरं पृथिवीपतिः । त्वय्येव भूयोऽप्यपरं दर्शयिष्यति किल्बिषम् ॥ ८३ ॥
‘परंतु यह राजा वैर-भाव छोड़कर अपने नगरको नहीं लौट रहा है; अतः यह फिर तुम्हारे प्रति ही दूसरे पापपूर्ण कृत्यका प्रदर्शन करेगा ॥ ८३ ॥
तदिमां संत्यजाशु त्वं महीं हतनराकुलाम् । क्रव्यादगणसंकीर्णां सेवितव्याममानुषैः ॥ ८४ ॥
‘इसलिए अब तुम शीघ्र ही इस भूमिको त्याग दो। यह मुर्दे मनुष्योंसे भरी हुई है और यहाँ सब ओर हिंसक प्राणी छा गये हैं। अब यह स्थान मानवेतर (राक्षस आदि) प्राणियोंके ही सेवन करने योग्य है ॥ ८४ ॥
करवीरपुरं कृष्ण गच्छामः सबलानुगाः । शृगालं वासुदेवं वै द्रक्ष्यामस्तत्र पार्थिवम् ॥ ८५ ॥
‘श्रीकृष्ण ! अब हमलोग सैनिकों और सेवकोंसहित करवीरपुरमें चलें। वहाँ शृगालनामसे विख्यात राजा वासुदेव रहते हैं। उनसे हम मिलेंगे ॥ ८५ ॥
इमौ रथवरोदग्रौ युवयोः कारितौ मया । योजितौ शीघ्रतुरगैः खङ्गचक्राक्षकूवरौ ॥ ८६ ॥
‘ये दो श्रेष्ठ रथ मैंने तुम दोनों भाइयोंके लिये तैयार कराये हैं। इनमें शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं। इनके सभी अङ्ग, पहिये, धुरे और कूबर आदि सुदृढ़ हैं ॥ ८६ ॥
शीघ्रमारुह भद्रं ते बलदेवसहायवान् । त्वरामः करवीरस्थं द्रष्टुं तं वसुधाधिपम् ॥ ८७ ॥
‘तुम्हारा भला हो। तुम बलदेवके साथ शीघ्र रथपर आरूढ़ हो जाओ। हमें करवीरपुरमें निवास करनेवाले राजा शृगालसे मिलनेके लिये जल्दी लगी हुई है' ॥ ८७ ॥
वैशम्पायन उवाच पितृष्वसृपतेर्वाक्यं श्रुत्वा चेदिपतेस्तदा । वाक्यं हृष्टमनाः कृष्णो जगाद जगतो गुरुः ॥ ८८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उस समय अपने फूफा चेदिराज दमघोषका यह वचन सुनकर जगद्गुरु श्रीकृष्णके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—॥ ८८ ॥
अहो युद्धाभिसंतप्तौ देशकालोचितं त्वया । बान्धवप्रतिरूपेण संसिक्तौ वचनाम्बुना ॥ ८९ ॥
‘अहो ! हमलोग युद्धसे संतप्त हो गये थे। आपने एक आत्मीय बन्धुकी भाँति आकर अपने देशकालोचित वचन-रूपी जलसे हमें नहला दिया है ॥ ८९ ॥
देशकालविशिष्टस्य हितस्य मधुरस्य च । वाक्यस्य दुर्लभा लोके वक्तारश्चेदिसत्तम ॥ ९० ॥
‘चेदिराज ! इस जगत्में देशकालके अनुरूप हितकर और मधुर वचन बोलनेवाले लोग दुर्लभ हैं ॥ ९० ॥
चेदिनाथ सनाथौ स्वः संवृत्तौ तव दर्शनात् । नावयोः किंचिदप्राप्यं ययोस्त्वं बन्धुरीदृशः ॥ ९१ ॥
‘चेदिनाथ ! आपके दर्शनसे हम दोनों सनाथ हो गये। जब हमारे आप-जैसे बन्धु यहाँ मौजूद हैं, तब यहाँ हमारे लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है ॥ ९१ ॥
जरासंधस्य निधनं ये चान्ये तत्समा नृपाः । पर्याप्तौ त्वत्सनाथौ स्वः कर्तुं चेदिकुलोद्वह ॥ ९२ ॥
‘चेदिकुलभूषण ! हम दोनों आपसे सनाथ होकर जरासंध तथा उसके समान जो दूसरे राजा हैं, उन सबको मौतके घाट उतार देनेमें समर्थ हैं ॥ ९२ ॥
यदूनां प्रथमो बन्धुस्त्वं हि सर्वमहीक्षिताम् । अतःप्रभृति संग्रामान् द्रक्ष्यसे चेदिसत्तम ॥ ९३ ॥
‘चेदिप्रवर ! समस्त राजाओंमें आप ही यदुवंशियोंके प्रथम बन्धु हैं। अबसे आपको बहुत-से संग्राम देखनेको मिलेंगे ॥ ९३ ॥
चाक्रं मौसलमित्येवं संग्रामं रणवृत्तयः । कथयिष्यन्ति लोकेऽस्मिन् ये धरिष्यन्ति पार्थिवाः ॥ ९४ ॥
‘युद्धसे जीवन-निर्वाह करनेवाले जो राजा इस लोकमें जीवित रहेंगे, वे आजके इस चाक्र-मौसल युद्धकी सदा चर्चा करेंगे ॥ ९४ ॥
राज्ञां पराजयं युद्धे गोमन्तेऽचलसत्तमे । श्रवणाद् धारणाद्वापि स्वर्गलोकं व्रजन्ति हि ॥ ९५ ॥
‘पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्तके समीप युद्धमें हमारे द्वारा जो यह राजाओंकी पराजय हुई है, इसके सुनने अथवा स्मरण करने-से भी मनुष्य स्वर्गलोकमें जायँगे ॥ ९५ ॥
तद्गच्छाम महाराज करवीरं पुरोत्तमम् ।
विष्णुपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ३८१
त्वयोद्दिष्टेन मार्गेण चेदिराज शिवाय वै ॥ ९६ ॥
'अतः महाराज चेदिराज ! अब हमलोग आपके बताये हुए मार्गसे अपने कल्याणके लिये उत्तम नगर करवीरपुरको चलें' ॥ ९६ ॥
ते स्यन्दनगताः सर्वे पवनोत्पातिभिर्हयैः ।
भेजिरे दीर्घमध्वानं मूर्तिमन्त इवाग्नयः ॥ ९७ ॥
तदनन्तर वे सब-के-सब तीन मूर्तिमान् अग्नियोंके समान रथपर आरूढ़ हो हवाकी भाँति उड़नेवाले घोड़ोंद्वारा विशाल मार्गपर चल दिये ॥ ९७ ॥
ते त्रिरात्रोषिताः प्राप्ताः करवीरं पुरोत्तमम् ।
शिवाय च शिवे देशे निविष्टास्त्रिदशोपमाः ॥ ९८ ॥
वे देवोपम वीर मार्गमें तीन रात निवास करके उत्तम करवीरपुरमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपने भलेके लिये एक सुखद स्थानमें डेरा डाला ॥ ९८ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि करवीरपुराभिगमने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्ण आदिकी करवीरपुरमें गमनविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा शृगालका वध तथा उसके पुत्रका करवीरपुरके राज्यपर अभिषेक
वैशम्पायन उवाच
तानागतान् विदित्वाथ शृगालो युद्धदुर्मदः ।
पुरस्य धर्षणं मत्वा निर्जगामेन्द्रविक्रमः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! उन सबके आनेका समाचार पाकर इन्द्रके समान पराक्रमी रणदुर्मद राजा शृगाल अपनी पुरीपर आक्रमण हुआ समझकर नगरसे बाहर निकला ॥ १ ॥
रथेनादित्यवर्णेन भास्वता रणगामिना ।
आयुधप्रतिपूर्णेन नेमिनिर्घोषहासिना ॥ २ ॥
मन्दराचलकल्पेन चित्राभरणभूषिणा ।
अक्षय्यसायकैस्तूणैः पूर्णेनार्णवघोषिणा ॥ ३ ॥
हर्यश्वेनाशुगतिनासक्तेन शिखरेष्वपि ।
हेमकूबरगर्भेण दृढाक्षेणातिशोभिना ॥ ४ ॥
सुवन्धुरेण दीप्तेन पतत्त्रिचरगामिना ।
खगतेनेव शक्रस्य हर्यश्वेन रथाद्रिणा ॥ ५ ॥
सावित्रे नियमे पूर्णे यं ददौ सविता स्वयं ।
आदित्यरश्मिभिरिव रश्मिभिर्यो निगृह्यते ॥ ६ ॥
तेन स्यन्दनमुख्येन द्विषत्स्यन्दनघातिना ।
स शृगालोऽभ्ययात्कृष्णं शलभः पावकं यथा ॥ ७ ॥
वह एक श्रेष्ठ रथपर चढ़कर चला । उसका वह रथ सूर्यके समान तेजःपुञ्जसे प्रकाशित हो रहा था । वह रणभूमिमें (अप्रतिहतगति) से जानेवाला था । उसमें सभी तरहके अस्त्र-शस्त्र भरे हुए थे । उसके पहियोंकी जो घरघराहट होती थी, वही मानो उसका अट्टहास था ( अथवा वह पहियोंकी घर्घर ध्वनिसे मेघकी गम्भीर गर्जनाका उपहास कर रहा था)। उसका आकार मन्दराचलके समान था । उस रथको विचित्र आभरणोंसे विभूषित किया गया था । वह अक्षय सायकोंसे भरे हुए तूणीरोंसे परिपूर्ण था तथा समुद्रकी गम्भीर गर्जनाके समान घरघराहट पैदा करता था । उसमें हरे रङ्गके शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए थे । वह पर्वतके शिखरोंपर भी कहीं अटकता नहीं था । उसके कूबरके *भीतरी भागमें सोना जड़ा हुआ था, उसका धुरा भी सुदृढ़ था, उस रथकी बड़ी शोभा हो रही थी । वह सुन्दर रस्सियोंसे भलीभाँति बँधा हुआ था, उसकी दीप्ति सब ओर छिटक रही थी; वह पक्षिराज गरुड़के समान तीव्र गतिसे चलनेवाला था और इन्द्रके हरित अश्वसे जुते हुए आकाशगामी पर्वताकार रथकी समानता करता था । शृगालने नियमपूर्वक गायत्री जप करके सूर्यदेवकी आराधना की थी । उसका वह नियम पूर्ण होनेपर साक्षात् भगवान् सूर्यने उसे वह रथ दिया था, जो सूर्यकी किरणोंके समान सुनहरी बागडोरोंसे उस रथके घोड़ोंको काबूमें लाया जाता था । शत्रुओंके रथोंको नष्ट कर देनेवाले उस श्रेष्ठ रथके द्वारा राजा शृगाल उसी तरह श्रीकृष्णपर चढ़ आया जैसे पतिंगा आगपर टूट पड़ता है॥२-७॥
चापपाणिः सुतीक्ष्णेषुः कवची हेममालिकः ।
सितप्रावरणोष्णीषः पावकाकारलोचनः ॥ ८ ॥
उसके हाथमें धनुष और तीखे बाण शोभा पाते थे । वह कवच धारण करके सोनेकी मालासे विभूषित था । उसकी चादर और पगड़ी श्वेतवर्णकी थी और नेत्र अग्निके समान जलते-से प्रतीत होते थे ॥ ८ ॥
मुहुर्मुहुर्ज्याचपलं विक्षिपन् दुःसहं धनुः ।
निर्वमन् रोषजं वायुं सानलज्वालमण्डलम् ॥ ९ ॥
* कूबर रथका वह भाग है, जिसपर जूआ बाँधा जाता है।
३८२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
वह बारंबार अपने दुःसह धनुषको हिलाता हुआ उसकी प्रत्यञ्चा खींचता था और आगकी ज्वालाओंसे युक्त रोषजनित उच्छ्वास छोड़ रहा था ॥ ९ ॥
भाभिर्भूषणपंक्तीनां दीप्तो मेरुरिवाचलः।
रथस्थ इव शैलेन्द्रः शृगालः प्रत्यदृश्यत ॥ १० ॥
अपने आभूषण-समूहोंकी प्रभाओंसे प्रकाशित होकर वह राजा शृगाल मेरूपर्वतके समान शोभा पाता था और रथपर बैठे हुए गिरिराज-सा दृष्टिगोचर होता था ॥ १० ॥
तस्यारसितशब्देन रथनेमिस्वनेन च।
गुरुत्वेन च नाम्यन्ती चचालोर्वी भयातुरा ॥ ११ ॥
उसके गर्जनेकी ध्वनि, रथके पहियोंकी घर्घराहट और भारीपनसे दबी जाती हुई पृथ्वी भयसे आतुर हो डगमगाने लगी ॥ ११ ॥
तमापतन्तं श्रीमन्तं मूर्तिमन्तमिवाचलम्।
शृगालं लोकपालाभं दृष्ट्वा कृष्णो न विव्यथे ॥ १२ ॥
लोकपालोंके समान तेजस्वी और मूर्तिमान् पर्वतके समान विशालकाय श्रीमान् राजा शृगालको आक्रमण करते देख श्रीकृष्णके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई ॥ १२ ॥
शृगालश्चापि संरब्धः स्यन्दनेनाशुगामिना।
समीपे वासुदेवस्य युयुत्सुः प्रत्यदृश्यत ॥ १३ ॥
इधर शृगाल भी रोषमें भरकर उस शीघ्रगामी रथके द्वारा श्रीकृष्णके पास आकर युद्धके लिये उत्सुक दिखायी देने लगा ॥ १३ ॥
वासुदेवं स्थितं दृष्ट्वा शृगालो युद्धलालसः।
अभिदुद्राव वेगेन मेघराशिरिवाचलम् ॥ १४ ॥
श्रीकृष्णको अपने सामने खड़ा देख शृगालकी युद्ध-लालसा जाग उठी और जिस प्रकार मेघोंका समूह वर्षाद्वारा पर्वतपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने वेगपूर्वक उन-पर धावा किया ॥ १४ ॥
वासुदेवः स्मितं कृत्वा प्रतियुद्धाय तस्थिवान्।
तद् युद्धमभवत् ताभ्यां समरे घोरदर्शनम्।
उभाभ्यामिव मत्ताभ्यां कुञ्जराभ्यां यथा वने ॥ १५ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्ण मुसकराकर उसका सामना करनेके लिये खड़े हो गये; फिर तो समरभूमिमें उन दोनोंका बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा, जैसे वनमें दो मदमत्त हाथी आपसमे लड़ रहे हों ॥ १५ ॥
शृगालस्त्वब्रवीत् कृष्णं समरे समुपस्थितम्।
युद्धरागेण तेजस्वी मोहात्स्खलितगौरवः ॥ १६ ॥
उस समय मोहवश जो अपने गौरवसे गिर गया था, उस तेजस्वी शृगालने समराङ्गणमें उपस्थित हुए श्रीकृष्णसे युद्धविषयक आसक्तिसे प्रेरित होकर कहा ॥ १६ ॥
गोमन्ते युद्धमार्गेण यत् त्वया कृष्ण चेष्टितम्।
अनायकानां मूर्खाणां नृपाणां दुर्बले बले ॥ १७ ॥
स मे सुविदितः कृष्ण क्षत्रियाणां पराजयः।
कृपणानामसत्त्वाना मयुद्धानां रणोत्सवे ॥ १८ ॥
'कृष्ण! तुमने गोमन्तके समीप नायकरहित मूर्ख नरेशों-की दुर्बल सेनाके भीतर युद्धके मार्गसे जो-जो चेष्टाएँ की हैं, उनके विषयमें मुझे सब कुछ भलीभाँति विदित हो गया है। क्षत्रियोंके उस पराजयसे मैं अच्छी तरह परिचित हूँ; परंतु वे क्षत्रिय कायर, धैर्य और शक्तिसे रहित तथा समरोत्सवमें कभी युद्ध न कर सकनेवाले थे ॥ १७-१८ ॥
तिष्ठेदानीं यथाकामं स्थितोऽहं पार्थिवे पदे।
क्व यास्यसि मया रुद्धो रणेष्वापरिनिष्ठितः ॥ १९ ॥
'परंतु इस समय तुम इच्छानुसार युद्ध करनेके लिये खड़े हो जाओ, मैं यहाँ राजाके पदपर प्रतिष्ठित हूँ। यदि मैं तुम्हें सब ओरसे घेरा डालकर रोक लूँ, तो तुम कहाँ जाओगे; क्योंकि तुम तो रणकर्ममें परिनिष्ठित (निपुण) हो नहीं ॥ १९ ॥
न चाहमेकं सबलो युक्तस्त्वां योद्धुमाहवे।
अहमेकस्त्वमप्येको द्वौ युध्यस्व रणे स्थितौ ॥ २० ॥
'तुम अकेले हो और मैं सेनाके साथ हूँ। अतः रणभूमि-में तुम्हारे साथ युद्ध करना मेरे लिये उचित न होगा। इधरसे मैं अकेला रहूँ और उधरसे तुम, फिर हम दोनों समरभूमिमें डटकर युद्ध करें ॥ २० ॥
किं जनेन निरस्तेन त्वं वाहं च रणे स्थितः।
धर्मयुद्धेन निधनं व्रजत्वेकतरो रणे ॥ २१ ॥
'साधारण लोगोंको मारनेसे क्या लाभ? रणभूमिमें खड़े हुए तुम या मैं—दोनोंमेंसे एक योद्धा धर्मयुद्धके द्वारा मृत्युको प्राप्त हो ॥ २१ ॥
लोकेऽस्मिन् वासुदेवोऽहं भविष्यामि हते त्वयि।
हते मयि त्वमप्येको वासुदेवो भविष्यसि ॥ २२ ॥
'तुम्हारे मारे जानेपर इस संसारमें मैं अकेला ही वासुदेव रहूँगा और मेरे मारे जानेपर तुम भी अकेले वासुदेव बने रहोगे' ॥ २२ ॥
शृगालस्य वचः श्रुत्वा वासुदेवः क्षमापरः।
ईर्ष्यान्तं प्रहरस्वेति तमुक्त्वा चक्रमददे ॥ २३ ॥
शृगालकी यह बात सुनकर क्षमाशील भगवान् वासुदेव-ने उस ईर्ष्यालु नरेशसे कहा, 'पहले तुम प्रहार करो' ऐसा कहकर उन्होंने हाथमें चक्र ले लिया ॥ २३ ॥
ततः सायकजालानि शृगालः क्रोधमूर्च्छितः।
चिक्षेप कृष्णे घोराणि युद्धाय लघुविक्रमः ॥ २४ ॥
तब युद्धके लिये शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले
विष्णुपर्व ] चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ३८३
शृगालने क्रोधमे उन्मत्त होकर श्रीकृष्णपर घोर वाण-समूहोंकी वर्षा आरंभ कर दी ॥ २४ ॥
शस्त्राणि यानि चान्यानि मुसलाद्यानि संयुगे ।
पातयामास गोविन्दे स शृगालः प्रतापवान् ॥ २५ ॥
प्रतापी शृगालने उस युद्धमें गोविन्दपर मूसल आदि अन्य शस्त्रोंका भी प्रहार किया ॥ २५ ॥
शृगालप्रहितैरस्त्रैः पावकज्वालमालिभिः ।
निर्दयाभिहतः कृष्णः स्थितो गिरिरिवाचलः ॥ २६ ॥
सोऽस्त्रप्रहाराभिहतः किंचिद् रोषसमन्वितः ।
चक्रमुद्यम्य गोविन्दः शृगालस्य परिक्षिपत् ॥ २७ ॥
शृगालके चलाये हुए अस्त्रोंद्वारा, जिनसे आगकी लपटें उठ रही थीं, निर्दयतापूर्वक आहत होनेपर भी श्रीकृष्ण पर्वतके समान अविचल-भावसे खड़े रहे। उसके अस्त्रोंके प्रहारसे घायल होकर किञ्चित् रोषसे युक्त हुए भगवान् गोविन्दने चक्र उठाकर शृगालपर प्रहार किया ॥ २६-२७ ॥
तं रथस्थं प्रमाणस्थं शृगालं युद्धदुर्मदम् ।
जघान समरे चक्रं जातदर्पं महाबलम् ॥ २८ ॥
रणदुर्मद महाबली शृगाल घमण्डमें भरकर रथपर ही बैठा रहा, अपनी जगहसे हटा नहीं। इसी समय (भगवान्के चलाये हुए) चक्रने समरभूमिमें उसपर गहरी चोट की ॥ २८ ॥
ततः सुदर्शनं चक्रं पुनरायाद् गुरोः करे ।
चक्रेणोरसि निर्भिन्नः स गतासुर्गतोत्सवः ।
पपात क्षतजस्रावी शृगालोऽद्रिरिवाहतः ॥ २९ ॥
इसके बाद सुदर्शन चक्र पुनः जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णके हाथमें आ गया। उस चक्रसे आहत होकर शृगालकी छाती फट गयी और वह वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति खूनकी धारा बहाता हुआ प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके जीवनका सारा आनन्दोत्सव समाप्त हो गया ॥ २९ ॥
निशाम्य तं निपतितं वज्रपातादिवाचलम् ।
तस्य सैन्यान्यपययुर्विमनांसि हते नृपे ॥ ३० ॥
वज्रपातसे धराशायी हुए पर्वतकी भाँति राजा शृगालको पृथ्वीपर पड़ा देख, उसके मारे जानेपर उसके सारे सैनिक खिन्नचित्त होकर भाग गये ॥ ३० ॥
केचित् प्रविश्य नगरं कश्मलाभिहता भृशम् ।
रुरुदुर्दुःखसंतप्ता भर्तृशोकाभिपीडिताः ॥ ३१ ॥
कुछ सैनिक नगरमे प्रवेश करके अत्यन्त मोहग्रस्त, दुःखसे सन्तप्त तथा स्वामीके शोकसे पीड़ित हो फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ३१ ॥
केचित् तत्रैव शोचन्तः स्मरन्तः सुकृतानि च ।
पतितं भूपतिं भूमौ न त्यजन्ति स्म दुःखिताः ॥ ३२ ॥
कुछ सैनिक वहीं शोक करने लगे। वे स्वामीके उपकारोंका स्मरण करके दुखी हो भूमिपर पड़े हुए भूपालको छोड़ नहीं रहे थे ॥ ३२ ॥
ततो मेघनिनादेन स्वरेणारिविमर्दनः ।
कृष्णः कमलपत्राक्षो जनानामभयं ददौ ॥ ३३ ॥
तदनन्तर शत्रुमर्दन कमलनयन श्रीकृष्णने मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे उन सब लोगोंको अभयदान दिया ॥ ३३ ॥
चक्रोचितेन हस्तेन राजताङ्गुलिपर्वणा ।
न भेतव्यं न भेतव्यमिति तानभ्यभाषत ॥ ३४ ॥
नास्य पापस्य दोषेण निराबाधकरं जनम् ।
घातयिष्यामि समरे नेदं शूरव्रतं मतम् ॥ ३५ ॥
उन्होंने अङ्गुलिपर्वसे सुशोभित तथा चक्र धारण करनेके योग्य उठे हुए दाहिने हाथके द्वारा संकेत करके उन सब-से कहा, 'सैनिको ! तुम डरो मत ! डरो मत !! इस पापीके अपराधसे मैं समरभूमिमें निरपराध मनुष्योंका वध नहीं करूँगा; क्योंकि—यह वीरोंका व्रत नहीं है' ॥ ३४-३५ ॥
अश्रुपूर्णमुखा दीनाः क्रन्दमाना भृशं तदा ।
ते स्म पश्यन्ति पतितं धरण्यां धरणीपतिम् ॥ ३६ ॥
चक्रनिर्दारितोरस्कं भिन्नशृङ्गमिवाचलम् ॥ ३७ ॥
वे सैनिक अत्यन्त दीनभावसे क्रन्दन करते हुए उस समय पृथ्वीपर पड़े हुए पृथ्वीपति शृगालकी ओर देख रहे थे। उनका सारा मुखमण्डल आँसुओंसे भींगा हुआ था। राजाका वक्षःस्थल चक्रसे विदीर्ण हो गया था। वह टूटे हुए शिखरवाले पर्वतके समान भूमिपर पड़ा था ॥ ३६-३७ ॥
विलपन्ति स्म ते सर्वे सचिवाः सप्रजा भृशम् ।
साश्रुपातेक्षणा दीनाः शोकस्य वशमागताः ॥ ३८ ॥
वे समस्त सचिव तथा प्रजावर्गके लोग शोकके वशीभूत हो नेत्रोंसे अश्रुपात करते हुए अत्यन्त दीनभावसे विलाप करते थे ॥ ३८ ॥
तेषां रुदितशब्देन पौराणां विस्वरैः स्वरैः ।
महिष्यस्तस्य निष्पेतुः सपुत्रा रुदिताननाः ॥ ३९ ॥
उन पुरवासियोंके रोनेके शब्द तथा फटे हुए स्वरोंसे अनिष्टकी आशङ्का करके राजा शृगालकी रानियाँ भी पुत्रोंको साथ लिये रोती हुई वहाँ निकल आयीं ॥ ३९ ॥
तास्तं निपतितं दृष्ट्वा श्लाघ्यं भूमिपतिं पतिम् ।
स्तनानाुरुज्य करजैर्भृशार्ताः पर्यदेवयन् ॥ ४० ॥
अपने स्पृहणीय पति भूमिपाल शृगालको वहाँ धरतीपर पड़ा देख वे रानियाँ अत्यन्त आर्त हो अपनी अङ्गुलियोंसे स्तनोंको नोचती हुई करुण विलाप करने लगीं ॥ ४० ॥
३८४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
उरांस्युरसिजांश्चैव शिरोजान्याकुलान्यपि ।
निर्दयं ताडयन्त्यस्ता विस्वरं रुरुदुः स्त्रियः ॥ ४१ ॥
वे स्त्रियाँ अपनी छाती, स्तन और वहाँ फैले हुए सिरके बालोंको भी निर्दयतापूर्वक पीटती हुई फुक्का फाड़-फाड़कर रोने लगीं ॥ ४१ ॥
तस्योरसि सुदुःखार्ता मृदिताः क्लिन्नलोचनाः ।
पेतुरूध्वंभुजाः सर्वाश्छिन्नमूला लता इव ॥ ४२ ॥
वे सब रानियाँ अत्यन्त दुःखसे आतुर और मर्दित हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई दोनों बाँहें ऊपर उठाकर जड़से कटी हुई लताओंकी भाँति राजाकी छातीपर गिर पड़ीं ॥ ४२ ॥
तासां बाष्पाम्बुपूर्णानि नेत्राणि नृपयोषिताम् ।
वारिविप्रहतानीव पङ्कजानि चकाशिरे ॥ ४३ ॥
उन राजरानियोंके आँसूभरे नेत्र जल (या ओले) से आहत हुए कमलोंके समान प्रकाशित होते थे ॥ ४३ ॥
ताः पतिं पतितं भूमौ रुदन्त्यो हृदि ताडिताः ।
लालप्यमानाः करुणं योषितः पर्यदेवयन् ॥ ४४ ॥
धरतीपर पड़े हुए पतिकी ओर देखकर रोती और छाती पीटती हुई ये राजपत्नियां करुण विलाप करती हुई शोकोद्गार प्रकट करने लगीं ॥ ४४ ॥
पुत्रं चास्य पुरस्कृत्य बालं प्रस्रुतलोचनम् ।
शक्रदेवं पितुः पार्श्वे द्विगुणं रुरुदुः स्त्रियः ॥ ४५ ॥
उस राजाके बालक पुत्र शक्रदेवको अपने आगे पिताके पास खड़ा करके वे रानियाँ और दूने वेगसे रोने तथा विलाप करने लगीं । उस बालकके नेत्रोंसे भी आँसू बह रहा था ॥
अयं ते वीर विक्रान्तो बालः पुत्रो न पण्डितः ।
त्वद्विहीनः कथमयं पदे स्थास्यत पैतृके ॥ ४६ ॥
वे बोलीं—'वीर महाराज ! यह आपका पराक्रमी पुत्र अभी बालक है, विद्वान् नहीं हो सका है । अब आपके बिना यह अपने पैतृक राज्यपर कैसे प्रतिष्ठित हो सकेगा ? ॥ ४६ ॥
कथमेकपदे त्यक्त्वा गतोऽस्यन्तःपुरं परम् ।
अतृप्तास्तव सौख्यानां किं कुर्मो विधवा वयम् ॥ ४७ ॥
'(प्राणनाथ !) आप अपने अन्तःपुरकी रानियोंको सहसा त्यागकर क्यों परलोकको चले गये ? हम आपके दिये हुए सुखोंसे अभी तृप्त नहीं हुई थीं । हाय ! हम विधवा हो गयीं, अब क्या करें ?' ॥ ४७ ॥
तस्य पद्मावती नाम महिषी प्रमदोत्तमा ।
रुदती पुत्रमादाय वासुदेवमुपस्थिता ॥ ४८ ॥
राजा शृगालकी पटरानीका नाम पद्मावती था । वह स्त्रियोंमें श्रेष्ठ थी । पद्मावती रोती हुई अपने पुत्रको साथ ले भगवान् वासुदेवके पास गयी ॥ ४८ ॥
यस्त्वया पातितो वीर रणप्रोक्तेन कर्मणा ।
तस्य प्रेतगतस्यायं पुत्रस्त्वां शरणं गतः ॥ ४९ ॥
और बोली—'वीर ! आपने युद्ध-कर्मके द्वारा जिन्हें मार गिराया है, उन्हीं परलोकवासी नरेशका यह पुत्र आपकी शरणमें आया है ॥ ४९ ॥
यदि त्वां प्रणमेतासौ कुर्याद् वा शासनं तव ।
नायमेकप्रहारेण जनस्तप्येत दारुणम् ॥ ५० ॥
'यदि ये महाराज आपको प्रणाम करते—आपके सम्मुख विनीत भावका परिचय देते अथवा आपकी आज्ञाका पालन करते तो आपके एक ही प्रहारसे इन्हें संतापका भागी नहीं होना पड़ता ॥ ५० ॥
यदि कुर्यादयं मूढस्त्वयि बान्धवकं विधिम् ।
नैवं परीतः कृपणः सेवेत धरणीतलम् ॥ ५१ ॥
'यदि ये मूढ (विवेकशून्य) नरेश आपके प्रति बन्धु-जनोचित बर्ताव करते तो इन्हें मांसभक्षी जन्तुओंसे घिरकर पृथ्वीका सेवन नहीं करना पड़ता ॥ ५१ ॥
अयमस्य विपन्नस्य बान्धवस्य तवानघ ।
सन्तती रक्ष्यतां वीर पुत्रः पुत्र इवात्मजः ॥ ५२ ॥
'अनघ ! वीर ! यह आपके इस मरे हुए बान्धवकी ही सन्तति है; आप अपने पुत्रकी ही भाँति इसकी रक्षा करें' ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा महिष्या यदुनन्दनः ।
मृदुपूर्वमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ॥ ५३ ॥
रानीका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ यदुनन्दन श्रीकृष्णने मधुर वाणीमें कहा--॥ ५३ ॥
राजपत्नि गतो रोषः सहानेन दुरात्मना ।
प्रकृतिस्था वयं जाता देवि सैषोऽस्मि बान्धवः ॥ ५४ ॥
'राजरानी ! मेरा रोष तो इस दुरात्माके मारे जानेके साथ ही दूर हो गया । देखें ! अब हम स्वाभाविक स्थितिमें हैं । मैं आपका वही भाई-बन्धु हूँ ॥ ५४ ॥
रोषो मे विगतः साध्वि तव वाक्यैरकल्मषैः ।
योऽयं पुत्रः शृगालस्य ममाप्येष न संशयः ॥ ५५ ॥
'साध्वी रानी ! तुम्हारे इन निर्दोष वचनोंसे मेरा सारा क्रोध दूर हो गया । राजा शृगालका जो यह पुत्र है, यह मेरे लिये भी पुत्रके ही समान है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५५ ॥
अभयं चाभिषेकं च ददाम्यस्मै सुखाय वै ।
आहूयन्तां प्रकृतयः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ॥ ५६ ॥
पितृपैतामहे राज्ये तत्र पुत्रोऽभिषिच्यताम् ।
'मैं इसके सुखके लिये इसे अभय देनेके साथ ही इसका राज्याभिषेक भी कर दूँगा । आप समस्त प्रकृतियों तथा मन्त्री और पुरोहितोंको भी बुलवाइये, जिससे आपके इस पुत्र-
विष्णुपर्व ] पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः [ ३८५
को, इसके बाप-दादोंके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जाय' ॥
ततः प्रकृतयः सर्वाः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ॥ ५७ ॥
अभिषेकार्थमाजग्मुर्यतो वै रामकेशवौ ।
तदनन्तर, सारी प्रकृतियाँ (प्रजा आदि), पुरोहित और मन्त्री भी राजकुमारका अभिषेक करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ श्रीबलराम और श्रीकृष्ण विराजमान थे ॥ ५७ ॥
ततः सिंहासनस्थं तु राजपुत्रं जनार्दनः ॥ ५८ ॥
अभिषेकेन दिव्येन योजयामास वीर्यवान् ।
इसके बाद पराक्रमी भगवान् जनार्दनने राजकुमारको राज्य सिंहासनपर बिठाकर दिव्य अभिषेककी विधिसे उसका राज्याभिषेक कर्म सम्पन्न किया ॥ ५८ ॥
अभिषिच्य शृगालस्य करवीरपुरे सुतम् ।
कृष्णस्तदहरेवाशु प्रस्थानमभ्यरोचयत् ॥ ५९ ॥
शृगालके पुत्रको करवीरपुरके राज्यपर अभिषिक्त करके श्रीकृष्णने उसी दिन वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर देना उचित समझा ॥ ५९ ॥
रथेन हरियुक्तेन तेन युद्धार्जितेन वै ।
केशवः प्रस्थितोऽध्वानं वृत्रहा त्रिदिवं यथा ॥ ६० ॥
जैसे इन्द्र स्वर्गलोकको जाते हैं, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण भी युद्धमें प्राप्त हुए उस अश्वयुक्त रथके द्वारा मथुराके पथपर चल दिये ॥ ६० ॥
शक्रदेवोऽपि धर्मात्मा सह मात्रा परंतपः ।
सबालवृद्धयुवतीमुख्याः प्रकृतयस्तथा ॥ ६१ ॥
शिविकायामथारोप्य शृगालं युद्धदुर्मदम् ।
संहता दूरमार्गेण पश्चिमाभिमुखा ययुः ॥ ६२ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाला धर्मात्मा राजा शक्रदेव भी माताके साथ बालक, वृद्ध और युवती आदि सारी प्रकृतियोंको साथ ले रणदुर्मद शृगालके शवको पालकीमें सुलाकर सब लोग संगठित हो नगरसे दूरके रास्तेपर पश्चिमाभिमुखी ओर चले ॥ ६१-६२ ॥
नैधनस्य विधानेन चक्रुस्ते तस्य सत्क्रियाम् ।
सत्कारं कारयामासुः पितॄणां पारलौकिकम् ॥ ६३ ॥
श्मशान-भूमिमें ले जाकर अन्त्येष्टिकी विधिसे उन सबने शक्रदेवद्वारा राजाका दाह-संस्कार करवाया और पितरोंके लिये पारलौकिक कृत्यका सम्पादन कराया ॥ ६३ ॥
उद्दिश्योद्दिश्य राजानं श्राद्धं कृत्वा सहस्रशः ।
ततस्ते सलिलं दत्त्वा नामगोत्रादि कीर्तनैः ॥ ६४ ॥
पितुर्युपरते घोरे शोकसंविनमानसाः ।
कृत्वोदकं तदा राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ६५ ॥
राजाके उद्देश्यसे सहस्रों प्रकारकी वस्तुएँ श्राद्धमें देकर उन सबने शृगालके लिये नाम-गोत्र आदिके उच्चारणपूर्वक जलदान किया। इस प्रकार पिताकी घोर मृत्यु हो जानेपर शोकसे व्याकुलचित्त हुए राजा शक्रदेवने उन्हे जलाञ्जलि देकर अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया ॥ ६४-६५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि शृगालवधो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें शृगालका वधनामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमन और स्वागत
वैशम्पायन उवाच
तौ तु स्वल्पेन कालेन दमघोषेण संगतो ।
अथाध्वविधिना तौ तु पञ्चरात्रोषितौ पथि ॥ १ ॥
दमघोषेण संगम्य एकरात्रोषिताविव ।
जग्मतुः सहितौ वीरौ मुदा परमया युतौ ।
नगरीं मथुरां प्राप्तौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर, वे दोनों भाई चेदिराज दमघोषके साथ मिलकर यात्रा करने लगे। मार्गके नियमानुसार चलते हुए उन्होंने बीच-बीचमें पाँच रात निवास किया; किंतु दमघोषके साथ रहनेसे उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि हम एक ही रात मार्गमें रहे हैं। इस प्रकार परमानन्दसे सम्पन्न हो वे दोनों वीर वसुदेवकुमार साथ-साथ थोड़े ही समयमें मथुरा नगरीमें जा पहुँचे ॥ १-२ ॥
ततः प्रत्युद्गताः सर्वे यादवा यदुनन्दनौ ।
सबला हृष्टमनस उग्रसेनपुरोगमाः ॥ ३ ॥
उस समय उग्रसेन आदि सभी यादवोंने सेनासहित आगे आकर प्रसन्नचित्तसे उन दोनों यदुनन्दन वीरोंका स्वागत किया ॥ ३ ॥
श्रेण्यः प्रकृतयश्चैव मन्त्रिणश्च यथोचिताः ।
सबालवृद्धा सा चैव पुरी समभिवर्तत ॥ ४ ॥
अनेक प्रकारके शिल्पियोंद्वारा जीवन-निर्वाह करनेवाले नाना जातिके शिल्पी, प्रजावर्ग, मन्त्री तथा बालकों और
३८६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
वृद्धोंसहित सारी मथुरापुरी यथोचित रीतिसे उनके स्वागतमें जुटी थी॥ ४॥
नन्दितूर्याण्यवाद्यन्त स्तूयेतां पुरुषर्षभौ।
रथ्याः पताकामालिन्यो भासन्ति स्म समन्ततः॥ ५॥
आनन्दवर्धक मङ्गल-वाद्य बजने लगे। उन दोनों पुरुष-प्रवर वीरोंकी स्तुति होने लगी। सब ओरकी गलियाँ और सड़कें पताकाओंसे अलङ्कृत हो उत्तम शोभा पाने लगीं॥
हृष्टा प्रमुदिता सर्वा पुरी परमशोभिता।
आश्रोस्तयोरागमने यथैवेन्द्रमहे तथा॥ ६॥
उन दोनों भाइयोंके आनेसे इन्द्रोत्सवके समान सारी पुरी परम शोभासे सम्पन्न हो हर्षसे खिल उठी। सर्वत्र आनन्द छा गया॥ ६॥
मुदितास्तत्र गायन्ति राजमार्गेषु गायकाः।
स्तवाशीर्बहुला गाथा यादवानां प्रियंकराः॥ ७॥
सड़कोंपर आनन्दमग्न हुए गायक यादवोंको प्रिय लगने-वाली आशीर्वादयुक्त गाथाएँ गा रहे थे॥ ७॥
गोविन्दरामौ सम्प्राप्तौ भ्रातरौ लोकविश्रुतौ।
स्वे पुरे निर्भयाः सर्वे क्रीडध्वं यादवाः सुखम्॥ ८॥
और सर्वत्र यह घोषणा करते थे कि 'यादवो! विश्वविख्यात वीर दोनों भाई श्रीकृष्ण और बलराम अब अपने नगरमें आ गये हैं, अतः सबलोग निर्भय होकर सुखपूर्वक क्रीड़ा करो'॥ ८॥
न तत्र कश्चिद् दीनो वा मलिनो वा विचेतनः।
मथुरायामभूत् कश्चिद् रामकृष्णसमागमे॥ ९॥
बलराम और श्रीकृष्णके आ जानेपर उस मथुरापुरीमें कोई भी दीन, मलिन अथवा उदासचित्त नहीं दिखायी देता था॥ ९॥
वयांसि साधुवाक्यानि प्रहृष्टा गोहयद्विपाः।
नरनारीगणाश्चैव भेजिरे मानसं सुखम्॥ १०॥
पक्षी सुमधुर बोली बोलते थे; गौ, घोड़े और हाथी भी बहुत प्रसन्न थे तथा स्त्रियों और पुरुषोंके मनको भी बड़ा ही सुख मिला॥ १०॥
शिवाश्च प्रववुर्वाता विरजस्का दिशो दश।
दैवतान्यपि सर्वाणि हृष्यन्त्यायतनेष्वथ॥ ११॥
शीतल एवं सुखदायिनी हवाएँ चलने लगीं, दसों दिशाओंकी धूल उड़ गयी और मन्दिरोंमें स्थित सम्पूर्ण देवता भी बड़े प्रसन्न हुए॥ ११॥
यानि लिङ्गानि लोकस्य वृत्तानीह कृते युगे।
तानि सर्वाण्यदृश्यन्त तयोरागमने तदा॥ १२॥
सत्ययुग आनेपर इस जगत्में जो-जो लक्षण एवं वृत्तान्त घटित होते हैं, वे सब-के-सब श्रीकृष्ण एवं बलरामके आगमन-पर प्रत्यक्ष दिखायी देने लगे॥ १२॥
ततः काले शिवे पुण्ये स्यन्दनेनारिमर्दनौ।
हरियुक्तेन तौ वीरौ प्रविष्टौ मथुरां पुरीम्॥ १३॥
तदनन्तर, मङ्गलमय पुण्यमुहूर्तमें वे दोनों शत्रुमर्दन वीर उस अश्वयुक्त रथके द्वारा मथुरापुरीमें प्रविष्ट हुए॥ १३॥
प्रविशन्तं पुरीं रम्यां गोविन्दं राममेव च।
अनुजग्मुर्यदुगणाः शक्रं देवगणा इव॥ १४॥
उस रमणीय पुरीमें प्रवेश करते समय श्रीकृष्ण और बलरामके पीछे समस्त यादव उसी प्रकार चले, जैसे देवता इन्द्रके पीछे चलते हैं॥ १४॥
वसुदेवस्य भवनं पितुस्तौ यदुनन्दनौ।
प्रविष्टौ दृष्टवदनौ चन्द्रादित्याविवाचलम्॥ १५॥
जैसे चन्द्रमा और सूर्य सुमेरुपर्वतकी गुफामें प्रवेश करते हों, उसी प्रकार वे दोनों यदुनन्दन वीर पिता वसुदेवके घरमें प्रविष्ट हुए। उस समय उन दोनोंके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी॥ १५॥
तत्रायुधानि संन्यस्य गृहे स्वे स्वैरचारिणौ।
समुदाते यदुवरौ वसुदेवसुतावुभौ॥ १६॥
वहाँ अपने घरमें आयुधोंको रखकर वे दोनों यदुकुल-तिलक वसुदेवपुत्र स्वेच्छानुसार विचरते हुए आनन्दमग्न रहने लगे॥ १६॥
ततस्तु वसुदेवस्य पादौ समभिपीड्य च।
तत्रोग्रसेनं राजानमन्यांश्च यदुपुङ्गवान्॥ १७॥
यथान्यायं पूजयित्वा तौ सर्वैश्चाभिनन्दितौ।
जग्मतुर्हृष्टमनसौ मातुरेव निवेशनम्॥ १८॥
तदनन्तर, वसुदेवजीके दोनों चरणोंको दबाकर राजा उग्रसेन तथा अन्य प्रधान यदुवंशियोंका यथोचित सत्कार करनेके पश्चात् उन सबके द्वारा स्वयं भी अभिनन्दित हो, वे दोनों भाई प्रसन्न मनसे माताके ही महलमें चले गये १७-१८
एवं तावेकनिर्माणौ मथुरायां शुभाननौ।
उग्रसेनानुगौ भूत्वा कंचित्कालं सुमोदतुः॥ १९॥
इस प्रकार एक ही तत्त्वके बने और एक ही उद्देश्यकी सिद्धिके लिये प्रकट हुए वे दोनों श्रीकृष्ण और बलराम राजा उग्रसेनके अनुगामी होकर कुछ कालतक वहाँ सुखसे रहे॥ १९॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामकृष्णयोर्मथुरां प्रत्यागमने पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलराम और श्रीकृष्णका मथुरामें प्रत्यागमनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥