भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 397

विष्णुपर्व ] त्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः ३७५


उन दोनों पुत्रोंको पर्वतसे कूदकर आया देख उन नरेशोंकी सारी सेनामें हलचल मच गयी। उसके वाहनोंपर मोह छा गया ॥ १ ॥

बाहुप्रहरणौ तौ तु चेरतुस्तत्र यादवौ ।
मकराविव संरुद्धौ समुद्रक्षोभणावुभौ ॥ २ ॥

रोषमें भरे हुए वे दोनों यदुवंशी वीर अपनी भुजाओंसे ही आयुधका काम लेते हुए उस विशाल सेनामें विचरने लगे, जैसे दो महान् मगर समुद्रको विक्षुब्ध करते हुए उसके भीतर घूम रहे हों ॥ २ ॥

ताभ्यां मृधे प्रविष्टाभ्यां यादवाभ्यां मतिस्त्वभूत् ।
आयुधानां पुराणानामादानकृतलक्षणा ॥ ३ ॥

समराङ्गणमें प्रविष्ट होनेपर उन दोनों यादवोंके मनमें अपने पुराने आयुधोंको ग्रहण करनेका विचार हुआ ॥ ३ ॥

ततोऽम्बरतलाद् भूयः पतन्ति स्म महात्मनोः ।
मध्ये राजसहस्रस्य समरं प्रतिकाङ्क्षिणोः ॥ ४ ॥
यानि वै माथुरे युद्धे प्राप्तान्याहवशोभिनोः ।

फिर तो सहस्रो राजाओके बीचमें युद्धकी आकांक्षा रखने तथा समरमें शोभा पानेवाले उन दोनों महात्माओंके हाथमें आकाशसे वे ही अस्त्र-शस्त्र आ गये, जो मथुराके युद्धमें उन दोनोंको प्राप्त हुए थे ॥ ४½ ॥

तान्यम्बरात् पतन्ति स्म दिव्याान्याहवसप्लवे ॥ ५ ॥
लेलिहानानि दीप्तानि दीप्ताग्निसदृशानि वै ।
निक्षिप्य यानि तत्रैव तानि प्राप्तौ स्म यादवौ ॥ ६ ॥

उस युद्धसम्बन्धी विप्लवके समय वे ही प्रज्वलित अग्निके तुल्य तेजस्वी, दीप्तिमान् तथा शत्रुओंको चाट जानेवाले दिव्यास्त्र आकाशसे आ पड़े। जिन्हें वे यादव-वीर मथुरामें ही (आकाशमें) फेंककर चले गये थे, उन यदुवंशी वीरोंको पुनः उन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्ति हो गयी ॥ ५-६ ॥

क्रव्यादैरनुयातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च ।
तृषितान्याहवे भोक्तुं नृपमांसानि सर्वशः ॥ ७ ॥

उन अस्त्रोंके पीछे मांसभक्षी भूत-प्रेत आदि भी आ रहे थे। वे विशाल अस्त्र मूर्तिमान् होकर उस युद्धमे समस्त राजाओंके रक्त-मांसका उपभोग करनेके लिये मानो भूखे-प्यासे थे ॥ ७ ॥

दिव्यस्रग्दामधारीणि त्रासयन्ति च खेचरान् ।
प्रभया भासमानानि दंशितानि दिशो दश ॥ ८ ॥

उन सबने दिव्य पुष्पोंकी मालाएँ धारण की थीं। वे अपनी प्रभासे प्रकाशित होकर दसों दिशाओंको सुशोभित करते थे और आकाशचारी प्राणियोंको भी भयभीत कर देते थे ॥ ८ ॥

हलं सांवर्तकं नाम सौनन्दं मुसलं तथा ।
चक्रं सुदर्शनं नाम गदां कौमोदकीं तथा ॥ ९ ॥
चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि वै ।
ताभ्यां समवतीर्णानि यादवाभ्यां महामृधे ॥ १० ॥

सांवर्तक हल, सौनन्द मूसल, सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा—भगवान् विष्णुके ये चार तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र उस महासमरमें उन दोनों यादव-वीरोंके लिये उतरे थे ॥ ९-१० ॥

जग्राह प्रथमं रामो ललामप्रतिमं रणे ।
सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं दिव्यमालाकुलं हलम् ॥ ११ ॥

पहले बलरामजीने रणभूमिमें सुन्दर आकृतिवाले सर्पराजके समान सर्पणशील तथा दिव्यमालाओंसे अलंकृत हलको अपने दायें हाथमे ग्रहण किया ॥ ११ ॥

सव्येन सात्वतां श्रेष्ठो जग्राह मुसलोत्तमम् ।
सौनन्दं नाम बलवान् निरानन्दकरं द्विषाम् ॥ १२ ॥

फिर उन यदुकुलतिलक बलवान् वीरने बायें हाथसे सौनन्द नामक उत्तम मूसलको ग्रहण किया, जो शत्रुओंको आनन्दशून्य कर देनेवाला था ॥ १२ ॥

दर्शनीयं च लोकेषु चक्रमादित्यवर्चसम् ।
नाम्ना सुदर्शनं नाम प्रीतो जग्राह केशवः ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने सम्पूर्ण लोकोंमे दर्शनीय तथा सूर्यके समान तेजस्वी सुदर्शन नामक चक्रको बड़ी प्रसन्नताके साथ ग्रहण किया ॥ १३ ॥

दर्शनीयं च लोकेषु धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
नाम्ना शार्ङ्गमिति ख्यातं प्रीतो जग्राह वीर्यवान् ॥ १४ ॥

फिर समस्त लोकोंमें दर्शनीय तथा मेघोंकी गर्जनाके समान टंकारध्वनि करनेवाले शार्ङ्ग नामसे विख्यात धनुषको भी उन बलवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक अपने हाथमें ले लिया ॥

देवैर्निगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे ।
निपक्ता कुमुदाक्षस्य नाम्ना कौमोदकीति सा ॥ १५ ॥

तदनन्तर देवताओंने जिनसे अपना प्रयोजन निवेदन किया था तथा जिनके नेत्र विकसित कुमुद-कुसुमके समान शोभायमान हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णके दूसरे हाथमें कौमोदकी नामक गदा आ गयी ॥ १५ ॥

तौ सप्रहरणौ वीरौ साक्षाद्विष्णुतनुपमौ ।
समरे रामगोविन्दौ रिपूंस्तान् प्रत्ययुद्ध्यताम् ॥ १६ ॥

साक्षात् विष्णुके-से विग्रहवाले वे दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण जब अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो गये, तब समरभूमिमें उन शत्रुओंके साथ युद्ध करने लगे ॥ १६ ॥

आयुधप्रग्रहौ वीरौ तावन्योन्यमयावुभौ ।
पूर्वजानुजसंह्रदौ तु रामगोविन्दलक्षणौ ॥ १७ ॥

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित) · पृष्ठ 397, कुल 1169 में से · BharatKosha