भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 396

३७४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे


अविचल रहनेवाले श्रीकृष्ण ! इस गोमन्त पर्वतसे उन्ऋण होनेके लिये हमलोग अपनी भुजाओंसे ही इन क्षत्रियोंको मार डालेंगे ॥ ७६ ॥

एते ते क्षत्रियाः सर्वे गिरिमादीप्य दंशिताः ।
रथिनस्तात दृश्यन्ते यथादेशं युयुत्सवः ॥ ७७ ॥

'तात ! ये सारे क्षत्रिय इस पर्वतको जलाकर कवच आदिसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर यथास्थान युद्ध करनेके लिये उत्सुक दिखायी देते हैं ॥ ७७ ॥

एवमुक्त्वा गिरेः शृङ्गान्ममेरुशृङ्गादिवोडुराट् ।
निपपात बलः श्रीमान् वनमालाधरो युवा ॥ ७८ ॥

ऐसा कहकर मेरु पर्वतके शिखरसे नीचे उतरनेवाले चन्द्रमाके समान कान्तिमान् वनमालाधारी नवयुवक बलराम गोमन्त पर्वतकी चोटीसे कूद पड़े ॥ ७८ ॥

कादम्बरीमदक्षीबो नीलवासाः सिताननः ।
स शारदेन्दुसंकाशो वनमालाञ्चितोदरः ॥ ७९ ॥

उस समय वे कादम्बरी (सुधा या मधु) के मदसे कुछ मत्त-से हो रहे थे । उनके शरीरपर नील वस्त्र शोभा पाता था । उनका मुख गौर वर्णका था । वे शरत्-कालके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल प्रभासे उद्भासित हो रहे थे । उनका उदरभाग वन-मालासे अलंकृत था ॥ ७९ ॥

कान्तैककुण्डलधरश्चारुमौलिरवाङ्मुखः ।
निपपात नरेन्द्राणां मध्ये केशवपूर्वजः ॥ ८० ॥

उन्होंने एक कानमें कमनीय कुण्डल धारण कर रखा था तथा उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट शोभा दे रहा था । श्रीकृष्णके बड़े भाई बलराम नीचे मुँह किये राजाओंके बीचमें ही कूद पड़े ॥ ८० ॥

अवप्लुते ततो रामे कृष्णः कृष्णाम्बुदोपमः ।
गोमन्तशिखराच्छ्रीमानाप्लुतोऽमितविक्रमः ॥ ८१ ॥

बलरामजीके कूदनेके पश्चात् काले मेघके समान श्याम कान्तिमान् और अमित पराक्रमी श्रीमान् कृष्ण भी गोमन्त-शिखरसे कूद पड़े ॥ ८१ ॥

ततस्तं पीडयामास पद्भ्यां गिरिवरं हरिः ।
स पीडितो गिरिस्तेन निर्ममज्ज समन्ततः ॥ ८२ ॥
जलाकुलोपलस्तत्र प्रस्रुतो द्विरदो यथा ।
स तेन वारिणा वह्निस्तत्क्षणात् प्रशमं ययौ ॥ ८३ ॥
कल्पान्ते वारिधाराभिर्मेघजालैरिवांशुमान् ।

कूदते समय श्रीहरिने उस श्रेष्ठ पर्वतको अपने दोनों पैरोंसे दबाया । उनके द्वारा दबाव पड़नेपर वह पर्वत चारों ओरसे जलमग्न-सा हो गया । उसका एक-एक पत्थर जलसे नहा उठा और मदकी बूँदें टपकानेवाले हाथीके समान जल-का स्रोत बहाने लगा । उस जलसे वहाँकी सारी आग तत्काल बुझ गयी । मानो प्रलयकालमें मेघसमूहोंद्वारा बरसायी हुई वारिधाराओंसे अंशुमाली सूर्य शान्त हो गये हों ॥ ८२-८३ ॥

सिंहारसितनिर्घोषः पीतवासा घनाकृतिः ॥ ८४ ॥
किरीटमूर्द्धा सौम्यास्यः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
श्रीवत्सवक्षाः सुमुखः सहस्राक्षसमद्युतिः ॥ ८५ ॥
रामादनन्तरं कृष्णः प्लुतो वै वीर्यवांस्ततः ।

उस समय पीताम्बरधारी घनश्याम-विग्रह कमलनयन श्रीकृष्ण सिंहके समान दहाड़ रहे थे । उनके मस्तकपर दिव्य किरीट शोभा पा रहा था और मुख बड़ा ही सौम्य दिखायी देता था । उनके वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था । मुख बहुत ही सुन्दर था और अंगोंकी कान्ति देवराज इन्द्रके समान प्रकाशित हो रही थी । बलरामजीके बाद पराक्रमी श्रीकृष्ण भी वहीं (राजाओंके बीचमें ही) कूद पड़े थे ॥

ताभ्यामेव प्लुताभ्यां च चरणैः पीडितो गिरिः ॥ ८६ ॥
मुमोच सलिलोत्पीडांस्तीव्रपावकशान्तये ।
सलिलोत्पीडनं दृष्ट्वा पार्थिवा भयमाविशन् ॥ ८७ ॥

उन दोनों भाइयोंके कूदनेसे उनके चरणोंका दबाव पाकर वह पर्वत जलके स्रोत बहाने लगा था, जो उस भयानक अग्निको बुझानेमे सहायक हुआ । पर्वतसे जलके स्रोत निकलते देखकर राजाओंके मनमें भय समा गया ॥ ८६-८७ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोमन्तदाहे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें गोमन्त-पर्वतका दाहविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥


त्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण और बलरामका जरासंध और उसकी सेनाओंके साथ युद्ध, राजा दरदकी मृत्यु, जरासंधका पराजित होकर पलायन तथा चेदिराज दमघोषके साथ श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना

वैशम्पायन उवाच
तौ नगादाप्लुतौ दृष्ट्वा वसुदेवसुतावुभौ ।
क्षुब्धं नरवरानीकं सर्वं सम्मूढवाहनम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवके

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