विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 395, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ३७३
तथा काले रंगकी धातुओंके पिघले हुए रसोंकी धारा बहाने लगा॥ ६० ॥
वह्निना चापि दीप्ताङ्गो गिरिनातिविराजते।
धूमान्धकारोर्ध्वतनुर्मज्जमान इवाम्बुदः॥ ६१॥
यद्यपि अग्निसे उसका सारा अङ्ग उद्भासित हो उठा था, तो भी उसके ऊपरी भागमें धुएँका अन्धकार छा रहा था; इसलिये उस पर्वतकी अधिक शोभा नहीं हो रही थी। वह समुद्रमें डूबते हुए मेघके समान जान पड़ता था॥ ६१॥
विश्लिष्टोपलसंघातः कर्कशाङ्गारवर्षणः।
गिरिर्भात्यनलोद्गारैरूल्कावृष्टिरिवाम्बुदः ॥ ६२॥
उसके प्रस्तरसमूह अलग हो-होकर गिर रहे थे। उससे कड़े अङ्गारोंकी वर्षा हो रही थी। उस समय आग उगलनेके कारण वह पर्वत उल्काओंकी वर्षा करनेवाले मेघके समान प्रतीत होता था॥ ६२॥
प्रपातप्रस्रवेण्विक्षो धूमसंवर्द्धितोदरः।
स गिरिर्भस्मसां यातो युगान्ताग्निरितोपमः॥ ६३॥
उसके झरनोंके स्रोत सूख गये, मध्यभागमें धुआँ फैल गया। उस अवस्थामें वह पर्वत प्रलयाग्निसे दग्ध होकर भस्म हुआ-सा जान पड़ता था॥ ६३॥
विह्वलास्तस्य पार्श्वेभ्यः सर्पा दग्धार्धदेहिनः।
श्वसन्तः पृथुमूर्धानो निश्चेरूरुशिवेक्षणाः॥ ६४॥
उसके पार्श्वभागोंसे, घबराये हुए सर्प निकलने लगे। उनके आधे शरीर जल गये थे। उनकी आँखोंसे क्रूरता टपक रही थी तथा वे अपने फैले हुए मस्तकों (फनो) से फुङ्कार मार रहे थे॥ ६४॥
उत्पत्योत्पत्य गगनात् पुनः पुनरवाङ्मुखाः।
रेसुश्चोद्वेजिताः सिंहाः शार्दूलाश्चानलाखिलाः॥ ६५॥
आगसे झुलसे हुए सिंह और व्याघ्र भयसे उद्विग्न हो बार-बार उछलकर आकाशसे नीचे मुँह किये गिरते और आर्तनाद करते थे॥ ६५॥
मुमुचुः पादपाश्चैव दाहनिर्यासं जलम्॥ ६६॥
वहाँके वृक्ष दग्ध होनेके कारण अपने भीतरके रसको पानीके रूपमे वहाने लगे॥ ६६॥
वहत्यूर्ध्वगतिर्वातो भस्माङ्गारारतिपिङ्गलः।
धूमच्छाया च गगने दर्पिताम्भोददर्शना॥ ६७॥
ऊपरको उठनेवाली वायु भस्म और अङ्गारोंसे अत्यन्त पिंगलवर्णको होकर बहने लगी और आकाशमें धूमकी छाया घुमड़कर घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान दिखायी देने लगी
त्यज्यमानो महासानुर्विहगैः श्वापदैरपि।
गिरिर्वैकल्यमायाति प्रागल्भ्यात्कृष्णवर्त्मनः॥ ६८॥
पक्षी और हिंसक जन्तु भी उसे छोड़कर भाग रहे थे। वह महान् शिखरवाला पर्वत अधिक आग बढ़ जानेके कारण व्याकुल-सा हो उठा था॥ ६८॥
स मुमोच शिलाः शैलश्चलोदग्रशिलोच्चयः।
वज्रेण पुरुहूतस्य यथा स्याद् दारितस्तथा॥ ६९॥
बड़ी-बड़ी चञ्चल शिलाओंके ढेरसे युक्त वह पर्वत आगसे तपकर अपनी शिलाओंको इस प्रकार छोड़ रहा था, मानो इन्द्रके वज्रसे विदीर्ण होकर बिखरा जा रहा हो॥ ६९॥
आदीप्य तं तु शैलेन्द्रं क्षत्रिया व्यूहदर्शिताः।
अर्धक्रोशमपक्रान्ताः पावकेनाभितापिताः॥ ७०॥
उस पर्वतराज़में आग लगाकर व्यूहके आकारमें सुसज्जित होकर खड़े हुए क्षत्रिय उस प्रचण्ड पावकसे सन्तप्त हो आधा कोस पीछे हट गये॥ ७०॥
दह्यमाने नगश्रेष्ठे सीदमानैर्महाद्रुमैः।
धूमभारैरनालक्ष्ये मूले शिथिलतां गते॥ ७१॥
सरोषं हि तदा रामो वचनं केनिसूदनम्।
बभाषे पद्मपत्राक्षं स साक्षान्मधुसूदनम्॥ ७२॥
वह पर्वतोंमे श्रेष्ठ गोमन्त नष्ट होते हुए महान् वृक्षोंके साथ जब इस प्रकार दग्ध होने लगा, धूमभारसे उसकी ओर देखना असम्भव हो गया और उसका मूलभाग शिथिल होने लगा, तब वलरामजीने केशी और मधुनामक दैत्योंका संहार करनेवाले साक्षात् विष्णुरूप कमलनयन श्रीकृष्णसे रोषपूर्वक कहा-॥ ७१-७२॥
दह्यतेऽयं गिरिस्तात ससानुशिखरद्रुमः।
आवयोः कृष्ण वैरेण चलिभिर्वसुधाधिपैः॥ ७३॥
'तात! श्रीकृष्ण! हमलोगोंसे वैर हो जानेके कारण इन बलवान् भूपतियोंद्वारा छोटे-बड़े शिखरों और वृक्षोंसहित यह पर्वत जलाया जा रहा है॥ ७३॥
पश्य कृष्णानलौष्णानां सधूमानां समन्ततः।
वनानां विरसन्तीय नगाभ्याशे द्विपोत्तमाः॥ ७४॥
'श्रीकृष्ण! देखो, चारो ओर आगमे तपे और धुएँसे भरे इन जंगलोंके वृक्षोंके निकट ये उत्तम हाथी करुण-क्रन्दन-सा कर रहे हैं॥ ७४॥
अयं यद्यावयोरर्थे गोमन्तस्तात दह्यते।
अयशस्यमिदं लोके कौलीनं च भविष्यति॥ ७५॥
'तात! यदि हम दोनोंके लिये गोमन्त जला दिया जायगा, तो यह संसारमें हमारे लिये महान् अयश और कलङ्ककी बात होगी॥ ७५॥
तदम्यानृण्यहेतोर्हि नगस्य नगसंनिभ।
क्षत्रियाञ्छिनिष्यामो दोर्भ्यामेव युधां वर॥ ७६॥
'अतः योद्धाओंमें श्रेष्ठ तथा युद्धमें पर्वतके समान