विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 392, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशो |
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अपनी उत्ताल तरंगोंसे परिपूर्ण हुए महासागरका रूप देखनेमें आता है॥ १३॥
वीतरात्रे ततः काले नृपास्ते कृतकौतुकाः।
आरोहणार्थं शैलस्य समेता युद्धलालसाः॥ १४॥
तदनन्तर रात बीतनेपर सब राजा उठे और मंगलाचारमें सम्पन्न हो युद्धकी लालसासे गोमन्तपर्वतपर चढ़नेके लिये एकत्र होने लगे॥ १४॥
समवायीकृताः सर्वे गिरिम्रस्थेषु ते नृपाः।
निविष्टा मन्त्रयामासुर्युद्धकालकुतूहलाः॥ १५॥
पर्वतके शिखरोपर एकत्र हो वे सभी राजा बैठे और युद्धके शुभ अवसरके लिये उत्सुक हो आपसमें मन्त्रणा करने लगे॥ १५॥
एषां तु तुमुलः शब्दः शुश्रुवे पृथिवीक्षिताम्।
युगान्ते भिद्यमानानां सागराणां यथा स्वनः॥ १६॥
सेनासहित इन नरेशोंकी तुमुल ध्वनि प्रलयकालमें मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रोंकी भयंकर गर्जनाके समान सुनायी देती थी॥ १६॥
तेषां सकञ्चुकोष्णीषाः स्थविरा वेत्रपाणयः।
चेरुर्मा शब्द इत्येवं ब्रुवन्तो राजशासनात्॥ १७॥
'उन राजाओंके छड़ीदार वृद्ध सिपाही चोगा और पगड़ी धारण किये तथा हाथमें बेंत लिये राजाज्ञासे यह कहते हुए विचरने लगे कि सब लोग मौन रहें। कोई एक शब्द भी न बोले॥ १७॥
तस्य रूपं बलस्यासीन्निःशब्दस्तिमितस्य वै।
लीनमीनभुजङ्गस्य निःशब्दस्य पयोदधेः॥ १८॥
उस समय नीरव और निश्चल हुए उस सैन्यसमूहका रूप उस शब्दहीन प्रशान्त महासागरके समान प्रतीत होता था, जिसके मत्स्य और भुजङ्ग जलके भीतर विलीन हो गये हों॥ १८॥
तस्मिन् स्तिमितनिशब्दे योगादिव महार्णवे।
जरासन्धो बृहद्वाक्यं बृहस्पतिरिवाददे॥ १९॥
वह सैन्यसागर मानो योगबलसे जन सहसा नीरव तथा निश्चल हो गया, तब बृहस्पतिके समान नीतिज्ञ जरासंधने यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ १९॥
शीघ्रं समभिवर्तन्तां बलानीह महीक्षिताम्।
सर्वतः पर्वतश्चायं बलौघैः परिवार्यताम्॥ २०॥
'राजाओंकी सेनाएँ शीघ्र ही आक्रमण करें और सब ओरसे सैनिकसमूह इस पर्वतको घेर लें॥ २०॥
अश्मयन्त्राणि युज्यन्तां क्षेपणीयाश्च मुद्गराः।
ऊर्ध्वं चापिप्रवाद्यान्तां प्रासा वै तोमराणि च॥ २१॥
'पत्थरोंके गोले बरसानेवाले यन्त्र लगा दिये जायें। क्षेपणीय (गोफना या ढेलवाँस) तथा मुद्गर सँभाल लिये जायें। प्रास और तोमर भी ऊपर कर लिये जायें॥ २१॥
ऊर्ध्वं प्रक्षेपणार्याय दृढानि च लघूनि च।
शस्त्रपातविघातानि क्रियन्तामाशु शिल्पिभिः॥ २२॥
'शत्रुओंके शस्त्रप्रहारको नष्ट करनेमें समर्थ सुदृढ़ और हल्के गोलोंको ऊपर फेंकनेके लिये हमारे शिल्पी शीघ्र तैयार करें॥ २२॥
शूराणां युद्ध्यमानानां प्रमत्तानां परस्परम्।
यथा नरपतिः प्राह तथा शीघ्रं विधीयताम्॥ २३॥
'परस्पर प्रमत्त होकर युद्ध करनेवाले शूरवीरोंके लिये जैसा राजा शिशुपाल कहे, शीघ्र वैसा ही प्रबन्ध किया जाय॥
दार्यतामेष टङ्कौघैः खनित्रैश्च नगोत्तमः।
नृपाश्च युद्धमार्गज्ञा विम्यस्यन्तामदूरतः॥ २४॥
'उस उत्तम पर्वतको टंकसमूहों और खनित्रोंसे खोदकर विदीर्ण कर डाला जाय। युद्धकी प्रणालीके जानकार नरेशोंको इसके समीप ही यथास्थान खड़ा किया जाय॥ २४॥
अद्यप्रभृति सैन्यैर्मे गिरिरोधः प्रवर्त्यताम्।
यावदेतौ पातयामो वसुदेवसुतावुभौ॥ २५॥
'आजसे मेरे सैनिक इस पर्वतपर घेरा डाल दें और इसे तबतक चालू रखें, जबतक कि हम इन दोनों वसुदेवपुत्रोंको मार न डालें॥ २५॥
अचलोऽयं शिलायोनिः क्रियतां निश्चलाण्डजः।
आकाशमपि वाणौघैर्निःसम्पातं विधीयताम्॥ २६॥
'शिलाओंसे ही उत्पन्न हुआ (अथवा शिलाओंका उत्पादक) यह पर्वत स्वयं तो अचल है ही, इसपर रहनेवाले पक्षियोंको भी सायकोंद्वारा अचल (हिलने-डुलने या उड़नेमें असमर्थ) कर दिया जाय। आकाशको भी वाणसमूहोंसे इस तरह रूँध दिया जाय कि उसमें पक्षी भी उड़ न सकें॥ २६॥
मयानुशिष्टास्तिष्ठन्तु गिरिभूमिषु भूमिपाः।
तेषु तेष्ववकाशेषु शीघ्रमारुह्यतां गिरिः॥ २७॥
'मेरी आज्ञा मानकर समस्त भूपाल पर्वतीय स्थानोंमें खड़े रहें और जहाँ-जहाँ अवकाश मिल जाय, वहाँ-वहाँसे शीघ्र ही पर्वतपर चढ़ जायें॥ २७॥
मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्लिकः।
काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा॥ २८॥
द्रुमः किंपुरुषश्चैव पर्वतीयाश्च मानवाः।
पर्वतस्यापरं पार्श्वं क्षिप्रमारोहयन्त्वमी॥ २९॥
'मद्रराज शल्य, कलिङ्गराज श्रुतायु, चेकितान, बाह्लिक, काश्मीरराज गोनर्द, करूषराज दन्तवक्त्र, किन्नरराज द्रुम तथा