भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 391

[ विष्णुपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ३६९


द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसका सेनाको पर्वतपर आक्रमण करनेकी आज्ञा देना, शिशुपालकी सम्मतिसे गोमन्तपर्वतमें आग लगाया जाना, पर्वतका जलना तथा बलराम और श्रीकृष्णका पर्वतसे कूदकर राजाओंकी सेनामें आ पहुँचना—

वैशम्पायन उवाच
जरासंधस्ततः प्राप्तो नृपः सर्वमहीक्षिताम् ।
नराधिपैर्बलयुक्तैरनुयातो महाद्युतिः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर समस्त राजाओंका राजा महातेजस्वी जरासंध वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे अपनी-अपनी सेनाओंके साथ दूसरे भी बहुत-से नरेश थे ॥ १ ॥

व्यायतोद्यततुरगैर्धिष्ण्यप्रार्थसमाहितैः ।
रथैः साङ्ग्रामिकैर्युक्तैरसङ्गतगतिभिः क्वचित् ॥ २ ॥

कहीं अस्त्र-शस्त्रके ज्ञाता पुरुषोंद्वारा भलीभाँति सिखाये गये विशाल एवं प्रचण्ड बलशाली अश्वोंसे युक्त रथ युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर आगे बढ़ रहे थे। उन रथोंकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी ॥ २ ॥

हेमकक्षैर्महाघण्टैर्वारणैर्वारिदोपमैः ।
महामात्रोत्तमैरारूढैः कल्पितै रणगर्वितैः ॥ ३ ॥

कहीं बहुसंख्यक हाथी चल रहे थे, जिन्हें सोनेकी जंजीरोंसे कसा गया था। उनके दोनों पार्श्वमे बड़े-बड़े घंटे लटक रहे थे। वे सभी हाथी मेघोंकी घटाके समान जान पड़ते थे। उनके ऊपर अच्छे महावत बैठे थे तथा रणगर्वित कुशल योद्धाओं-द्वारा उन्हें सुसज्जित किया गया था ॥ ३ ॥

खारूढैः सादिभिर्युक्तैः प्रेङ्खमाणैः प्रवल्गितैः ।
वाजिभिर्वायुसङ्काशैः प्लवद्भिरिव पत्रिभिः ॥ ४ ॥

कहीं घुड़सवार योद्धा घोड़ोंपर अच्छी तरहसे सवार थे। उनके वे घोड़े वायुके समान वेगशाली थे और उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते समय आकाशमे उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥

खड्गचर्मवलोद्नग्नैः पत्तिभिर्बलिनां वरैः ।
सहस्रसंख्यैर्निर्मुक्तैरुत्पतद्भिरिवोरगैः ॥ ५ ॥

बलवानोंमें श्रेष्ठ पैदल सैनिक भी ढाल और तलवार लिये प्रचण्डरूप धारण करके आगे बढ़ते थे। वे हजार-हजार-की टोलियोंमे एक साथ चलते और केंचुलसे छुटे हुए सर्पोंके समान उछलते थे ॥ ५ ॥

एवं चतुर्विधैः सैन्यैः प्रचलद्भिरिवाम्बुदैः ।
नृपोऽभियातो बलवाञ्जरासंधो धृतव्रतः ॥ ६ ॥

इस प्रकार मँडराते हुए बादलोंके समान चतुरङ्गिणी सेनाएँ साथ लेकर वीर-व्रतको धारण करनेवाला बलवान् राजा जरासंध युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था ॥ ६ ॥

स रथैर्नेमिघोषैश्च गजैश्च मदसंयुतैः ।
हेषद्भिश्चापि तुरगैः क्ष्वेडितोग्रैश्च पत्तिभिः ॥ ७ ॥
संनादयन् दिशः सर्वाः सर्वांश्चापि गुहाशयान् ।
स राजा सागराकारः ससैन्यः प्रत्यदृश्यत ॥ ८ ॥

वह राजा पहियोंके घर्घर घोषसे युक्त रथों, (चिग्घाड़ते हुए) मतवाले हाथियों, हिनहिनाते हुए घोड़ो तथा गर्जते हुए पैदल सैनिकोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं एवं समस्त पर्वताय कन्दराओंको प्रतिध्वनित करता हुआ, सेनाके साथ समुद्रके समान दिखायी देता था ॥ ७-८ ॥

तद्द्बलं पृथिवीशानां हृष्टयोधजनाकुलम् ।
क्ष्वेडितास्फोटितरवं मेघसैन्यमिवाबभौ ॥ ९ ॥

भूमिपालोंकी वह सेना हृष्टपुष्ट योद्धाओंसे परिपूर्ण थी। गर्जने और ताल ठोंकनेकी गम्भीर ध्वनिसे वह गर्जती हुई मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होती थी ॥ ९ ॥

रथैः पवनसंपातैर्गजैश्च जलदोपमैः ।
तुरगैश्च सिताभ्राभैः पत्तिभिश्चापि दंशितैः ॥ १० ॥
व्यामिश्रं तद्बलं भाति मत्तद्विपसमाकुलम् ।
घर्मान्ते सागरगतं यथाभ्रपटलं तथा ॥ ११ ॥

वायुके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले रथों, काले मेघोंके समान प्रतीत होनेवाले हाथियों, श्वेत बादलोंके समान घोड़ों तथा कवच आदिसे सुसज्जित पैदल योद्धाओसे मिश्रित हुई वह सेना सब ओरसे सुशोभित हो रही थी। मतवाले हाथियोंसे व्याप्त हुई वह विशाल वाहिनी वर्षाऋतुमें समुद्रके भीतर लक्षित होनेवाले मेघोंके समूहकी शोभा धारण करती थी ॥ १०-११ ॥

सबलास्ते महीपाला जरासंधपुरोगमाः ।
परिवार्य गिरिं सर्वे निवेशायोपचक्रमुः ॥ १२ ॥

जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनाके साथ उस पर्वतको चारों ओरसे घेरकर छावनी डालनेकी तैयारी करने लगे ॥ १२ ॥

बभौ तस्य निविष्टस्य बलश्रीः शिविरस्य वै ।
शुक्ले पर्वणि पूर्णस्य यथा रूपं महोदधेः ॥ १३ ॥

वहाँ डेरा डाले हुए जरासंधके सैनिकशिविरकी शोभा वैसी ही प्रतीत होती थी, जैसा कि शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको