विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 390, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३६८ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
‘भैया ! इस पर्वतपर हम दोनोंके लिये जिस प्रकार युद्धोपयोगी वेष-भूषाकी रचना कर दी गयी है, इससे यही अनुमान होता है कि देवताओंका कार्य एवं प्रयोजन शीघ्र ही सिद्ध होना चाहता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४७ ॥
वैरोचनेन सुप्तस्य मम मौलिर्महोदधौ ।
शक्रस्य सदृशं रूपं दिव्यमास्थाय सागरात् ॥ ४८ ॥
ग्राहरूपेण यो नीत आनीतोऽसौ गरुत्मता ।
ममादिशयनान्मौलिर्हृत्वा क्षिप्तो गरुत्मता ॥ ४९ ॥
‘जब मैं महासागरमें सो रहा था, उस समय विरोचनका पुत्र इन्द्रका-सा रूप धारण करके वहाँ चला गया और जब मैं शेष-शय्यासे उठकर यहाँ आ गया, तब वह ग्राहरूप धारण करके वहाँसे मेरा मुकुट उठा लाया। वही मुकुट गरुड़ उससे छीन लाये हैं और उन्होंने इसे मेरे मस्तकपर रख दिया है॥
सुव्यक्तं संनिकृष्टः स जरासंधो नराधिपः ।
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां वातरंहसाम् ॥ ५० ॥
‘निश्चय ही राजा जरासंध अब बहुत निकट आ गया है; क्योंकि वायुके समान वेगवाले रथोंकी ध्वजाओंके अग्रभाग दिखायी दे रहे हैं ॥ ५० ॥
एतानि विजिगीषूणां शशिकल्पानि भूपृताम् ।
छत्राण्यार्य विराजन्ते दंशितानि मितानि च ॥ ५१ ॥
‘आर्य ! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजाओंके ये चन्द्रमा-जैसे श्वेत कान्तिवाले सुसज्जित छत्र प्रकाशित हो रहे हैं; इनकी संख्या परिमित ही है ॥ ५१ ॥
अहो नृपरथोद्गता विमलाश्छत्रपङ्क्तयः ।
अभिवर्तन्ति नः शुभ्रा यथा खे हंसपङ्क्तयः ॥ ५२ ॥
‘अहो ! राजाओंके रथोंपर विराजमान जो ये श्वेत वर्णवाली ऊँची छत्र-पङ्क्तियाँ हमलोगोंकी ओर बढ़ी आ रही हैं, ये आकाशमें उज्ज्वल हंसपङ्क्तियोंके समान सुशोभित होती हैं ॥ ५२ ॥
अहो द्यौर्विमलाभानां शस्त्राणां विमलानना ।
प्रभा भास्करभामिश्रा चरन्तीव दिशो दश ॥ ५३ ॥
‘अहो ! इन निर्मल प्रभाववाले शस्त्रोंकी चमकसे आकाशका मुख भी उज्ज्वल एवं प्रकाशित हो उठा है । शस्त्रोंकी ये दीप्तियाँ सूर्यदेवकी किरणोंसे मिलकर दसों दिशाओंमें विचरती-सी प्रतीत होती हैं ॥ ५३ ॥
एतानि नूनं समरे पार्थिवैरायुधानि च ।
क्षिप्तानि विनशिष्यन्ति मयि सर्वाणि संयुगे ॥ ५४ ॥
‘निश्चय ही, समराङ्गणमें भूमिपालोंद्वारा मुझपर चलाये गये ये समस्त अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो जायेंगे ॥ ५४ ॥
काले खलु नृपः प्राप्तो जरासंधो महीपतिः ।
आवयोर्युद्धनिकषः प्रथमः समरातिथिः ॥ ५५ ॥
‘राजा जरासंध ठीक समयपर आया है। यह हमलोगोंके युद्ध-कौशलकी कसौटी है तथा समराङ्गणका पहला अतिथि है॥
आर्य तिष्ठाव सहितौ न खल्वानागते नृपे ।
युद्धारम्भः प्रयोक्तव्यो बलं तावद् विमृश्यताम् ॥ ५६ ॥
‘आर्य ! हम दोनों साथ रहें। राजा जरासंधके आनेसे पहले अभी हमें युद्ध आरम्भ नहीं करना चाहिये। जबतक वह नहीं आता है, तबतक हम उसके बलका विचार कर लें'॥
एवमुक्त्वा ततः कृष्णः स्वस्थः संग्रामलालसः ।
जरासंधवधं प्रेप्सुश्चकार बलदर्शनम् ॥ ५७ ॥
ऐसा कहकर श्रीकृष्ण स्वस्थभावसे संग्रामकी इच्छा रख-कर जरासंधका वध चाहते हुए उसके सैनिक-बलका निरीक्षण करने लगे ॥ ५७ ॥
वीक्षमाणश्च तान् सर्वान् नृपान् यदुवरोऽव्ययः ।
आत्मानमात्मनोवाच यत्पूर्वं दिवि मन्त्रितम् ॥ ५८ ॥
इमे ते पृथिवीपालाः पार्थिवे वर्त्मनि स्थिताः ।
ये विनाशं गमिष्यन्ति शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ५९ ॥
उन सब राजाओंका निरीक्षण करते हुए अविनाशी यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही अपने-आपसे कहने लगे—‘अहो ! दिव्यलोकमें देवताओंके साथ बैठकर जो गुप्त मन्त्रणा की गयी थी, उसके अनुसार ये भूमिपाल राजोचित मार्गपर स्थित हैं। ये शास्त्रोक्त विधिसे संग्राममे विनाशको प्राप्त होंगे ॥ ५८-५९ ॥
प्रोक्षितान् सत्विमान् मन्ये मृत्युना नृपसत्तमान् ।
स्वर्गगामीनि चाप्येषां वपूंषि प्रचकाशिरे ॥ ६० ॥
‘मैं तो समझता हूँ कि मृत्युने रणयज्ञमें आहुति देनेके लिये इन श्रेष्ठ राजाओंका प्रोक्षण कर लिया है। इनके स्वर्गगामी शरीर अभीसे प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ६० ॥
स्थाने भारपरिश्रान्ता वसुधेयं दिवं गता ।
एषां नृपतिसिंहानां बलौघैरभिपीडिता ॥ ६१ ॥
‘यह पृथ्वी इन राजसिंहोंके सैन्यसमूहोंसे पीड़ित हो इनके भारसे थककर जो देवलोकमें गयी थी, वह इसका जाना उचित ही था ॥ ६१ ॥
अल्पेन खलु कालेन विविक्तं पृथिवीतलम् ।
भविष्यति नरेन्द्रौघैराकीर्णं च नभस्तलम् ॥ ६२ ॥
‘अब थोड़े ही समयमें यह भूमण्डल इन राजसमूहोंसे खाली हो जायगा और आकाश भर जायगा’ ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि जरासंधाभिगमनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधका अभियानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥४१॥