भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 393

विष्णुपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ३७१

पर्वतीय प्रदेशके योद्धा—ये सब लोग इस पर्वतके पश्चिम भागपर शीघ्र ही चढ़ाई कर दें ॥ २८-२९ ॥

पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमकतथा ।
रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः ॥ ३० ॥
पाञ्चालाधिपतिश्चैव द्रुपदश्च नराधिपः ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥ ३१ ॥
छागलिः पुरुमित्रश्च विराटश्च महीपतिः ।
कौशाम्ब्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः ॥ ३२॥
भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च वाणः पञ्चनदस्तथा ।
उत्तरं पर्वतोद्देशमेते दुर्गसहा नृपाः ।
आरोहन्तु विमर्द्दन्तो वज्रप्रतिमगौरवाः ॥ ३३ ॥

पूरुवंशीय वेणुदारि, विदर्भदेशीय सोमक, भोजोंके अधिपति रुक्मी, मालवाके राजा सूर्याक्ष, पाञ्चालदेशके अधिपति राजा द्रुपद, अवन्तिके दोनों राजकुमार विन्द और अनुविन्द, पराक्रमी दन्तवक्त्र, छागलि, पुरुमित्र, राजा विराट, कौशाम्बीनरेश मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, वाण और पञ्चनद-ये दुर्गयुद्धका वेग सह सकनेवाले नरेश शत्रुओंको कुचलते हुए इस पर्वतके उत्तरभागपर चढ़ाई करें, इनका गौरव वज्रके तुल्य है ॥ ३०-३३ ॥

उलूकः कैतवेयश्च वीरश्चांशुमतः सुतः ।
एकलव्यो दृढाश्वश्च क्षत्रधर्मा जयद्रथः ॥ ३४ ॥
उत्तमौजास्तथा शाल्वः कैरलेयश्च कैशिकः ।
वैदिशो वामदेवश्च सुकेतुश्चापि वीर्यवान् ॥ ३५ ॥
पूर्वपर्वतनिव्यूहमतेष्वायतमस्तु नः ।
विदारयन्तो धावन्तो वाता इव बलाहकान् ॥ ३६ ॥

'शकुनिपुत्र उलूक, अंशुमानके पुत्र वीर, एकलव्य, दृढ़ाश्व, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शाल्व, केरलराज कैशिक, विदिशाके राजा वामदेव और पराक्रमी सुकेतु—इन सबके अधीन इस पर्वतका पूर्वभाग सौंप दिया जाय । ये लोग जैसे वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार शत्रुओंको विदीर्ण करते हुए उनपर धावा बोल दें ॥३४-३६॥

अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान् ।
दक्षिणं शैलनिचयं दारयिष्याम दंशितः ॥ ३७ ॥

'मैं दरद तथा पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल कवच आदि-से सुसज्जित होकर इस पर्वतके दक्षिणभागको विदीर्ण कर डालेंगे ॥ ३७ ॥

एवमेष गिरिः क्षिप्रं समन्ताद् वेष्टितो बलैः ।
वज्रप्रपातप्रतिमं प्राप्नोतु तुमुलं भयम् ॥ ३८ ॥

'इस प्रकार हमारी सेनाओंद्वारा चारों ओरसे घिरा हुआ यह पर्वत शीघ्र ही, मानो इसपर वज्रका आघात हो रहा हो, इस तरह घोर भय प्राप्त करे ॥ ३८ ॥

गदिनो वै गदाभिश्च परिघैः परिघायुधाः ।
अपरे विविधैः शस्त्रैर्दारयन्तु नगोत्तमम् ॥ ३९ ॥

'गदाधारी वीर गदाओंसे, परिघ चलानेवाले परिघोंसे तथा अन्य वीर नाना प्रकारके दूसरे अस्त्र-शस्त्रोंसे इस श्रेष्ठ पर्वतके टुकड़े-टुकड़े कर डालें ॥ ३९ ॥

एष भूमिधरोऽद्यैव विषमोज्चशिलान्वितः ।
कार्यो भूमिसमः सर्वो भवद्भिर्वसुधाधिपैः ॥ ४० ॥

'विषम एवं ऊँची शिलाओंसे युक्त इस भूधरको आप सभी भूपाल मिलकर आज ही भूमिके समान समतल कर डालें' ॥ ४० ॥

जरासंधवचः श्रुत्वा पार्थिवा राजशासनात् ।
गोमन्तं वेष्टयामासुः सागराः पृथिवीमिव ॥ ४१ ॥

जरासंधकी बात सुनकर समस्त राजाओंने मगधराजकी आज्ञासे गोमन्तपर्वतको चारों ओरसे घेर लिया, ठीक उसी तरह जैसे समुद्र पृथ्वीको घेरे हुए है ॥ ४१॥

उवाच राजा चेदीनां देवानां मघवानिव ।
किं ते युद्धेन दुर्गेऽस्मिन् गोमन्ते च नगोत्तमे ॥ ४२ ॥

उस समय देवताओंके राजा इन्द्रके समान चेदिवासियोंके अधिपति राजा दमघोषने जरासंधसे कहा—राजन् ! यह पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्त दुर्गम पर्वत है । इसपर युद्ध करनेसे आपको क्या लाभ होगा ॥ ४२ ॥

दुरारोहश्च शिखरे प्रांशुपादपकण्टके ।
काष्ठैस्तृणैश्च बहुभिः परिचार्य समन्ततः ॥ ४३ ॥
अद्यैव दीप्यतां क्षिप्रमलमन्येन कर्मणा ।

'इसके शिखरपर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष और काँटेरे हैं; अतः इसपर चढ़ना बहुत कठिन काम है । मेरी तो राय है, बहुत-से काठ और घासफूस जुटाकर इस पर्वतको चारों ओरसे घेर दिया जाय और अभी इसमें आग लगा दी जाय । इसी कार्यमें शीघ्रता करनी चाहिये । दूसरे किसी प्रयत्नसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है ॥ ४३॥

क्षत्रियाः सुकुमारा हि रणे सायकयोधिनः ॥ ४४ ॥
नियुक्ताः पर्वते दुर्गे नियोक्तुं पादयोधिनः ।
ननाम प्रतिबन्धेन न चावस्कन्दकर्मणा ॥ ४५ ॥
शक्य एष गिरिस्तात देवैरप्यवमर्दितुम् ।

'क्योंकि क्षत्रिय लोग सुकुमार होते है। ये रणभूमिमें बाणोंद्वारा ही युद्ध कर सकते हैं । ( पर्वतपर चढ़ना इनके लिये अत्यन्त कठिन है । ) इस समय इन्हें दुर्गम पर्वतपर चढ़कर वहाँके पैदल योद्धाओंके साथ युद्ध करनेके कामपर नियुक्त किया गया है ( जो इनके लिये दुष्कर है ) । तात ! केवल घेरा डालनेसे या ऊपर चढ़ जानेसे देवता भी इस पर्वतका मर्दन नहीं कर सकते ॥ ४४-४५½ ॥