भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 377

विष्णुपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३५५


असंस्कृताम्बुपरिखा द्वारयन्त्रविवर्जिता।
वप्रप्राकारनिचया कर्तव्या बहुविस्तरा ॥ ५८ ॥

इसके चारों ओर जो जल भरनेके लिये खाइयाँ बनी हुई हैं, उनकी बहुत दिनोंसे मरम्मत और सफाई नहीं हुई है तथा नगरके द्वारपर रक्षाके लिये यन्त्र (तोप आदि) भी नहीं लगे हुए हैं। पुरीकी रक्षाके लिये चारों ओरसे मिट्टीकी मोटी दीवारें तथा कई पक्के परकोटे बनवानेकी आवश्यकता है, जिनका विस्तार बहुत बड़ा हो ॥ ५८ ॥

संस्कर्तव्यायुधागारा योकव्या चेट्रिकाचयैः।
कंसस्य वलभोग्यत्वान्नातिगुप्ता पुरा जनैः ॥ ५९ ॥

नगरके जितने आयुधागार हैं, उन सबका संस्कार (मरम्मत और सफाई) होना चाहिये। जगह-जगह ईंटोंके ढेर जुटा लेनेकी आवश्यकता है। कंसकी सेनाके उपयोगमें आनेके कारण इस नगरकी रक्षाके लिये लोगोंने पहलेसे कोई व्यवस्था नहीं कर रखी है ॥ ५९ ॥

सद्यो निपतिते कंसे राज्येऽस्माकं नवोदये।
पुरी प्रत्यग्ररोधेष्व न रोधं विसहिष्यति ॥ ६० ॥

अभी हालमें ही कंस मारा गया है, अतः हमारे राज्यका अभी नवोदय (प्रभात) काल है। जैसे राजाके सिपाही कर वसूल करनेके लिये गाँवको घेर लेते हैं, उसी तरह यदि इस पुरीका भी अवरोध हुआ तो यह उसे सहन न कर सकेगी ॥

बलं सम्मर्दभग्नं च कृष्यमाणं परेण ह।
असंशयमिदं राष्ट्रं जनैः सह विनङ्क्ष्यति ॥ ६१ ॥

हमारी सेना अनेको युद्धोंका सामना करनेके कारण हताश हो गयी है। शत्रु इसे बार-बार पीड़ा देकर क्षीण कर रहा है, अतः यह राष्ट्र यहाँके निवासियोंके साथ ही नष्ट हो जायगा। इसमें संदेह नहीं है ॥ ६१ ॥

यादवानां विरोधेन ये जिता राज्यकामुकैः।
ते सर्वे द्वैधमिच्छन्ति यत् क्षमं तद् विधीयताम् ॥ ६२ ॥

हमलोगोंने राज्यप्राप्तिकी इच्छा रखकर यादवोंका विरोध करनेके कारण जिन-जिन लोगोंको पराजित किया है, वे सब लोग हममें फूट डालना चाहते हैं। ऐसी परिस्थितिमें जो उचित हो सो करो ॥ ६२ ॥

वञ्चनीया भविष्यामो नृपाणां नृपकारणात्।
जरासंधभयार्तानां द्रवतां राज्यसम्भ्रमे ॥ ६३ ॥

राजा जरासंधके कारण दूसरे-दूसरे राजा भी हमें धोखा देंगे; क्योंकि ये जरासंधके भयसे पीड़ित हैं और अपने राज्यमें कोई विप्लव न मच जाय, इसके डरसे सब-के-सब उसके पीछे दौड़ते हैं ॥ ६३ ॥

आर्ता वक्ष्यन्ति नः सर्वे रुध्यमानाः पुरे जनाः।
यादवानां विरोधेन विनष्टाः स्मेति केशव ॥ ६४ ॥

केशव ! यदि इस नगरके सब लोग शत्रुओंके घेरा डालनेसे अवरुद्ध हो जायेंगे तो ये पीड़ित होकर हमारे लिये यही कहेगे कि हम यादवोंके विरोधसे नष्ट हो गये ॥ ६४ ॥

एतन्मम मतं कृष्ण विस्रम्भात् समुदाहृतम्।
त्वं तु विज्ञापितः पूर्वं न पुनः सम्प्रवोधितः ॥ ६५ ॥

श्रीकृष्ण ! यह मेरा मत है, जिसे तुमपर विश्वास होनेके कारण मैंने प्रकट किया है। तुम्हें इस बातकी पहले-पहल सूचना दी गयी है। तुम्हे समझानेका प्रयत्न नहीं किया गया है ॥ ६५ ॥

यदत्र वः क्षमं कृष्ण तच्च वै संविधीयताम्।
त्वमस्य नेता सैन्यस्य वयं त्वच्छासने स्थिताः।
त्वन्मूलश्च विरोधोऽयं रक्षाम्रानात्मना सह ॥ ६६ ॥

श्रीकृष्ण ! इस परिस्थितिमें जो उचित हो, वह करो। तुम इस यादव-सेनाके नेता हो और हम तुम्हारे शासनमें स्थित हैं। इस विरोधके मूल कारण तुम्हीं हो, इसलिये तुम अपने साथ ही हमलोगोंकी रक्षा करो ॥ ६६ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि विकद्रुवाक्यं नामाष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें विकद्रुका वाक्यविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥


एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

बलराम और श्रीकृष्णका पुरी और पुरवासियोंकी रक्षाके लिये मथुरासे दक्षिण भारतकी ओर प्रस्थान, परशुरामजीसे उनकी भेंट तथा उन दोनोंको गोमन्तपर्वतपर चलनेके लिये उनकी सलाह

वैशम्पायन उवाच
विकद्रोस्तु वचः श्रुत्वा वसुदेवो महायशाः।
परितुष्टेन मनसा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
राजा षाड्गुण्यवक्ता वै राजा मन्त्रार्थतत्त्ववित्।
सतत्त्वं च हितं चैव कृष्णोक्तं किल धीमता ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विकद्रुकी बात सुनकर महायशस्वी वसुदेव संतुष्टचित्तसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

'श्रीकृष्ण ! जो राजनीतिके छः गुणोंसे युक्त बात बोले अथवा उन छहों गुणोंके उपयोगका अवसर बताये, वह राजा है। जो मन्त्रार्थ-तत्त्व (गुप्त मन्त्रणाका प्रयोजन एवं महत्त्व)

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