विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भीमने इस पुरीको अपने वशमें किया और वे स्वयं भी यहीं आकर रहने लगे ॥ ४१-४२ ॥
ततः कुश स्थिते राज्ये लवे तु युवराजति ।
अन्धको नाम भीमस्य सुतो राज्यमकारयत् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर जब अयोध्याके राज्यपर कुश प्रतिष्ठित हुए और लव युवराज बन गये, तब मथुरामें भीमके पुत्र अन्धक राज्य करने लगे ॥ ४३ ॥
अन्धकस्य सुतो जज्ञे रेवतो नाम पार्थिवः ।
ऋक्षोऽपि रेवताज्जज्ञे रम्ये पर्वतमूर्धनि ॥ ४४ ॥
ततो रैवत उत्पन्नः पर्वतः सागरान्तिके ।
नाम्ना रैवतको नाम भूमौ भूमिधरः स्मृतः ॥ ४५ ॥
अन्धकके पुत्र राजा रेवत हुए । रेवतसे पर्वतके रमणीय शिखरपर ऋक्षका जन्म हुआ । इस प्रकार उनसे रैवत (ऋक्ष) की उत्पत्ति हुई । उस समय समुद्रके तटकी भूमिपर जो विशाल भूधर था, वह उसी रैवतके नामपर रैवतक पर्वतके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ४४-४५ ॥
रैवतस्यात्मजो राजा विश्वगर्भो महायशाः ।
बभूव पृथिवीपालः पृथिव्यां प्रथितः प्रभुः ॥ ४६ ॥
रैवत (ऋक्ष) के पुत्र महायशस्वी राजा विश्वगर्भ हुए, जो इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली भूमिपाल थे ॥ ४६ ॥
तस्य तिसृषु भार्यासु दिव्यरूपासु केशव ।
चत्वारो जज्ञिरे पुत्रा लोकपालोपमाः शुभाः ॥ ४७ ॥
केशव ! उनके तीन भार्याएँ थीं । तीनों ही दिव्य रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित होती थीं । उनके गर्भसे राजाके चार सुन्दर पुत्र हुए, जो लोकपालोंके समान पराक्रमी थे ॥ ४७ ॥
वसुर्बभ्रुः सुषेणश्च सभाक्षश्चैव वीर्यवान् ।
यदुप्रवीराः प्रख्याता लोकपाला इवापरे ॥ ४८ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—वसु, बभ्रु, सुषेण और बलवान् सभाक्ष । ये यदुकुलके प्रख्यात श्रेष्ठ वीर दूसरे लोकपालोंके समान शक्तिशाली थे ॥ ४८ ॥
तैरयं यादवो वंशः पार्थिवैर्बहुलीकृतः ।
यैः सार्धं कृष्ण लोकेऽस्मिन् प्रजावन्तः प्रजेश्वराः ॥ ४९ ॥
वसोस्तु कुन्तिविषये वसुदेवः सुतो विभुः ।
ततः स जनयामास सुप्रभे द्वे च दारिके ॥ ५० ॥
कुन्तीं च पाण्डोर्महिषीं देवतामिव भूचरीम् ।
भार्यां च दमघोषस्य चेदिराजस्य सुप्रभाम् ॥ ५१ ॥
श्रीकृष्ण ! उन राजाओंने इस यादव-वंशको बढ़ाकर बड़ी भारी संख्यासे सम्पन्न कर दिया । जिनके साथ इस संसारमें बहुत-से संतानवान् नरेश हैं । वसुसे (जिनका दूसरा नाम शूर था) वसुदेव उत्पन्न हुए । ये वसुपुत्र वसुदेव बड़े प्रभावशाली हैं । वसुदेवकी उत्पत्तिके अनन्तर वसुने दो कान्तिमती कन्याओंको जन्म दिया (जो पृथा (कुन्ती) और श्रुतश्रवा नामसे विख्यात हुईं) । इनमेंसे पृथा कुन्ति-देशमें (राजा कुन्तिभोजकी दत्तक पुत्रीके रूपमें) रहती थी । कुन्ती जो पृथ्वीपर विचरनेवाली देवाङ्गनाके समान थी, महाराज पाण्डुकी महारानी हुई तथा सुन्दर कान्तिसे प्रकाशित होनेवाली श्रुतश्रवा चेदिराज दमघोषकी पत्नी हुई ॥
एष ते स्वस्य वंशस्य प्रभवः सम्प्रकीर्तितः ।
श्रुतो मया पुरा कृष्ण कृष्णद्वैपायनान्तिकात् ॥ ५२ ॥
श्रीकृष्ण ! यह मैंने तुमसे अपने यादववंशकी उत्पत्ति बतायी है । इसे मैंने पहले श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीसे सुना था ॥ ५२ ॥
त्वं त्विदानीं प्रणष्टेऽस्मिन् वंशे वंशभृतां वर ।
स्वयम्भूरिव सम्प्राप्तो भवायास्माज्जयाय च ॥ ५३ ॥
वंशधारियोंमें श्रेष्ठ गोविन्द ! इस समय यह वंश नष्ट-सा हो चला था । परंतु तुम स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान इस वंशके उद्भव तथा हमारी विजयके लिये इसमें अवतीर्ण हुए हो ॥
न तु त्वां पौरमात्रेण शक्ता गूढयितुं वयम् ।
देवगुह्योप्यपि भगवान् सर्वज्ञः सर्वभावनः ॥ ५४ ॥
हमलोग तुम्हें साधारण पुरवासी बताकर छिपानेमें असमर्थ हैं; क्योंकि तुम देवताओंके गुप्त रहस्योंसे भी परिचित, सर्वज्ञ तथा सबको उत्पन्न करनेवाले हो ॥ ५४ ॥
शक्तश्चापि जरासंधं नृपं योधयितुं विभो ।
त्वद्बुद्धिवशगाः सर्वे वयं योधव्रते स्थिताः ॥ ५५ ॥
प्रभो ! तुम राजा जरासंधसे युद्ध करनेमें समर्थ हो । हम सब लोग योद्धाओंके व्रतमें स्थिर रहकर सदा तुम्हारी बुद्धिके वशीभूत रहेंगे ॥ ५५ ॥
जरासंधस्तु बलवान् नृपाणां मूर्ध्नि तिष्ठति ।
अप्रमेयबलश्चैव वयं च कुशसाधनाः ॥ ५६ ॥
परंतु राजा जरासंध बड़ा बलवान् है । वह राजाओंके सिरपर खड़ा है । उसके पास असंख्य सेना है और इधर हम लोगोंके पास युद्धकी साधन-सामग्री बहुत थोड़ी है ॥ ५६ ॥
न चेयमेकाहमपि पुरी रोधं सहिष्यति ।
कृशभक्तेन्धनक्षामा दुर्गैरपरिवेष्टिता ॥ ५७ ॥
यह मथुरापुरी शत्रुओंद्वारा किये गये एक दिनके उपरोध (घेरे) को भी नहीं सह सकेगी; क्योंकि यहाँ खाने-पीनेकी सामग्री बहुत कम है। लकड़ियोंका संचय भी स्वल्प ही है तथा यह पुरी विभिन्न प्रकारके दुर्गोंसे घिरी हुई नहीं है ॥ ५७ ॥
पादटिप्पणी:
सम्पत्ति दौहित्रको ही प्राप्त होनी चाहिये—यह शास्त्रका नियम है, अतः लवणासुरके मारे जानेपर यदु-पौत्र भीम ही उस समय उस राज्यके अधिकारी हुए ।