विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 375, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] अष्टात्रिंशोऽध्यायः ३५३
बहुलता थी। उसका विस्तार बड़ा था और वहाँ ताँबेका कारोबार होता था, जिससे लोगोंकी जीविका चलती थी ॥ २७ ॥
वनवासीति विख्यातः स्फीतो जनपदो महान् ।
पुरस्य तस्य तु श्रीमान् द्रुमैः सार्वर्तुकैर्वृतः ॥ २८ ॥
उस नगरका महान् समृद्धिशाली एवं शोभायमान जनपद 'वनवासी' नामसे विख्यात हुआ। वहाँ सभी ऋतुओंमे फूलने-फलनेवाले वृक्ष सब ओर हरे-भरे दिखायी देते थे ॥२८॥
हरितोऽपि समुद्रस्य द्वीपं समभिपालयत् ।
रत्नसंचयसम्पूर्णं नारीजनमनोहरम् ॥ २९ ॥
हरित भी रत्नराशिसे पूर्ण उस समुद्र-सम्बन्धी द्वीपका पालन करने लगे, जो नारीजनोंके लिये मनोहर था (अथवा नारियोंके कारण मनोहर प्रतीत होता था) ॥ २९ ॥
तस्य दाशा जले मग्ना मधुरा नाम विश्रुताः ।
ये हरन्ति सदा शङ्खान् समुद्रोदरचारिणः ॥ ३० ॥
राजा हरितके द्वारा नियुक्त हुए धीवर, जो वहाँ 'मधुर' नामसे प्रसिद्ध थे, जलमे डूबकर समुद्रके भीतर विचरनेवाले शङ्खोंको पकड़ लाते थे ॥ ३० ॥
तस्यापरे दाशजनाः प्रवालाञ्जलसम्भवान् ।
संचिन्वन्ति सदा युक्ता जातरूपं च मौक्तिकम् ॥ ३१ ॥
उनके दूसरे-दूसरे मल्लाह सदा सावधान रहकर जलके भीतर होनेवाले मूँगो तथा चमकीले मोतियोंका संग्रह करते थे ॥ ३१ ॥
जलजानि च रत्नानि निषादास्तस्य मानवाः ।
प्रचिन्वन्तोऽर्णवे युक्ता नौभिः संयानगामिनः ॥ ३२ ॥
हरितके ही कार्यकर्ता निषाद बड़ी-बड़ी नौकाओंको साथ लिये छोटी नौकाओंद्वारा समुद्रमे जाते और जलमे उत्पन्न होनेवाले रत्नोंकी खोज करते थे (छोटी नावोंसे दूर-दूरतक जाकर वे रत्नोंका संचय करते और एक जगह खड़ी हुई बड़ी नौकामे लाकर रखते थे) ॥ ३२ ॥
मत्स्यमांसेन ते सर्वे वर्तन्ते स्म सदा नराः ।
गृह्णन्तः सर्वरत्नानि रत्नद्वीपनिवासिनः ॥ ३३ ॥
उस रत्नद्वीपमें निवास करनेवाले वे मल्लाह जातिके लोग सब प्रकारके रत्नोंका संग्रह करते और मछलीके मांससे जीवन-निर्वाह करते थे ॥ ३३ ॥
तैः संयानगतैर्द्रव्यैर्वणिजो दूरगामिनः ।
हरितं तर्पयन्त्येकं यथैव धनदं तथा ॥ ३४ ॥
नौकाओंमें समुद्रने निकाले गये जो द्रव्य संचित होते, उनके द्वारा दूर देशोकी यात्रा करनेवाले व्यवसायी वैश्य व्यापार करते और प्राप्त हुए धनसे एकमात्र राजा हरितको ही तृप्त करते थे, जैसे यक्ष केवल कुवेरको ही अपने उपार्जित धनसे संतुष्ट किया करते हैं ॥ ३४ ॥
एवमिक्ष्वाकुवंशात् तु यदुवंशो विनिःसृतः ।
चतुर्धा यदुपूत्रैस्तु चतुर्भिर्भिद्यते पुनः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार यह यदुवंश इक्ष्वाकुवंशसे निकला है। फिर यदुके चार छोटे पुत्रोंद्वारा यह चार अन्य शाखाओमे विभक्त हुआ है ॥ ३५ ॥
स यदुर्माधवे राज्यं विसृज्य यदुपूङ्गवे ।
त्रिविष्टपं गतो राजा देहं त्यक्त्वा महीतले ॥ ३६ ॥
वे राजा यदु अपने बड़े पुत्र यदुकुल-पुङ्गव माधवको अपना राज्य दे इस भूतलपर शरीरका परित्याग करके स्वर्ग-को चले गये ॥ ३६ ॥
बभूव माधवसुतः सत्त्वतो नाम वीर्यवान् ।
सत्त्ववृत्तिर्गुणोपेतो राजा राजगुणे स्थितः ॥ ३७ ॥
माधवका पराक्रमी पुत्र सत्त्वत नामसे विख्यात हुआ। वे गुणवान् राजा सत्त्वत राजोचित गुणोंमें प्रतिष्ठित थे और सदा सात्त्विक वृत्तिसे रहते थे ॥ ३७ ॥
सत्त्वतस्य सुतो राजा भीमो नाम महानभूत् ।
येन भैमाः सुसंवृत्ताः सत्त्वतात् सात्त्वताः स्मृताः॥३८॥
सत्त्वतके पुत्र महान् राजा भीम हुए, जिनसे भावी पीढ़ी-के लोग 'भैम' कहलाये। सत्त्वतसे उत्पन्न होनेके कारण उन सबको 'सात्त्वत' भी माना गया है॥ ३८ ॥
राज्ये स्थिते नृपे तस्मिन् रामे राज्यं प्रशासति ।
शत्रुघ्नो लवणं हत्वा चिच्छेद स मधोर्वनम् ॥ ३९ ॥
जब राजा भीम आनर्त देशके राज्यपर प्रतिष्ठित थे, उन्हीं दिनों अयोध्यामे भगवान् श्रीराम भूमण्डलके राज्यका शासन करते थे। उनके राज्यकालमे शत्रुघ्नने मधुपुत्र लवणको मारकर मधुवनका उच्छेद कर डाला ॥ ३९ ॥
तस्मिन् मधुवने स्थाने पुरीं च मधुरामिमाम् ।
निवेशयामास विभुः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ४० ॥
उसी मधुवनके स्थानमे सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले प्रभावशाली शत्रुघ्नने इस मधुरापुरीको बसाया था ॥ ४० ॥
पर्यये चैव रामस्य भरतस्य तथैव च ।
सुमित्रासुतयोश्चैव स्थानं प्राप्तं च वैष्णवम् ॥ ४१ ॥
भीमेनेयं पुरी तेन राज्यसम्बन्धकारणात् ।
स्ववशे स्थापिता पूर्वं स्वयमध्यासिता तथा ॥ ४२ ॥
जब श्रीरामके अवतारका उपसंहार हुआ और श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न सभी परमधामको पधारे, तब भीमने इस वैष्णव स्थान (मधुरा) को प्राप्त किया; क्योकि (लवणके) मारे जानेपर अब उस राज्यसे उन्हींका लगाव रह गया था। (वे ही उत्तराधिकारी होनेयोग्य थे।)*
* हर्यश्वके पुत्र यदु मधुकी पुत्री मधुमतीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे; अतः वे मधुके दौहित्र थे। नानाके कोई पुत्र न हो तो उसकी
म० ह० १२-