विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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स्वं स्वं निवेशनं सर्वे भेजिरे नृपसत्तमाः ।
पुरस्थानानि रम्याणि मृगयन्तो यथाक्रमम् ॥ १३ ॥
उन सबको राज्यलक्ष्मी प्राप्त हुई। सबका विभिन्न राज्योंपर अभिषेक हुआ तथा सभी छत्र-चामर आदि राजोचित चिह्नोंसे अलंकृत हुए। तत्पश्चात् पिताकी आज्ञा पाकर लोकपालोंके समान वे चारों नृपश्रेष्ठ राजकुमार अपने-अपने घरमें गये। फिर उन्होंने क्रमशः सुरम्य राजधानी बनानेके लिये स्थानकी खोज प्रारम्भ की ॥ १२-१३ ॥
मुचुकुन्दश्च राजर्षिर्विन्ध्यमध्यमरोचयत् ।
स्वस्थानं नर्मदातीरे दारुणोपलसंकटे ॥ १४ ॥
राजर्षि मुचुकुन्दने विन्ध्यपर्वतके मध्यवर्ती स्थानको पसंद किया। उन्होंने विषम प्रस्तरखण्डोंसे भरे हुए दुर्गम नर्मदा-तटपर अपना स्थान बनाया ॥ १४ ॥
स च तं शोधयामास विविक्तं च चकार ह ।
सेतुं चैव समं चक्रे परिखाश्चामितोदकाः ॥ १५ ॥
उन्होंने उस स्थानका शोधन किया और उसे एकान्त एवं पवित्र बनाया। सम सेतुका निर्माण किया और अथाह जलसे भरी हुई खाइयाँ खुदवायीं ॥ १५ ॥
स्थापयामास भागेषु देवतायतनान्यपि ।
रथ्या वीथीर्नृणां मार्गांश्चत्वराणि वनानि च ॥ १६ ॥
नगरके विभिन्न भागोंमें बहुत-से देवमन्दिर भी स्थापित किये। सड़कें, गलियाँ, जनसाधारणके मार्ग तथा चौराहे बनवाये और वन भी लगवाये ॥ १६ ॥
स तां पुरीं धनवतीं पुरुहूतपुरीप्रभाम् ।
नातिदीर्घेण कालेन चकार नृपसत्तमः ॥ १७ ॥
उन नृपश्रेष्ठ मुचुकुन्दने उस पुरीको थोड़े ही दिनोंमें धन-धान्यसे सम्पन्न करके इन्द्रपुरीके समान प्रकाशित एवं सुशोभित कर दिया ॥ १७ ॥
नाम चास्याः शुभं चक्रे निर्मितं स्वेन तेजसा ।
तस्याः पुर्या नृपश्रेष्ठो देवश्रेष्ठपराक्रमः ॥ १८ ॥
देवताओंके समान श्रेष्ठ पराक्रमी नृपवर मुचुकुन्दने उस पुरीका अपने ही तेजसे निर्मित शुभ सुन्दर नाम रक्खा—॥ १८ ॥
महाश्मसंघातवती यथेयं विन्ध्यसानुगा ।
माहिष्मती नाम पुरी प्रकाशमुपयास्यति ॥ १९ ॥
'विन्ध्य-गिरिके शिखरपर बसी हुई यह नगरी महान् अश्मसंघात (प्रस्तर-समूह) से युक्त है, इसलिये संसारमें 'माहिष्मतीपुरी' के नामसे विख्यात होगी' ॥ १९ ॥
उभयोर्विन्ध्ययोः पादे नगयोस्तां महापुरीम् ।
मध्ये निवेशयामास श्रिया परमया युताम् ॥ २० ॥
राजा मुचुकुन्दने उत्तम शोभा-सम्पत्तिसे सम्पन्न उस महापुरीको दोनों विन्ध्यपर्वतोंके बीचमें बसाया था ॥ २० ॥
पुरिकां नाम धर्मात्मा पुरीं देवपुरीप्रभाम् ।
उद्यानशतसम्बाधां समृद्धआपणचत्वराम् ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् उन धर्मात्मा नरेशने एक 'पुरिका' नामवाली पुरी बसायी, जो देवपुरीके समान प्रकाशित होती थी। उसके भीतर सैकड़ों उद्यान बने थे तथा वैभवपूर्ण हाट-बाजार और चौराहे भी उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २१ ॥
ऋक्षवन्तं समभितस्तीरे तत्र निरामये ।
निर्मिता सा पुरी राज्ञा पुरिका नाम नामतः ॥ २२ ॥
ऋक्षवान् पर्वतके समीप, रोग-शोकसे रहित नर्मदा-तटपर राजाने पुरिका नामक पुरीका निर्माण कराया था ॥ २२॥
स ते द्वे विपुले पुर्यौ देवभोग्योपमे शुभे ।
पालयामास धर्मात्मा राजा धर्मे व्यवस्थितः ॥ २३ ॥
धर्ममें स्थित हुए वे धर्मात्मा नरेश देवताओंके उपभोगमें आनेवाली स्वर्गीय पुरियोंके समान उन दो सुन्दर नगरोंका निर्माण करके उनका पालन करने लगे ॥ २३ ॥
पद्मवर्णोऽपि राजर्षिः सह्यपृष्ठे पुरोत्तमम् ।
चकार नद्या वेणायास्तीरे तरुलताकुले ॥ २४ ॥
राजर्षि पद्मवर्णने भी सह्यपर्वतके पृष्ठभागमें वृक्षों और लताओंसे व्याप्त वेणा नदीके तटपर एक उत्तम नगरका निर्माण कराया ॥ २४ ॥
विषयस्याल्पतां ज्ञात्वा सम्पूर्णं राष्ट्रमेव च ।
निवेशयामास नृपः स वप्रप्रायमुत्तमम् ॥ २५ ॥
अपनी राज्यभूमिका विस्तार दूसरोंकी अपेक्षा छोटा जानकर उन्होंने अपने सम्पूर्ण राष्ट्रको ही एक नगरके रूपमें बसाया और उसे सब ओरसे एक विशाल चहारदीवारीके द्वारा घेर दिया। उस उत्तम राष्ट्रमें परकोटेकी ही प्रधानता थी ॥ २५ ॥
पद्मावतं जनपदं करवीरं च तत्पुरम् ।
निर्मितं पद्मवर्णेन प्राजापत्येन कर्मणा ॥ २६ ॥
उनका राज्य पद्मावत जनपदके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उनकी राजधानीका नाम करवीरपुर हुआ। पद्मवर्णने शिल्पशास्त्रके नियमोंके अनुसार उस नगरका निर्माण कराया था ॥
सारसेनापि विहितं रम्यं क्रौञ्चपुरं महत् ।
चम्पकाशोकबहुलं विपुलं ताम्रमृत्तिकम् ॥ २७ ॥
राजा सारसने भी क्रौञ्चपुर¹ नामक महान् एवं रमणीय नगरका निर्माण कराया, जिसमें चम्पा और अशोक वृक्षोंकी
१. आचार्य नीलकण्ठने 'क्रौञ्चपुर' नगरकी स्थिति वेणाके दक्षिण तटपर बतायी है।