विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 373, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| विष्णुपर्व ] | सप्तत्रिंशोऽध्यायः | ३५१ |
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ताराओंवाले नक्षत्रसे संयुक्त चन्द्रमाके समान दिखायी देते थे ॥ ७१ ॥
स तदन्तःपुरं सर्वं ददर्श नृपसत्तमः।
वैवाहिकेन वेषेण दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ ७२ ॥
'वैवाहिक वेशसे युक्त तथा दिव्य हार एवं चन्दन धारण करनेवाले नृपश्रेष्ठ यदुने जलसे बाहर आकर अपने समस्त अन्तःपुरको वहाँ उपस्थित देखा ॥ ७२ ॥
समाश्वास्य च ताः सर्वाः सपत्नीः पावकोपमाः।
जगाम स्वपुरं राजा प्रीत्या परमया युतः ॥ ७३ ॥
'तदनन्तर अग्निके समान तेजस्विनी उन सारी पत्नियोंको आश्वासन देकर राजा यदु अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उन सबके साथ अपने नगरको चले गये' ॥ ७३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि विकद्रुवाक्यं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें विकद्रुका वाक्यविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
अष्टात्रिंशोऽध्यायः
विकद्रुद्वारा यदुकी संततिका वर्णन तथा मथुरापुरीको जरासंधका आक्रमण सहनेके अयोग्य बताना
वैशम्पायन उवाच
स तासु नागकन्यासु कालेन महता नृपः।
जनयामास विक्रान्तान् पञ्च पुत्रान् कुलोद्वहान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यदुने दीर्घकालके पश्चात् उन पाँचों नागकन्याओंके गर्भसे पाँच पराक्रमी एवं कुलका भार वहन करनेमे समर्थ पुत्र उत्पन्न किये ॥ १ ॥
मुचुकुन्दं महाबाहुं पद्मवर्णं तथैव च।
माधवं सारसं चैव हरितं चैव पार्थिवम् ॥ २ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—महाबाहु मुचुकुन्द, पद्मवर्ण, माधव, सारस तथा राजा हरित ॥ २ ॥
एतान् पञ्च सुतान् राजा पञ्चभूतोपमान् भुवि।
ईक्षमाणो नृपः प्रीतिं जगामातुलविक्रमः ॥ ३ ॥
ये पाँचों पुत्र भूतलपर पाँच भूतोंके समान थे । अतुल पराक्रमी राजा यदु इन्हे देखकर बहुत प्रसन्न होते थे ॥ ३ ॥
ते प्राप्तवयसः सर्वे स्थिताः पञ्च यथाद्रयः।
तेजिता बलदर्पाभ्यामूचुः पितरमग्रतः ॥ ४ ॥
जब वे सब वयस्क हुए, तब पाँच पर्वतोंके समान प्रतीत होने लगे। एक दिन अपने बल और दर्पसे प्रोत्साहित होकर वे अपने पिताके सामने खड़े हो इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥
तात युक्ताः स्म वयसा बले महति संस्थिताः।
क्षिप्रमाज्ञाप्तुमिच्छामः किं कुर्मस्तव शासनात् ॥ ५ ॥
'तात ! अब हम बड़ी अवस्थाके हो गये, महान् बलमे हमारी स्थिति है (हम महान् बलवान् हैं); अतः शीघ्र आपकी आज्ञा चाहते हैं, बताइये, आपके आदेशसे हम कौन-सा कार्य करें'? ॥ ५ ॥
स तान् नृपतिशार्दूलः शार्दूलानिव वेगितान्।
प्रीत्या परमया प्राह सुतान् वीर्यकुतूहलात् ॥ ६ ॥
नरेशोमे सिंहके समान पराक्रमी यदुने सिंहोंके ही सदृश वेगशाली अपने इन पुत्रोसे उनके बल-पराक्रमको जाननेकी उत्सुकतासे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा—॥ ६ ॥
विन्ध्यर्क्षवन्तावभितो द्वे पुर्यौ पर्वताश्रये।
निवेशयतु यत्नेन मुंचुकुन्दः सुतो मम ॥ ७ ॥
'मेरा पुत्र मुचुकुन्द विन्ध्य और ऋक्षवान् पर्वतोंके निकट पर्वतीय भूमिका ही आश्रय ले यत्नपूर्वक दो पुरियाँ बसाये ॥ ७ ॥
सह्यस्य चोपरिष्टात्तु दक्षिणां दिशमाश्रितः।
पद्मवर्णोऽपि मे पुत्रो निवेशयतु मा चिरम् ॥ ८ ॥
'मेरा बेटा पद्मवर्ण भी दक्षिण दिशाका आश्रय ले सह्यपर्वतके शिखरपर शीघ्र एक नगर बसाये !॥ ८ ॥
तत्रैव परतः कान्ते देशे चम्पकभूषिते।
सारसो मे पुरं रम्यं निवेशयतु पुत्रकः ॥ ९ ॥
'वहीं पश्चिम दिशाकी ओर चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित मनोरम प्रदेशमे बेटा सारस एक रमणीय राजधानीकी स्थापना करे ॥ ९ ॥
हरितोऽयं महाबाहुः सागरे हरितोदके।
द्वीपं पन्नगराजस्य सुतो मे पालयिष्यति ॥ १० ॥
'मेरा पुत्र यह महाबाहु हरित हरे जलसे भरे हुए समुद्रमें नागराज धूम्रवर्णके द्वीपका पालन करेगा ॥ १० ॥
माधवो मे महाबाहुर्ज्येष्ठपुत्रश्च धर्मवित्।
यौवराज्येन संयुक्तः स्वपुरं पालयिष्यति ॥ ११ ॥
'मेरा पाँचवाँ पुत्र महाबाहु माधव ज्येष्ठ तथा धर्मज्ञ है, यह युवराज होकर अपने इसी नगरका (जो रैवतकके समीप है) पालन करेगा' ॥ ११ ॥
सर्वे नृपश्रियं प्राप्ता अभिषिक्ताः सचामराः।
पित्रानुशिष्टाश्चत्वारो लोकपालोपमा नृपाः ॥ १२॥