विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| विष्णुपर्व ] | षट्त्रिंशोऽध्यायः | ३४३ |
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राजन् ! दोनों सेनाओंमें वेणु, भेरी, मृदङ्ग और शङ्ख आदि सहस्रों वाद्योंका महान् घोष होने लगा ॥ ९८ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितोत्कृष्टैस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् ।
उत्पपात रजश्चापि खुरनेमिसमुद्धतम् ॥ ९९ ॥
योद्धाओंके गर्जने, ताल ठोंकने और उच्च स्वरसे पुकारने आदिके कारण वहाँ सब ओर तुमुल ध्वनि छा गयी। घोड़ोंकी टापों और रथके पहियोंके प्रान्तभागसे उठी हुई धूल सब ओर उड़ने लगी ॥ ९९ ॥
समुद्यतमहाशस्त्राः प्रगृहीतशरासनाः ।
अन्योन्यमभिगर्जन्तः शूरास्तत्रावतस्थिरे ॥ १००॥
उभयपक्षके शूर-वीर सैनिक बड़े-बड़े शस्त्र उठाये, धनुष लिये एक दूसरेके सम्मुख गर्जना करते हुए युद्धस्थलमे डटे हुए थे ॥ १०० ॥
रथिनः सादिनश्चैव पत्तयश्च सहस्रशः ।
गजाश्चातिबलास्तत्र समुत्पेतुः समन्ततः ॥ १०१॥
उस युद्धमें सब ओर रथी, घुड़सवार, सहस्रों पैदल तथा अत्यन्त बलशाली गजराज एक दूसरेपर टूटे पड़ते थे ॥ १०१ ॥
स संनिपातस्तुमुलस्त्यक्त्वा प्राणानवर्तत ।
वृष्णिभिः सह योधानां जरासंधस्य दारुणः ॥१०२॥
वृष्णियोंके साथ जरासंधके योद्धाओंका वह घमासान युद्ध प्राणोंका मोह छोड़कर हो रहा था और भयानक रूप धारण करता जा रहा था ॥ १०२ ॥
ततः शिनिरनाधृष्टिर्बभ्रुुर्विपृथुराहुकः ।
बलदेवं पुरस्कृत्य सैन्यस्यार्द्धेन दंशिताः ॥ १०३॥
दक्षिणं पक्षमासेदुः शत्रुसैन्यस्य भारत ।
भरतनन्दन ! तदनन्तर शिनि, अनाधृष्टि, बभ्रु (अक्रूर), विपृथु और आहुक (उग्रसेन)—इन सबने बलदेवजीको आगे रखकर अपनी आधी सेनासे घिरे रहकर शत्रुओंकी सेनाके दक्षिण भागपर आक्रमण किया ॥ १०३ १/२ ॥
पालितं चेदिराजेन जरासंधेन वा विभो ॥ १०४॥
उदीच्यैश्च महावीर्यैः शल्यशाल्वादिभिर्नृपैः ।
सृजन्तः शरवर्षाणि समभित्यक्तजीविताः ॥१०५॥
प्रभो ! उस भागकी रक्षा चेदिराज शिशुपाल, जरासंध तथा उत्तर दिशाके महापराक्रमी योद्धा शल्य और शाल्व आदि नरेश कर रहे थे। यादवोंने जीवनका मोह छोड़कर शत्रुओंपर बाणवर्षा आरम्भ कर दी ॥ १०४-१०५ ॥
अवगाहः पृथुः कङ्कः शतद्युम्नो विदूरथः ।
हृषीकेशं पुरस्कृत्य सैन्यस्यार्द्धेन दंशिताः ॥ १०६ ॥
शेष सेनाके आधे भागसे घिरे हुए अवगाह, पृथु, कङ्क, शतद्युम्न और विदूरथ आदि वीरोंने भगवान् श्रीकृष्णको आगे रखकर शत्रुसेनाके वामभागपर आक्रमण किया ॥ १०६ ॥
भीष्मकेणाभिगुप्तश्च रुक्मिणा च महात्मना ।
देवकेनापि राजेन्द्र तथा मद्रेreview: मद्रेश्वरेण च ॥ १०७॥
प्राच्यैश्च दाक्षिणात्यैश्च गुप्तवीर्यबलान्वितैः ।
तेषां च युद्धमभवत् समभित्यक्तजीवितम् ॥१०८॥
शक्त्यृष्टिप्रासबाणौघान् सृजतामशनिस्वनान् ।
राजेन्द्र ! वह भाग भीष्मक, महामना रुक्मी, देवक, मद्रराज शल्य तथा गुप्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न पूर्व और दक्षिण दिशाके वीरोंसे सुरक्षित था। इन्हीं सब लोगोंमें जीवनका मोह छोड़कर युद्ध होने लगा। ये लोग बिजलीके समान गड़गड़ाहट पैदा करनेवाले शक्ति, ऋष्टि, प्रास तथा बाणसमूहोंकी वर्षा करते थे ॥ १०७-१०८ १/२ ॥
सात्यकिश्चित्रकः श्यामो युयुधानश्च वीर्यवान् ।
राजाधिदेवो मृदुरः श्वफल्कश्च महारथः ॥१०९॥
सत्राजिच्च प्रसेनश्च बलेन महता वृताः ।
व्यूहस्य पुच्छं ते सर्वे प्रतियुयुर्दिपंतां मृधे ॥ ११०॥
व्यूहस्यार्द्धं समासेदुर्मुद्गरेणाभिरक्षिताः ।
राजभिश्चापि बहुभिर्वेणुदारिमुखैः सह ॥ १११॥
सात्यकि, चित्रक, श्याम, पराक्रमी युयुधान, राजाधिदेव, मृदुर, महारथी श्वफल्क, सत्राजित् और प्रसेन—इन सबने विशाल सेनासे घिरकर युद्धस्थलमे शत्रुओंके व्यूहके पुच्छभागपर आक्रमण किया। मुद्गरसे सुरक्षित रहकर इन्होंने व्यूहके आधे भागपर धावा बोल दिया था, उस समय इनका वेणुधारि आदि बहुत-से राजाओके साथ युद्ध हुआ ॥ १०९-१११ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि मथुरोपरोधे युद्धवर्णने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधका मथुरापर घेरा और दोनों पक्षके योद्धाओंके युद्धका वर्णनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
षट्त्रिंशोऽध्यायः
वृष्णिवंशियों तथा जरासंधके सैनिकोंका युद्ध, बलराम और जरासंधका गदायुद्ध तथा जरासंधका पराजित होकर पलायन करना
| वैशम्पायन उवाच | वैशम्पायनजी कहते हैं— |
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| ततो युद्धानि वृष्णीनां बभूवुः सुमहान्त्यथ ।<br>मागधस्य महामात्रैर्नृपैश्चैवानुयायिभिः ॥ १ ॥ | जनमेजय ! तदनन्तर जरासंधके महावतों और अनुगामी नरेशोंके साथ वृष्णिवंशियोंके कई बड़े-बड़े युद्ध हुए ॥ १ ॥ |