विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३४२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंश
एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवानां नन्दिवर्धनः ।
सुपर्णध्वजमास्थाय कृष्णस्तु रथमुत्तमम् ॥ ८२ ॥
समभ्ययाज्जरासंधं शरैर्विव्याध चाष्टभिः ।
सारथिं चास्य विव्याध पञ्चभिर्निशितैः शरैः ॥ ८३ ॥
इसी बीचमें देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उत्तम गरुड़ध्वज रथपर आरूढ़ हो जरासंधपर चढ़ आये। उन्होंने आठ बाणोंसे उसको घायल कर दिया और पाँच पैने बाणोंद्वारा उसके सारथिको भी बींध डाला ॥
जघान तुरगांश्चाजौ यतमानस्य वीर्यवान् ।
तं कृच्छ्रगतमाज्ञाय चित्रसेनो महारथः ॥ ८४ ॥
सेनानीः कैशिकश्चैव कृष्णं विविध्यतुः शरैः ।
जरासंध बचनेका प्रयत्न करता ही रह गया, किंतु पराक्रमी श्रीकृष्णने रणभूमिमें उसके घोड़ोंको भी मार डाला। उसे संकटमें पड़ा जान महारथी चित्रसेन तथा सेनापति कैशिक दोनों आ पहुँचे और श्रीकृष्णको अपने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ८४ ॥
त्रिभिर्विव्याध संसक्तं बलदेवं च कैशिकः ॥ ८५ ॥
बलदेवो धनुश्चास्य भल्लेनाजौ द्विधाकरोत् ।
जवेनाभ्यर्दयच्चापि तानरीञ्छरवृष्टिभिः ॥ ८६ ॥
कैशिकने लगातार तीन बाणोंसे बलरामजीको बींध दिया। तब बलरामने भी एक भल्ल मारकर युद्धमें उसके धनुषके दो टुकड़े कर डाले। साथ ही वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करके उन तीनों शत्रुओंको पीड़ित कर दिया ॥ ८५-८६ ॥
बहुभिर्बहुधा वीरान् समन्तात् स्वर्णभूषणैः ।
तं चित्रसेनः संरब्धो विव्याध नवभिः शरैः ॥ ८७ ॥
कैशिकः पञ्चभिश्चापि जरासंधश्च सप्तभिः ।
उन्होंने बहुतसे स्वर्णभूषित बाणोंद्वारा उन वीरोंको सब ओरसे बारंबार घायल किया। तब क्रोधमें भरे हुए चित्रसेनने नौ, कैशिकने पाँच तथा जरासंधने सात बाणोंसे उनको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ८७ ॥
त्रिभिस्त्रिभिश्च नाराचैस्तान् विभेद जनार्दनः ॥ ८८ ॥
पञ्चभिः पञ्चभिश्चैव बलदेवः शितैः शरैः ।
यह देख श्रीकृष्णने तीन-तीन नाराचोंसे उन तीनोंको वेध डाला। फिर बलदेवने भी पाँच-पाँच पैने बाणोंसे उन सबको घायल कर दिया ॥ ८८ ॥
रथं चैवास्य चिच्छेद चित्रसेनस्य वीर्यवान् ॥ ८९ ॥
बलदेवो धनुश्चास्य भल्लेनाजौ द्विधाकरोत् ।
इसके बाद पराक्रमी बलरामने चित्रसेनके रथके टुकड़े-टुकड़े कर दिये तथा एक भल्ल मारकर युद्धस्थलमें उसके धनुषके भी दो खण्ड कर डाले ॥ ८९ ॥
स च्छिन्नधन्वा विरथो गदामादाय वीर्यवान् ॥ ९० ॥
अभ्यधावत् सुसंरब्धो जिघांसुर्मुसलायुधम् ।
धनुष और रथके नष्ट हो जानेपर रोषमें भरा हुआ पराक्रमी चित्रसेन मूसलधारी बलरामको मार डालनेकी इच्छा से हाथमें गदा लेकर उनकी ओर दौड़ा ॥ ९० ॥
सिखृक्षतस्तु नाराचांश्चित्रसेनवधैषिणः ।
धनुश्चिच्छेद रामस्य जरासंधो महाबलः ॥ ९१ ॥
यह देख बलराम चित्रसेनके वधकी इच्छासे उसपर नाराचोंकी वृष्टि करने लगे। इतनेहीमें महाबली जरासंधने बलरामजीके धनुषको काट दिया ॥ ९१ ॥
गदया च जघानाश्वान् क्रोधात् स मगधेश्वरः ।
रामं चाभ्यद्रवद् वीरो जरासंधो महाबलः ॥ ९२ ॥
साथ ही क्रोधपूर्वक गदाका प्रहार करके महाबली वीर मगधराज जरासंधने उनके घोड़ोंको कालके गालमें भेज दिया, फिर बलरामपर भी धावा किया ॥ ९२ ॥
आदाय मुसलं रामो जरासंधमुपाद्रवत् ।
तयोस्तद् युद्धमभवत् परस्परवधैषिणोः ॥ ९३ ॥
बलरामजी भी मूसल लेकर जरासंधपर टूट पड़े। एक दूसरेके वधकी इच्छावाले उन दोनों वीरोंमें घोर युद्ध होने लगा ॥ ९३ ॥
चित्रसेनस्तु संसक्तं दृष्ट्वा रामेण मागधम् ।
रथमन्यं समारुह्य जरासंधमवारयत् ॥ ९४ ॥
उधर चित्रसेन मगधराजको बलरामजीके साथ उलझा हुआ देख दूसरे रथपर चढ़कर आ गया और जरासंधको लड़नेसे रोकने लगा ॥ ९४ ॥
ततो बलेन महता गजानीकेन चाप्यथ ।
उभयोरन्तरे ताभ्यां संकुलं समपद्यत ॥ ९५ ॥
तदनन्तर वह विशाल गजसेनाके साथ जरासंध और बलरामके बीचमें आ गया और उन दोनों भाइयोंके साथ घोर युद्ध करने लगा ॥ ९५ ॥
ततः सैन्येन महता जरासंधोऽभिसंवृतः ।
रामकृष्णाग्रगान् भोजानाससाद महाबलः ॥ ९६ ॥
तब विशाल सेनासे घिरा हुआ महाबली जरासंध बलराम और श्रीकृष्णके अग्रगामी भोजोंपर जा चढ़ा ॥ ९६ ॥
तत्र प्रक्षुभितस्येव सागरस्य महास्वनः ।
प्रादुर्बभूव तुमुलः सेनयोरुभयोरपि ॥ ९७ ॥
फिर तो वहाँ उभय पक्षकी सेनाओंमें विक्षुब्ध महासागरके समान बड़ी भयंकर एवं भारी गर्जना सुनायी देने लगी ॥ ९७ ॥
वेणुभेरीमृदङ्गानां शङ्खानां च सहस्रशः ।
उभयोः सेनयो राजन् प्रादुरासीन्महास्वनः ॥ ९८ ॥