विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ३४१
श्रीकृष्णके दूसरे हाथमे वह सुप्रसिद्ध कौमोदकी गदा स्वतः आ गयी ॥ ६५ ॥
तौ सप्रहरणौ वीरौ साक्षाद् विष्णुतनुपमौ ।
समरे रामगोविन्दौ रिपूंस्तान् प्रत्ययुध्यताम् ॥ ६६ ॥
उन आयुधोंसे युक्त हो साक्षात् विष्णु-विग्रहके समान शरीरवाले दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण समराङ्गणमें उन शत्रुओंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ६६ ॥
सायुधप्रग्रहौ वीरौ तावन्योन्याश्रयावुभौ ।
पूर्वजानुजसंज्ञौ तौ रामगोविन्दलक्षणौ ॥ ६७ ॥
द्विषत्सु प्रतिकुर्वाणौ पराक्रान्तौ यथेश्वरौ ।
विचेरतुर्यथा देवौ वसुदेवसुतावुभौ ॥ ६८ ॥
उन दिव्य आयुधोंको ग्रहण करके एक दूसरेको सहारा देनेवाले वे अग्रज और अनुजरूप दोनों वीर बन्धु श्रीबलराम और श्रीकृष्ण शत्रुओंका सामना करते हुए ईश्वरकोटिक महापुरुषोंके समान पराक्रम दिखाने लगे। वसुदेवके वे दोनों पुत्र रणभूमिमें देवताओंके समान विचरते थे ॥ ६७-६८ ॥
हलमुद्यम्य रामस्तु सर्पेन्द्रमिव कोपितः।
चचार समरे वीरो द्विषियामन्तको यथा ॥ ६९ ॥
वीर बलराम क्रोधमें भरकर सर्पराजके समान हल उठाये शत्रुओंके लिये कालरूप होकर समरभूमिमे विचर रहे थे ॥ ६९ ॥
विक्षिपन् रथवृन्दानि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
चकार रोषं सफलं नागेषु च हयेषु च ॥ ७० ॥
वे महामनस्वी क्षत्रियोंके रथसमूहोंको पीछे ढकेलते हुए हाथियों और घोड़ोंपर अपना रोष सफल करने लगे ॥ ७० ॥
कुञ्जराल्लाङ्गलक्षितान् मुसलाक्षेपताडितान् ।
रामो विराजन् समरे निर्ममन्थ यथाचलान् ॥ ७१ ॥
बलरामजी गजराजोंको हलसे खींचकर उन्हें मूसलकी मारसे घायल करते हुए समराङ्गणमे अद्भुत शोभा पा रहे थे। उन्होंने पर्वतोंके समान हाथियोंको मथ डाला ॥ ७१ ॥
ते वध्यमाना रामेण रणे क्षत्रियपुङ्गवाः ।
जरासंधान्तिकं भीताः समरोत् प्रतिजग्मिरे ॥ ७२ ॥
रणभूमिमे बलरामजीके द्वारा मारे जाते हुए वे क्षत्रियशिरोमणि भयभीत हो समरसे पीछे हटकर जरासंधके पास भाग गये ॥ ७२ ॥
तानुवाच जरासंधः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ।
धिगेतां क्षत्रवृत्तिं वः समरे कातरात्मनाम् ॥ ७३ ॥
उस समय क्षत्रिय-धर्ममे स्थिर रहनेवाले जरासंधने उन क्षत्रियोंसे कहा—'अरे समराङ्गणमे कातर-हृदय होकर पीछे भागनेवाले तुम सब लोगोंकी इस क्षत्रिय-वृत्तिको धिक्कार है! ॥
परावृत्तस्य समरे विरथस्य पलायतः ।
भ्रूणहत्यामिवासह्यां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७४ ॥
'जो क्षत्रिय संग्रामभूमिमें रथहीन होनेपर पीठ दिखाकर भागने लगता है, उसकी इस भीरुताको मनीषी पुरुष भ्रूण-हत्याके समान असह्य बताते हैं ॥ ७४ ॥'
भीताः कस्मान्निवर्तध्वं धिगेतां क्षत्रवृत्तित्ताम् ।
क्षिप्रं सर्वे निवर्तध्वं मम वाक्येन चोदिताः ॥ ७५ ॥
'योद्धाओ ! तुम भयभीत होकर युद्धसे पीछे क्यों हटते हो? तुम्हारी ऐसी क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है! मेरी वाणीसे प्रेरित हो तुम सब लोग शीघ्र ही युद्धभूमिको लौट जाओ ॥
अथवा तिष्ठत रथैः प्रेक्षकाः समवस्थिताः ।
यावदेतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम् ॥ ७६ ॥
'अथवा रथोंके द्वारा दर्शक बनकर तटस्थ खड़े रहो, जबतक कि मैं रणभूमिमें इन ग्वालोंको मारकर यमलोक नहीं भेज देता हूँ' ॥ ७६ ॥
ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे जरासंधेन नोदिताः ।
सृजन्तः शरजालानि हृष्टा योद्धुं व्यवस्थिताः ॥ ७७ ॥
तत्र जरासंधसे प्रेरित हो वे समस्त क्षत्रिय बाण-समूहोंकी वृष्टि करते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धके लिये डट गये ॥७७॥
ते हयैः काञ्चनापीडै रथैश्चाम्बुदनादिभिः ।
नागैश्चाम्बुदसङ्काशैर्महामात्रप्रचोदितैः ॥ ७८ ॥
वे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुए घोड़ों, मेघकी गर्जनाके समान घरघर ध्वनि फैलानेवाले रथों और महावतोंद्वारा हाँके गये मेघोंके समान काले गजराजोंद्वारा आगे बढ़कर युद्ध करने लगे ॥ ७८ ॥
सतनुत्राः सनिस्त्रिंशाः सपताकायुधध्वजाः ।
त्वारोपितधनुष्मन्तः सतूणीराः सतोमराः ॥ ७९ ॥
उन सबके शरीरमे कवच बँधे थे, सबने तलवारें ले रखी थीं, सभी ध्वजा-पताका और आयुधोंसे सम्पन्न थे, सभीके धनुष चढ़े हुए थे तथा सबने तरकस और तोमर ले रखे थे ॥ ७९ ॥
सच्छत्राः सादिनश्चैव चारुचामरवीजिताः ।
रणे तेऽधिगता रेजुः स्यन्दनस्था महीक्षितः ॥ ८० ॥
रथपर बैठे हुए उन राजाओंके ऊपर छत्र तने हुए थे, मनोहर चँवर डुलाये जाते थे। उनके साथ घुड़सवार भी थे। युद्धभूमिमें स्थित हुए वे सभी नरेश बड़ी शोभा पा रहे थे ॥
ते युद्धरागा रथिनो व्यगाहन्त युधां वराः ।
गदाभिश्चैव गुर्वीभिः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ॥ ८१ ॥
योद्धाओंमे श्रेष्ठ उन रथी वीरोंका युद्धमें अनुराग था, इसलिये वे भारी गदाओं, क्षेपणीयों (गोफनों) तथा मुद्गरों- से विपक्षियोंको घायल करते हुए उनकी सेनाओंमे घुस गये।