विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 362, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
तथा अन्य वीर नाना प्रकारके दूसरे शस्त्रोंसे इस पुरीको विदीर्ण कर डालें ॥ ५० ॥
अद्यैव नगरी ह्येषा विषमोच्छ्रायसंकटा ।
कार्या भूमिसमा सर्वा भवद्भिर्वसुधाधिपैः ॥ ५१ ॥
'आज ही आप सब भूपाल मिलकर ऊँचे-नीचे महलोंके समूहोंसे भरी हुई इस सारी नगरीको गर्दमें मिलाकर समतल भूमिके समान कर दें' ॥ ५१ ॥
चतुरङ्गबलैर्व्यूह्य जरासंधो व्यवस्थितः ।
अथाभ्ययाद् यदून् क्रुद्धैः सह सर्वैर्नराधिपैः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार आदेश दे चतुरङ्गिणी सेनाओंका व्यूह बनाकर जरासंध युद्धके लिये डट गया और क्रोधमें भरे हुए समस्त नरेशोंके साथ यादवोंपर चढ़ आया ॥ ५२ ॥
प्रतिजग्मुर्दशार्हास्तं व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
तद् युद्धमभवद् घोरं तेषां देवासुरोपमम् ।
अल्पानां बहुभिः सार्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् ॥ ५३ ॥
उस समय अपनी सेनाका व्यूह बनाकर प्रहारकुशल यादवोंने जरासंधका सामना किया। उनका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर प्रतीत होता था। यह थोड़ेसे योद्धाओंका बहुसंख्यक शत्रुओंके साथ युद्ध हुआ, जिसमें उभय पक्षके रथ और हाथी एक दूसरेसे सटकर जूझ रहे थे ॥ ५३ ॥
नगरान्निस्सृतौ दृष्ट्वा वसुदेवसुतावुभौ ।
क्षुभितं नृवरानीकं त्रस्तसम्मूढवाहनम् ॥ ५४ ॥
इसी समय वसुदेवके दोनों पुत्र श्रीकृष्ण और बलराम नगरसे बाहर निकले। उन्हें देखते ही उन श्रेष्ठ राजाओंकी विशाल वाहिनी क्षुब्ध हो उठी। उसके वाहन भयभीत और मोहाच्छन्न-से हो गये ॥ ५४ ॥
रथस्थौ दंशितौ चैव चेरतुस्तत्र यादवौ ।
मकराविव संरब्धौ समुद्रक्षोभणावुभौ ॥ ५५ ॥
कवच धारण करके रथपर बैठे हुए वे दोनों यादव-वीर वहाँ विचरने लगे, मानो क्रोधमें भरे हुए दो मगर समुद्रमें हलचल मचा रहे हों ॥ ५५ ॥
तयोः प्रयुध्यतोः संख्ये मतिरासीन्महात्मनोः ।
आयुधानां पुराणानामादानकृतलक्षणा ॥ ५६ ॥
उस संग्राममें जूझते हुए उन दोनों महात्मा वीरोंके मनमें यह संकल्प उठा, यदि हमारे पुरातन अस्त्र आ जाते तो हम उन्हें ही लेकर युद्ध करते ॥ ५६ ॥
ततः खान्निपतन्ति स्म दिव्यान्याहवसंप्लवे ।
लेलिहानानि दीप्तानि महान्ति सुदृढानि च ॥ ५७ ॥
उनके इतना सोचते ही उस युद्धमें आकाशसे वे दिव्य आयुध नीचे आने लगे। वे सब-के-सब सुदृढ़, महान् और देदीप्यमान थे तथा शत्रुओंको चाट जानेके लिये उद्यत दिखायी देते थे ॥ ५७ ॥
क्रव्यादाैरनुयातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च ।
तृपितान्याहवे भोक्तुं नृपमांसानि वै भृशम् ॥ ५८ ॥
उनके पीछे मांसभक्षी भूत-प्रेत आदि भी आ रहे थे। वे दिव्य अस्त्र मूर्तिमान् एवं विशाल थे तथा युद्धमें आये हुए राजाओंके रक्त-मांसका उपभोग करनेके लिये मानो अत्यन्त भूखे-प्यासे थे ॥ ५८ ॥
दिव्यस्रग्दामधारीणि त्रासयन्ति च खेचरान् ।
प्रभया भासमानानि पतमानानि चाम्बरात् ॥ ५९ ॥
उन्होंने दिव्य फूलोंके हार धारण किये थे। अपनी प्रभासे प्रकाशित हो आकाशसे गिरते हुए ये दिव्यास्त्र आकाशचारी प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करते थे ॥ ५९ ॥
हलं संवर्तकं नाम सौनन्दं मुसलं तथा ।
धनुषां प्रवरं शार्ङ्गं गदा कौमोदकी तथा ॥ ६० ॥
चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि च ।
ताभ्यां समवतीर्णानि यादवाभ्यां महामृधे ॥ ६१ ॥
संवर्तक नामक हल, सौनन्द नामक मूसल, धनुषोंमें श्रेष्ठ शार्ङ्ग तथा कौमोदकी गदा—भगवान् विष्णुके ये चार तेजस्वी आयुध उन दोनों भाइयोंके लिये यादवोंके उस महासमरमें उतर आये ॥ ६०-६१ ॥
जग्राह प्रथमं रामो ललामप्रतिमं हलम् ।
सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं दिव्यमालाकुलं मृधे ॥ ६२ ॥
बलरामजीने उस युद्धस्थलमें पहले सर्पराजके समान सर्पणशील (गतिमान्) तथा दिव्य मालाओंसे अलंकृत सुन्दर आकृतिवाले हलको (दाहिने हाथमें) ग्रहण किया ॥
सौनन्दं च ततः श्रीमान् निरानन्दकरं द्विषाम् ।
सव्येन सात्वतां श्रेष्ठो जग्राह मुसलोत्तमम् ॥ ६३ ॥
तदनन्तर यादवोंमें श्रेष्ठ श्रीमान् संकर्षणने शत्रुओंके आनन्दको हर लेनेवाले सौनन्द नामक श्रेष्ठ मूसलको बायें हाथसे ग्रहण किया ॥ ६३ ॥
दर्शनीयं च लोकेषु धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
नाम्ना शार्ङ्गमिति ख्यातं कृष्णो जग्राह वीर्यवान् ॥ ६४ ॥
इसके बाद पराक्रमी श्रीकृष्णने मेघोंके समान गम्भीर घोष करनेवाले शार्ङ्ग नामक धनुषको ग्रहण किया, जो समस्त लोकोंमें दर्शनीय है ॥ ६४ ॥
देवैर्निगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे ।
निशिसा कुमुदाक्षस्य नाम्ना कौमोदकीति सा ॥ ६५ ॥
देवताओंग्रहने जिन्हें अपना प्रयोजन बताया था और जिनके नेत्र खिले हुए कुमुदके समान शोभा पाते हैं, उन भगवान्