भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

३४४ : श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे रुक्मिणा वासुदेवस्य भीष्मकेणाहुकस्य च । रथी रामो जरासंधं शरैराशीविषोपमैः ॥ १० ॥ क्रथेन वसुदेवस्य कैशिकस्य तु बभ्रुना ॥ २ ॥ आवृण्वन्नभ्ययाद् वीरस्तं च राजा स मागधः ।' गदेन चेदिराजस्य दन्तवक्त्रस्य शङ्कुना । अभ्यवर्तत वेगेन स्यन्दनेनाशुगामिना ॥ ११ ॥ तथान्यैर्वृष्णिवीराणां नृपाणां च महात्मनाम् ॥ ३ ॥ रथारूढ वीर बलरामने विषधर सर्पोंके समान भयंकर युद्धमासीद्धि सैन्यानां सैनिकैर्भरतर्षभ । बाणोंद्वारा जरासंधको आच्छादित करते हुए उसपर आक्रमण अहानि पञ्च चैकं च षट् सप्ताष्टौ च दारुणम् ॥ ४ ॥ किया तथा मगधराज भी अपने शीघ्रगामी रथद्वारा बड़े वेगसे भरतश्रेष्ठ ! रुक्मीके साथ वासुदेव श्रीकृष्णका, भीष्मक- उनका सामना करनेके लिये आ पहुँचा ॥ १०-११ ॥ के साथ आहुक ( उग्रसेन ) का, क्रथके साथ वसुदेवका, अन्योन्यं विविधैरस्त्रैर्विद्ध्वा विद्ध्वा विनेदतुः । बभ्रु ( अक्रूर ) के साथ कैशिकका, गदके साथ चेदिराज तौ क्षीणशस्त्रौ विरथौ हताश्वौ हतसारथी ॥१२॥ शिशुपालका, शंकुके साथ दन्तवक्त्रका तथा अन्य सैनिकोंके गदे गृहीत्वा विक्रान्तावन्योऽन्यमभिधावताम् । साथ वृष्णिकुलके महामना वीर नरेशोंका, सारांश यह कि चे दोनों नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा एक दूसरेको घायल उभय पक्षके सैनिकोंका प्रतिद्वन्द्वी सैनिकोंके साथ दारुण करके जोर-जोरसे गरजते थे । दोनोंके अस्त्र-शस्त्र क्षीण हो द्वन्द्व युद्ध होने लगा, जो सत्ताईस दिनोंतक चलता गये, दोनों ही रथहीन हो गये तथा दोनोंके ही घोड़े और रहा ॥ २-४ ॥ सारथि मारे गये । उस दशामे वे दोनों पराक्रमी योद्धा गदा गजैर्गजा हयैरश्वाः पदाताश्च पदातिभिः । हाथमें लेकर एक-दूसरेपर टूट पड़े ॥ १२३ ॥ रथै रथा विमिश्राश्च योधा युयुधिरे नृप ॥ ५ ॥ कम्पयन्तौ भुवं वीरौ तावुद्यतगदावुभौ ॥ १३ ॥ नरेश्वर ! हाथियोंसे हाथी, घोड़ोंसे घोड़े, पैदलोंसे पैदल ददृशाते महात्मानौ गिरी सशिखराविव । और रथोंसे रथ मिश्रित हो गये और इस प्रकार घोल-मेल हाथमें गदा उठाये वे दोनों महामनस्वी वीर पृथिवीको कर सभी योद्धा विपक्षियोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ५ ॥ कम्पित करते हुए वहाँ एक-एक शिखरवाले दो पर्वतोंके समान जरासंधस्य नृपते रामेणासीत् समागमः । दिखायी देते थे ॥ १३३ ॥ महेन्द्रस्येव वृत्रेण दारुणो रोमहर्षणः ॥ ६ ॥ व्युपरमन्त युद्धानि पश्यता तौ महाभुजौ । राजा जरासंधका बलरामजीके साथ उसी प्रकार दारुण संरम्भावभिधावन्तौ गदायुद्धेषु विश्रुतौ ॥ १४ ॥ एवं रोमाञ्चकारी संघर्ष हुआ, जैसा वृत्रासुरके साथ देवराज उन दोनों महाबाहु वीरोंको युद्धके लिये उद्यत देख इन्द्रका हुआ था ॥ ६ ॥ दूसरे योद्धाओंके युद्ध बंद हो गये । उन दोनोंकी गदायुद्धमे अवेक्ष्य रुक्मिणीं कृष्णो रुक्मिणं न व्यपोथयत् । ख्याति थी । वे दोनों बड़े रोषमे भरकर एक-दूसरेपर धावा ज्वलनाकींशुसंकाशान्नानाशीविषविषोपमान् ॥ ७ ॥ करते थे ॥ १४ ॥ वारयामास कृष्णो वै शरांस्तस्य तु शिक्षया । उभौ तौ परमाचार्यौ लोके ख्यातौ महाबलौ । रुक्मिणीके साथ भविष्यमे होनेवाले सम्बन्धको दृष्टिमें मत्ताविव गजौ युद्धे तावन्योन्यमयुध्यताम् ॥ १५ ॥ रखकर श्रीकृष्णने रुक्मीको नहीं मारा, उसकी ओरसे वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आनेवाले अग्नि और सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी तथा आचार्यके रूपमे विख्यात थे तथा जैसे दो मतवाले हाथी विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंका उन्होंने अपनी शिक्षाके लड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें वे एक-दूसरेके साथ जूझ बलसे निवारण कर दिया ॥ ७३ ॥ रहे थे ॥ १५ ॥ इत्येषां सुमहानासीद् बलौघानां परिक्षयः ॥ ८ ॥ ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च समहर्षयः । उभयोः सेनयो राजन् मांसशोणितकर्दमः । समन्ततश्चाप्सरसः समाजग्मुः सहस्रशः ॥ १६ ॥ राजन् ! इस प्रकार दोनों सेनाओके सैनिकसमूहोंका उस समय गन्धर्वोंसहित देवता, सिद्ध, महर्षि तथा महान् विनाश हुआ । वहाँ रक्त और मांसकी कीच सहस्रों अप्सराएँ सब ओरसे उस युद्धको देखनेके लिये आ जम गयी ॥ ८३ ॥ पहुँचीं ॥ १६ ॥ कबन्धानि समुत्तस्थुः सुवहूनि समन्ततः ॥ ९ ॥ तद् देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम् । तस्मिन् विमर्दे योधानां संख्यावृत्तिकराणि च । शुशुभेऽभ्यधिकं राजन् दिवं ज्योतिर्गणैरिव ॥ १७ ॥ योद्धाओंके उस महान् संहारमे चारो ओरसे बहुत-से अभिदुद्राव रामं तु जरासंधो महाबलः । कबन्ध उठने लगे, जिनकी गणना नहीं की जा सकती सव्यं मण्डलममाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् ॥ १८ ॥ थी ॥ ९३ ॥