विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
३४४ : श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे रुक्मिणा वासुदेवस्य भीष्मकेणाहुकस्य च । रथी रामो जरासंधं शरैराशीविषोपमैः ॥ १० ॥ क्रथेन वसुदेवस्य कैशिकस्य तु बभ्रुना ॥ २ ॥ आवृण्वन्नभ्ययाद् वीरस्तं च राजा स मागधः ।' गदेन चेदिराजस्य दन्तवक्त्रस्य शङ्कुना । अभ्यवर्तत वेगेन स्यन्दनेनाशुगामिना ॥ ११ ॥ तथान्यैर्वृष्णिवीराणां नृपाणां च महात्मनाम् ॥ ३ ॥ रथारूढ वीर बलरामने विषधर सर्पोंके समान भयंकर युद्धमासीद्धि सैन्यानां सैनिकैर्भरतर्षभ । बाणोंद्वारा जरासंधको आच्छादित करते हुए उसपर आक्रमण अहानि पञ्च चैकं च षट् सप्ताष्टौ च दारुणम् ॥ ४ ॥ किया तथा मगधराज भी अपने शीघ्रगामी रथद्वारा बड़े वेगसे भरतश्रेष्ठ ! रुक्मीके साथ वासुदेव श्रीकृष्णका, भीष्मक- उनका सामना करनेके लिये आ पहुँचा ॥ १०-११ ॥ के साथ आहुक ( उग्रसेन ) का, क्रथके साथ वसुदेवका, अन्योन्यं विविधैरस्त्रैर्विद्ध्वा विद्ध्वा विनेदतुः । बभ्रु ( अक्रूर ) के साथ कैशिकका, गदके साथ चेदिराज तौ क्षीणशस्त्रौ विरथौ हताश्वौ हतसारथी ॥१२॥ शिशुपालका, शंकुके साथ दन्तवक्त्रका तथा अन्य सैनिकोंके गदे गृहीत्वा विक्रान्तावन्योऽन्यमभिधावताम् । साथ वृष्णिकुलके महामना वीर नरेशोंका, सारांश यह कि चे दोनों नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा एक दूसरेको घायल उभय पक्षके सैनिकोंका प्रतिद्वन्द्वी सैनिकोंके साथ दारुण करके जोर-जोरसे गरजते थे । दोनोंके अस्त्र-शस्त्र क्षीण हो द्वन्द्व युद्ध होने लगा, जो सत्ताईस दिनोंतक चलता गये, दोनों ही रथहीन हो गये तथा दोनोंके ही घोड़े और रहा ॥ २-४ ॥ सारथि मारे गये । उस दशामे वे दोनों पराक्रमी योद्धा गदा गजैर्गजा हयैरश्वाः पदाताश्च पदातिभिः । हाथमें लेकर एक-दूसरेपर टूट पड़े ॥ १२३ ॥ रथै रथा विमिश्राश्च योधा युयुधिरे नृप ॥ ५ ॥ कम्पयन्तौ भुवं वीरौ तावुद्यतगदावुभौ ॥ १३ ॥ नरेश्वर ! हाथियोंसे हाथी, घोड़ोंसे घोड़े, पैदलोंसे पैदल ददृशाते महात्मानौ गिरी सशिखराविव । और रथोंसे रथ मिश्रित हो गये और इस प्रकार घोल-मेल हाथमें गदा उठाये वे दोनों महामनस्वी वीर पृथिवीको कर सभी योद्धा विपक्षियोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ५ ॥ कम्पित करते हुए वहाँ एक-एक शिखरवाले दो पर्वतोंके समान जरासंधस्य नृपते रामेणासीत् समागमः । दिखायी देते थे ॥ १३३ ॥ महेन्द्रस्येव वृत्रेण दारुणो रोमहर्षणः ॥ ६ ॥ व्युपरमन्त युद्धानि पश्यता तौ महाभुजौ । राजा जरासंधका बलरामजीके साथ उसी प्रकार दारुण संरम्भावभिधावन्तौ गदायुद्धेषु विश्रुतौ ॥ १४ ॥ एवं रोमाञ्चकारी संघर्ष हुआ, जैसा वृत्रासुरके साथ देवराज उन दोनों महाबाहु वीरोंको युद्धके लिये उद्यत देख इन्द्रका हुआ था ॥ ६ ॥ दूसरे योद्धाओंके युद्ध बंद हो गये । उन दोनोंकी गदायुद्धमे अवेक्ष्य रुक्मिणीं कृष्णो रुक्मिणं न व्यपोथयत् । ख्याति थी । वे दोनों बड़े रोषमे भरकर एक-दूसरेपर धावा ज्वलनाकींशुसंकाशान्नानाशीविषविषोपमान् ॥ ७ ॥ करते थे ॥ १४ ॥ वारयामास कृष्णो वै शरांस्तस्य तु शिक्षया । उभौ तौ परमाचार्यौ लोके ख्यातौ महाबलौ । रुक्मिणीके साथ भविष्यमे होनेवाले सम्बन्धको दृष्टिमें मत्ताविव गजौ युद्धे तावन्योन्यमयुध्यताम् ॥ १५ ॥ रखकर श्रीकृष्णने रुक्मीको नहीं मारा, उसकी ओरसे वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आनेवाले अग्नि और सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी तथा आचार्यके रूपमे विख्यात थे तथा जैसे दो मतवाले हाथी विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंका उन्होंने अपनी शिक्षाके लड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें वे एक-दूसरेके साथ जूझ बलसे निवारण कर दिया ॥ ७३ ॥ रहे थे ॥ १५ ॥ इत्येषां सुमहानासीद् बलौघानां परिक्षयः ॥ ८ ॥ ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च समहर्षयः । उभयोः सेनयो राजन् मांसशोणितकर्दमः । समन्ततश्चाप्सरसः समाजग्मुः सहस्रशः ॥ १६ ॥ राजन् ! इस प्रकार दोनों सेनाओके सैनिकसमूहोंका उस समय गन्धर्वोंसहित देवता, सिद्ध, महर्षि तथा महान् विनाश हुआ । वहाँ रक्त और मांसकी कीच सहस्रों अप्सराएँ सब ओरसे उस युद्धको देखनेके लिये आ जम गयी ॥ ८३ ॥ पहुँचीं ॥ १६ ॥ कबन्धानि समुत्तस्थुः सुवहूनि समन्ततः ॥ ९ ॥ तद् देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम् । तस्मिन् विमर्दे योधानां संख्यावृत्तिकराणि च । शुशुभेऽभ्यधिकं राजन् दिवं ज्योतिर्गणैरिव ॥ १७ ॥ योद्धाओंके उस महान् संहारमे चारो ओरसे बहुत-से अभिदुद्राव रामं तु जरासंधो महाबलः । कबन्ध उठने लगे, जिनकी गणना नहीं की जा सकती सव्यं मण्डलममाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् ॥ १८ ॥ थी ॥ ९३ ॥
विष्णुपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः ३४५
राजन् ! देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों और महर्षियोंसे अलंकृत हुआ आकाशका वह भाग नक्षत्रसमूहोंसे विभूषित हुआ-सा अधिक शोभा पाने लगा। महाबली जरासंध बायेंसे पैंतरा देकर बलरामजीकी ओर दौड़ा और बलरामजीने दाहिनेसे उसपर आक्रमण किया ॥ १७-१८ ॥
प्रहरन्तौ ततोऽन्योन्यं गदायुद्धविशारदौ ।
दन्ताभ्यामिव मातङ्गौ नादयन्तौ दिशो दश ॥ १९ ॥
गदानिपातो रामस्य शुश्रुवेऽशनिनिःस्वनः ।
जरासंधस्य च रणे पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ २० ॥
गदायुद्धमें कुशल वे दोनों वीर दसों दिशाओंको निनादित करते हुए एक दूसरेपर उसी प्रकार प्रहार करने लगे, जैसे दो मतवाले हाथी परस्पर दाँतोंसे आघात करते हों। बलरामजी जब गदाका आघात करते, तब वज्रपातके समान भयानक शब्द सुनायी पड़ता था तथा रणभूमिमें जरासंधके गदाघातसे ऐसी आवाज होती थी, मानो कोई पर्वत फट पड़ा हो ॥ १९-२० ॥
न स्म कम्पयते रामं जरासंधकरच्युता ।
गदा गदाभृतां श्रेष्ठं विन्ध्यं गिरिमिवानिलः ॥ २१ ॥
रामस्य तु गदावेगं वीर्यात् स मगधेश्वरः ।
सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोहयत् ॥ २२ ॥
जैसे प्रचण्ड वायु विन्ध्यपर्वतको नहीं हिला सकती, उसी प्रकार जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको कम्पित नहीं कर पाती थी। बलरामजीकी गदाके वेगको मगधराज जरासंध अपने बलकी अधिकताके कारण महान् धैर्यके साथ सह लेता था तथा अपनी शिक्षाके द्वारा उनके प्रहारको व्यर्थ कर देता था ॥ २१-२२ ॥
एवं तौ तत्र संग्रामे विचरन्तौ महाबलौ ।
मण्डलानि विचित्राणि विचेतुररिंदमौ ॥ २३ ॥
इस प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों महाबली योद्धा उस संग्राममें विचित्र पैंतरे दिखाते हुए विचर रहे थे ॥
व्यायच्छन्तौ चिरं कालं परिश्रान्तौ च तस्थतुः ।
समाश्र्वस्य मुहूर्त्तं तु पुनरन्योन्यमाहताम् ॥ २४ ॥
देरतक परिश्रम करके थक जानेपर दोनों खड़े हो जाते थे; फिर दो घड़ीतक सुस्ताकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगते थे ॥ २४ ॥
एवं तौ योधमुख्यौ तु समं युयुधतुश्चिरम् ।
न च तौ युद्धवैमुख्यमुभावेव प्रजग्मतुः ॥ २५ ॥
इस प्रकार वे दोनों प्रमुख योद्धा समानभावसे देरतक लड़ते रहे। वे दोनों ही युद्धसे विमुख नहीं हुए ॥ २५ ॥
अथापश्यद् गदायुद्धे विशेषं तस्य वीर्यवान् ।
रामः क्रुद्धो गदां त्यक्त्वा जग्राह मुसलोत्तमम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर पराक्रमी बलरामजीने जब गदायुद्धमें जरासंधकी विशेषता देखी, तब उन्होंने कुपित हो गदा त्यागकर उत्तम मूसल हाथमें लिया ॥ २६ ॥
तमुद्यन्तं तदा दृष्ट्वा मुसलं घोरदर्शनम् ।
अमोघं बलदेवेन क्रुद्धेन तु महारणे ॥ २७ ॥
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुस्वरा लोकसाक्षिणी ।
उवाच बलदेवं तं समुद्यतहलायुधम् ॥ २८ ॥
उस महासमरमें कुपित हुए बलदेवजीके द्वारा उस भयानक तथा अमोघ मूसलको उठाया जाता देख आकाशमें सब लोगोंके सामने स्पष्ट शब्दोंमें देववाणी सुनायी दी। उसने हल-मूसल उठाये हुए बलदेवजीसे कहा— ॥ २७-२८ ॥
न त्वया राम वध्योऽयमलं खेदेन मानद ।
विदितोऽस्य मया मृत्युस्तस्मात् साधु व्युपरम ।
अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागधः ॥ २९ ॥
'दूसरोंको मान देनेवाले बलरामजी ! जरासंधका वध आपके हाथसे होनेवाला नहीं है; अतः खेद करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसकी मृत्युका हेतु मुझे विदित हो गया है; अतः आप इसे मारनेकी चेष्टासे निवृत्त हो जाइये। मगधराज जरासंध थोड़े ही समयमें अपने प्राणोंका परित्याग करेगा' ॥ २९ !
जरासंधस्तु तच्छ्रुत्वा विमनाः समपद्यत ।
न प्रजह्रे ततस्तस्मै पुनरेव हलायुधः ॥ ३० ॥
यह सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया और बलरामजीने फिर उसपर प्रहार नहीं किया ॥ ३० ॥
तौ व्युपारमतां युद्धे वृष्णयस्ते च पार्थिवाः ।
असक्तमभवद् युद्धं तेषामेवं सुदारुणम् ॥ ३१ ॥
दीर्घकालं महाराज निघ्नतामितरेतरम् ।
अब वे दोनों युद्धसे विरत हो गये; फिर तो वृष्णिवंशी योद्धा तथा दूसरे राजाओंने भी युद्ध बंद कर दिया। महाराज ! इस प्रकार दीर्घकालतक एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए उन योद्धाओंका जो अत्यन्त भयंकर युद्ध अविराम गतिसे चलता आ रहा था, वह शान्त हो गया ॥ ३१ १/२ ॥
पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ ॥ ३२ ॥
अस्तं याते दिनकरे नानुसस्रुरुस्तदा निशि ।
राजा जरासंध जब परास्त होकर युद्धसे हट गया और सूर्यदेव अस्त हो गये, तब रातके समय यादवोंने फिर उसका पीछा नहीं किया ॥ ३२ १/२ ॥
समानीय स्वकं सैन्यं लब्धलक्ष्या महाबलाः ॥ ३३ ॥
पुरीं प्रविशिशुर्हृष्टाः केशवेनाभिपारिताः ।
भगवान् श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित महाबली यादव अपने लक्ष्यमें सफल हो चुके थे, अतः वे अपनी सेना साथ लेकर बड़ी प्रसन्नताके साथ मथुरापुरीमें लौट आये ॥ ३३ १/२ ॥
| ३४६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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खाच्छ्रुतान्यायुधान्येवं तान्येवान्तर्दधुस्तदा ॥ ३४ ॥ जरासंधोऽपि नृपतिर्विमनाः स्वपुरीं ययौ । राजानश्चानुगा येऽस्य स्वराष्ट्राण्येव ते ययुः ॥ ३५ ॥
इसी तरह आकाश या दिव्य लोकसे जो आयुध आये थे, वे भी तत्काल अन्तर्धान हो गये। इधर राजा जरासंध भी उदास होकर अपनी पुरीको लौट गया। उसके साथ जो राजा लोग आये थे, वे भी अपने-अपने राष्ट्रोंको ही लौट गये॥
जरासंधं तु ते जित्वा मेनिरे नैव निर्जितम् । वृष्णयः कुरुशार्दूल राजा ह्यतिबलः स वै ॥ ३६ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! वृष्णिवंशी वीर जरासंधको जीतकर भी उसे हारा हुआ नहीं मानते थे; क्योंकि उस राजाके पास बहुत बड़ी सेना थी तथा वह स्वयं भी अत्यन्त बलशाली था॥
दश चाष्टौ च संग्रामाञ्जरासन्धस्य यादवाः । ददुर्न चैनं समरे हन्तुं शेकुर्महाबलाः ॥ ३७ ॥
महाबली यादवोंने जरासंधको अठारह बार युद्धका अवसर प्रदान किया; किंतु वे किसी भी समरमें उसे मार न सके ॥
अक्षौहिण्यश्च तस्यासन् विंशतिश्च महामते । जरासन्धस्य नृपतेस्तदर्थं याः समांगताः ॥ ३८ ॥
महामते ! राजन्! जरासंधके पास बीस अक्षौहिणी सेनाएँ थीं, जो उसके लिये लड़नेको आयी थीं ॥ ३८ ॥
अल्पत्वादभिभूतास्तु वृष्णयो भरतर्षभ । वार्हद्रथेन राजेन्द्र राजभिः सहितेन वै ॥ ३९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! राजेन्द्र ! वृष्णिवंशी वीर संख्यामें बहुत कम थे, इसलिये वे राजाओंसहित जरासंधसे अभिभूत हो जाते थे ॥ ३९ ॥
जित्वा तु मागधं संख्ये जरासन्धं महीपतिम् । विहरन्ति स्म सुखिनो वृष्णिसिंहा महारथाः ॥ ४० ॥
मगधके राजा पृथ्वीपति जरासंधको इस प्रकार युद्धमें जीतकर वृष्णिवंशके सिंह-जैसे पराक्रमी महारथी सुखपूर्वक वहाँ विहार करने लगे ॥ ४० ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि जरासंधापयानं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें जरासंधका पलायनविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥
सप्तत्रिंशोऽध्यायः
जरासंधके पुनः आक्रमणसे शङ्कित यादवोंकी सभामें विकद्रुका भाषण—राजा हर्यश्वका चरित्र तथा उनसे यदु एवं यादवोंकी उत्पत्तिका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
स कृष्णस्तत्र बलवान् रौहिणेयेन संगतः ।
मथुरां यादवाकीर्णां पुरीं तां सुखमावसत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! महाबली भगवान् श्रीकृष्ण रोहिणीकुमार बलदेवजीके साथ मिलकर यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १ ॥
प्राप्तयौवनदेहस्तु युक्तो राजश्रिया विभुः ।
चचार मथुरां प्रीतः सवनाकरभूषनाम् ॥ २ ॥
उनके श्रीअङ्गोंमें यौवनावस्थाका प्रवेश हुआ था। वे भगवान् राजोचित शोभासे सम्पन्न हो वन-प्रान्तसे विभूषित मथुरामें प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ॥ २ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य राजा राजगृेश्वरः ।
सस्मार निहतं कंसं जरासंधः प्रतापवान् ॥ ३ ॥
कुछ कालके अनन्तर राजगृहके स्वामी प्रतापी राजा जरासंधने कंसके मारे जानेकी घटनाको फिरसे स्मरण किया ॥
युद्धाय योजितो भूयो दुहितृभ्यां महीपतिः ।
दश सप्त च संग्रामाञ्जरासंधस्य यादवाः ।
ददुर्न चैनं समरे हन्तुं शेकुर्महारथाः ॥ ४ ॥
उसकी दोनों कन्याओंने पुनः उसे युद्धके लिये उत्साहित किया। यादवोंने जरासंधको क्रमशः सत्रह बार युद्धका अवसर दिया; परंतु वे महारथी यादव समरभूमिमे उसे मार न सके ॥
ततो मागधराट् श्रीमांश्चतुरङ्गबलान्वितः ।
भूयोऽप्यष्टादशं कर्तुं संग्रामं स समारभत् ॥ ५ ॥
तदनन्तर श्रीमान् मगधराजने चतुरङ्गिणी सेनाको साथ लेकर फिर अठारहवीं बार यादवोंके साथ युद्ध करनेका आयोजन किया ॥ ५ ॥
वैलक्ष्यात् पुनरेवासौ राजा राजगृेश्वरः ।
जरासंधो वली श्रीमान् पाकशासनविक्रमः ॥ ६ ॥
राजगृहका स्वामी बलवान् राजा श्रीमान् जरासंध इन्द्रके समान पराक्रमी था। उसने पहलेकी पराजयसे लज्जाका अनुभव करनेके कारण पुनः युद्धकी तैयारी की ॥ ६ ॥
स साधनेन महता वृहद्रथसुतो वली ।
कृष्णस्य वधमन्विच्छन् भूयो वै संन्यवर्तत ॥ ७ ॥
विष्णुपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः ३४७
बृहद्रथका वह बलवान् पुत्र महान् साधनसे सम्पन्न हो श्रीकृष्णका वध चाहता हुआ फिर मथुरापुरीकी ओर लौटा ॥
तं श्रुत्वा सहिताः सर्वे निवृत्तं मगधेश्वरम्।
यादवा मन्त्रयामासुर्जरासंधभयार्दिताः ॥ ८ ॥
मगधराजको पुनः लौटा हुआ सुनकर जरासंधके भयसे पीड़ित हुए सब यादव एक साथ बैठकर मन्त्रणा करने लगे ॥
ततः प्राह महातेजा विकद्रुर्नयकोविदः ।
कृष्णं कमलपत्राक्षमग्रसेनस्य शृण्वतः ॥ ९ ॥
उस समय नीतिकुशल महातेजस्वी विकद्रुने उग्रसेनके सुनते हुए कमलनयन श्रीकृष्णसे कहा—॥ ९ ॥
श्रूयतां तात गोविन्द कुलस्यास्य समुद्भवः ।
श्रूयतामभिधास्यामि प्राप्तकालमहं ततः ।
युक्तं चेन्मन्यसे साधो करिष्यसि वचो मम ॥ १० ॥
'तात ! गोविन्द ! इस कुलकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनो। इसके लिये उपयुक्त अवसर आया है, इसलिये बता रहा हूँ; ध्यान देकर श्रवण करो। साधो ! इसे सुनकर यदि उचित समझो तो मेरे कथनानुसार कार्य करना ॥ १० ॥
यादवस्यास्य वंशस्य समुद्भवमशेषतः ।
यथा मे कथितः पूर्वं व्यासेन विदितात्मना ॥ ११ ॥
'यादववंशकी इस उत्पत्तिका सारा प्रसंग आत्मज्ञानी व्यासजीने पूर्वकालमें मुझे जैसा बताया था, वैसा ही सुना रहा हूँ ॥ ११ ॥
आसीद् राजा मनोर्वंशे श्रीमानिक्ष्वाकुसम्भवः ।
हर्यश्व इति विख्यातो महेन्द्रसमविक्रमः ॥ १२ ॥
'वैवस्वत मनुके वंशमें इक्ष्वाकुके पुत्र हर्यश्व नामसे विख्यात एक श्रीसम्पन्न राजा हो गये हैं, जो महेन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे ॥ १२ ॥
तस्यासीद् दयिता भार्या मधोर्दैत्यस्य वै सुता ।
देवी मधुमती नाम यथेन्द्रस्य शची तथा ॥ १३ ॥
'मधु नामक दैत्यकी पुत्री मधुमती देवी उनकी प्राण-प्यारी भार्या थी। जैसे इन्द्रको शची प्रिय है, उसी प्रकार हर्यश्वको मधुमती प्रिय थी ॥ १३ ॥
सा यौवनगुणोपेता रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
मनोरथकरी राज्ञः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ १४ ॥
'वह यौवनके गुणोंसे सम्पन्न थी। इस पृथ्वीपर उसके रूप सौन्दर्यकी कहीं तुलना नहीं थी। वह राजा हर्यश्वके मनोरथको सिद्ध करनेवाली होनेके कारण उन्हें प्राणोंसे भी अधिक माननीया थी ॥ १४ ॥
दानवेन्द्रकुले जाता सुश्रोणी कामरूपिणी ।
एकपत्नीव्रतधरा खेचरा रोहिणी यथा ॥ १५ ॥
'दानवराज मधुके कुलमें उत्पन्न हुई वह सुन्दर कटि-प्रदेशवाली कामरूपिणी देवी रोहिणीके समान एकपत्नीव्रतका पालन करनेवाली तथा आकाशमें विचरनेवाली थी ॥ १५ ॥
सा तमिक्ष्वाकुशार्दूलं कामयामास कामिनी ।
स कदाचिन्नरश्रेष्ठो भ्रात्रा ज्येष्ठेन माधव ॥ १६ ॥
राज्यान्निरस्तो विश्वस्तः सोऽयोध्यां सम्परित्यजत् ।
स तदाल्पपरीवारः प्रियया सहितो वने ॥ १७ ॥
'वह कामिनी होकर इक्ष्वाकुवंशके श्रेष्ठ वीर हर्यश्वको सम्पूर्ण हृदयसे चाहती थी। माधव ! एक दिन बड़े भाईने उनके विश्वासपर रहनेवाले नरश्रेष्ठ हर्यश्वको राज्यसे निकाल दिया, तब उन्होंने अयोध्या छोड़ दी और थोड़े-से परिवारके साथ अपनी प्रिया मधुमतीसहित वे वनमें रहने लगे ॥
रेमे समेत्य कालज्ञः प्रियया कमलेक्षणः ।
भ्रात्रा विनिष्कृतं राज्यात् प्रोवाच कमलेक्षणा ॥ १८ ॥
'कालकी महिमाको जाननेवाले कमलनयन हर्यश्व अपनी प्यारी पत्नीके साथ मिलकर वहाँ बड़े आनन्दसे समय बिताने लगे। एक दिन कमलनयनी मधुमतीने भाईद्वारा राज्यसे निकाले गये पतिसे कहा—॥ १८ ॥
एह्यागच्छ नरश्रेष्ठ त्यज राज्यकृतां स्पृहाम् ।
गच्छावः सहितौ वीर मधोर्मम पितुर्गृहम् ॥ १९ ॥
'नरश्रेष्ठ वीर ! अयोध्याके राज्यकी अभिलाषा छोड़ दो और आओ मेरे साथ चलो। हम दोनों मेरे पिता मधुके घरपर चलें ॥ १९ ॥
रम्यं मधुवनं नाम कामपुष्पफलद्रुमम् ।
सहितौ तत्र रंस्यावो यथा दिवि गतौ तथा ॥ २० ॥
'सुरम्य मधुवन नामक वन ही मेरे पिताका निवासस्थान है। वहाँके वृक्ष इच्छानुसार फूल और फल देनेवाले हैं। वहाँ हम दोनों साथ रहकर स्वर्गवासियोंके समान मौज करेंगे॥
पितुर्मे दयितस्त्वं हि मातुर्मम च पार्थिव ।
मत्प्रियार्थं प्रियतरो भ्रातुश्च लवणस्य वै ॥ २१ ॥
'पृथ्वीनाथ ! मेरे पिता और माता दोनोंको ही तुम बहुत प्रिय हो तथा मेरा प्रिय करनेके लिये मेरा भाई लवणासुर भी तुम्हें अत्यन्त प्रिय मानेगा ॥ २१ ॥
रंस्यावस्तत्र सहितौ राज्यस्थाविव कामगौ ।
तत्र गत्वा नरश्रेष्ठ ह्यमराविव नन्दने ।
भद्रं ते विहरिष्यावो यथा देवपुरे तथा ॥ २२ ॥
'नरश्रेष्ठ ! वहाँ जाकर हम दोनों साथ-साथ रहकर राज्यपर बैठे हुए दम्पतियोंकी भाँति इच्छानुरूप वस्तुओंका उपभोग करते हुए रमण करेंगे। जैसे देवपुरीके नन्दनवनमें देवाङ्गना और देवता विहार करते हैं, उसी प्रकार वहाँ हम दोनों विहार करेंगे। आपका भला हो ॥ २२ ॥
३४८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तं त्यजाव महाराज भ्रातरं तेऽभिमानिनम्।
आवयोर्द्वेषिणं नित्यं मत्तं राज्यमदेन वै॥ २३॥
‘महाराज! आपका भाई राज्यके मदसे सदा उन्मत्त रहकर अभिमानमें भरा रहता है और हम दोनोंसे द्वेष रखता है; अतः हम दोनों उसे त्याग दें॥ २३॥
धिगिमं गर्हितं वासं भृत्यवच्च पराश्रयम्।
गच्छावः सहितौ वीर पितुर्मे भवनान्तिकम्॥ २४॥
‘दासकी भाँति दूसरेके आश्रित होकर रहना अच्छा नहीं है; अतः इस निन्दित निवासको धिक्कार है। वीर! चलो, हम दोनों मेरे पिताके घरके पास चलें’॥ २४॥
तस्य सम्यक्प्रवृत्तस्य पूर्वजं भ्रातरं प्रति।
कामार्तस्य नरेन्द्रस्य पत्न्यास्तद् रुरुचे वचः॥ २५॥
‘श्रीकृष्ण! यद्यपि हर्यश्वका अपने बड़े भाईके प्रति अच्छा बर्ताव था (वह उनसे कोई प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था), तो भी कामसे पीड़ित होनेके कारण उस नरेशको पत्नीकी बात पसंद आ गयी॥ २५॥
ततो मधुपुरं राजा हर्यश्वः स जगाम च।
भार्यया सह कामिन्या कामी पुरुषपुङ्गवः॥ २६॥
‘तब कामी पुरुषप्रवर राजा हर्यश्व अपनी कामवती पत्नीके साथ मधुपुरको चला गया॥ २६॥
मधुना दानवेन्द्रेण स साम्ना समुदाहृतः।
स्वागतं वत्स हर्यश्व प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात्॥ २७॥
‘वहाँ दानवराज मधुने उससे सान्त्वनापूर्वक कहा—‘बेटा हर्यश्व! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारे दर्शनसे (अथवा तुमसे मिलकर) बहुत प्रसन्न हूँ॥ २७॥
यदेतन्मम राज्यं वै सर्वं मधुवनं विना।
ददामि तव राजेन्द्र वासश्च प्रतिगृह्यताम्॥ २८॥
‘राजेन्द्र! यह जो मेरा सारा राज्य है, उसे मैं केवल मधुवनको छोड़कर तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम यहाँ निवास करो॥ २८॥
वनेऽस्मिल्लवणश्चायं सहायस्ते भविष्यति।
अमित्रनिग्रहे चैव कर्णधारत्वमेष्यति॥ २९॥
‘इस वनमें यह मेरा पुत्र लवण भी तुम्हारा सहायक होगा तथा शत्रुओंका निग्रह करनेमें यह तुम्हारे लिये कर्णधारका काम देगा॥ २९॥
पालयैनं शुभं राष्ट्रं समुद्रानूपभूषितम्।
गोसमृद्धं श्रिया जुष्टमाभीरप्रायमानुपम्॥ ३०॥
‘तुम समुद्रके जलप्राय प्रदेशसे विभूषित इस शुभ राष्ट्रका पालन करो। यह गौओंसे समृद्ध और लक्ष्मीसे सेवित है तथा इसमें अधिकतर आभीर जातिके लोगोंका निवास है॥
अत्र ते वसतस्तात दुर्गं गिरिपुरं महत्।
भविता पार्थिवावासः सुराष्ट्रविषयो महान्॥ ३१॥
अनूपविषयश्चैव समुद्रान्ते निरामयः।
‘तात! यहाँ रहनेपर महान् एवं दुर्गम गिरिपुर (गिरिनार या रैवतक पर्वतसे मिला हुआ नगर) तुम्हारी राजधानीके रूपमें प्रतिष्ठित होगा। यह महान् सुराष्ट्र राज्य समुद्रके निकट और जलप्राय प्रदेशसे युक्त है। यहाँ किसी प्रकारका रोग नहीं होता॥ ३१½॥
आनर्तं नाम ते राष्ट्रं भविष्यत्यायतं महत्॥ ३२॥
तद् भविष्यमहं मन्ये कालयोगेन पार्थिव।
अध्यास्यतां यथाकालं पार्थिवं वृत्तमुत्तमम्॥ ३३॥
‘तुम्हारा विशाल एवं विस्तृत राज्य आनर्त नामसे विख्यात होगा। पृथ्वीनाथ! मेरा विश्वास है कि कालयोगसे वह अवश्यम्भावी है। तुम समयानुसार उत्तम राजोचित बर्तावका आश्रय लेकर यहाँ रहो॥ ३२-३३॥
यायातमपि वंशस्ते समेष्यति च यादवम्।
अनु वंशं च वंशस्ते सोमस्य भविता किल॥ ३४॥
‘तुम्हारा यह वंश ययाति एवं यदुके वंशमें मिल जायगा। चन्द्रवंशके भीतर तुम्हारा वंश चलेगा (सूर्यवंशसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जायगा)॥ ३४॥
एष मे विभवस्तात तवेमं विषयोत्तमम्।
दत्त्वा यास्यामि तपसे सागरं लवनालयम्॥ ३५॥
‘तात! यही मेरा विभव है। मैं तुम्हें यह उत्तम राज्य देकर तपस्याके लिये लवणसमुद्रको चला जाऊँगा॥ ३५॥
लवणेन समायुक्तस्त्वमिमं विषयोत्तमम्।
पालयस्वाखिलं तात स्वस्य वंशस्य वृद्धये॥ ३६॥
‘तात! तुम लवणके साथ रहकर अपने वंशकी वृद्धिके लिये इस समस्त उत्तम राज्यका पालन करो॥ ३६॥
बाढमित्येव हर्यश्वः प्रतिजग्राह तत् पुरम्।
स च दैत्यस्तपोवासं जगाम वरुणालयम्॥ ३७॥
‘तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर हर्यश्वने उस पुरको ग्रहण किया; फिर वह दैत्य तपस्याके लिये समुद्रको चला गया॥
हर्यश्वश्च महातेजा दिव्ये गिरिवरोत्तमे।
निवेशयामास पुरं वासार्थममरोपमः॥ ३८॥
‘अमरोंके समान महातेजस्वी हर्यश्वने दिव्य एवं श्रेष्ठ गिरिवर (रैवतक) के समीप अपने रहनेके लिये एक नगर बसाया॥ ३८॥
आनर्तं नाम तद् राष्ट्रं सुराष्ट्रं गोधनायुतम्।
अचिरेणैव कालेन समृद्धं प्रत्यपद्यत॥ ३९॥
‘आनर्त नामसे प्रसिद्ध वह गोधनसम्पन्न राष्ट्र सुराष्ट्र
विष्णुपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ३४९
कहलाया और थोड़े ही समयमें समृद्धिशाली हो गया ॥३९॥
अनूपविषये चैव वेलावनविभूषितम् ।
विचित्रं क्षेत्रसस्याढ्यं प्राकारग्रामसंकुलम् ॥ ४० ॥
शशास नृपतिः स्फीतं तद् राष्ट्रं राष्ट्रवर्द्धनः ।
राजधर्मेण यशसा प्रजानां नन्दिवर्द्धनः ॥ ४१ ॥
'जलप्राय देशमें समुद्रतटवर्ती वनोंसे विभूषित, विचित्र, खेतों और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित, परकोटों और गाँवोंसे युक्त तथा धनधान्यसे सम्पन्न उस राष्ट्रपर राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले राजा हर्यश्व शासन करने लगे और राजधर्म एवं यशसे प्रजाका आनन्द बढ़ाने लगे ॥ ४०-४१ ॥
तस्य सम्यक् प्रचारेण हर्यश्वस्य महात्मनः ।
व्यवधंत तदक्षोभ्यं राष्ट्रं राष्ट्रगुणैर्युतम् ॥ ४२ ॥
'महामना हर्यश्वके उत्तम आचार-व्यवहारके कारण वह अक्षोभ्य राष्ट्र उत्तम राष्ट्रके गुणोंसे सम्पन्न हो निरन्तर उन्नति करने लगा ॥ ४२ ॥
स हि राजा स्थितो राज्ये राजवृत्तेन शोभितः ।
प्राप्तः कुलोचितां लक्ष्मीं वृत्तेन च नयेन च ॥ ४३ ॥
'राज्यपर स्थित होकर राजोचित बर्तावसे सुशोभित होनेवाले उन राजा हर्यश्वने सदाचार और उत्तम नीतिसे अपने कुलके लिये उचित लक्ष्मी प्राप्त कर ली ॥ ४३ ॥'
तस्यैव च सुवृत्तस्य पुत्रकामस्य धीमतः ।
मधुमत्यां सुतो जज्ञे यदुर्नाम महायशाः ॥ ४४ ॥
'पुत्रकी इच्छा रखनेवाले उन्हीं सदाचारी एवं बुद्धिमान् हर्यश्वके मधुमतीके गर्भसे महायशस्वी यदुका जन्म हुआ* ॥ ४४ ॥
सोऽवर्धत महातेजा यदुदुन्दुभिनिःस्वनः ।
राजलक्षणसम्पन्नः सपत्नौर्दुरतिक्रमः ॥ ४५ ॥
'महातेजस्वी यदुका स्वर दुन्दुभिनिनादके समान गम्भीर था। वे राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न होकर दिनोंदिन बढ़ने लगे। शत्रुओंके लिये वे सर्वथा दुर्जय थे ॥ ४५ ॥
यदुर्नामाभवत् पुत्रो राजलक्षणपूजितः ।
यथास्य पूर्वजो राजा पूरुः स सुमहायशाः ॥ ४६ ॥
'हर्यश्वका वह पुत्र यदु नामसे ही विख्यात हुआ। यदु राजोचित लक्षणोंसे सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पूर्वज राजा महायशस्वी पूरु सम्मानित होते थे ॥ ४६ ॥
* कहते हैं, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र वसिष्ठ किसी कारणवश मित्रावरुणके अंशसे नूतन शरीर धारण करके प्रकट हुए; फिर भी वसिष्ठ ही बने रहे, उसी प्रकार ययातिपुत्र महाराज यदु ही योग-बलसे हर्यश्वके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे और उसी पूर्व नामसे प्रख्यात हुए।
स एक एव तस्यासीत् पुत्रः परमशोभनः ।
ऊर्जितः पृथिवीभर्त्ता हर्यश्वस्य महात्मनः ॥ ४७ ॥
'महामना हर्यश्वके एक ही पुत्र यदु हुए। वे परम सुन्दर, बलवान् और पृथ्वीका भरण-पोषण करनेमें समर्थ थे ॥ ४७ ॥
दस वर्षसहस्राणि स कृत्वा राज्यमव्ययम् ।
जगाम त्रिदिवं राजा धर्मेणाप्रतिमो भुवि ॥ ४८ ॥
'राजा हर्यश्व दस हजार वर्षोंतक अक्षय राज्यका उपभोग करके स्वर्गलोकमें चले गये । वे भूमण्डलके अनुपम धर्मात्मा थे ॥ ४८ ॥
ततो यदुरदीनात्मा प्रजाभिस्त्वभ्यषिच्यत ।
पितुर्युपरते श्रीमान् क्रमेणार्क इवोदितः ॥ ४९ ॥
'पिताके मर जानेपर प्रजाओंने उदारचेता श्रीमान् यदु-को उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वे क्रमशः एक सूर्यके बाद दूसरे सूर्यके समान उदित हो प्रकाशित होने लगे ॥ ४९ ॥
शशास चेमां वसुधां प्रशान्तभयतस्कराम् ।
यदुरिन्द्रप्रतीकाशो नृपो येनास्म यादवाः ॥ ५० ॥
'वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदु, जिनके कारण हमलोग यादव कहलाते हैं, जब इस पृथ्वीका शासन करने लगे, तब यहाँका सारा भय शान्त हो गया। चोर-लुटेरे आदि लुप्त हो गये ॥ ५० ॥
स कदाचिन्नृपश्चक्रे जलक्रीडां महोदधौ ।
दारैः सह गुणोदारैः सतार इव चन्द्रमाः ॥ ५१ ॥
'एक समयकी बात है, राजा यदु अपनी उदार गुणवाली पत्नियोंके साथ ताराओंसहित चन्द्रमाके समान महासागरमें जलक्रीडा कर रहे थे ॥ ५१ ॥
स तत्र सहसा क्षिप्तस्तितीर्षुः सागराम्भसि ।
धूम्रवर्णेन नृपतिः सर्पराजेन वीर्यवान् ॥ ५२ ॥
सोऽपाकृष्यत वेगेन जले सर्पपुरं महत् ।
'वे पराक्रमी राजा यदु जलको पार करके निकलना ही चाहते थे कि सहसा किसीने उन्हें समुद्रके गहरे जलमें डाल दिया। बात यह हुई कि सर्पोंके राजा धूम्रवर्णने बड़े वेगसे उनको खींचा और जलके भीतर बसे हुए सर्पोंके एक महान् नगरमें पहुँचा दिया ॥ ५२३ ॥
मणिस्तम्भगृहद्वारं मुक्तादामविभूषितम् ॥ ५३ ॥
कीर्णं शङ्खकुलैः शुभ्रै रत्नरैशिविभूषितम् ।
प्रवालाङ्कूरपत्राढ्यैः पादपैरुपशोभितम् ॥ ५४ ॥
'वहाँके खम्भे, घर और द्वार सभी मणियोंके बने हुए थे। उन सबको मोतीकी लड़ियों एवं झालरोंसे सजाया गया था। वहाँ ढेर-के-ढेर श्वेत शङ्खोंके समूह पड़े हुए थे। रत्न-
| ३५० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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राशियोंसे उस नगरके घर-द्वारको विभूषित किया गया था। नूतन पल्लव, अंकुर और पत्तोंसे युक्त वृक्ष उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ५३-५४ ॥
कीर्णं पन्नगनार्योघैः समुद्रोदरवासिभिः ।
स्वर्णवर्णेन भास्वन्तं स्वस्तिकेनेन्दुवर्चसा ॥ ५५ ॥
'वहाँ समुद्रके उदरमें निवास करनेवाली नागदलनाएँ भरी हुई थीं। वह ग्राम कहीं सुवर्णमय और कहीं चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिमान् स्वस्तिकसे प्रकाशित होता था ॥ ५५ ॥
स तं ददर्श राजेन्द्रो विमले सागराम्भसि ।
पन्नगेन्द्रपुरं तोये जगत्यामिव निर्मितम् ॥ ५६ ॥
'राजाधिराज यदुने देखा;— समुद्रके निर्मल जलमें बना हुआ यह नागराजका नगर भूतलपर ही निर्मित हुआ-सा जान पड़ता है ॥ ५६ ॥
स्वच्छं चैव पुरं तत्र प्रविवेश नृपो यदुः ।
अगाधं तोयदाकारं पूर्णं सर्पवधूगणैः ॥ ५७ ॥
'राजा यदुने सर्पवधुओंसे भरे हुए उस अगाध जलदाकार स्वच्छ नगरमें प्रवेश किया ॥ ५७ ॥
तस्य दत्तं मणिमयं जलजं परमासनम् ।
स्वास्तीर्णं पद्मपत्रैश्च पद्मसूत्रोत्तरच्छदम् ॥ ५८ ॥
'वहाँ उन्हें मणिमय कमलका आसन दिया गया, जिसपर पद्मोँके दल बिछे हुए थे और पद्मसूत्रोंकी ही बनी हुई चादर डाली गयी थी ॥ ५८ ॥
तमासीनं नृपं तत्र परमे पन्नगासने ।
द्विजिह्वपतिरव्यग्रो धूम्रवर्णोऽभ्यभाषत ॥ ५९ ॥
'सर्पोंके दिये हुए उस उत्तम आसनपर जब राजा यदु वहाँ विराजमान हुए, तब सर्पराज धूम्रवर्णने उनसे शान्तभाव- से कहा- ॥ ५९ ॥
पिता ते स्वर्गतिं प्राप्तः कृत्वा वंशमिमं महत् ।
भवन्तं तेजसा युक्तमुत्पाद्य वसुधाधिपम् ॥ ६० ॥
'राजन् ! तुम्हारे पिता इस विशाल वंशकी नींव डालकर और तुम-जैसे तेजस्वी भूपालको जन्म देकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ६० ॥
यादवानामयं वंशस्तवनाम्ना यदुपुङ्गव ।
पित्रा ते मङ्गलार्थाय स्थापितः पार्थिवाकरः ॥ ६१ ॥
'यदुपुङ्गव ! तुम्हारे नामसे ही यह वंश यादववंश कहलायेगा। तुम्हारे पिताने तुम्हारे मङ्गलके लिये ही इस कुलकी स्थापना की है, जो राजाओंकी खान है ॥ ६१ ॥
वंशे चास्मिंस्त्व विभो देवानां तनयाव्ययाः ।
ऋषीणामुरगाणां च उत्पत्स्यन्ते नृयोनिजाः ॥ ६२ ॥
'प्रभो ! तुम्हारे इस वंशमें देवताओं और ऋषियों तथा नागोंकी अक्षय संतानें मनुष्य-योनिमें उत्पन्न होंगी ॥ ६२ ॥
तन्ममेमाः सुताः पञ्च कुमार्यो वृत्तसम्मताः ।
उत्पन्ना यौवनाश्वस्य भगिन्यां नृपसत्तम ॥ ६३ ॥
'नृपश्रेष्ठ ! मेरी जो ये पाँच कुमारी कन्याएँ हैं, ये उत्तम आचार-व्यवहारसे सम्मानित हैं। इनका जन्म यौवनाश्वकी बहिनके गर्भसे हुआ है ॥ ६३ ॥
प्रतीच्छेमाः स्वधर्मेण प्राजापत्येन कर्मणा ।
वरं च ते प्रदास्यामि वरार्हस्त्वं मतो मम ॥ ६४ ॥
'तुम अपने धर्मके अनुसार वैवाहिक विधिसे इन कन्याओंको ग्रहण करो। मेरी धारणाके अनुसार तुम वर पानेके योग्य हो, अतः मैं तुम्हें मनोवाञ्छित वर भी दूँगा ॥ ६४ ॥
भैमाश्च कुकुराश्चैव भोजाश्चान्धकयादवाः ।
दाशार्हा वृष्णयश्चेति ख्यातिं यास्यन्ति सप्त ते ॥ ६५ ॥
'तुमसे सात कुल विख्यात होंगे, जो भौम, कुक्कुर, भोज, अन्धक, यादव, दाशार्ह तथा वृष्णिके नामसे प्रसिद्ध होंगे' ॥
स तस्मै धूम्रवर्णो वै कन्याः कन्याव्रते स्थिताः ।
जलपूर्वेन योगेन ददाविन्द्रसमाय वै ॥ ६६ ॥
'ऐसा कहकर धूम्रवर्णने इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदुको कन्या- व्रतमें स्थित हुई वे कन्याएँ हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक दे दीं ॥ ६६ ॥
वरं चास्मै ददौ प्रीतः स वै पन्नगपुङ्गवः ।
श्रावयन् कन्यकाः सर्वा यथाक्रममदीनवत् ॥ ६७ ॥
'फिर उन नागशिरोमणि धूम्रवर्णने प्रसन्न होकर समस्त कन्याओंको सुनाते हुए एक उदार पुरुषकी भाँति राजाको क्रमशः वर प्रदान किये ॥ ६७ ॥
एतासु ते सुताः पञ्च सुतासु मम मानद ।
उत्पत्स्यन्ते पितुस्तेजो मातुश्चैव समाश्रिताः ॥ ६८ ॥
'मानद ! मेरी इन पाँच कन्याओंसे तुम्हारे पाँच पुत्र उत्पन्न होंगे, जो पिता और माता दोनोंके तेजसे सम्पन्न होंगे ॥ ६८ ॥
अस्मत्समयवृद्धाश्च सलिलाभ्यन्तरेचराः ।
तव वंशे भविष्यन्ति पार्थिवाः कामरूपिणः ॥ ६९ ॥
'हमारे वरदानसे अनुगृहीत होकर तुम्हारे वंशके वे सभी राजा जलके भीतर विचरनेवाले तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ होंगे ॥ ६९ ॥
स वरं कन्यकाश्चैव लब्ध्वा यदुवरस्तदा ।
उदतिष्ठत वेगेन सलिलाच्चन्द्रमा इव ॥ ७० ॥
'वे श्रेष्ठ यदु उस समय वर और उन कन्याओंको पाकर चन्द्रमाके समान वेगपूर्वक जलसे ऊपर उठे ॥ ७० ॥
स पञ्चकन्यामध्यस्थो ददृशे तत्र पार्थिवः ।
पञ्चतारेण संयुक्को नक्षत्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ७१ ॥
'पाँच कन्याओंके बीचमें स्थित हुए राजा यदु वहाँ पाँच
| विष्णुपर्व ] | सप्तत्रिंशोऽध्यायः | ३५१ |
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ताराओंवाले नक्षत्रसे संयुक्त चन्द्रमाके समान दिखायी देते थे ॥ ७१ ॥
स तदन्तःपुरं सर्वं ददर्श नृपसत्तमः।
वैवाहिकेन वेषेण दिव्यस्रगनुलेपनः ॥ ७२ ॥
'वैवाहिक वेशसे युक्त तथा दिव्य हार एवं चन्दन धारण करनेवाले नृपश्रेष्ठ यदुने जलसे बाहर आकर अपने समस्त अन्तःपुरको वहाँ उपस्थित देखा ॥ ७२ ॥
समाश्वास्य च ताः सर्वाः सपत्नीः पावकोपमाः।
जगाम स्वपुरं राजा प्रीत्या परमया युतः ॥ ७३ ॥
'तदनन्तर अग्निके समान तेजस्विनी उन सारी पत्नियोंको आश्वासन देकर राजा यदु अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उन सबके साथ अपने नगरको चले गये' ॥ ७३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि विकद्रुवाक्यं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें विकद्रुका वाक्यविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
अष्टात्रिंशोऽध्यायः
विकद्रुद्वारा यदुकी संततिका वर्णन तथा मथुरापुरीको जरासंधका आक्रमण सहनेके अयोग्य बताना
वैशम्पायन उवाच
स तासु नागकन्यासु कालेन महता नृपः।
जनयामास विक्रान्तान् पञ्च पुत्रान् कुलोद्वहान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! यदुने दीर्घकालके पश्चात् उन पाँचों नागकन्याओंके गर्भसे पाँच पराक्रमी एवं कुलका भार वहन करनेमे समर्थ पुत्र उत्पन्न किये ॥ १ ॥
मुचुकुन्दं महाबाहुं पद्मवर्णं तथैव च।
माधवं सारसं चैव हरितं चैव पार्थिवम् ॥ २ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—महाबाहु मुचुकुन्द, पद्मवर्ण, माधव, सारस तथा राजा हरित ॥ २ ॥
एतान् पञ्च सुतान् राजा पञ्चभूतोपमान् भुवि।
ईक्षमाणो नृपः प्रीतिं जगामातुलविक्रमः ॥ ३ ॥
ये पाँचों पुत्र भूतलपर पाँच भूतोंके समान थे । अतुल पराक्रमी राजा यदु इन्हे देखकर बहुत प्रसन्न होते थे ॥ ३ ॥
ते प्राप्तवयसः सर्वे स्थिताः पञ्च यथाद्रयः।
तेजिता बलदर्पाभ्यामूचुः पितरमग्रतः ॥ ४ ॥
जब वे सब वयस्क हुए, तब पाँच पर्वतोंके समान प्रतीत होने लगे। एक दिन अपने बल और दर्पसे प्रोत्साहित होकर वे अपने पिताके सामने खड़े हो इस प्रकार बोले—॥ ४ ॥
तात युक्ताः स्म वयसा बले महति संस्थिताः।
क्षिप्रमाज्ञाप्तुमिच्छामः किं कुर्मस्तव शासनात् ॥ ५ ॥
'तात ! अब हम बड़ी अवस्थाके हो गये, महान् बलमे हमारी स्थिति है (हम महान् बलवान् हैं); अतः शीघ्र आपकी आज्ञा चाहते हैं, बताइये, आपके आदेशसे हम कौन-सा कार्य करें'? ॥ ५ ॥
स तान् नृपतिशार्दूलः शार्दूलानिव वेगितान्।
प्रीत्या परमया प्राह सुतान् वीर्यकुतूहलात् ॥ ६ ॥
नरेशोमे सिंहके समान पराक्रमी यदुने सिंहोंके ही सदृश वेगशाली अपने इन पुत्रोसे उनके बल-पराक्रमको जाननेकी उत्सुकतासे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा—॥ ६ ॥
विन्ध्यर्क्षवन्तावभितो द्वे पुर्यौ पर्वताश्रये।
निवेशयतु यत्नेन मुंचुकुन्दः सुतो मम ॥ ७ ॥
'मेरा पुत्र मुचुकुन्द विन्ध्य और ऋक्षवान् पर्वतोंके निकट पर्वतीय भूमिका ही आश्रय ले यत्नपूर्वक दो पुरियाँ बसाये ॥ ७ ॥
सह्यस्य चोपरिष्टात्तु दक्षिणां दिशमाश्रितः।
पद्मवर्णोऽपि मे पुत्रो निवेशयतु मा चिरम् ॥ ८ ॥
'मेरा बेटा पद्मवर्ण भी दक्षिण दिशाका आश्रय ले सह्यपर्वतके शिखरपर शीघ्र एक नगर बसाये !॥ ८ ॥
तत्रैव परतः कान्ते देशे चम्पकभूषिते।
सारसो मे पुरं रम्यं निवेशयतु पुत्रकः ॥ ९ ॥
'वहीं पश्चिम दिशाकी ओर चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित मनोरम प्रदेशमे बेटा सारस एक रमणीय राजधानीकी स्थापना करे ॥ ९ ॥
हरितोऽयं महाबाहुः सागरे हरितोदके।
द्वीपं पन्नगराजस्य सुतो मे पालयिष्यति ॥ १० ॥
'मेरा पुत्र यह महाबाहु हरित हरे जलसे भरे हुए समुद्रमें नागराज धूम्रवर्णके द्वीपका पालन करेगा ॥ १० ॥
माधवो मे महाबाहुर्ज्येष्ठपुत्रश्च धर्मवित्।
यौवराज्येन संयुक्तः स्वपुरं पालयिष्यति ॥ ११ ॥
'मेरा पाँचवाँ पुत्र महाबाहु माधव ज्येष्ठ तथा धर्मज्ञ है, यह युवराज होकर अपने इसी नगरका (जो रैवतकके समीप है) पालन करेगा' ॥ ११ ॥
सर्वे नृपश्रियं प्राप्ता अभिषिक्ताः सचामराः।
पित्रानुशिष्टाश्चत्वारो लोकपालोपमा नृपाः ॥ १२॥
| ३५२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
स्वं स्वं निवेशनं सर्वे भेजिरे नृपसत्तमाः ।
पुरस्थानानि रम्याणि मृगयन्तो यथाक्रमम् ॥ १३ ॥
उन सबको राज्यलक्ष्मी प्राप्त हुई। सबका विभिन्न राज्योंपर अभिषेक हुआ तथा सभी छत्र-चामर आदि राजोचित चिह्नोंसे अलंकृत हुए। तत्पश्चात् पिताकी आज्ञा पाकर लोकपालोंके समान वे चारों नृपश्रेष्ठ राजकुमार अपने-अपने घरमें गये। फिर उन्होंने क्रमशः सुरम्य राजधानी बनानेके लिये स्थानकी खोज प्रारम्भ की ॥ १२-१३ ॥
मुचुकुन्दश्च राजर्षिर्विन्ध्यमध्यमरोचयत् ।
स्वस्थानं नर्मदातीरे दारुणोपलसंकटे ॥ १४ ॥
राजर्षि मुचुकुन्दने विन्ध्यपर्वतके मध्यवर्ती स्थानको पसंद किया। उन्होंने विषम प्रस्तरखण्डोंसे भरे हुए दुर्गम नर्मदा-तटपर अपना स्थान बनाया ॥ १४ ॥
स च तं शोधयामास विविक्तं च चकार ह ।
सेतुं चैव समं चक्रे परिखाश्चामितोदकाः ॥ १५ ॥
उन्होंने उस स्थानका शोधन किया और उसे एकान्त एवं पवित्र बनाया। सम सेतुका निर्माण किया और अथाह जलसे भरी हुई खाइयाँ खुदवायीं ॥ १५ ॥
स्थापयामास भागेषु देवतायतनान्यपि ।
रथ्या वीथीर्नृणां मार्गांश्चत्वराणि वनानि च ॥ १६ ॥
नगरके विभिन्न भागोंमें बहुत-से देवमन्दिर भी स्थापित किये। सड़कें, गलियाँ, जनसाधारणके मार्ग तथा चौराहे बनवाये और वन भी लगवाये ॥ १६ ॥
स तां पुरीं धनवतीं पुरुहूतपुरीप्रभाम् ।
नातिदीर्घेण कालेन चकार नृपसत्तमः ॥ १७ ॥
उन नृपश्रेष्ठ मुचुकुन्दने उस पुरीको थोड़े ही दिनोंमें धन-धान्यसे सम्पन्न करके इन्द्रपुरीके समान प्रकाशित एवं सुशोभित कर दिया ॥ १७ ॥
नाम चास्याः शुभं चक्रे निर्मितं स्वेन तेजसा ।
तस्याः पुर्या नृपश्रेष्ठो देवश्रेष्ठपराक्रमः ॥ १८ ॥
देवताओंके समान श्रेष्ठ पराक्रमी नृपवर मुचुकुन्दने उस पुरीका अपने ही तेजसे निर्मित शुभ सुन्दर नाम रक्खा—॥ १८ ॥
महाश्मसंघातवती यथेयं विन्ध्यसानुगा ।
माहिष्मती नाम पुरी प्रकाशमुपयास्यति ॥ १९ ॥
'विन्ध्य-गिरिके शिखरपर बसी हुई यह नगरी महान् अश्मसंघात (प्रस्तर-समूह) से युक्त है, इसलिये संसारमें 'माहिष्मतीपुरी' के नामसे विख्यात होगी' ॥ १९ ॥
उभयोर्विन्ध्ययोः पादे नगयोस्तां महापुरीम् ।
मध्ये निवेशयामास श्रिया परमया युताम् ॥ २० ॥
राजा मुचुकुन्दने उत्तम शोभा-सम्पत्तिसे सम्पन्न उस महापुरीको दोनों विन्ध्यपर्वतोंके बीचमें बसाया था ॥ २० ॥
पुरिकां नाम धर्मात्मा पुरीं देवपुरीप्रभाम् ।
उद्यानशतसम्बाधां समृद्धआपणचत्वराम् ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् उन धर्मात्मा नरेशने एक 'पुरिका' नामवाली पुरी बसायी, जो देवपुरीके समान प्रकाशित होती थी। उसके भीतर सैकड़ों उद्यान बने थे तथा वैभवपूर्ण हाट-बाजार और चौराहे भी उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २१ ॥
ऋक्षवन्तं समभितस्तीरे तत्र निरामये ।
निर्मिता सा पुरी राज्ञा पुरिका नाम नामतः ॥ २२ ॥
ऋक्षवान् पर्वतके समीप, रोग-शोकसे रहित नर्मदा-तटपर राजाने पुरिका नामक पुरीका निर्माण कराया था ॥ २२॥
स ते द्वे विपुले पुर्यौ देवभोग्योपमे शुभे ।
पालयामास धर्मात्मा राजा धर्मे व्यवस्थितः ॥ २३ ॥
धर्ममें स्थित हुए वे धर्मात्मा नरेश देवताओंके उपभोगमें आनेवाली स्वर्गीय पुरियोंके समान उन दो सुन्दर नगरोंका निर्माण करके उनका पालन करने लगे ॥ २३ ॥
पद्मवर्णोऽपि राजर्षिः सह्यपृष्ठे पुरोत्तमम् ।
चकार नद्या वेणायास्तीरे तरुलताकुले ॥ २४ ॥
राजर्षि पद्मवर्णने भी सह्यपर्वतके पृष्ठभागमें वृक्षों और लताओंसे व्याप्त वेणा नदीके तटपर एक उत्तम नगरका निर्माण कराया ॥ २४ ॥
विषयस्याल्पतां ज्ञात्वा सम्पूर्णं राष्ट्रमेव च ।
निवेशयामास नृपः स वप्रप्रायमुत्तमम् ॥ २५ ॥
अपनी राज्यभूमिका विस्तार दूसरोंकी अपेक्षा छोटा जानकर उन्होंने अपने सम्पूर्ण राष्ट्रको ही एक नगरके रूपमें बसाया और उसे सब ओरसे एक विशाल चहारदीवारीके द्वारा घेर दिया। उस उत्तम राष्ट्रमें परकोटेकी ही प्रधानता थी ॥ २५ ॥
पद्मावतं जनपदं करवीरं च तत्पुरम् ।
निर्मितं पद्मवर्णेन प्राजापत्येन कर्मणा ॥ २६ ॥
उनका राज्य पद्मावत जनपदके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उनकी राजधानीका नाम करवीरपुर हुआ। पद्मवर्णने शिल्पशास्त्रके नियमोंके अनुसार उस नगरका निर्माण कराया था ॥
सारसेनापि विहितं रम्यं क्रौञ्चपुरं महत् ।
चम्पकाशोकबहुलं विपुलं ताम्रमृत्तिकम् ॥ २७ ॥
राजा सारसने भी क्रौञ्चपुर¹ नामक महान् एवं रमणीय नगरका निर्माण कराया, जिसमें चम्पा और अशोक वृक्षोंकी
१. आचार्य नीलकण्ठने 'क्रौञ्चपुर' नगरकी स्थिति वेणाके दक्षिण तटपर बतायी है।
विष्णुपर्व ] अष्टात्रिंशोऽध्यायः ३५३
बहुलता थी। उसका विस्तार बड़ा था और वहाँ ताँबेका कारोबार होता था, जिससे लोगोंकी जीविका चलती थी ॥ २७ ॥
वनवासीति विख्यातः स्फीतो जनपदो महान् ।
पुरस्य तस्य तु श्रीमान् द्रुमैः सार्वर्तुकैर्वृतः ॥ २८ ॥
उस नगरका महान् समृद्धिशाली एवं शोभायमान जनपद 'वनवासी' नामसे विख्यात हुआ। वहाँ सभी ऋतुओंमे फूलने-फलनेवाले वृक्ष सब ओर हरे-भरे दिखायी देते थे ॥२८॥
हरितोऽपि समुद्रस्य द्वीपं समभिपालयत् ।
रत्नसंचयसम्पूर्णं नारीजनमनोहरम् ॥ २९ ॥
हरित भी रत्नराशिसे पूर्ण उस समुद्र-सम्बन्धी द्वीपका पालन करने लगे, जो नारीजनोंके लिये मनोहर था (अथवा नारियोंके कारण मनोहर प्रतीत होता था) ॥ २९ ॥
तस्य दाशा जले मग्ना मधुरा नाम विश्रुताः ।
ये हरन्ति सदा शङ्खान् समुद्रोदरचारिणः ॥ ३० ॥
राजा हरितके द्वारा नियुक्त हुए धीवर, जो वहाँ 'मधुर' नामसे प्रसिद्ध थे, जलमे डूबकर समुद्रके भीतर विचरनेवाले शङ्खोंको पकड़ लाते थे ॥ ३० ॥
तस्यापरे दाशजनाः प्रवालाञ्जलसम्भवान् ।
संचिन्वन्ति सदा युक्ता जातरूपं च मौक्तिकम् ॥ ३१ ॥
उनके दूसरे-दूसरे मल्लाह सदा सावधान रहकर जलके भीतर होनेवाले मूँगो तथा चमकीले मोतियोंका संग्रह करते थे ॥ ३१ ॥
जलजानि च रत्नानि निषादास्तस्य मानवाः ।
प्रचिन्वन्तोऽर्णवे युक्ता नौभिः संयानगामिनः ॥ ३२ ॥
हरितके ही कार्यकर्ता निषाद बड़ी-बड़ी नौकाओंको साथ लिये छोटी नौकाओंद्वारा समुद्रमे जाते और जलमे उत्पन्न होनेवाले रत्नोंकी खोज करते थे (छोटी नावोंसे दूर-दूरतक जाकर वे रत्नोंका संचय करते और एक जगह खड़ी हुई बड़ी नौकामे लाकर रखते थे) ॥ ३२ ॥
मत्स्यमांसेन ते सर्वे वर्तन्ते स्म सदा नराः ।
गृह्णन्तः सर्वरत्नानि रत्नद्वीपनिवासिनः ॥ ३३ ॥
उस रत्नद्वीपमें निवास करनेवाले वे मल्लाह जातिके लोग सब प्रकारके रत्नोंका संग्रह करते और मछलीके मांससे जीवन-निर्वाह करते थे ॥ ३३ ॥
तैः संयानगतैर्द्रव्यैर्वणिजो दूरगामिनः ।
हरितं तर्पयन्त्येकं यथैव धनदं तथा ॥ ३४ ॥
नौकाओंमें समुद्रने निकाले गये जो द्रव्य संचित होते, उनके द्वारा दूर देशोकी यात्रा करनेवाले व्यवसायी वैश्य व्यापार करते और प्राप्त हुए धनसे एकमात्र राजा हरितको ही तृप्त करते थे, जैसे यक्ष केवल कुवेरको ही अपने उपार्जित धनसे संतुष्ट किया करते हैं ॥ ३४ ॥
एवमिक्ष्वाकुवंशात् तु यदुवंशो विनिःसृतः ।
चतुर्धा यदुपूत्रैस्तु चतुर्भिर्भिद्यते पुनः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार यह यदुवंश इक्ष्वाकुवंशसे निकला है। फिर यदुके चार छोटे पुत्रोंद्वारा यह चार अन्य शाखाओमे विभक्त हुआ है ॥ ३५ ॥
स यदुर्माधवे राज्यं विसृज्य यदुपूङ्गवे ।
त्रिविष्टपं गतो राजा देहं त्यक्त्वा महीतले ॥ ३६ ॥
वे राजा यदु अपने बड़े पुत्र यदुकुल-पुङ्गव माधवको अपना राज्य दे इस भूतलपर शरीरका परित्याग करके स्वर्ग-को चले गये ॥ ३६ ॥
बभूव माधवसुतः सत्त्वतो नाम वीर्यवान् ।
सत्त्ववृत्तिर्गुणोपेतो राजा राजगुणे स्थितः ॥ ३७ ॥
माधवका पराक्रमी पुत्र सत्त्वत नामसे विख्यात हुआ। वे गुणवान् राजा सत्त्वत राजोचित गुणोंमें प्रतिष्ठित थे और सदा सात्त्विक वृत्तिसे रहते थे ॥ ३७ ॥
सत्त्वतस्य सुतो राजा भीमो नाम महानभूत् ।
येन भैमाः सुसंवृत्ताः सत्त्वतात् सात्त्वताः स्मृताः॥३८॥
सत्त्वतके पुत्र महान् राजा भीम हुए, जिनसे भावी पीढ़ी-के लोग 'भैम' कहलाये। सत्त्वतसे उत्पन्न होनेके कारण उन सबको 'सात्त्वत' भी माना गया है॥ ३८ ॥
राज्ये स्थिते नृपे तस्मिन् रामे राज्यं प्रशासति ।
शत्रुघ्नो लवणं हत्वा चिच्छेद स मधोर्वनम् ॥ ३९ ॥
जब राजा भीम आनर्त देशके राज्यपर प्रतिष्ठित थे, उन्हीं दिनों अयोध्यामे भगवान् श्रीराम भूमण्डलके राज्यका शासन करते थे। उनके राज्यकालमे शत्रुघ्नने मधुपुत्र लवणको मारकर मधुवनका उच्छेद कर डाला ॥ ३९ ॥
तस्मिन् मधुवने स्थाने पुरीं च मधुरामिमाम् ।
निवेशयामास विभुः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ ४० ॥
उसी मधुवनके स्थानमे सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले प्रभावशाली शत्रुघ्नने इस मधुरापुरीको बसाया था ॥ ४० ॥
पर्यये चैव रामस्य भरतस्य तथैव च ।
सुमित्रासुतयोश्चैव स्थानं प्राप्तं च वैष्णवम् ॥ ४१ ॥
भीमेनेयं पुरी तेन राज्यसम्बन्धकारणात् ।
स्ववशे स्थापिता पूर्वं स्वयमध्यासिता तथा ॥ ४२ ॥
जब श्रीरामके अवतारका उपसंहार हुआ और श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न सभी परमधामको पधारे, तब भीमने इस वैष्णव स्थान (मधुरा) को प्राप्त किया; क्योकि (लवणके) मारे जानेपर अब उस राज्यसे उन्हींका लगाव रह गया था। (वे ही उत्तराधिकारी होनेयोग्य थे।)*
* हर्यश्वके पुत्र यदु मधुकी पुत्री मधुमतीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे; अतः वे मधुके दौहित्र थे। नानाके कोई पुत्र न हो तो उसकी
म० ह० १२-
| ३५४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भीमने इस पुरीको अपने वशमें किया और वे स्वयं भी यहीं आकर रहने लगे ॥ ४१-४२ ॥
ततः कुश स्थिते राज्ये लवे तु युवराजति ।
अन्धको नाम भीमस्य सुतो राज्यमकारयत् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर जब अयोध्याके राज्यपर कुश प्रतिष्ठित हुए और लव युवराज बन गये, तब मथुरामें भीमके पुत्र अन्धक राज्य करने लगे ॥ ४३ ॥
अन्धकस्य सुतो जज्ञे रेवतो नाम पार्थिवः ।
ऋक्षोऽपि रेवताज्जज्ञे रम्ये पर्वतमूर्धनि ॥ ४४ ॥
ततो रैवत उत्पन्नः पर्वतः सागरान्तिके ।
नाम्ना रैवतको नाम भूमौ भूमिधरः स्मृतः ॥ ४५ ॥
अन्धकके पुत्र राजा रेवत हुए । रेवतसे पर्वतके रमणीय शिखरपर ऋक्षका जन्म हुआ । इस प्रकार उनसे रैवत (ऋक्ष) की उत्पत्ति हुई । उस समय समुद्रके तटकी भूमिपर जो विशाल भूधर था, वह उसी रैवतके नामपर रैवतक पर्वतके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ४४-४५ ॥
रैवतस्यात्मजो राजा विश्वगर्भो महायशाः ।
बभूव पृथिवीपालः पृथिव्यां प्रथितः प्रभुः ॥ ४६ ॥
रैवत (ऋक्ष) के पुत्र महायशस्वी राजा विश्वगर्भ हुए, जो इस पृथ्वीपर प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली भूमिपाल थे ॥ ४६ ॥
तस्य तिसृषु भार्यासु दिव्यरूपासु केशव ।
चत्वारो जज्ञिरे पुत्रा लोकपालोपमाः शुभाः ॥ ४७ ॥
केशव ! उनके तीन भार्याएँ थीं । तीनों ही दिव्य रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित होती थीं । उनके गर्भसे राजाके चार सुन्दर पुत्र हुए, जो लोकपालोंके समान पराक्रमी थे ॥ ४७ ॥
वसुर्बभ्रुः सुषेणश्च सभाक्षश्चैव वीर्यवान् ।
यदुप्रवीराः प्रख्याता लोकपाला इवापरे ॥ ४८ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—वसु, बभ्रु, सुषेण और बलवान् सभाक्ष । ये यदुकुलके प्रख्यात श्रेष्ठ वीर दूसरे लोकपालोंके समान शक्तिशाली थे ॥ ४८ ॥
तैरयं यादवो वंशः पार्थिवैर्बहुलीकृतः ।
यैः सार्धं कृष्ण लोकेऽस्मिन् प्रजावन्तः प्रजेश्वराः ॥ ४९ ॥
वसोस्तु कुन्तिविषये वसुदेवः सुतो विभुः ।
ततः स जनयामास सुप्रभे द्वे च दारिके ॥ ५० ॥
कुन्तीं च पाण्डोर्महिषीं देवतामिव भूचरीम् ।
भार्यां च दमघोषस्य चेदिराजस्य सुप्रभाम् ॥ ५१ ॥
श्रीकृष्ण ! उन राजाओंने इस यादव-वंशको बढ़ाकर बड़ी भारी संख्यासे सम्पन्न कर दिया । जिनके साथ इस संसारमें बहुत-से संतानवान् नरेश हैं । वसुसे (जिनका दूसरा नाम शूर था) वसुदेव उत्पन्न हुए । ये वसुपुत्र वसुदेव बड़े प्रभावशाली हैं । वसुदेवकी उत्पत्तिके अनन्तर वसुने दो कान्तिमती कन्याओंको जन्म दिया (जो पृथा (कुन्ती) और श्रुतश्रवा नामसे विख्यात हुईं) । इनमेंसे पृथा कुन्ति-देशमें (राजा कुन्तिभोजकी दत्तक पुत्रीके रूपमें) रहती थी । कुन्ती जो पृथ्वीपर विचरनेवाली देवाङ्गनाके समान थी, महाराज पाण्डुकी महारानी हुई तथा सुन्दर कान्तिसे प्रकाशित होनेवाली श्रुतश्रवा चेदिराज दमघोषकी पत्नी हुई ॥
एष ते स्वस्य वंशस्य प्रभवः सम्प्रकीर्तितः ।
श्रुतो मया पुरा कृष्ण कृष्णद्वैपायनान्तिकात् ॥ ५२ ॥
श्रीकृष्ण ! यह मैंने तुमसे अपने यादववंशकी उत्पत्ति बतायी है । इसे मैंने पहले श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीसे सुना था ॥ ५२ ॥
त्वं त्विदानीं प्रणष्टेऽस्मिन् वंशे वंशभृतां वर ।
स्वयम्भूरिव सम्प्राप्तो भवायास्माज्जयाय च ॥ ५३ ॥
वंशधारियोंमें श्रेष्ठ गोविन्द ! इस समय यह वंश नष्ट-सा हो चला था । परंतु तुम स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान इस वंशके उद्भव तथा हमारी विजयके लिये इसमें अवतीर्ण हुए हो ॥
न तु त्वां पौरमात्रेण शक्ता गूढयितुं वयम् ।
देवगुह्योप्यपि भगवान् सर्वज्ञः सर्वभावनः ॥ ५४ ॥
हमलोग तुम्हें साधारण पुरवासी बताकर छिपानेमें असमर्थ हैं; क्योंकि तुम देवताओंके गुप्त रहस्योंसे भी परिचित, सर्वज्ञ तथा सबको उत्पन्न करनेवाले हो ॥ ५४ ॥
शक्तश्चापि जरासंधं नृपं योधयितुं विभो ।
त्वद्बुद्धिवशगाः सर्वे वयं योधव्रते स्थिताः ॥ ५५ ॥
प्रभो ! तुम राजा जरासंधसे युद्ध करनेमें समर्थ हो । हम सब लोग योद्धाओंके व्रतमें स्थिर रहकर सदा तुम्हारी बुद्धिके वशीभूत रहेंगे ॥ ५५ ॥
जरासंधस्तु बलवान् नृपाणां मूर्ध्नि तिष्ठति ।
अप्रमेयबलश्चैव वयं च कुशसाधनाः ॥ ५६ ॥
परंतु राजा जरासंध बड़ा बलवान् है । वह राजाओंके सिरपर खड़ा है । उसके पास असंख्य सेना है और इधर हम लोगोंके पास युद्धकी साधन-सामग्री बहुत थोड़ी है ॥ ५६ ॥
न चेयमेकाहमपि पुरी रोधं सहिष्यति ।
कृशभक्तेन्धनक्षामा दुर्गैरपरिवेष्टिता ॥ ५७ ॥
यह मथुरापुरी शत्रुओंद्वारा किये गये एक दिनके उपरोध (घेरे) को भी नहीं सह सकेगी; क्योंकि यहाँ खाने-पीनेकी सामग्री बहुत कम है। लकड़ियोंका संचय भी स्वल्प ही है तथा यह पुरी विभिन्न प्रकारके दुर्गोंसे घिरी हुई नहीं है ॥ ५७ ॥
पादटिप्पणी:
सम्पत्ति दौहित्रको ही प्राप्त होनी चाहिये—यह शास्त्रका नियम है, अतः लवणासुरके मारे जानेपर यदु-पौत्र भीम ही उस समय उस राज्यके अधिकारी हुए ।
विष्णुपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३५५
असंस्कृताम्बुपरिखा द्वारयन्त्रविवर्जिता।
वप्रप्राकारनिचया कर्तव्या बहुविस्तरा ॥ ५८ ॥
इसके चारों ओर जो जल भरनेके लिये खाइयाँ बनी हुई हैं, उनकी बहुत दिनोंसे मरम्मत और सफाई नहीं हुई है तथा नगरके द्वारपर रक्षाके लिये यन्त्र (तोप आदि) भी नहीं लगे हुए हैं। पुरीकी रक्षाके लिये चारों ओरसे मिट्टीकी मोटी दीवारें तथा कई पक्के परकोटे बनवानेकी आवश्यकता है, जिनका विस्तार बहुत बड़ा हो ॥ ५८ ॥
संस्कर्तव्यायुधागारा योकव्या चेट्रिकाचयैः।
कंसस्य वलभोग्यत्वान्नातिगुप्ता पुरा जनैः ॥ ५९ ॥
नगरके जितने आयुधागार हैं, उन सबका संस्कार (मरम्मत और सफाई) होना चाहिये। जगह-जगह ईंटोंके ढेर जुटा लेनेकी आवश्यकता है। कंसकी सेनाके उपयोगमें आनेके कारण इस नगरकी रक्षाके लिये लोगोंने पहलेसे कोई व्यवस्था नहीं कर रखी है ॥ ५९ ॥
सद्यो निपतिते कंसे राज्येऽस्माकं नवोदये।
पुरी प्रत्यग्ररोधेष्व न रोधं विसहिष्यति ॥ ६० ॥
अभी हालमें ही कंस मारा गया है, अतः हमारे राज्यका अभी नवोदय (प्रभात) काल है। जैसे राजाके सिपाही कर वसूल करनेके लिये गाँवको घेर लेते हैं, उसी तरह यदि इस पुरीका भी अवरोध हुआ तो यह उसे सहन न कर सकेगी ॥
बलं सम्मर्दभग्नं च कृष्यमाणं परेण ह।
असंशयमिदं राष्ट्रं जनैः सह विनङ्क्ष्यति ॥ ६१ ॥
हमारी सेना अनेको युद्धोंका सामना करनेके कारण हताश हो गयी है। शत्रु इसे बार-बार पीड़ा देकर क्षीण कर रहा है, अतः यह राष्ट्र यहाँके निवासियोंके साथ ही नष्ट हो जायगा। इसमें संदेह नहीं है ॥ ६१ ॥
यादवानां विरोधेन ये जिता राज्यकामुकैः।
ते सर्वे द्वैधमिच्छन्ति यत् क्षमं तद् विधीयताम् ॥ ६२ ॥
हमलोगोंने राज्यप्राप्तिकी इच्छा रखकर यादवोंका विरोध करनेके कारण जिन-जिन लोगोंको पराजित किया है, वे सब लोग हममें फूट डालना चाहते हैं। ऐसी परिस्थितिमें जो उचित हो सो करो ॥ ६२ ॥
वञ्चनीया भविष्यामो नृपाणां नृपकारणात्।
जरासंधभयार्तानां द्रवतां राज्यसम्भ्रमे ॥ ६३ ॥
राजा जरासंधके कारण दूसरे-दूसरे राजा भी हमें धोखा देंगे; क्योंकि ये जरासंधके भयसे पीड़ित हैं और अपने राज्यमें कोई विप्लव न मच जाय, इसके डरसे सब-के-सब उसके पीछे दौड़ते हैं ॥ ६३ ॥
आर्ता वक्ष्यन्ति नः सर्वे रुध्यमानाः पुरे जनाः।
यादवानां विरोधेन विनष्टाः स्मेति केशव ॥ ६४ ॥
केशव ! यदि इस नगरके सब लोग शत्रुओंके घेरा डालनेसे अवरुद्ध हो जायेंगे तो ये पीड़ित होकर हमारे लिये यही कहेगे कि हम यादवोंके विरोधसे नष्ट हो गये ॥ ६४ ॥
एतन्मम मतं कृष्ण विस्रम्भात् समुदाहृतम्।
त्वं तु विज्ञापितः पूर्वं न पुनः सम्प्रवोधितः ॥ ६५ ॥
श्रीकृष्ण ! यह मेरा मत है, जिसे तुमपर विश्वास होनेके कारण मैंने प्रकट किया है। तुम्हें इस बातकी पहले-पहल सूचना दी गयी है। तुम्हे समझानेका प्रयत्न नहीं किया गया है ॥ ६५ ॥
यदत्र वः क्षमं कृष्ण तच्च वै संविधीयताम्।
त्वमस्य नेता सैन्यस्य वयं त्वच्छासने स्थिताः।
त्वन्मूलश्च विरोधोऽयं रक्षाम्रानात्मना सह ॥ ६६ ॥
श्रीकृष्ण ! इस परिस्थितिमें जो उचित हो, वह करो। तुम इस यादव-सेनाके नेता हो और हम तुम्हारे शासनमें स्थित हैं। इस विरोधके मूल कारण तुम्हीं हो, इसलिये तुम अपने साथ ही हमलोगोंकी रक्षा करो ॥ ६६ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि विकद्रुवाक्यं नामाष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें विकद्रुका वाक्यविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
बलराम और श्रीकृष्णका पुरी और पुरवासियोंकी रक्षाके लिये मथुरासे दक्षिण भारतकी ओर प्रस्थान, परशुरामजीसे उनकी भेंट तथा उन दोनोंको गोमन्तपर्वतपर चलनेके लिये उनकी सलाह
वैशम्पायन उवाच
विकद्रोस्तु वचः श्रुत्वा वसुदेवो महायशाः।
परितुष्टेन मनसा वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
राजा षाड्गुण्यवक्ता वै राजा मन्त्रार्थतत्त्ववित्।
सतत्त्वं च हितं चैव कृष्णोक्तं किल धीमता ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विकद्रुकी बात सुनकर महायशस्वी वसुदेव संतुष्टचित्तसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
'श्रीकृष्ण ! जो राजनीतिके छः गुणोंसे युक्त बात बोले अथवा उन छहों गुणोंके उपयोगका अवसर बताये, वह राजा है। जो मन्त्रार्थ-तत्त्व (गुप्त मन्त्रणाका प्रयोजन एवं महत्त्व)
३५६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे
समझता हो, वह राजा है। बुद्धिमान् विकद्रुने तत्त्व और हित-की बात बतायी है ॥ २ ॥
भाषिता राजधर्माश्च सत्याश्च जगतो हिताः।
विकद्रुणा यदुश्रेष्ठ यद्धितं तद् विधीयताम् ॥ ३ ॥
'यदुश्रेष्ठ ! विकद्रुने उन राजधर्मोंका प्रतिपादन किया है, जो सत्य होनेके साथ ही जगत्के लिये हितकर हैं। अब तुम्हें जो हितकर जान पड़े, वह करो' ॥ ३ ॥
एतच्छ्रुत्वा पितुर्वाक्यं विकद्रोश्च महात्मनः।
वाक्यमुत्तममेकाग्रो बभाषे पुरुषोत्तमः ॥ ४ ॥
अपने पिता वसुदेव तथा महात्मा विकद्रुका यह कथन सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने एकाग्रचित्त होकर यह उत्तम बात कही—॥ ४ ॥
ब्रुवतां वः श्रुतं वाक्यं हेतुतः क्रमतस्तथा।
न्यायतः शास्त्रतश्चैव दैवं चैवानुपश्यताम् ॥ ५ ॥
'आपलोगोंने वैरके मूल-कारण, शत्रुके पराक्रम, न्यायोचित बर्ताव, शास्त्रकी आज्ञा तथा दैववश भविष्यमें होनेवाले कार्यपर दृष्टि रखते हुए जो कुछ कहा है, वह सब मैंने सुन लिया ॥ ५ ॥
श्रूयतामुत्तरं वाक्यं श्रुत्वा च परिगृह्यताम्।
नयेन व्यवहर्त्तव्यं पार्थिवेन यथाक्रमम् ॥ ६ ॥
संधिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च।
द्वैधीभावं संश्रयं च षाड्गुण्यं चिन्तयेत् सदा ॥ ७ ॥
'अब उसका उत्तर सुनिये और सुनकर यदि ठीक जँचे तो उसे ग्रहण कीजिये। इसमें संदेह नहीं कि राजाको राजनीतिके अनुसार व्यवहार करना चाहिये। उसके लिये यह उचित है कि संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन छः गुणोंका क्रमशः सदा चिन्तन करता रहे* ॥ ६-७ ॥
बलिनः संनिकृष्टे तु न स्थेयं पण्डितेन वै।
अपक्रमेद्धि कालज्ञः समर्थो युद्धमुद्वहेत् ॥ ८ ॥
'विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह बलवान् शत्रुके समीप न ठहरे। समयका ज्ञान रखनेवाला पुरुष बलवान् शत्रुसे अपनी रक्षा करनेके लिये स्थान छोड़कर हट जाय। यदि वह शत्रु-सेनाका सामना करनेके लिये समर्थ हो तो युद्धका बोझ उठाये ॥ ८ ॥
* संधि, विग्रह आदि छः गुणोंका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है—शत्रुसे मेल रखना संधि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसरकी प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बरतना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता है।
अहं तावत् सहायेण मुहूर्तेऽस्मिन् प्रकाशिते।
जीवितार्थं गमिष्यामि शक्तिमानप्यशक्तवत् ॥ ९ ॥
'मैं शक्तिशाली होकर भी असमर्थकी भाँति इस वर्तमान मुहूर्तमें भैया बलरामजीके साथ जीवनकी रक्षाके लिये यहाँसे पलायन करूँगा ॥ ९ ॥
ततः सह्याचलयुतं सहार्थेणाहमक्षयम्।
आत्मद्वितीयः श्रीमन्तं प्रवेक्ष्ये दक्षिणापथम् ॥ १० ॥
'यहाँसे प्रस्थान करनेके बाद मैं आर्य बलरामके साथ अपने आपको ही उनका दूसरा साथी बनाकर उस अक्षय शोभासम्पन्न दक्षिणापथमें प्रवेश करूँगा, जो सह्य पर्वतसे मिला-जुला है ॥ १० ॥
करवीरपुरं चैव रम्यं क्रौञ्चपुरं तथा।
द्रक्ष्यावस्तत्र सहितौ गोमन्तं च नगोत्तमम् ॥ ११ ॥
'वहाँ हम दोनों भाई एक साथ रहकर करवीरपुर, रमणीय क्रौञ्चपुर तथा पर्वतश्रेष्ठ गोमन्तका दर्शन करेंगे ॥
आवयोर्गमनं श्रुत्वा जितकाशी स पार्थिवः।
अप्रविश्य पुरीं दर्पादनुसारं करिष्यति ॥ १२ ॥
'हमलोगोंका दक्षिण-गमन सुनकर विजयसे सुशोभित होनेवाला राजा जरासंध बलके घमण्डमें आकर मथुरापुरीमें प्रवेश न करके हमारा पीछा ही करेगा ॥ १२ ॥
ततः सह्यवनेष्वेव राजा याति स सानुगः।
आवयोर्ग्रहणे चैव नृपतिः प्रयतिष्यति ॥ १३ ॥
'तत्पश्चात् हमारा अनुसरण करता हुआ वह राजा सेवकों-सहित सह्याचलके वनोंमें ही जा पहुँचेगा और हम दोनोंको पकड़ लेनेके लिये पूरा प्रयत्न करेगा ॥ १३ ॥
एषा नः श्रेयसी यात्रा भविष्यति कुलस्य वै।
पौराणामथ पुर्याश्च देशस्य च सुखावहा ॥ १४ ॥
'हमारी यह यात्रा इस यादवकुलके लिये कल्याणकारिणी होगी तथा पुरवासियोंके, मथुरापुरीके एवं इस शूरसेन देशके लिये भी सुखदायिनी होगी ॥ १४ ॥
न च शत्रोः परिभ्रष्टा राजानो विजिगीषवः।
परराष्ट्रेषु मृष्यन्ति मृधे शत्रोः क्षयं विना ॥ १५ ॥
'विजयकी इच्छा रखनेवाले राजालोग जब शत्रु हाथमें आकर निकल जाता है, तब वे उस शत्रुके राज्योंमें पहुँचकर युद्धमें उसका वध किये बिना शान्त नहीं होते हैं' ॥ १५ ॥
एवमुक्त्वा तु तौ वीरौ कृष्णसंकर्षणावुभौ।
प्रपेदतुरसम्भ्रान्तौ दक्षिणौ दक्षिणापथम् ॥ १६ ॥
ऐसा कहकर वे दोनों नीतिनिपुण वीर श्रीकृष्ण और संकर्षण बिना किसी घबराहटके दक्षिणापथकी ओर चल दिये ॥ १६ ॥
विष्णुपर्र्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३५७
तौ तु राष्ट्राणि शतशश्चरन्तौ कामरूपिणौ ।
दक्षिणां दिशमास्थाय चेरतुर्मार्गगौ सुखम् ॥ १७ ॥
इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वे दोनों वीर सैकड़ों राष्ट्रोंपर विचरते हुए दक्षिण दिशामें पहुँचकर उत्तम मार्गका आश्रय ले सुखपूर्वक आगे बढ़ने लगे ॥ १७ ॥
सह्यपृष्ठेषु रम्येषु मोदमानावुभौ तथा ।
दक्षिणापथगौ वीरावध्वानं सम्प्रपेदतुः ॥ १८ ॥
सह्यपर्वतके रमणीय शिखरोंपर सानन्द विचरते हुए वे दोनों दक्षिणापथके वीर यात्री अपने मार्गपर बढ़ते ही चले गये ॥ १८ ॥
तौ च स्वल्पेन कालेन सह्याचलविभूषितम् ।
करवीरपुरं प्राप्तौ स्ववंशेन विभूषितम् ॥ १९ ॥
थोड़े ही समयमें वे दोनों भाई सह्यकी पर्वत-मालाओंसे अलंकृत करवीरपुरमें जा पहुँचे, जो उन्हींके वंशके लोगोंसे विभूषित था ॥ १९ ॥
तौ तत्र गत्वा वेणाया नद्यास्तीरान्तमाश्रितम् ।
आसेदतुः प्ररोहाढ्यं न्यग्रोधं तरुपुङ्गवम् ॥ २० ॥
वहाँ पहुँचकर वे दोनों वीर वेणा नदीके तटपर ही बढ़े हुए, वरोहोंसे युक्त एक श्रेष्ठ वृक्ष वरगदके समीप गये ॥
अधस्तात् तस्य वृक्षस्य मुनिं दीप्ततपोधनम् ।
अंसावसक्तपरशुं जटावल्कलधारिणम् ॥ २१ ॥
गौरमग्निशिखाकारं तेजसा भास्करोपमम् ।
क्षत्रान्तकरमक्षोभ्यं वपुष्मन्तमिवार्णवम् ॥ २२ ॥
न्यस्तसंकुचिताधानं काले हुतहुताशनम् ।
क्लिन्नं त्रिपवणाम्भोभिराद्यं देवगुरुं यथा ॥ २३ ॥
सवत्सां धेनुकां श्वेतां होमधुक्कामदोहनाम् ।
क्षीरारणिं कर्षमाणं महेन्द्रगिरिगोचरम् ॥ २४ ॥
ददृशतुस्तौ सहितावपरिश्रान्तमव्ययम् ।
भार्गवं राममासीनं मन्दरस्थं यथा रविम् ॥ २५ ॥
उस वृक्षके नीचे उद्दीप्त तपस्वी भृगुनन्दन परशुरामजी विराजमान थे, जिनके एक कंधेपर फरसा सटा हुआ था और जो जटा और वल्कल धारण किये हुए थे । उनके शरीरका वर्ण गौर तथा अग्निशिखाके समान प्रकाशमान था। वे सूर्यके समान तेजस्वी दिखायी देते थे । क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले परशुराम किसीसे क्षुब्ध होनेवाले नहीं थे । वे मूर्त्तिमान् समुद्रके समान गम्भीर प्रतीत होते थे। उनका अग्न्याधान-सम्बन्धी कार्य समाप्त एवं संकुचित हो चुका था, फिर भी वे समय-समयपर प्रज्वलित अग्निमें आहुति दिया करते थे । तीनों समय स्नान करनेके कारण उनका शरीर एवं वस्त्र जलसे भीगे हुए थे । वे देवताओंके आदि-गुरु बृहस्पति के समान जान पड़ते थे । उनके पास जो श्वेत रंगकी सवत्सा (बछड़ेवाली) धेनु थी, वह केवल होमके लिये दुही जाती थी, इसलिये होमधेनु कहलाती थी। इसके सिवा वह मुनिकी इच्छाके अनुसार समस्त वस्तुओंको देनेमें समर्थ थी, इसलिये कामदोहना या कामधेनु कहलाती थी । दुग्धरूपी अग्निको प्रकट करनेके लिये अरणीके समान शोभित होनेवाली उस होमधेनुको परशुरामजी कहीं खींच-कर ले जा रहे थे । वे कभी परिश्रमसे थकते नहीं हैं और अविनाशी हैं । श्रीकृष्ण और बलरामने महेन्द्र गिरिपर विचरनेवाले परशुरामजीको वहाँ मन्दराचलके शिखरपर प्रकाशित होनेवाले सूर्यके समान देखा ॥ २१–२५ ॥
न्यायतस्तौ तु तं दृष्ट्वा पादमूले कृताञ्जली ।
वसुदेवसुतौ वीरौ सधिष्ण्ण्याविव पावकौ ॥ २६ ॥
उनका दर्शन करके वसुदेवके उन दोनों वीर पुत्रोंने न्यायानुसार उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर प्रणाम किया । वे उस समय वेदीपर प्रज्वलित अग्नियोंके समान जान पड़ते थे ॥ २६ ॥
कृष्णस्तमृषिशार्दूलमुवाच वदतां वरः ।
श्लक्ष्णं मधुरया वाचा लोकवृत्तान्तकोविदः ॥ २७ ॥
इसके बाद वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं लोकवृत्तान्तके ज्ञानमें कुशल श्रीकृष्णने मुनिश्रेष्ठ परशुरामजीसे स्नेहयुक्त मधुर-वाणीमें कहा—॥ २७ ॥
भगवन् जामदग्न्यं त्वामवगच्छामि भार्गवम् ।
रामं मुनीनामृषभं क्षत्रियाणां कुलान्तकम् ॥ २८ ॥
‘भगवन् ! मैं समझता हूँ कि आप भृगुकुलभूषण क्षत्रिय-कुलविनाशक मुनिश्रेष्ठ जमदग्निनन्दन परशुरामजी हैं ॥ २८॥
त्वया सायकवेगेन क्षिप्तो भार्गव सागरः ।
इषुपातेन नगरं कृतं शूर्पारिकं त्वया ॥ २९ ॥
'भृगुनन्दन ! आपने अपने बाणके वेगसे समुद्रको पीछे ढकेल दिया और जितनी दूरीमें बाण गिरा समुद्रसे उतनी ही भूमि लेकर वहाँ शूर्पारक नगरका निर्माण किया ॥ २९ ॥
धनुःपञ्चशतायाममिषुपञ्चशतोच्छ्रयम् ।
सह्यस्य च निकुञ्जेषु स्फीतो जनपदो महान् ॥ ३० ॥
'उस नगरकी लंबाई पाँच सौ धनुर और चौड़ाई पाँच सौ बाण है* । सह्यपर्वतके निकुञ्जोंमें वह समृद्धिशाली महान् जनपद बसा हुआ है ॥ ३० ॥
अतिक्रम्योदधेर्वेलामपरान्ते निवेशितः ।
त्वया तत् कार्त्तवीर्यस्य सहस्रभुजकाननम् ॥ ३१ ॥
छिन्नं परशुनैकेन स्मरता निधनं पितुः ।
* धनुष चार हाथ लंबा और बाण दो हाथ लंबा माना गया है।
| ३५८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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'आपने समुद्रवेलाका उल्लङ्घन करके अपरान्तदेशमें (जो पश्चिम समुद्रके तटपर है) उस महान् जनपदको बसाया है। आपने ही अपने पिताकी मृत्युको याद करके एक ही फरसेसे कार्तवीर्यकी सहस्र भुजाओंका वह जंगल काट डाला था ॥ ३१½ ॥
इयमद्यापि रुधिरैः क्षत्रियाणां हतद्विपाम् ॥ ३२ ॥
स्निग्धैस्त्वत्परशुत्सृष्टै रक्तपङ्का वसुंधरा ।
रैणुकेयं विजाने त्वां क्षितौ क्षितिपरोपणम् ॥ ३३ ॥
'आपके द्वारा मारे गये जो शत्रुभूत क्षत्रिय थे, आपके फरसेसे प्रवाहित हुए उनके स्निग्ध रुधिरसे आज भी यह वसुन्धरा भीगकर रक्तकी कीचसे युक्त दिखायी देती है। मैं जानता हूँ कि आप भूमण्डलके क्षत्रियोंपर रोष प्रकट करने-वाले रेणुकानन्दन परशुराम हैं ॥ ३२-३३ ॥
परशुप्रग्रहे युक्तं यथैवेह रणे तथा ।
तदिच्छावस्त्वया विप्र कांचिदर्थमुपश्रुतम् ॥ ३४ ॥
उत्तरं च श्रुतार्थेन प्रत्युक्तमविशङ्कया ।
'क्योंकि आप रणभूमिकी ही भाँति यहाँ भी फरसा लिये हुए हैं, अतः विप्रवर! हम दोनों आपसे एक बात पूछना चाहते हैं तथा आप हमारी बात सुनकर निर्भीक हो हमें जो उत्तर देंगे, उसे सुननेकी भी हमारी इच्छा है ॥ ३४½ ॥
आवयोर्मथुरा राम यमुनातीरशोभिनी ॥ ३५ ॥
यादवौ स्वो मुनिश्रेष्ठ यदि ते श्रुतिमागतौ ।
वसुदेवो यदुश्रेष्ठः पिता नौ हि धृतव्रतः ॥ ३६ ॥
'मुनिश्रेष्ठ परशुराम ! हमारी निवासभूमि मथुरापुरी है, जो यमुना तटपर शोभा पाती है। हम दोनों यादव हैं। यदि हमारे नाम भी कभी आपके कानोंमें पड़े हों तो आप हमें जानते भी होंगे। यदुकुलके श्रेष्ठ पुरुष तथा उत्तम व्रत-धारण करनेवाले वसुदेवजी हम दोनोंके पिता हैं ॥ ३५-३६ ॥
जन्मप्रभृति चैवावां व्रजेष्वेव नियोजितौ ।
तौ स्वः कंसभयात् तत्र शङ्कितौ परिवर्धितौ ॥ ३७ ॥
'हम दोनों भाई जन्मसे ही कंसके भयसे ब्रजमें ही रक्खे गये और वहीं उससे शङ्कित रहकर बड़े हुए हैं ॥ ३७ ॥
वयश्च प्रथमं प्राप्तौ मथुरायां प्रवेशितौ ।
तावावां व्युत्थितं हत्वा समाजे कंसमोजसा ॥ ३८ ॥
पितरं तस्य तत्रैव स्थापयित्वा जनेश्वरम् ।
स्वमेव कर्म चारब्धौ गवां व्यापारकारकौ ॥ ३९ ॥
'प्रथम किशोरावस्थाको प्राप्त होनेपर हम दोनों भाइयों-का मथुरामें प्रवेश हुआ। वहाँ हमने धर्म-मर्यादासे विचलित हुए कंसको रंगशालामें बलपूर्वक मार डाला और उसके राज्य-पर उसीके पिताको राजा बनाकर बिठा दिया। तत्पश्चात् सदासे गोपालन-सम्बन्धी कार्य करनेवाले हम दोनों भाइयोंनें फिर वही अपना काम-धंधा आरम्भ कर दिया ॥ ३८-३९ ॥
अथावयोः पुरं रोद्धुं जरासंधो व्यवस्थितः ।
संग्रामान् सुवहून् कृत्वा लब्धलक्ष्यावपि स्वयम् ॥ ४० ॥
ततः स्वपुररक्षार्थं प्रजानां च धृतव्रत ।
अकृतार्थावनुद्योगौ कर्तव्यबलसाधनौ ॥ ४१ ॥
'तदनन्तर राजा जरासंधने हम दोनोंके नगरपर घेरा डालनेके लिये निश्चित विचार कर लिया। यद्यपि हम दोनों उसके साथ बहुत युद्ध कर चुके हैं और उनमें अपना लक्ष्य सिद्ध करनेमें सफल भी हुए हैं तथापि अपने नगर और प्रजाजनों-की रक्षाके लिये हमने जरासंधसे लड़नेके लिये कोई उद्योग नहीं किया। व्रतधारी मुने! अभी हमलोगोंको शक्ति और साधनका संचय करना है, अतः अकृतार्थ होकर ही हमलोग वहाँसे चल पड़े ॥ ४०-४१ ॥
अरथौ पत्तिनौ युद्धे निस्तनूत्रौ निरायुधौ ।
जरासंधोद्यमभयात् पुराद् द्वावेव निःसृतौ ॥ ४२ ॥
'हमारे पास युद्धके लिये रथ नहीं है। हम पैदल ही हैं। हमारे शरीरपर कवच और हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र भी नहीं हैं। हम जरासंधके आक्रमणके भयसे नगरको छोड़कर केवल दो ही जने वहाँसे निकल आये हैं ॥ ४२ ॥
एवमावामनुप्राप्तौ मुनिश्रेष्ठ तवान्तिकम् ।
आवयोर्मन्त्रमात्रेण कर्तुमर्हसि सत्क्रियाम् ॥ ४३ ॥
'मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार हम दोनों आपके निकट आये हैं। आप हमें सलाहमात्र देकर हमारा सत्कार करें' ॥ ४३ ॥
श्रुत्वैतद् भार्गवो रामस्तयोर्वाक्यमनिन्दितम् ।
रैणुकेयः प्रतिवचो धर्मसंहितमब्रवीत् ॥ ४४ ॥
उन दोनोंका यह निर्दोष वचन सुनकर रेणुकानन्दन भृगुवंशी परशुरामने उन्हें यह धर्मयुक्त उत्तर दिया- ॥ ४४ ॥
अपरान्तादहं कृष्ण सम्प्रतीहागतः प्रभो ।
एक एव विना शिष्यैर्युवयोर्मन्त्रकारणात् ॥ ४५ ॥
'प्रभावशाली श्रीकृष्ण ! मैं तुम दोनोंको सलाह देनेके लिये ही इस समय यहाँ अपरान्तसे अकेला ही चला आया हूँ। शिष्योंको भी मैंने साथ नहीं लिया है ॥ ४५ ॥
विदितो मे व्रजे वासस्तव पद्मनिभेक्षण ।
दानवानां वधश्चापि कंसस्यापि दुरात्मनः ॥ ४६ ॥
'कमलनयन ! तुम्हारा जो ब्रजमें निवास हुआ है तथा तुम्हारे हाथसे जो दानवों और दुरात्मा कंसका वध हुआ है, वह सब मुझे विदित है ॥ ४६ ॥
विग्रहं च जरासंधे विदित्वा पुरुषोत्तम ।
तव सभ्रातृकस्येह सम्प्राप्तोऽस्मि वरानन ॥ ४७ ॥
'सुन्दर मुखवाले पुरुषोत्तम ! जरासंधके साथ होनेवाले
विष्णुपर्व ] एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ३५९
विग्रहको जानकर ही मैं भाईसहित तुमसे मिलनेके लिये यहाँ आ गया हूँ ॥ ४७ ॥
जाने त्वां कृष्ण गोतारं जगतः प्रभुमव्ययम्।
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थमबालं बालतां गतम् ॥ ४८ ॥
'श्रीकृष्ण ! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम जगत्के रक्षक अविनाशी भगवान् हो और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये बालक न होनेपर भी बालक बनकर प्रकट हुए हो ॥ ४८ ॥'
न त्वयाविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु विद्यते।
तथापि भक्तिमात्रेण शृणु वक्ष्यामि ते वचः ॥ ४९ ॥
'(तीनों लोकोंमें जो कुछ भी है, वह तुमसे अविदित नहीं है (अतः तुम्हें सलाह देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है), तथापि मैं अपनी भक्तिमात्रसे प्रेरित हो तुमसे जो बात कहता हूँ, उसे सुनो ॥ ४९ ॥'
पूर्वजैस्तव गोविन्द पूर्वं पुरमिदं कृतम्।
करवीरपुरं नाम राष्ट्रं चैव निवेशितम् ॥ ५० ॥
'गोविन्द ! पहले तुम्हारे पूर्वजोंने यहाँ इस करवीरपुर नामक नगरका निर्माण किया और इस राष्ट्रको बसाया है ॥'
पुरेऽस्मिन् नृपतिः कृष्ण वासुदेवो महायशाः।
शृगाल इति विख्यातो नित्यं परंमकोपनः ॥ ५१ ॥
'श्रीकृष्ण ! इस करवीरपुरमें इस समय महायशस्वी वासुदेव रहता है, जो शृगाल नामसे विख्यात है। वह सदा ही अत्यन्त क्रोधमे भरा रहता है ॥ ५१ ॥'
नृपेण तेन गोविन्द तव वंशभवा नृपाः।
दायादा निहताः सर्वे वीर द्वेषानुशायिना ॥ ५२ ॥
'वीर गोविन्द ! सदा द्वेषका ही अनुसरण करनेवाले उस राजा शृगालने तुम्हारे कुलमे उत्पन्न हुए समस्त उत्तराधिकारी क्षत्रिय नरेशोंको मार डाला है ॥ ५२ ॥'
अहंकारपरो नित्यमजितात्मातिमत्सरी।
राज्यैश्वर्यमदाविष्टः पुत्रेष्वपि च दारुणः ॥ ५३ ॥
'वह नित्य घमंडमे भरा रहता है। उसका मन वशमें नहीं है। वह दूसरोंसे अत्यन्त डाह रखता है। राज्य और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त होकर अपने पुत्रोके प्रति भी निर्दयता-पूर्ण बर्ताव करता है ॥ ५३ ॥'
तन्नेह भवतः स्थानं रोचते मे नरोत्तम।
करवीरपुरे घोरे नित्यं पार्थिवदूषिते ॥ ५४ ॥
'नरश्रेष्ठ ! इसीलिये यहाँ सर्वदा इस राजाद्वारा कलङ्कित घोर करवीरपुरमें तुम्हारा ठहरना मुझे ठीक नहीं जँचता है ॥'
श्रूयतां कथयिष्यामि यत्रोभौ शत्रुबाधनौ।
जरासंधं बलोदग्रं भवन्तौ योधयिष्यतः ॥ ५५ ॥
'जहाँ रहकर तुम दोनों बन्धु शत्रुको बाधा पहुँचाते हुए बलमें बढ़े-चढ़े जरासंधके साथ युद्ध करेंगे, उस स्थानका परिचय देता हूँ; सुनो ॥ ५५ ॥'
तीर्त्वा वेणामिमां पुण्यां नदीमद्यैव बाहुभिः।
विषयान्ते निवासाय गिरि गच्छाम दुर्गमम् ॥ ५६ ॥
'हमलोग आज ही इस पुण्य नदी वेणाको भुजाओंसे ही पार करके इस देशकी सीमापर स्थित एक दुर्गम पर्वतपर चले चलें, वहीं निवास करेंगे ॥ ५६ ॥'
रम्यं यज्ञगिरिं नाम सह्यस्य प्ररुहं गिरिम्।
निवासं मांसभक्षाणां चौराणां घोरकर्मणाम् ॥ ५७ ॥
'उस पर्वतका नाम है यज्ञगिरि, जो सह्यपर्वतकी ही उपशाखा है। वह बड़ा ही रमणीय स्थान है। वहाँ इन दिनों भयानक कर्म करनेवाले मांसाहारी चोर-डाकुओंने अड्डा जमा रखा है ॥ ५७ ॥'
नानाद्रुमलतायुक्तं चित्रं पुष्पितपादपम्।
प्रोष्वे तत्र निशामेकां खट्वाङ्गां नाम निम्नगाम् ॥ ५८ ॥
भद्रं ते संतरिष्यामो निकषोपलभूषणाम्।
गङ्गाप्रपातप्रतिमां शृङ्गं च महतो गिरेः ॥ ५९ ॥
'उस पर्वतपर भाँति-भाँतिके वृक्ष और लताएँ लहलहा रही हैं। वृक्षोंमे फूल लगे हुए हैं। इससे उस पर्वतकी विचित्र शोभा होती है। वहाँ हमलोग एक रात निवास करेंगे। तदनन्तर खट्वाङ्गा नामवाली नदीको पार करेंगे, जो कसौटीके पत्थरोसे विभूषित है। तुम्हारा भला हो। वह नदी उस महान् पर्वतसे गिरी हुई है, जो गङ्गाके प्रपात-सी दिखायी देती है ॥ ५८-५९ ॥'
तस्याः प्रपातं द्रक्ष्यामस्तापसारण्यभूषणम्।
उपभुज्य त्विमान् कामान् गत्वा तान् धरणीधरान् ॥ ६० ॥
द्रक्ष्यामस्तत्र तान् विप्रान्छाम्यतो वै तपोधनान्।
रम्यं क्रौञ्चपुरं नाम गमिष्यामः पुरोत्तमम् ॥ ६१ ॥
'खट्वाङ्गाका प्रपात (झरना) तापसारण्यसे विभूषित है, हमलोग उसे देखेंगे और वहीं कुछ खा-पीकर इन कमनीय एवं प्रसिद्ध पर्वतोंपर विचरते हुए वहाँ उन तपस्वी ब्राह्मणोंका दर्शन करेंगे, जो तपमे संलग्न होकर कष्ट उठा रहे हैं। तत्पश्चात् हम रमणीय एवं श्रेष्ठ नगर क्रौञ्चपुरमें चलेंगे ॥ ६०-६१ ॥'
वंशजस्तत्र ते राजा कृष्ण धर्मरतः सदा।
महाकपिरिति ख्यातो वनवास्यजनाधिपः ॥ ६२ ॥
'श्रीकृष्ण ! वहाँ तुम्हारे ही कुलमें उत्पन्न एक राजा राज्य करते हैं, जो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं, उनका नाम है महाकपि। वे वनवासी जनपद तथा वहाँकी निवासी प्रजाओंके अधिपति हैं ॥ ६२ ॥'
३६० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तमदृष्ट्वैव राजानं निवासाय गतेऽहनि।
तीर्थमानडुहं नाम तत्रस्थाः स्याम संगताः ॥ ६३ ॥
'उस राजासे मिले बिना ही हमलोग निवासके लिये संध्या होते-होते आनडुह नामक तीर्थमें जा पहुँचेंगे और वहाँ एक साथ मिलकर रहेंगे ॥ ६३ ॥
ततश्च्युता गमिष्यामः सह्यस्य विवरे गिरिम् ।
गोमन्तमिति विख्यातं नैकशृङ्गविभूषितम् ॥ ६४ ॥
'वहाँसे उतरकर हमलोग सह्यपर्वतकी गुफामें होते हुए उस गोमन्त नामसे विख्यात शैलपर जा पहुँचेंगे, जो अनेकानेक शिखरोंसे विभूषित है ॥ ६४ ॥
स्वर्गतैकमहाशृङ्गं दुरारोहं खगैरपि ।
विश्रामभूतं देवानां ज्योतिर्भरिभिसंवृतम् ॥ ६५ ॥
'इसका एक विशाल शिखर इतना ऊँचा है कि वह स्वर्गलोकतक पहुँचा हुआ जान पड़ता है । आकाशचारी पक्षियोंके लिये भी उसपर चढ़ना कठिन है। वह देवताओंका विश्राम-स्थल है और ज्योतियोंसे घिरा हुआ है ॥ ६५ ॥
सोपानभूतं स्वर्गस्य गगनाद्रिमिवोच्छ्रितम् ।
तं विमानावतरणं गिरिं मेरुमिवापरम् ॥ ६६ ॥
'उसे स्वर्गका सोपान समझा जाता है। वह उच्चतम पर्वत (भूतलका नहीं) आकाशका-सा पर्वत जान पड़ता है। उसपर देवताओंके विमान उतरते हैं तथा वह दूसरे मेरु-गिरिके समान प्रतीत होता है ॥ ६६ ॥
तस्योत्तमे महाशृङ्गे भास्वन्तौ देवरूपिणौ ।
उदयास्तमये सूर्य सोमं च ज्योतिषां पतिम् ॥ ६७ ॥
ऊर्मिमन्तं समुद्रं च अपारद्वीपभूषणम् ।
प्रेक्षमाणौ सुखं तत्र नगाग्रे विचरिष्यथः ॥ ६८ ॥
'तुम दोनों भाई देवताओंके समान दिव्य रूपधारी तथा तेजस्वी हो । उस गोमन्त गिरिके महान् शिखरपर आरूढ़ होकर उदय और अस्तके समय सूर्य एवं नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमाका तथा अपार द्वीपोंसे विभूषित और तरङ्गमालाओंस अलंकृत समुद्रका दर्शन करते हुए तुम दोनों बन्धु वहाँ पर्वतीय शिखरके अग्रभागमें सुखपूर्वक विचरोगे ॥ ६७-६८ ॥
शृङ्गस्थौ तस्य शैलस्य गोमन्तस्य वनेचरौ ।
दुर्गयुद्धेन धावन्तौ जरासंधं विजेष्यथः ॥ ६९ ॥
'उस गोमन्त नामक शैलके शिखरपर रहकर वहाँके वनमे विचरते हुए तुम दोनों वीर दुर्ग-युद्धद्वारा धावा करके जरासंधको जीत लोगे ॥ ६९ ॥
तत्र शैलगतौ दृष्ट्वा भवन्तौ युद्धदुर्मदौ ।
आसक्तः शैलयुद्धे वै जरासंधो भविष्यति ॥ ७० ॥
'तुम दोनो रण-दुर्मद वीरोंको उस पर्वतपर आरूढ़ हुआ देख जरासंध पर्वत-युद्धमे ही आसक्त हो जायगा ॥ ७० ॥
भवतोरपि युद्धे तु प्रवृत्ते तत्र दारुणे ।
आयुधैः सह संयोगं पश्यामि नचिरादिव ॥ ७१ ॥
'वहाँ भयंकर युद्ध आरम्भ हो जानेपर तुम दोनोंके हाथमे भी शीघ्र ही दिव्य आयुधोंका संयोग हुआ देखूँगा ॥ ७१ ॥
संग्रामश्च महान् कृष्ण निर्दिष्टस्तत्र दैवतैः ।
यदूनां पार्थिवानां च मांसशोणितकर्दमः ॥ ७२ ॥
'श्रीकृष्ण ! वहाँ देवताओंने यादवों तथा अन्य राजाओंके महान् युद्धका निर्देश किया है, जिसमें रक्त और मांसकी कीच जम जानेवाली है ॥ ७२ ॥
तत्र चक्रं हलं चैव गदां कौमोदकीं तथा ।
सौनन्दं मुसलं चैव वैष्णवान्यायुधानि च ॥ ७३ ॥
दर्शयिष्यन्ति संग्रामे पास्यन्ति च महीक्षिताम् ।
रुधिरं कालयुक्तानां वपुर्भिः कालसंनिभैः ॥ ७४ ॥
'वहाँ सुदर्शन चक्र, संवर्तक हल, कौमोदकी गदा तथा सौनन्द नामक मुसल-ये विष्णुसम्बन्धी आयुध संग्राममें तुम्हें दर्शन देंगे और अपने कालके समान स्वरूपोंसे कालके अधीन हुए राजाओंका रक्त पीयेंगे ॥ ७३-७४ ॥
स चक्रमुसलो नाम संग्रामः कृष्ण विश्रुतः ।
दैवतैरिह निर्दिष्टः कालस्यादेशसंज्ञितः ॥ ७५ ॥
'श्रीकृष्ण ! वह संग्राम चक्र-मुसलके नामसे विख्यात होगा। देवताओंने इसी स्थानपर उसके होनेका संकेत किया है। वह युद्ध साक्षात् कालका आज्ञापत्र है ॥ ७५ ॥
तत्र ते कृष्ण संग्रामे सुव्यक्तं वैष्णवं वपुः ।
द्रक्ष्यन्ति रिपवः सर्वे सुराश्च सुरभावन ॥ ७६ ॥
'देवताओंकी उत्पत्ति और वृद्धि करनेवाले श्रीकृष्ण ! उस संग्राममें समस्त शत्रु और देवता भी तुम्हारे भलीभाँति व्यक्त हुए वैष्णव रूपका दर्शन करेंगे ॥ ७६ ॥
तां भजस्व गदां कृष्ण चक्रं च चिरविस्मृतम् ।
भजस्व स्वेन रूपेण सुराणां विजयाय वै ॥ ७७ ॥
'श्रीकृष्ण ! तुम अपने उसी वैष्णव रूपसे स्थित हो देवताओंकी विजयके लिये चिरकालसे भूले हुए अपने उस चक्र और गदाको ग्रहण करना ॥ ७७ ॥
बलश्चायं हलं घोरं मुसलं चारिमर्दनम् ।
वधाय सुरशत्रूणां भजताल्लोकभावनः ॥ ७८ ॥
'तथा ये लोकभावन बलराम भी देवद्रोहियोंका वध करने-के लिये अपने शत्रुविदारण घोर हल और मुसलको हाथमे ले लें ॥ ७८ ॥
एष ते प्रथमः कृष्ण संग्रामो भुवि पार्थिवैः ।
पृथिव्यर्थे समाख्यातो भारावतरणे सुरैः ॥ ७९ ॥
विष्णुपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः [ ३६१
'श्रीकृष्ण! पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूमण्डलके राजाओंके साथ तुम्हारा यह पहला संग्राम देवताओंद्वारा बताया गया है ॥ ७९ ॥
आयुधावाप्तिरत्रैव वपुषो वैष्णवस्य च ।
लक्ष्म्याश्च तेजसश्चैव व्यूहानां च विदारणम् ॥ ८० ॥
'यहीं तुम्हें अपने दिव्य आयुधोंकी, वैष्णव स्वरूपकी, लक्ष्मीकी तथा शत्रुव्यूहोंका विदारण करनेवाले तेजकी प्राप्ति होगी ॥ ८० ॥'
अतःप्रभृति संग्रामो धरण्यां शस्त्रमूर्च्छितः ।
भविष्यति महान् कृष्ण भारतं नाम वैशसम् ॥ ८१ ॥
'श्रीकृष्ण! इसके बाद पृथ्वीपर अस्त्र-शस्त्रोंसे व्याप्त एक महान् संग्राम होगा, जो लोगोंमें महाभारतके नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ८१ ॥
तद् गच्छ कृष्ण शैलेन्द्रं गोमन्तं च नगोत्तमम् ।
जरासंधमृधे चापि विजयस्त्वामुपस्थितः ॥ ८२ ॥
'अतः श्रीकृष्ण! तुम पर्वतोंमें श्रेष्ठ गिरिराज गोमन्तपर चलो। जरासंधके युद्धमें भी विजयश्री तुम्हारा ही वरण करनेके लिये प्रस्तुत है ॥ ८२ ॥
इदं चैवामृतप्रख्यं होमधेनोः पयोऽमृतम् ।
पीत्वा गच्छत भद्रं वो मयाऽऽदिष्टेन वर्त्मना ॥ ८३ ॥
'तुम्हारा कल्याण हो। मेरी इस होमधेनुका यह अमृतोपम सुमधुर दुग्ध पीकर मेरे बताये हुए मार्गसे चलो' ॥ ८३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि रामवाक्ये एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत परशुरामवाक्यविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥
चत्वारिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण, बलराम और परशुरामजीका गोमन्तपर्वतपर आरोहण, गोमन्तकी शोभाका वर्णन तथा परशुरामजीका श्रीकृष्णको युद्धके लिये प्रोत्साहन देकर वहाँसे प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
तत्त धेन्वाः पयः पीत्वा बलदर्पसमन्वितौ ।
ततस्तौ रामसहितौ प्रस्थितौ यदुपुङ्गवौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस होमधेनुका दूध पीकर बल और दर्पसे भरे हुए वे दोनों यदुपुङ्गव वीर परशुरामजीके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ १ ॥
गोमन्तं पर्वतं द्रष्टुं मत्तनागेन्द्रगामिनौ ।
जामदग्न्यप्रदिष्टेन मार्गेण वदतां वरौ ॥ २ ॥
मतवाले गजराजकी भाँति मस्तीके साथ चलनेवाले वे वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और बलराम परशुरामजीके बताये हुए मार्गसे गोमन्तपर्वतका दर्शन करनेके लिये चले ॥ २ ॥
जामदग्न्यतृतीयास्ते त्रयस्त्रय इवाग्नयः ।
शोभयन्ति स्म पन्थानं त्रिदिवं त्रिदशा इव ॥ ३ ॥
उन दोनोंके साथ तीसरे परशुरामजी थे। वे तीनों तीन अग्नियोंके समान उसी तरह उस मार्गकी शोभा बढ़ाते थे, जैसे देवता स्वर्गकी ॥ ३ ॥
ते चाध्वविधिना सर्वे ततो वै दिवसक्रमात् ।
गोमन्तमचलं प्राप्ता मन्दरं त्रिदशा इव ॥ ४ ॥
मनुष्य जिस तरह किसी मार्गपर चलते हैं, उसी विधिसे वे सब लोग यात्रा करते हुए क्रमशः कई दिनोंके बाद गोमन्त गिरिपर् जा पहुँचे, मानो देवता मन्दराचलके शिखरपर गये हों ॥ ४ ॥
लताचारुविचित्रं च नानाद्रुमविभूषितम् ।
नानागुरुपिनद्धाङ्गं चित्रं चित्रैर्मनोज्ञरैः ॥ ५ ॥
नाना प्रकारकी लताओंके विस्तारसे उस पर्वतकी सुन्दर एवं विचित्र शोभा हो रही थी। भाँति-भाँतिके वृक्ष उसके लिये भूषणका काम दे रहे थे। उस पर्वतका सारा अङ्ग अनेक प्रकारके अगुरु आदि सुगन्धित धूपोंसे व्याप्त था। मनोहर मयूर उसे और भी विचित्र शोभासे सम्पन्न किये देते थे ॥ ५ ॥
द्विरेफगणसंकीर्णं शिलासंकटपादपम् ।
मत्तबर्हिणनिर्घोषैर्नादितं मेघनादिभिः ॥ ६ ॥
भ्रमरोंसे व्याप्त और शिला तथा वृक्षोंसे भरा हुआ वह पर्वत मेघोंके समान गम्भीर स्वरोंमें बोलनेवाले मतवाले मयूरोंकी मधुर ध्वनिसे निनादित हो रहा था ॥ ६ ॥
गगनालग्नशिखरं जलदासक्तपादपम् ।
मत्तद्विपविषाणाग्रैः परिवृष्टोपलाङ्कितम् ॥ ७ ॥
उसके शिखर आकाशके ऊर्ध्वभागसे लगे हुए थे। बादल उसके वृक्षोंका आलिङ्गन करते थे तथा उसके प्रस्तरखण्ड मतवाले हाथियोंके दाँतोंके अग्रभागकी रगड़से घिसे हुए दिखायी देते थे। उन प्रस्तरोंसे अङ्कित हुआ वह पर्वत बड़ी शोभा पाता था ॥ ७ ॥
कूजद्भिश्वाण्डजगणैः समन्तात् प्रतिनादितम् ।
दरीप्रपाताम्बुरवैश्छन्नं शार्दूलतल्लजैः ॥ ८ ॥
वहाँ चारों ओर पक्षी कलरव करते थे, जिनकी प्रतिध्वनि
३६२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
सब ओर छायी रहती थी । गुफाओंमें झरनेका जल गिरनेसे जो शब्द होता था तथा बड़े-बड़े व्याघ्रोंके दहाड़नेसे जो ध्वनि होती थी, उससे भी वह पर्वत व्याप्त हो रहा था ॥ ८ ॥
नीलाश्मचयसंघातैर्बहुवर्णं यथा घनम् ।
धातुविस्त्रावदिग्धाङ्गं सानुप्रस्रवभूषितम् ॥ ९ ॥
यहाँ नीले पत्थरोंके ढेर-के-ढेर पड़े थे, जिनमें वह अनेक वर्णके मेघकी भाँति सुशोभित होता था। पानीके साथ गेरू आदि धातुओंके बहानेसे उसका अङ्ग चन्दनसे चर्चित-सा जान पड़ता था । शिखरोंसे जो झरने गिर रहे थे, वे आभूषण-के समान उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ९ ॥
कीर्णं सुरगणैः कान्तैर्मैनाकमिव कामगम् ।
उच्छ्रितं सुविशालाग्रं समूलाम्वुपरिस्रवम् ॥ १० ॥
कान्तिमान् देवता वहाँ सब ओर फैले हुए थे। वह इच्छानुसार विचरनेवाले मैनाक-सा प्रतीत होता था। अत्यन्त विशाल शिखरसे सुशोभित वह उच्चतम पर्वत अपने मूलभागसे निर्झरोंके जलकी धारा बहा रहा था ॥ १० ॥
सकाननदरीप्रस्थं श्वेताभ्रगणभूषितम् ।
पनसाम्रातकाम्रौघैर्वैत्रस्यन्दनचन्दनैः ॥ ११ ॥
तमालैलावनयुतं मरीचक्षुपसंकुलम् ।
वन, गुफा और शिखरोंसे सम्पन्न वह शैलराज श्वेत बादलोंसे विभूषित था । वहाँ कटहल, आम्रातक ( अमड़ा ), आम्रोंके समूह, बेंत, स्यन्दन ( तिनिश ), चन्दन, तमाल, इलायचीके वन तथा मिर्चकी झाड़ियों शोभा पाती थीं ॥११॥
पिप्पलीवल्लिकलिलं चित्रमिङ्गुदिपादपैः ॥ १२ ॥
द्रुमैः सर्जरसानां च सर्वतः परिशोभितम् ।
प्रांशुशालवनैर्युक्तं बहुचित्रवनैर्युतम् ॥ १३ ॥
वहाँ सब ओर पिप्पलीकी बेलें फैली थीं । इङ्गुदीके वृक्ष विचित्र शोभा दे रहे थे तथा सर्जरस ( राल ) के वृक्ष सब ओरसे उस पर्वतको सुशोभित किये हुए थे। ऊँचे-ऊँचे शाल वृक्षोंके वन तथा अन्य बहुत-से विचित्र वन उस पर्वतकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १२-१३ ॥
सर्जनिम्बार्जुनवनं पाटलीकुलसंकुलम् ।
हिन्तालैश्च तमालैश्च पुन्नागैश्चोपशोभितम् ॥ १४ ॥
राल, नीम और अर्जुन वृक्षोंका वन शोभा दे रहा था। पाड़र वृक्षोंके समूह वहाँ सब ओर छा रहे थे । हिंताल, तमाल और पुन्नाग ( जायफल ) उस शैलाग्रशिखरकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १४ ॥
जलेषु जलजैश्छन्नं स्थलेषु स्थलजैरपि ।
पङ्कजैर्द्रुमखण्डैश्च सर्वतः प्रतिभूषितम् ॥ १५ ॥
वहाँ जलोंमें जलज कमल, स्थलोंमें स्थलज कमल तथा अन्यान्य वृक्षसमूह सब ओरसे उस पर्वतके आभूषण बने हुए थे ॥ १५ ॥
जम्बूजम्बूलवृक्षाढ्यं कद्रुकन्दलभूषितम् ।
चम्पकाशोकवकुलं बिल्वतिन्दुकशोभितम् ॥ १६ ॥
जामुन, केवड़े, कद्रु, केले, चम्पा, अशोक, बकुल, बिल्व और तिन्दुक आदि वृक्षोंसे वह शैल सुशोभित था ॥
कुब्जैश्च नागपुष्पैश्च समन्तादुपशोभितम् ।
नागयूथसमाकीर्णं मृगसंघातशोभितम् ॥ १७ ॥
बहुत-से कुब्ज और नागकेसरके फूल सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ाते थे । झुंड-के-झुंड हाथी वहाँ सब ओर फैले हुए थे । मृगोंके समुदायसे वह शोभायमान था ॥ १७ ॥
सिद्धचारणरक्षोभिः सेवितप्रस्तरान्तरम् ।
गन्धर्वैश्च समायुक्तं गुह्यकैः पक्षिभिस्तथा ॥ १८ ॥
उसके प्रस्तरखण्डोंके मध्यभागोंमें सिद्ध, चारण तथा राक्षस बैठे हुए थे। गन्धर्व, गुह्यक तथा पक्षी भी उस पर्वत-का सेवन करते थे ॥ १८ ॥
विद्याधरगणैर्नित्यमनुकीर्णशिलातलम् ।
सिंहशार्दूलसंनादैः सततं प्रतिनादितम् ।
सेवितं वारिधाराभिश्चन्द्रपादैश्च शोभितम् ॥ १९ ॥
उसकी शिलाएँ सदा ही विद्याधरगणोंसे सेवित होती थीं। सिंहों और व्याघ्रोंके दहाड़नेकी ध्वनिसे यह पर्वत निरन्तर गूँजता रहता था । जलकी धाराएँ और चन्द्रमाकी किरणें उसका सेवन एवं शोभा-संवर्धन करती थीं ॥ १९ ॥
स्तुतं त्रिदशगन्धर्वरप्सरोभिरलंकृतम् ।
वनस्पतीनां दिव्यानां पुष्पैरुच्चावचैः श्रितम् ॥ २० ॥
देवता और गन्धर्व उसकी प्रशंसा करते थे । वह पर्वत अप्सराओंसे अलंकृत था। दिव्य वनस्पतियोंके नाना प्रकारके फूल वहाँ सब ओर बिखरे पड़े थे ॥ २० ॥
शक्रवज्रप्रहाराणामनभिज्ञं कदाचन ।
दावाग्निभयनिर्मुक्तं महावातभयोज्झितम् ॥ २१ ॥
उस पर्वतको कभी भी इन्द्रके वज्रप्रहारकी व्यथाका अनुभव नहीं हुआ था । वहाँ न तो दावानलका भय था और न प्रचण्ड आँधीका ॥ २१ ॥
प्रपातप्रभवाभिश्च सरिद्भिरुपशोभितम् ।
काननैरानाकारैर्विशेषपद्भिरिव श्रियम् ॥ २२ ॥
निर्झरोंसे प्रकट हुई सरिताएँ उस पर्वतको सुशोभित करती थीं । वह अपनी शोभा बढ़ाते हुए-से मुखाकार काननोंसे उपलक्षित होता था ॥ २२ ॥
जलशैवलशृङ्गाग्रैरन्मिपन्तमिव श्रिया ।
स्थलीभिर्मृगजुष्टाभिः कान्ताभिरुपशोभितम् ॥ २३ ॥
जल और सिवारसे युक्त शिखरोंके अग्रभागद्वारा मानों वह लक्ष्मीसे आँख मिला रहा था । पशुओंसे सेवित कमनीय वनस्थलियाँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं ॥ २३ ॥
पादपच्छन्नभूमिभिः सपुष्पाभिः समन्ततः ॥ २४ ॥
विष्णुपर्व ] चत्वारिंशोऽध्यायः ३६३
पार्श्वैरुपलकल्माषैर्मेघैरिव विभूषितम् ।
पादपच्छन्नभूमिभिः सपुष्पाभिः समन्ततः ॥ २४ ॥
मण्डितं वनराजीभिः प्रमदाभिः पतिर्यथा ।
पार्श्वभागमें स्थित चितकबरे प्रस्तरखण्डोंसे वह ऐसी शोभा पा रहा था, मानो बहुरंगे बादलोंसे विभूषित हो रहा हो। अपने वृक्षसमूहोंसे भूमिको ढक देनेवाली पुष्पशोभित वनश्रेणियाँ उस पर्वतको सब ओरसे घेरकर उसी प्रकार शोभा-सम्पन्न किए हुए थीं, जैसे पुष्पवती (रजस्वला होनेके पश्चात् स्नान एवं पुष्पहारसे अलंकृत) युवती स्त्रियाँ पतिको घेरकर खड़ी हों ॥ २४३॥
सुन्दरीभिर्धरीभिश्च कन्दराभिस्तथैव च ॥ २५ ॥
तेषु तेष्ववकाशेषु सदारमिव शोभितम् ।
जगह-जगह सुन्दर गुफाओं और मनोहर कन्दराओंसे अलंकृत हुआ गोमन्तगिरि विभिन्न स्थानोंमें सपत्नीक पुरुष-की भाँति शोभा पाता था ॥ २५३॥
ओषधीदीप्तशिखरं वानप्रस्थनिषेवितम् ।
जातरूपैर्वनोद्देशैः कृत्रिमैरिव भूषितम् ॥ २६ ॥
विभिन्न प्रकारकी ओषधियाँ उसके शिखरको उद्भासित किये हुए थीं। वानप्रस्थ मुनि उसका सेवन करते थे तथा उसके सहज सुन्दर वनोद्देश कृत्रिम उद्यानोंकी भाँति उसे विभूषित किये हुए थे ॥ २६ ॥
मूलेन सुविशालेन शिरसाप्युच्छ्रितेन च ।
पृथिवीमन्तरिक्षं च ग्राहयन्तमिव स्थितम् ॥ २७ ॥
वह पर्वत अपने अत्यन्त विशाल मूलभाग और उच्चतम शिखरसे पृथ्वी और आकाशमे प्रविष्ट होकर उनकी थाह लगाता हुआ-सा खड़ा था ॥ २७ ॥
ते समासाद्य गोमन्तं रम्यं भूमिधरोत्तमम् ।
रुचिरं रुरुचुः सर्वे वासायामरसंनिभाः ॥ २८ ॥
पर्वतोंमें श्रेष्ठ सुन्दर एवं मनोहर गोमन्तपर्वतपर पहुँच-कर उन सभी देवोपम पुरुषोंने वहाँ निवास करनेकी इच्छा की ॥ २८ ॥
रुरुहुस्ते गिरिवरं खमूर्ध्वमिव पक्षिणः ।
असज्जमाना वेगेन वैनतेयपराक्रमाः ॥ २९ ॥
गरुड़के समान पराक्रमी वे तीनों महापुरुष उस श्रेष्ठ पर्वतपर उसी तरह वेगसे चढ़ने लगे, जैसे पक्षी ऊपर आकाश-में उड़ते हैं। उस समय उनमेंसे किसीकी भी गति अवरुद्ध नहीं होती थी ॥ २९ ॥
ते तु तस्योत्तरं शृङ्गमारूढास्त्रिदशा इव ।
अगारं सहसा चक्रुर्मनसा निर्मितोपमम् ॥ ३० ॥
वे देवताओंकी भाँति उसके सर्वोच्च शिखरपर आरूढ़ हो गये । वहाँ उन्होंने सहसा अपने रहनेके लिये घर बना लिया, मानो मानसिक संकल्पसे ही उसका निर्माण कर लिया हो ॥ ३० ॥
निविष्टौ यादवौ दृष्ट्वा जामदग्न्यो महामतिः ।
रामोऽभिमतमक्लिष्टमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ ३१ ॥
उन दोनों यदुकुमारोंको वहाँ विराजमान हुआ देख परम बुद्धिमान् परशुरामजीने प्रसन्नतापूर्वक अपने अभीष्ट स्थानपर जानेके लिये उनसे पूछना आरम्भ किया—॥३१॥
कृष्ण यास्याम्यहं तात पुरं शूर्पारकं विभो ।
युवयोर्नास्ति चमूख्यं संग्रामे दैवतैरपि ॥ ३२ ॥
'तात ! प्रभावशाली श्रीकृष्ण ! अब मैं शूर्पारक नगरको जाऊँगा । आप दोनोंको तो युद्धमें देवता भी नहीं हरा सकते (फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या है ?) ॥ ३२ ॥
प्राप्तवानस्मि यां प्रीतिं मार्गानुगमनादपि ।
सा मे कृष्णानुगृह्णाति शरीरमिदमव्ययम् ॥ ३३ ॥
'श्रीकृष्ण ! तुम दोनोंके साथ मार्गका अनुसरण करनेसे मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई है, वह मेरे इस अविनाशी शरीर-को अनुगृहीत कर रही है ॥ ३३ ॥
इदं तत् स्थानमुद्दिष्टं यत्रायुधसमागमः ।
युवयोर्विहितो देवैः समयः साम्परायिकः ॥ ३४ ॥
'मैंने जिसे बताया था और जहाँ तुम्हें अपने दिव्य आयुध प्राप्त होनेवाले हैं, वह स्थान यही है । देवताओंने तुम्हारे लिये उनकी प्राप्तिका यही समय निर्धारित किया है, जो परलोकके लिये हितकर है ॥ ३४ ॥
देवानां मुख्य वैकुण्ठ विष्णो देवैरभीष्टुत ।
कृष्ण सर्वस्य लोकस्य शृणु मे नैष्ठिकं वचः ॥ ३५ ॥
'देवताओंमे श्रेष्ठ वैकुण्ठ ! तुम सर्वव्यापी विष्णु हो । देवताओंने सदा तुम्हारी स्तुति की है । श्रीकृष्ण ! तुम मेरी यह तात्त्विक बात सुनो, जो सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर है ॥ ३५ ॥
यदिदं प्रस्तुतं कर्म त्वया गोविन्द लौकिकम् ।
मानुषाणां हितार्थाय लोके मानुषदेहिना ॥ ३६ ॥
तस्यायं प्रथमः कल्पः कालेन तु नियोजितः ।
'गोविन्द ! तुमने मनुष्योंके हितके लिये संसारमें मानव-शरीर धारण करके जो यह लौकिक कर्म प्रारम्भ किया है, उसका यह पहला प्रयोग यहीं होने जा रहा है। कालने उसका आयोजन यहीं किया है ॥ ३६३॥
जरासंधेन चै सार्धं संग्रामे समुपस्थिते ॥ ३७॥
तत्रायुधबलं चैव रूपं च रणकर्कशम् ।
स्वयमेवात्मना कृष्ण त्वमात्मानं विधत्स्व ह ॥ ३८ ॥
'श्रीकृष्ण ! जरासंधके साथ संग्राम उपस्थित होनेपर तुम स्वयं ही अपने-आपके द्वारा अपनेको आयुध-बलसे सम्पन्न कर लेना और अपना रण-कर्कश रूप बना लेना ॥३७-३८॥