भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 369

विष्णुपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः ३४७


बृहद्रथका वह बलवान् पुत्र महान् साधनसे सम्पन्न हो श्रीकृष्णका वध चाहता हुआ फिर मथुरापुरीकी ओर लौटा ॥

तं श्रुत्वा सहिताः सर्वे निवृत्तं मगधेश्वरम्।
यादवा मन्त्रयामासुर्जरासंधभयार्दिताः ॥ ८ ॥

मगधराजको पुनः लौटा हुआ सुनकर जरासंधके भयसे पीड़ित हुए सब यादव एक साथ बैठकर मन्त्रणा करने लगे ॥

ततः प्राह महातेजा विकद्रुर्नयकोविदः ।
कृष्णं कमलपत्राक्षमग्रसेनस्य शृण्वतः ॥ ९ ॥

उस समय नीतिकुशल महातेजस्वी विकद्रुने उग्रसेनके सुनते हुए कमलनयन श्रीकृष्णसे कहा—॥ ९ ॥

श्रूयतां तात गोविन्द कुलस्यास्य समुद्भवः ।
श्रूयतामभिधास्यामि प्राप्तकालमहं ततः ।
युक्तं चेन्मन्यसे साधो करिष्यसि वचो मम ॥ १० ॥

'तात ! गोविन्द ! इस कुलकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनो। इसके लिये उपयुक्त अवसर आया है, इसलिये बता रहा हूँ; ध्यान देकर श्रवण करो। साधो ! इसे सुनकर यदि उचित समझो तो मेरे कथनानुसार कार्य करना ॥ १० ॥

यादवस्यास्य वंशस्य समुद्भवमशेषतः ।
यथा मे कथितः पूर्वं व्यासेन विदितात्मना ॥ ११ ॥

'यादववंशकी इस उत्पत्तिका सारा प्रसंग आत्मज्ञानी व्यासजीने पूर्वकालमें मुझे जैसा बताया था, वैसा ही सुना रहा हूँ ॥ ११ ॥

आसीद् राजा मनोर्वंशे श्रीमानिक्ष्वाकुसम्भवः ।
हर्यश्व इति विख्यातो महेन्द्रसमविक्रमः ॥ १२ ॥

'वैवस्वत मनुके वंशमें इक्ष्वाकुके पुत्र हर्यश्व नामसे विख्यात एक श्रीसम्पन्न राजा हो गये हैं, जो महेन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे ॥ १२ ॥

तस्यासीद् दयिता भार्या मधोर्दैत्यस्य वै सुता ।
देवी मधुमती नाम यथेन्द्रस्य शची तथा ॥ १३ ॥

'मधु नामक दैत्यकी पुत्री मधुमती देवी उनकी प्राण-प्यारी भार्या थी। जैसे इन्द्रको शची प्रिय है, उसी प्रकार हर्यश्वको मधुमती प्रिय थी ॥ १३ ॥

सा यौवनगुणोपेता रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
मनोरथकरी राज्ञः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ १४ ॥

'वह यौवनके गुणोंसे सम्पन्न थी। इस पृथ्वीपर उसके रूप सौन्दर्यकी कहीं तुलना नहीं थी। वह राजा हर्यश्वके मनोरथको सिद्ध करनेवाली होनेके कारण उन्हें प्राणोंसे भी अधिक माननीया थी ॥ १४ ॥

दानवेन्द्रकुले जाता सुश्रोणी कामरूपिणी ।
एकपत्नीव्रतधरा खेचरा रोहिणी यथा ॥ १५ ॥

'दानवराज मधुके कुलमें उत्पन्न हुई वह सुन्दर कटि-प्रदेशवाली कामरूपिणी देवी रोहिणीके समान एकपत्नीव्रतका पालन करनेवाली तथा आकाशमें विचरनेवाली थी ॥ १५ ॥

सा तमिक्ष्वाकुशार्दूलं कामयामास कामिनी ।
स कदाचिन्नरश्रेष्ठो भ्रात्रा ज्येष्ठेन माधव ॥ १६ ॥
राज्यान्निरस्तो विश्वस्तः सोऽयोध्यां सम्परित्यजत् ।
स तदाल्पपरीवारः प्रियया सहितो वने ॥ १७ ॥

'वह कामिनी होकर इक्ष्वाकुवंशके श्रेष्ठ वीर हर्यश्वको सम्पूर्ण हृदयसे चाहती थी। माधव ! एक दिन बड़े भाईने उनके विश्वासपर रहनेवाले नरश्रेष्ठ हर्यश्वको राज्यसे निकाल दिया, तब उन्होंने अयोध्या छोड़ दी और थोड़े-से परिवारके साथ अपनी प्रिया मधुमतीसहित वे वनमें रहने लगे ॥

रेमे समेत्य कालज्ञः प्रियया कमलेक्षणः ।
भ्रात्रा विनिष्कृतं राज्यात् प्रोवाच कमलेक्षणा ॥ १८ ॥

'कालकी महिमाको जाननेवाले कमलनयन हर्यश्व अपनी प्यारी पत्नीके साथ मिलकर वहाँ बड़े आनन्दसे समय बिताने लगे। एक दिन कमलनयनी मधुमतीने भाईद्वारा राज्यसे निकाले गये पतिसे कहा—॥ १८ ॥

एह्यागच्छ नरश्रेष्ठ त्यज राज्यकृतां स्पृहाम् ।
गच्छावः सहितौ वीर मधोर्मम पितुर्गृहम् ॥ १९ ॥

'नरश्रेष्ठ वीर ! अयोध्याके राज्यकी अभिलाषा छोड़ दो और आओ मेरे साथ चलो। हम दोनों मेरे पिता मधुके घरपर चलें ॥ १९ ॥

रम्यं मधुवनं नाम कामपुष्पफलद्रुमम् ।
सहितौ तत्र रंस्यावो यथा दिवि गतौ तथा ॥ २० ॥

'सुरम्य मधुवन नामक वन ही मेरे पिताका निवासस्थान है। वहाँके वृक्ष इच्छानुसार फूल और फल देनेवाले हैं। वहाँ हम दोनों साथ रहकर स्वर्गवासियोंके समान मौज करेंगे॥

पितुर्मे दयितस्त्वं हि मातुर्मम च पार्थिव ।
मत्प्रियार्थं प्रियतरो भ्रातुश्च लवणस्य वै ॥ २१ ॥

'पृथ्वीनाथ ! मेरे पिता और माता दोनोंको ही तुम बहुत प्रिय हो तथा मेरा प्रिय करनेके लिये मेरा भाई लवणासुर भी तुम्हें अत्यन्त प्रिय मानेगा ॥ २१ ॥

रंस्यावस्तत्र सहितौ राज्यस्थाविव कामगौ ।
तत्र गत्वा नरश्रेष्ठ ह्यमराविव नन्दने ।
भद्रं ते विहरिष्यावो यथा देवपुरे तथा ॥ २२ ॥

'नरश्रेष्ठ ! वहाँ जाकर हम दोनों साथ-साथ रहकर राज्यपर बैठे हुए दम्पतियोंकी भाँति इच्छानुरूप वस्तुओंका उपभोग करते हुए रमण करेंगे। जैसे देवपुरीके नन्दनवनमें देवाङ्गना और देवता विहार करते हैं, उसी प्रकार वहाँ हम दोनों विहार करेंगे। आपका भला हो ॥ २२ ॥