विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें३४८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तं त्यजाव महाराज भ्रातरं तेऽभिमानिनम्।
आवयोर्द्वेषिणं नित्यं मत्तं राज्यमदेन वै॥ २३॥
‘महाराज! आपका भाई राज्यके मदसे सदा उन्मत्त रहकर अभिमानमें भरा रहता है और हम दोनोंसे द्वेष रखता है; अतः हम दोनों उसे त्याग दें॥ २३॥
धिगिमं गर्हितं वासं भृत्यवच्च पराश्रयम्।
गच्छावः सहितौ वीर पितुर्मे भवनान्तिकम्॥ २४॥
‘दासकी भाँति दूसरेके आश्रित होकर रहना अच्छा नहीं है; अतः इस निन्दित निवासको धिक्कार है। वीर! चलो, हम दोनों मेरे पिताके घरके पास चलें’॥ २४॥
तस्य सम्यक्प्रवृत्तस्य पूर्वजं भ्रातरं प्रति।
कामार्तस्य नरेन्द्रस्य पत्न्यास्तद् रुरुचे वचः॥ २५॥
‘श्रीकृष्ण! यद्यपि हर्यश्वका अपने बड़े भाईके प्रति अच्छा बर्ताव था (वह उनसे कोई प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था), तो भी कामसे पीड़ित होनेके कारण उस नरेशको पत्नीकी बात पसंद आ गयी॥ २५॥
ततो मधुपुरं राजा हर्यश्वः स जगाम च।
भार्यया सह कामिन्या कामी पुरुषपुङ्गवः॥ २६॥
‘तब कामी पुरुषप्रवर राजा हर्यश्व अपनी कामवती पत्नीके साथ मधुपुरको चला गया॥ २६॥
मधुना दानवेन्द्रेण स साम्ना समुदाहृतः।
स्वागतं वत्स हर्यश्व प्रीतोऽस्मि तव दर्शनात्॥ २७॥
‘वहाँ दानवराज मधुने उससे सान्त्वनापूर्वक कहा—‘बेटा हर्यश्व! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारे दर्शनसे (अथवा तुमसे मिलकर) बहुत प्रसन्न हूँ॥ २७॥
यदेतन्मम राज्यं वै सर्वं मधुवनं विना।
ददामि तव राजेन्द्र वासश्च प्रतिगृह्यताम्॥ २८॥
‘राजेन्द्र! यह जो मेरा सारा राज्य है, उसे मैं केवल मधुवनको छोड़कर तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम यहाँ निवास करो॥ २८॥
वनेऽस्मिल्लवणश्चायं सहायस्ते भविष्यति।
अमित्रनिग्रहे चैव कर्णधारत्वमेष्यति॥ २९॥
‘इस वनमें यह मेरा पुत्र लवण भी तुम्हारा सहायक होगा तथा शत्रुओंका निग्रह करनेमें यह तुम्हारे लिये कर्णधारका काम देगा॥ २९॥
पालयैनं शुभं राष्ट्रं समुद्रानूपभूषितम्।
गोसमृद्धं श्रिया जुष्टमाभीरप्रायमानुपम्॥ ३०॥
‘तुम समुद्रके जलप्राय प्रदेशसे विभूषित इस शुभ राष्ट्रका पालन करो। यह गौओंसे समृद्ध और लक्ष्मीसे सेवित है तथा इसमें अधिकतर आभीर जातिके लोगोंका निवास है॥
अत्र ते वसतस्तात दुर्गं गिरिपुरं महत्।
भविता पार्थिवावासः सुराष्ट्रविषयो महान्॥ ३१॥
अनूपविषयश्चैव समुद्रान्ते निरामयः।
‘तात! यहाँ रहनेपर महान् एवं दुर्गम गिरिपुर (गिरिनार या रैवतक पर्वतसे मिला हुआ नगर) तुम्हारी राजधानीके रूपमें प्रतिष्ठित होगा। यह महान् सुराष्ट्र राज्य समुद्रके निकट और जलप्राय प्रदेशसे युक्त है। यहाँ किसी प्रकारका रोग नहीं होता॥ ३१½॥
आनर्तं नाम ते राष्ट्रं भविष्यत्यायतं महत्॥ ३२॥
तद् भविष्यमहं मन्ये कालयोगेन पार्थिव।
अध्यास्यतां यथाकालं पार्थिवं वृत्तमुत्तमम्॥ ३३॥
‘तुम्हारा विशाल एवं विस्तृत राज्य आनर्त नामसे विख्यात होगा। पृथ्वीनाथ! मेरा विश्वास है कि कालयोगसे वह अवश्यम्भावी है। तुम समयानुसार उत्तम राजोचित बर्तावका आश्रय लेकर यहाँ रहो॥ ३२-३३॥
यायातमपि वंशस्ते समेष्यति च यादवम्।
अनु वंशं च वंशस्ते सोमस्य भविता किल॥ ३४॥
‘तुम्हारा यह वंश ययाति एवं यदुके वंशमें मिल जायगा। चन्द्रवंशके भीतर तुम्हारा वंश चलेगा (सूर्यवंशसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जायगा)॥ ३४॥
एष मे विभवस्तात तवेमं विषयोत्तमम्।
दत्त्वा यास्यामि तपसे सागरं लवनालयम्॥ ३५॥
‘तात! यही मेरा विभव है। मैं तुम्हें यह उत्तम राज्य देकर तपस्याके लिये लवणसमुद्रको चला जाऊँगा॥ ३५॥
लवणेन समायुक्तस्त्वमिमं विषयोत्तमम्।
पालयस्वाखिलं तात स्वस्य वंशस्य वृद्धये॥ ३६॥
‘तात! तुम लवणके साथ रहकर अपने वंशकी वृद्धिके लिये इस समस्त उत्तम राज्यका पालन करो॥ ३६॥
बाढमित्येव हर्यश्वः प्रतिजग्राह तत् पुरम्।
स च दैत्यस्तपोवासं जगाम वरुणालयम्॥ ३७॥
‘तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर हर्यश्वने उस पुरको ग्रहण किया; फिर वह दैत्य तपस्याके लिये समुद्रको चला गया॥
हर्यश्वश्च महातेजा दिव्ये गिरिवरोत्तमे।
निवेशयामास पुरं वासार्थममरोपमः॥ ३८॥
‘अमरोंके समान महातेजस्वी हर्यश्वने दिव्य एवं श्रेष्ठ गिरिवर (रैवतक) के समीप अपने रहनेके लिये एक नगर बसाया॥ ३८॥
आनर्तं नाम तद् राष्ट्रं सुराष्ट्रं गोधनायुतम्।
अचिरेणैव कालेन समृद्धं प्रत्यपद्यत॥ ३९॥
‘आनर्त नामसे प्रसिद्ध वह गोधनसम्पन्न राष्ट्र सुराष्ट्र