विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंविष्णुपर्व ] सप्तत्रिंशोऽध्यायः [ ३४९
कहलाया और थोड़े ही समयमें समृद्धिशाली हो गया ॥३९॥
अनूपविषये चैव वेलावनविभूषितम् ।
विचित्रं क्षेत्रसस्याढ्यं प्राकारग्रामसंकुलम् ॥ ४० ॥
शशास नृपतिः स्फीतं तद् राष्ट्रं राष्ट्रवर्द्धनः ।
राजधर्मेण यशसा प्रजानां नन्दिवर्द्धनः ॥ ४१ ॥
'जलप्राय देशमें समुद्रतटवर्ती वनोंसे विभूषित, विचित्र, खेतों और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित, परकोटों और गाँवोंसे युक्त तथा धनधान्यसे सम्पन्न उस राष्ट्रपर राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले राजा हर्यश्व शासन करने लगे और राजधर्म एवं यशसे प्रजाका आनन्द बढ़ाने लगे ॥ ४०-४१ ॥
तस्य सम्यक् प्रचारेण हर्यश्वस्य महात्मनः ।
व्यवधंत तदक्षोभ्यं राष्ट्रं राष्ट्रगुणैर्युतम् ॥ ४२ ॥
'महामना हर्यश्वके उत्तम आचार-व्यवहारके कारण वह अक्षोभ्य राष्ट्र उत्तम राष्ट्रके गुणोंसे सम्पन्न हो निरन्तर उन्नति करने लगा ॥ ४२ ॥
स हि राजा स्थितो राज्ये राजवृत्तेन शोभितः ।
प्राप्तः कुलोचितां लक्ष्मीं वृत्तेन च नयेन च ॥ ४३ ॥
'राज्यपर स्थित होकर राजोचित बर्तावसे सुशोभित होनेवाले उन राजा हर्यश्वने सदाचार और उत्तम नीतिसे अपने कुलके लिये उचित लक्ष्मी प्राप्त कर ली ॥ ४३ ॥'
तस्यैव च सुवृत्तस्य पुत्रकामस्य धीमतः ।
मधुमत्यां सुतो जज्ञे यदुर्नाम महायशाः ॥ ४४ ॥
'पुत्रकी इच्छा रखनेवाले उन्हीं सदाचारी एवं बुद्धिमान् हर्यश्वके मधुमतीके गर्भसे महायशस्वी यदुका जन्म हुआ* ॥ ४४ ॥
सोऽवर्धत महातेजा यदुदुन्दुभिनिःस्वनः ।
राजलक्षणसम्पन्नः सपत्नौर्दुरतिक्रमः ॥ ४५ ॥
'महातेजस्वी यदुका स्वर दुन्दुभिनिनादके समान गम्भीर था। वे राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न होकर दिनोंदिन बढ़ने लगे। शत्रुओंके लिये वे सर्वथा दुर्जय थे ॥ ४५ ॥
यदुर्नामाभवत् पुत्रो राजलक्षणपूजितः ।
यथास्य पूर्वजो राजा पूरुः स सुमहायशाः ॥ ४६ ॥
'हर्यश्वका वह पुत्र यदु नामसे ही विख्यात हुआ। यदु राजोचित लक्षणोंसे सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पूर्वज राजा महायशस्वी पूरु सम्मानित होते थे ॥ ४६ ॥
* कहते हैं, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र वसिष्ठ किसी कारणवश मित्रावरुणके अंशसे नूतन शरीर धारण करके प्रकट हुए; फिर भी वसिष्ठ ही बने रहे, उसी प्रकार ययातिपुत्र महाराज यदु ही योग-बलसे हर्यश्वके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे और उसी पूर्व नामसे प्रख्यात हुए।
स एक एव तस्यासीत् पुत्रः परमशोभनः ।
ऊर्जितः पृथिवीभर्त्ता हर्यश्वस्य महात्मनः ॥ ४७ ॥
'महामना हर्यश्वके एक ही पुत्र यदु हुए। वे परम सुन्दर, बलवान् और पृथ्वीका भरण-पोषण करनेमें समर्थ थे ॥ ४७ ॥
दस वर्षसहस्राणि स कृत्वा राज्यमव्ययम् ।
जगाम त्रिदिवं राजा धर्मेणाप्रतिमो भुवि ॥ ४८ ॥
'राजा हर्यश्व दस हजार वर्षोंतक अक्षय राज्यका उपभोग करके स्वर्गलोकमें चले गये । वे भूमण्डलके अनुपम धर्मात्मा थे ॥ ४८ ॥
ततो यदुरदीनात्मा प्रजाभिस्त्वभ्यषिच्यत ।
पितुर्युपरते श्रीमान् क्रमेणार्क इवोदितः ॥ ४९ ॥
'पिताके मर जानेपर प्रजाओंने उदारचेता श्रीमान् यदु-को उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वे क्रमशः एक सूर्यके बाद दूसरे सूर्यके समान उदित हो प्रकाशित होने लगे ॥ ४९ ॥
शशास चेमां वसुधां प्रशान्तभयतस्कराम् ।
यदुरिन्द्रप्रतीकाशो नृपो येनास्म यादवाः ॥ ५० ॥
'वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदु, जिनके कारण हमलोग यादव कहलाते हैं, जब इस पृथ्वीका शासन करने लगे, तब यहाँका सारा भय शान्त हो गया। चोर-लुटेरे आदि लुप्त हो गये ॥ ५० ॥
स कदाचिन्नृपश्चक्रे जलक्रीडां महोदधौ ।
दारैः सह गुणोदारैः सतार इव चन्द्रमाः ॥ ५१ ॥
'एक समयकी बात है, राजा यदु अपनी उदार गुणवाली पत्नियोंके साथ ताराओंसहित चन्द्रमाके समान महासागरमें जलक्रीडा कर रहे थे ॥ ५१ ॥
स तत्र सहसा क्षिप्तस्तितीर्षुः सागराम्भसि ।
धूम्रवर्णेन नृपतिः सर्पराजेन वीर्यवान् ॥ ५२ ॥
सोऽपाकृष्यत वेगेन जले सर्पपुरं महत् ।
'वे पराक्रमी राजा यदु जलको पार करके निकलना ही चाहते थे कि सहसा किसीने उन्हें समुद्रके गहरे जलमें डाल दिया। बात यह हुई कि सर्पोंके राजा धूम्रवर्णने बड़े वेगसे उनको खींचा और जलके भीतर बसे हुए सर्पोंके एक महान् नगरमें पहुँचा दिया ॥ ५२३ ॥
मणिस्तम्भगृहद्वारं मुक्तादामविभूषितम् ॥ ५३ ॥
कीर्णं शङ्खकुलैः शुभ्रै रत्नरैशिविभूषितम् ।
प्रवालाङ्कूरपत्राढ्यैः पादपैरुपशोभितम् ॥ ५४ ॥
'वहाँके खम्भे, घर और द्वार सभी मणियोंके बने हुए थे। उन सबको मोतीकी लड़ियों एवं झालरोंसे सजाया गया था। वहाँ ढेर-के-ढेर श्वेत शङ्खोंके समूह पड़े हुए थे। रत्न-